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अध्याय इक्कीसवाँ: भरत का राजवंश
9.21श्रीशुक उवाचवितथस्य सुतान्मन्योर्बृहत्क्षत्रो जयस्ततः ।
महावीरयों नरोगर्ग: सट्डू तिस्तु नरात्मज: ॥
१॥
श्री-शुकः उवाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; वितथस्य--वितथ ( भरद्वाज ) का, जिसे भरत ने निराशा की विशेष परिस्थिति मेंगोद लिया था; सुतात्--पुत्र से; मन्यो: --मन्यु; बृहक्क्षत्र:--बृहत्क्षत्र; जयः--जय ; ततः--उससे; महावीर्य: --महावीर्य; नर: --नर;गर्ग:-गर्ग; सल्लू तिः--संकृति; तु--निश्चय ही; नर-आत्मज:--नर का पुत्र |
शुकदेव गोस्वामी ने कहा: चूँकि मरुत्गणों ने भरद्वाज को लाकर दिया था इसलिए वह वितथकहलाया।
वितथ के पुत्र का नाम मन्यु था जिसके पाँच पुत्र हुए--बृहक्क्षत्र, जय, महावीर्य, नर तथागर्ग।
इन पाँचों में से नर के पुत्र का नाम संकृति था।
गुरुश्न रन्तिदेवश्च सड्डू ते: पाण्डुनन्दन ।
रन्तिदेवस्य महिमा इहामुत्र च गीयते ॥
२॥
गुरुः--गुरु नामक पुत्र; च--तथा; रन्तिदेवः च--तथा रन्तिदेव; सड्डू तेः--संकृति से; पाण्डु-नन्दन--हे पाण्डु के वंशज, महाराजपरीक्षित; रन्तिदेवस्य--रन्तिदेव की; महिमा-- ख्याति; इह--इस संसार में; अमुत्र--तथा परलोक में; च-- भी; गीयते--गाई जातीहैहे महाराज परीक्षित, हे पाण्डु वंशज, संकृति के दो पुत्र थे--गुरु तथा रन्तिदेव।
रन्तिदेव इसलोक में तथा परलोक दोनों में ही विख्यात हैं क्योंकि उनकी महिमा का गान न केवल मानव समाजमें अपितु देव समाज में भी होता है।
विदद्वित्तस्थ ददतो लब्धं लब्धं बुभुक्षतः ।
निष्किज्ञनस्य धीरस्य सकुट॒म्बस्य सीदतः ॥
३॥
व्यतीयुरष्टचत्वारिंशदहान्यपिबत:ः किल ।
घृतपायससंयावं तोयं॑ प्रातरूपस्थितम् ॥
४॥
कृच्छ॒प्राप्तकुटुम्बस्य क्षुत्तृड्भ्यां जातवेषथो: ।
अतिथिर्त्राह्मण: काले भोक्तुकामस्थ चागमत् ॥
५॥
वियत्ू-वित्तस्थ--रन्तिदेव का, जिसे विधाता से वस्तुएँ प्राप्त होती थीं जिस तरह चातक पक्षी आकाश से जल प्राप्त करता है;ददतः--अन्यों को बाँट दिया; लब्धम्--जो कुछ प्राप्त हुआ; लब्धम्--ऐसे प्राप्त पदार्थ; बुभुक्षतः-- भोग किया; निष्किक्ननस्य--सदैव धनहीन; धीरस्य--फिर भी अत्यन्त धीर; स-कुटुम्बस्थ--अपने परिवार के साथ भी; सीदतः--अत्यधिक कष्ट भोगता;व्यतीयु:--बीत गये; अष्ट-चत्वारिंशत्-- अड़तालीस; अहानि--दिन; अपिबत:--जल पिये बिना; किल--निस्सन्देह; घृत-पायस--घी तथा दूध से बना भोजन; संयावम्--व्यंजन; तोयम्ू--जल; प्रात:--प्रातःकाल; उपस्थितम्--संयोगवश आ गया; कृच्छू-प्राप्त--कष्ट पाते हुए; कुटुम्बस्थ--कुट॒म्बियों का; क्षुत्-तृड्भ्याम्-- भूख तथा प्यास से; जात--हो गया; वेपथो: --कम्पित; अतिथि:--अतिथि; ब्राह्मण:--ब्राह्मण; काले--उस समय; भोक्तु-कामस्थ--कुछ खाने के लिए इच्छुक रन्तिदेव का; च-- भी; आगमत्--वहाँआ गया
रन्तिदेव ने कभी कुछ भी कमाने का यत्त नहीं किया।
उसे भाग्य से जो मिल जाता उसे हीभोगता, किन्तु जब अतिथि आ जाते तो वह हर वस्तु उन्हें दे देता था।
इस तरह उसे तथा उसके साथउसके परिवार के सदस्यों को काफी कष्ट सहना पड़ा।
वह तथा उसके परिवार के लोग अन्न तथा जलके अभाव से गंभीर रहते थे फिर भी रन्तिदेव धीर बना रहता।
एक बार अड़तालीस दिनों तक उपवासकरने के बाद रन्तिदेव को प्रातःकाल थोड़ा जल तथा घी और दूध से बने कुछ व्यंजन प्राप्त हुए,किन्तु जब वह तथा उसके परिवार वाले भोजन करने ही वाले थे तो एक ब्राह्मण अतिथि आ धमका।
तस्मै संव्यभजत्सोन्नमाहत्य श्रद्धयान्वित: ।
हरिं सर्वत्र सम्पश्यन्स भुक्त्वा प्रययौ द्विज:ः ॥
६॥
तस्मै--उस ( ब्राह्मण ) को; संव्यभजत्--बाँट कर अपना हिस्सा दे दिया; सः--उसने; अन्नमू-- भोजन; आहत्य--आदरपूर्वक;श्रद्धया अन्वित:--अत्यन्त श्रद्धापूर्वक; हरिम्ू-- भगवान् को; सर्वत्र--सभी जगह, हर जीव के हृदय में; सम्पश्यन्ू--देखते हुए; सः--वह; भुक्त्वा--भोजन करके; प्रययौ--उस स्थान से चला गया; द्विज:--ब्राह्मण |
चूँकि रन्तिदेव को सर्वत्र एवं हर जीव में भगवान् की उपस्थिति का बोध होता था अतएव वहबड़े ही श्रद्धा-सम्मान से अतिथि का स्वागत करता और उसे भोजन का अंश देता था।
उस ब्राह्मणअतिथि ने अपना भाग खाया और फिर चला गया।
अथान्यो भोक्ष्यमाणस्य विभक्तस्य महीपते: ।
विभक्तं व्यभजत्तस्मै वृषलाय हरिं स्मरन् ॥
७॥
अथ--त्पश्चात्; अन्य:--दूसरा अतिथि; भोक्ष्यमाणस्य--बस खाने ही जा रहे थे; विभक्तस्य--परिवार के लिए हिस्सा अलग करतेहुए; महीपतेः --राजा का; विभक्तम्--परिवार के लिए नियत भोजन; व्यभजत्--हिस्से लगाकर बाँट दिया; तस्मै--उस; वृषलाय--शूद्र को; हरिम्ू-- भगवान् का; स्मरन्ू--स्मरण करते हुए।
तत्पश्चात् शेष भोजन को अपने परिवार वालों मे बाँट देने के बाद रन्तिदेव अपना हिस्सा खानेजा ही रहे थे कि एक शूद्र अतिथि वहाँ आ गया।
इस शूद्र को भगवान् से सम्बन्धित देखकर राजारन्तिदेव ने उसे भी भोजन में से एक अंश दिया।
याते शूद्रे तमन्योगादतिथि: श्रभिरावृतः ।
राजन्मे दीयतामन्न॑ं सगणाय बुभुक्षते ॥
८॥
याते--चले जाने पर; शूद्रे--शूद्र अतिथि के; तमू--राजा के पास; अन्य:--दूसरा; अगातू--वहाँ आया; अतिथि:--मेहमान; श्वभिःआवृतः-कुत्तों से घिरा हुआ; राजन्ू--हे राजा; मे--मुझको; दीयतामू--दीजिये; अन्नम्ू--खाद्य पदार्थ; स-गणाय--कुत्तों समेत;बुभुक्षते-- भूखा होने के कारण।
जब शूद्र चला गया तो एक दूसरा मेहमान आया जिसके साथ कुत्ते थे।
उसने कहा, 'हे राजा, मैंतथा मेरे साथ के ये कुत्ते अत्यन्त भूखे हैं।
कृपया हमें कुछ खाने को दें।
'स आहत्यावशिष्ट यद्वहुमानपुरस्कृतम् ।
तच्च दत्त्वा नमश्नक्रे श्रभ्य: श्रपतये विभुः ॥
९॥
सः--वह ( राजा रन्तिदेव ); आहत्य--आदरपूर्वक; अवशिष्टम्-ब्राह्मण तथा शूद्र को खिलाने के बाद बचा हुआ भोजन; यत्--जितना भी; बहु-मान-पुरस्कृतम्--अत्यन्त आदर करते हुए; तत्--वह; च-- भी; दत्त्वा--देकर; नम:-चक्रे --नमस्कार किया;श्रभ्य:--कुत्तों के साथ; श्र-पतये--कुत्तों के मालिक को; विभुः--शक्तिशाली राजा
राजा रन्तिदेव ने अतिथि रूप में आये कुत्तों और कुत्तों के मालिक को अत्यन्त आदरपूर्वक बचाहुआ भोजन दे दिया।
राजा ने उनका सभी प्रकार से आदर किया और नमस्कार किया।
पानीयमात्रमुच्छेषं तच्चैकपरितर्पणम् ।
पास्यतः पुल्कसोभभ्यागादपो देहाशुभाय मे ॥
१०॥
पानीय-मात्रमू--केवल पीने का जल; उच्छेषम्--उच्छिष्ट भोजन; तत् च--वह भी; एक--एक के लिए; परितर्पणम्--तुष्ट करते हुए;पास्यतः--ज्योंही राजा पीने को हुआ; पुल्कस:ः--चण्डाल; अभ्यागात्--वहाँ आया; अप:--जल; देहि--कृपया दें; अशुभाय--अधम चण्डाल होने पर भी; मे--मुझको |
तत्पश्चात् केवल पीने का जल ही बच रहा जो केवल एक व्यक्ति को संतुष्ट करने के लिए हीपर्याप्त था।
किन्तु ज्योंही राजा जल पीने को हुआ कि एक चण्डाल वहाँ आया और कहने लगा, 'हेराजा, मैं निम्नकुल में उत्पन्न ( नीच ) हूँ।
कृपा करके मुझे पीने के लिए थोड़ा जल दें।
'तस्य तां करुणां वाच॑ निशम्य विपुल श्रमाम् ।
कृपया भृशसन्तप्त इदमाहामृतं वचः ॥
११॥
तस्य--उसका ( चण्डाल ) का; तामू--उन; करुणाम्ू--दयनीय; वाचम्--शब्दों को; निशम्य--सुनकर; विपुल--अत्यधिक;अ्रमामू--थका हुआ; कृपया--दया करके; भृूश-सन्तप्त:--अत्यन्त दुखी; इदम्--ये सब; आह--बोला; अमृतम्--मधुर; बच: --शब्द
बेचारे थके चण्डाल के दयनीय वचनों को सुनकर दुखित महाराज रन्तिदेव ने इस प्रकार केअमृततुल्य वचन कहे।
न कामयेहं गतिमीश्चरात्पराम्अष्ट््वियुक्तामपुनर्भव वा ।
आर्ति प्रपद्येईखखिलदेहभाजाम्अन्तःस्थितो येन भवन्त्यदु:ःखा: ॥
१२॥
न कामये--नहीं चाहता; अहम्--मैं; गतिम्--गन्तव्य; ईश्वरात्-- भगवान् से; पराम्ू--महान; अष्ट-ऋद्धि-युक्ताम्-- आठ प्रकार कीसिद्धियों से रचित; अपुन:ः-भवम्--बारम्बार जन्म का अन्त ( मोक्ष ); वा--अथवा; आर्तिम्--कष्ट; प्रपद्ये--स्वीकार करता हूँ;अखिल-देह- भाजाम्--सारे जीवों के; अन्तः-स्थित:-- भीतर स्थित; येन--जिससे; भवन्ति--होते हैं; अदुःखा:--दुखरहित
मैं ईश्वर से न तो योग की अष्ट सिद्ध्रियों के लिए प्रार्थना करता हूँ न जन्म-मृत्यु के चक्र से मोक्षकी कामना करता हूँ।
मैं सारे जीवों के बीच निवास करके उनके लिए सारे कष्टों को भोगना चाहताहूँ जिससे वे कष्ट से मुक्त हो सकें।
क्षुत्तट् अ्रमो गात्रपरिभ्रमश्चदैन्यं कलम: शोकविषादमोहा: ।
सर्वे निवृत्ता: कृपणस्य जन्तोर्जिजीविषोर्जीवजलार्पणान्मे ॥
१३॥
क्षुत्ू-- भूख; तृटू--तथा प्यास से; श्रम: -- थकावट; गात्र-परिभ्रम: --शरीर का काँपना; च-- भी; दैन्यम्ू--गरीबी; क्लम:--कष्ट;शोक--संताप; विषाद--खिन्नता; मोहा: --तथा मोह; सर्वे--सभी; निवृत्ता:--समाप्त; कृपणस्य--गरीब; जन्तो: --जीव ( चण्डाल )की; जिजीविषो:--जीने की इच्छा; जीव--प्राण बचाने के लिए हुए; जल--जल; अर्पणात्--प्रदान करने से; मे--मेरा
जीवन के लिए संघर्ष करते हुए बेचारे चण्डाल की जान बचाने के लिए अपना जल देकर मैंसारी भूख, प्यास, थकान, शरीर-कम्पन, खिन्नता, क्लेश, संताप तथा मोह से मुक्त हो गया हूँ।
इति प्रभाष्य पानीयं प्रियमाण: पिपासया ।
पुल्कसायाददाद्धीरो निसर्गकरुणो नूप: ॥
१४॥
इति--इस तरह; प्रभाष्य--यह कह कर; पानीयम्--पीने का जल; प्रियमाण: --मरणासन्न; पिपासया--प्यास के कारण;पुल्कसाय--चण्डाल को; अददात्--दे दिया; धीर:--धीर; निसर्ग-करुण: --स्वभाव से दयालु; नृप:--राजा ने
इस तरह कहकर प्यास के मारे मरते हुए राजा रन्तिदेव ने बिना किसी हिचक के अपने हिस्से काजल चण्डाल को दे दिया क्योंकि राजा स्वभाव से अत्यन्त दयालु तथा शान्त था।
तस्य त्रिभुवनाधीशा: फलदा: फलमिच्छताम् ।
आत्मानं दर्शयां चक्रुर्माया विष्णुविनिर्मिता: ॥
१५॥
तस्य--उसके समक्ष; त्रि-भुवन-अधीशा:--तीनों लोकों के नियन्ता ( यथा ब्रह्मा, शिव जैसे देवतागण ); फलदा:--फल देने वाले;'फलम् इच्छताम्-- भौतिक लाभ की इच्छा रखने वाले; आत्मानम्--अपना स्वरूप; दर्शयाम् चक्रु:--प्रकट किया; माया:--मोहकशक्ति; विष्णु--विष्णु द्वारा; विनिर्मिता: -- उत्पन्न |
तत्पश्चात् लोगों को इच्छित फल देकर उनकी सारी भौतिक इच्छाओं को पूरा करने वाले ब्रह्माजीतथा शिवजी जैसे देवताओं ने राजा रन्तिदेव के समक्ष अपना स्वरूप प्रकट किया क्योंकि वे हीब्राह्मण, शूद्र, चण्डाल इत्यादि के रूप में उनके पास आये थे।
स वै तेभ्यो नमस्कृत्य निःसड़ो विगतस्पृहः ।
वबासुदेवे भगवति भकत्या चक्रे मन: परम् ॥
१६॥
सः--वह ( राजा रन्तिदेव ); वै--निस्सन्देह; तेभ्य:--ब्रह्मा जी, शिवजी इत्यादि अन्य देवताओं को; नमः-कृत्य--नमस्कार करके;निःसड्ृः--निष्काम; विगत-स्पृह:-- किसी प्रकार की भौतिक सम्पत्ति की इच्छा न करते हुए; वासुदेवे--वासुदेव में; भगवति--भगवान्; भक्त्या--भक्ति के द्वारा; चक्रे --स्थिर किया; मन:--मन को; परम्--चरम लक्ष्य के रूप में |
राजा रन्तिदेव को देवताओं से किसी प्रकार का भौतिक लाभ प्राप्त करने की कोई आकांक्षा नथी।
उसने उन्हें प्रणाम किया, किन्तु भगवान् विष्णु या वासुदेव में अनुरक्त होने के कारण उसने अपनेमन को भगवान् विष्णु के चरणकमलों में स्थिर कर लिया।
ईश्वरालम्बनं चित्तं कुर्वतोनन्यराधस: ।
माया गुणमयी राजन्स्वणवत्प्रत्यलीयत ॥
१७॥
ईश्वर-आलम्बनम्-- भगवान् के चरणकमलों में पूरी तरह शरण लेना; चित्तम्--चेतना; कुर्वत:--स्थिर करके; अनन्य-राधस: --रन्तिदेव के लिए जो अविचल था और भगवान् की सेवा के अतिरिक्त कुछ नहीं चाहता था; माया-- भ्रामक शक्ति; गुण-मयी --प्रकृतिके तीन गुणों से युक्त; राजन्ू--हे महाराज परीक्षित; स्वप्न-वत्--सपने के समान; प्रत्यलीयत--नष्ट हो गईं।
हे महाराज परीक्षित, चूँकि राजा रन्तिदेव शुद्ध भक्त, सदैव कृष्णभावनाभावित तथा पूर्णरूपेणनिष्काम था अतएव भगवान् की माया उसके समक्ष प्रकट नहीं हो सकी।
उल्टे, माया स्वप्न के समानपूरी तरह नष्ट हो गई।
तत्प्रसड्रानुभावेन रन्तिदेवानुवर्तिन: ।
अभवनन््योगिनः सर्वे नारायणपरायणा: ॥
१८॥
तत्-प्रसड़र-अनु भावेन--राजा रन्तिदेव की संगति के कारण ( उनसे भक्तियोग के विषय में बातें करते हुए ); रन्तिदेव-अनुवर्तिन: --राजा रन्तिदेव के अनुयायी ( उनके नौकर, परिवार वाले, मित्र, इत्यादि ); अभवनू्--हो गये; योगिन:-- श्रेष्ठ भक्तियोगी; सर्वे --सभी;नारायण-परायणा: -- भगवान् नारायण के भक्त |
जिन लोगों ने राजा रन्तिदेव के सिद्धान्तों का पालन किया उन सबों को उनकी कृपा प्राप्त हुईऔर वे भगवान् नारायण के शुद्ध भक्त बन गये।
इस तरह वे सभी श्रेष्ठ योगी बन गये।
गर्गाच्छिनिस्ततो गार्ग्य: क्षत्राद्रह्म हावर्तत ।
दुरितक्षयो महावीर्यात्तस्य त्रय्यारुणि: कवि: ॥
१९॥
पुष्करारुणिरित्यत्र ये ब्राह्मणगतिं गता: ।
बृहक्क्षत्रस्य पुत्रो भूद्धस्ती यद्धस्तिनापुरम् ॥
२०॥
गर्गातू-गर्ग से ( भरद्वाज के अन्य पौत्र से ); शिनि:ः--शिनि नामक पुत्र; ततः--उससे ( शिनि से ); गार्ग्य; --गार्ग्य नामक पुत्र;क्षत्रातू-क्षत्रिय होते हुए भी; ब्रह्म-- ब्राह्मण; हि--निस्सन्देह; अवर्तत--हो सका; दुरितक्षय:--दुरितक्षय नामक पुत्र; महावीर्यात् --महावीर्य से ( भरद्वाज के अन्य पौत्र से ); तस्थ--उसका; त्रय्यारुणि:--त्रय्यारुणि नामक पुत्र; कवि:--कवि नामक पुत्र;पुष्करारुणि:--पुष्करारुणि नामक पुत्र; इति--इस प्रकार; अतन्र--यहाँ; ये--वे सभी; ब्राह्मण-गतिम्--ब्राह्मणों का पद; गता:--प्राप्तहुआ; बृहक्क्षत्रस्य--बृहत्क्षत्र का, जो भरद्वाज का पौत्र था; पुत्र:--पुत्र; अभूत्--हुआ; हस्ती--हस्ती; यत्--जिससे; हस्तिनापुरम्--हस्तिनापुर ( नई दिल्ली ) की स्थापना हुई |
गर्ग से शिनि नामक पुत्र उत्पन्न हुआ जिसका पुत्र गार्ग्य हुआ।
यद्यपि गार्ग्य क्षत्रिय था, किन्तुउससे ब्राह्मण कुल की उत्पत्ति हुईं।
महावीर्य का पुत्र दुरितक्षय हुआ, जिसके तीन पुत्र थे--त्रय्यारुणि, कवि तथा पुष्करारुणि।
यद्यपि दुरितक्षय के ये पुत्रक्षत्रिय कुल में उत्पन्न हुए थे, किन्तुउन्हें भी ब्राह्मण पद प्राप्त हुआ।
बृहक्क्षत्र का एक पुत्र हस्ती था जिसने हस्तिनापुर नामक नगर ( आजकी नई दिल्ली ) की स्थापना की।
अजमीढो द्विमीढश्न पुरुमीढश्च हस्तिन: ।
अजमीढस्य वंश्या: स्यु: प्रियमेधादयो द्विजा: ॥
२१॥
अजमीढ: --अजमीढ; द्विमीढ:--ट्विमीड; च-- भी; पुरुमीढ:--पुरुमीढ; च-- भी; हस्तिन: --हस्ती के पुत्र बने; अजमीढस्य--अजमीढ के; वंश्या:--वंशज; स्युः--हैं; प्रियमेध-आदय: --प्रियमेध इत्यादि; द्विजा:--ब्राह्मण |
राजा हस्ती के तीन पुत्र हुए--अजमीढ, द्विमीढ, तथा पुरुमीढ।
अजमीढ के वंशजों में प्रियमेथप्रमुख था और उन सबों ने ब्राह्मण पद प्राप्त किया।
अजमीढाह्ठहदिषुस्तस्य पुत्रो बृहद्धनुः ।
बृहत्कायस्ततस्तस्य पुत्र आसीज्यद्रथ: ॥
२२॥
अजमीढातू्--अजमीढ से; बृहदिषु:--बृहदिषु नामक पुत्र; तस्थ--उसका; पुत्र:--पुत्र; बृहद्धनु:--बृहद्धनु; बृहत्काय: --बृहत्काय;ततः-तत्पश्चात्; तस्थ--उसका; पुत्र:--पुत्र; आसीतू-- था; जयद्रथ: --जयद्रथ |
अजमीढ का पुत्र बृहदिषु था, बृहदिषु का पुत्र बृहद्धनु था, बृहद्धनु का पुत्र बृहत्काय था औरबृहत्काय से जयद्रथ नामक पुत्र हुआ।
तत्सुतो विशदस्तस्य स्येनजित्समजायत ।
रुचिराश्वो हढहनुः काश्यो वत्सश्न तत्सुता: ॥
२३॥
तत्ू-सुत:--जयद्रथ का पुत्र; विशद: --विशद्; तस्थ--उसका; स्येनजित्ू--स्येनजित; समजायत--उत्पन्न हुआ; रुचिराश्व:--रुचिराश्च; हृढहनु:--हृढ्हनु; काश्य: --काश्य; वत्स:--वत्स; च-- भी; तत्-सुता: --स्येनजित के पुत्र |
जयद्रथ का पुत्र विशद था और उसका पुत्र स्येनजित था।
स्येनजित के पुत्रों के नाम थे रुचिराश्व,हृढहनु, काश्य तथा वत्स।
रुचिराश्वसुतः पार: पृथुसेनस्तदात्मज: ।
पारस्य तनयो नीपस्तस्य पुत्रशतं त्वभूत् ॥
२४॥
रुचिराश्च-सुतः--रुचिराश्च का पुत्र; पार: --पार; पृथुसेन: --पृथुसेन; तत्--उसका; आत्मज: --पुत्र; पारस्थ--पार का; तनयः --पुत्र;नीप:--नीप; तस्य--उसके ; पुत्र-शतम्--एक सौ पुत्र; तु--निस्सन्देह; अभूत्-उत्पन्न हुए।
रुचिराश्व का पुत्र पार था और पार के पुत्र पृथुसेन तथा नीप थे।
नीप के एक सौ पुत्र थे।
स कृत्व्यां शुककन्यायां ब्रह्मदत्तमजीजनतू ।
योगी स गवि भार्यायां विष्वक्सेनमधात्सुतम् ॥
२५॥
सः--उसने ( नीप ); कृत्व्यामू-कृत्वी नामक पत्नी से; शुक-कन्यायाम्-शुक की कन्या से; ब्रह्मदत्तम्-ब्रह्मदत्त नामक पुत्र;अजीजनतू--उत्पन्न किया; योगी--योगी; सः--वह ब्रह्मदत्त; गवि--गौ या सरस्वती नाम की; भार्यायाम्ू--पली के गर्भ से;विष्वक्सेनम्-विष्वक्सेन को; अधात्--उत्पन्न किया; सुतम्--पुत्र |
शुक की पुत्री अर्थात् नीप की पती कृत्वी के गर्भ से राजा नीप के ब्रह्मदत्त नाम का पुत्र उत्पन्नहुआ।
ब्रह्मदत्त महान् योगी था।
उसकी पत्नी सरस्वती के गर्भ से विष्वक्सेन नाम का पुत्र उत्पन्न हुआ।
जैगीषव्योपदेशेन योगतन्त्रं चकार ह ।
उदक्सेनस्ततस्तस्माद्धल्लाटो बाहदीषवा: ॥
२६॥
जैगीषव्य--जैगीषव्य नामक महान् ऋषि के; उपदेशेन--उपदेश से; योग-तन्त्रमू--योगविधि का विस्तृत वर्णन; चकार--संकलितकिया; ह--भूतकाल में; उदक्सेन:--उदक्सेन; तत:--उससे ( विष्वक्सेन से ); तस्मात्--उससे ( उदक्सेन से ); भललाट:-- भल्लाटनामक पुत्र; बाहदीषवा:--बृहदिषु के वंशज।
जैगीषव्य ऋषि के उपदेशानुसार विष्वक्सेन ने योगपद्धति का विस्तृत वर्णन संकलित किया।
विष्वक्सेन से उदक्सेन उत्पन्न हुआ और उदक्सेन से भललाट।
ये सभी पुत्र बृहदिषु के वंशज थे।
यवीनरो द्विमीढस्य कृतिमांस्तत्सुतः स्मृतः ।
नाम्ना सत्यधृतिस्तस्य हृढनेमि: सुपार्थकृत् ॥
२७॥
यवीनर:--यवीनर; द्विमीढस्थ--द्विमीढ का पुत्र; कृतिमान्ू--कृतिमान; तत्-सुत:--यवीनर का पुत्र; स्मृत:--विख्यात है; नाम्ता--नाम से; सत्यधृति:--सत्यधूति; तस्थ--उसका; हृढनेमि: --हढनेमि; सुपार्थ-कृत्--सुपार्थ का पिताद्विमीढ का पुत्र यवीनर था और उसका पुत्र कृतिमान था।
कृतिमान का पुत्र सत्यधृति के नाम सेविख्यात था।
सत्यधृति से हृढनेमि नाम का पुत्र हुआ जो सुपार्श का पिता बना।
सुपार्श्रात्सुमतिस्तस्य पुत्र: सन्नतिमांस्ततः ।
कृती हिरण्यनाभाद्यो योगं प्राप्प जगौ सम घटू ॥
२८॥
संहिताः प्राच्यसाम्नां वै नीपो ह्युदग्रायुधस्ततः ।
तस्य क्षेम्य: सुवीरोथ सुवीरस्य रिपुञ्रय: ॥
२९॥
सुपार्थात्ू--सुपार्थ से; सुमतिः--सुमति नामक पुत्र; तस्य पुत्र:--उसका बेटा ( सुमति का बेटा ); सन्नतिमान्--सन्नतिमान; ततः--उससे; कृती--कृती नामक पुत्र; हिरण्यनाभात्-- ब्रह्मा से; यः--जो; योगम्--योगशक्ति; प्राप्प--प्राप्त करके; जगौ--पढ़ाया; स्म--भूतकाल में; षघटू--छ: ; संहिता:--संहिताएँ; प्राच्यसाम्नामू--सामवेद के प्राच्यसाम नामक एलोकों का; बै--निस्सन्देह; नीप:--नीप;हि--निस्सन्देह; उद्ग्रायुध: --उदग्रायुध; तत:--उससे; तस्य--उसका; क्षेम्य:--क्षेम्य; सुवीर: --सुवीर; अथ--तत्पश्चात्; सुवीरस्य--सुवीर का; रिपुञ्लयः--रिपुझ्लय नामक पुत्र
सुपार्थ से सुमति नाम का पुत्र, सुमति से सन्नतिमान तथा सन्नतिमान से कृती उत्पन्न हुआ जिसनेब्रह्मा से योगशक्ति प्राप्त की और सामवेद के प्राच्यसाम नामक श्लोकों की छह संहिताएँ पढ़ाई।
कृती का पुत्र नीप था, नीप का पुत्र उद्ग्रायुध हुआ, उद्ग्रायुध का पुत्र क्षेम्य हुआ, क्षेम्य से सुवीरनामक पुत्र हुआ तथा सुवीर का पुत्र रिपुल्लय था।
ततो बहुरथो नाम पुरुमीढोप्रजो भवत् ।
नलिन्यामजमीढस्य नील: शान्तिस्तु तत्सुतः: ॥
३०॥
ततः--उससे ( रिपुञ्नय से ); बहुरथः --बहुरथ; नाम--नामक; पुरुमीढ:--पुरुमीढ, द्विमीढ का छोटा भाई; अप्रज: --निःसन्तान;अभवत्--हुआ; नलिन्याम्ू--नलिनी से; अजमीढस्य--अजमीढ की; नील: --नील; शान्तिः:--शान्ति; तु--तब; तत्-सुत:--नील कापुत्र।
रिपुज्ञय का पुत्र बहुरथ हुआ।
पुरुमीढ नि:सन््तान था।
अजमीढ को अपनी पत्नी नलिनी से नीलनामक पुत्र की प्राप्ति हुईं।
नील का पुत्र शान्ति था।
शान्ते: सुशान्तिस्तत्पुत्र: पुरुजोर्कस्ततोभवत् ।
भर्म्याश्वस्तनयस्तस्य पशञ्ञासन्मुदूगलादय: ॥
३१॥
यवीनरो बूहद्विश्चव: काम्पिल्ल: सञ्जय: सुता: ।
भर्म्याश्वः प्राह पुत्रा मे पञ्ञानां रक्षणाय हि ॥
३२॥
विषयाणामलमिमे इति पशञ्ञालसंज्ञिता: ।
मुद्गलाइह्निर्वृत्तं गोत्र मौद्गल्यसंज्ञितम् ॥
३३॥
शान्ते:--शान्ति का; सुशान्ति:--सुशान्ति; ततू-पुत्र:ः--उसका पुत्र; पुरुष:--पुरुज; अर्क:--अर्क; तत:--उससे; अभवत्--उत्पन्नहुए; भर्म्याश्र: -- भर्म्या श्र; तनय: -- पुत्र; तस्य--उसके ; पञ्ञ--पाँच पुत्र; आसन्--थे; मुदूगल-आदय: --मुद्गल इत्यादि; यवीनर:--यवीनर; बृहद्विश्र:--बृहद्विश्र; काम्पिल्ल:--काम्पिल्ल; सञ्लय: --सझ्जय; सुता: --पुत्र; भर्म्या श्र: -- भर्म्या श्व ने; प्राह--कहा; पुत्रा:--पुत्र; मे--मेरे; पञ्ञानामू--पाँचों की; रक्षणाय--सुरक्षा के लिए; हि--निस्सन्देह; विषयाणाम्--विभिन्न राज्यों का; अलमू-दक्ष;इमे--ये सभी; इति--इस प्रकार; पञ्ञाल--पश्ञाल; संज्ञिता:--नामधारी; मुद्गलात्--मुद्गल से; ब्रह्म-निर्वत्तम्-ब्राह्मणों से युक्त;गोत्रमू-गोत्र; मौद्गल्य--मोद्गल; संज्ञितम्--नामधारी |
शान्ति का पुत्र सुशान्ति था, सुशान्ति का पुत्र पुरुज हुआ, पुरुज का अर्क और अर्क का पुत्रभर्म्याश्व था।
भर्म्याश्व के पाँच पुत्र हुए--मुद्गल, यवीनर, बृहद्विश्च, काम्पिलल तथा संजय।
भर्म्याश्वने अपने बेटों से कहा : मेरे बेटो, तुम लोग मेरे पाँचों राज्यों का भार सँभालो क्योंकि तुम ऐसा करनेके लिए पर्याप्त सक्षम हो।
इस तरह उसके पाँचों पुत्र पञ्ञाल कहलाये।
मुद्गल से ब्राह्मणों का गोत्रचला जो मौद्गल्य कहलाया।
मिथुन मुद्गलाद्धार्म्याद्दिवोदास: पुमानभूत् ।
अहल्या कन्यका यस्यां शतानन्दस्तु गौतमात् ॥
३४॥
मिथुनम्--जोड़ा, एक पुत्र और एक पुत्री; मुदूगलात्--मुद्गल से; भार्म्यात्-भार्म्या श्र का पुत्र; दिवोदास:--दिवोदास; पुमान्ू--पुरुष; अभूत्--उत्पन्न हुआ; अहल्या--अहल्या; कन्यका--कन्या; यस्याम्--जिससे; शतानन्द: --शतानन्द; तु--निस्सन्देह;गौतमात्--गौतम से, जो उसका पति था।
भर्म्याश्व के पुत्र मुदूगल के जुड़वाँ सनन््तान हुई जिसमें एक पुत्र था और एक कन्या।
पुत्र का नामदिवोदास रखा गया और कन्या का नाम अहल्या।
अहल्या के गर्भ और उसके पति गौतम मुनि केवीर्य से शतानन्द नामक पुत्र उत्पन्न हुआ।
तस्य सत्यधृतिः पुत्रो धनुर्वेदविशारद: ।
शरद्वांस्तत्सुतो यस्मादुर्वशीदर्शनात्किल ।
शरस्तम्बेपतद्रेतो मिथुनं तदभूच्छुभम् ॥
३५॥
तस्य--उसका ( शतानंद का ); सत्यधृतिः --सत्यधृति; पुत्र:--पुत्र; धनु:-वेद-विशारद: --थनुर्विद्या में पटु; शरद्वानू--शरद्वान; ततू-सुतः--उसका ( सत्यधृति का ) पुत्र; यस्मात्--जिससे; उर्वशी-दर्शनात्--उर्वशी अप्सरा के दर्शन मात्र से; किल--निस्सन्देह; शर-स्तम्बे--शर नामक घास ( सरपत ) के गुच्छे में; अपतत्--गिर पड़ा; रेत:--वीर्य; मिथुनम्--नर नारी का जोड़ा; तत् अभूत्-वहाँउत्पन्न हुआ; शुभम्ू--शुभ
शतानन्द का पुत्र सत्यधृति था जो धरनुर्विद्या में अत्यन्त पटु था।
सत्यधूति का पुत्र शरद्वान हुआ।
जब शरद्वान की भेंट उर्वशी से हुई तो शर नामक घास के गुच्छे पर उसका वीर्यपात हो गया।
इसवीर्य से दो शुभ शिशु उत्पन्न हुए जिनमें से एक लड़का था और दूसरा लड़की।
तद्ृष्ठा कृपयागृह्ाच्छान्तनुर्मृगयां चरन् ।
कृपः कुमारः कन्या च द्रोणपत्यभवत्कृपी ॥
३६॥
तत्--उस जुड़वे को; हृष्ठा--देखकर; कृपया--दयावश; अगृह्वात्--ले लिया; शान्तनु:--राजा शान्तनु ने; मृगयाम्--जंगल मेंशिकार करते समय; चरन्--घूमते हुए; कृप:--कृप; कुमार:--बालक; कन्या--बालिका; च-- भी; द्रोण-पत्नी--द्रोणाचार्य कीपतली; अभवत्--बनी; कृपी--कृपी
जब महाराज शान्तनु शिकार करने गये तो उन्होंने जंगल में जुड़वाँ शिशुओं को पड़ा देखा।
वेदयावश उन्हें अपने घर ले आये।
फलस्वरूप, बालक कृप नाम से विख्यात हुआ और बालिका कानाम कृपी पड़ा।
बाद में कृपी द्रोणाचार्य की पत्नी बनी।
