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अध्याय बाईसवाँ: अजमीढ़ के वंशज

9.22श्रीशुक उबाचमित्रायुश्न दिवोदासाच्च्यवनस्तत्सुतो नूप ।

सुदासः सहदेवोथ सोमको जन्तुजन्मकृत्‌ ॥

१॥

श्री-शुक: उवाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; मित्रायु;--मित्रायु; च--तथा; दिवोदासात्‌--दिवोदास से उत्पन्न; च्यवन:--च्यवन;ततू-सुतः--मित्रायु का पुत्र; नृप--हे राजा; सुदास:--सुदास; सहदेव:--सहदेव; अथ--तत्पश्चात्‌; सोमक: --सोमक; जन्तु-जन्म-कृत्‌ू--जन्तु का पिता

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे राजा, दिवोदास का पुत्र मित्रायु था और मित्रायु के चार पुत्र हुएजिनके नाम थे च्यवन, सुदास, सहदेव तथा सोमक ।

सोमक जन्तु का पिता था।

तस्य पुत्रशतं तेषां यवीयान्पूषतः सुतः ।

स तस्माद्द्रुपदो जज्ने सर्वसम्पत्समन्वित: ॥

२॥

तस्य--उसके ( सोमक के ); पुत्र-शतम्‌--एक सौ पुत्र; तेषामू--उन सबों के; यवीयान्‌--सबसे छोटा; पृषत:ः--पृषत; सुतः --पुत्र;सः--वह; तस्मात्‌--उससे ( पृषत से ); द्रपद:--द्भरुपद; जज्ञे--उत्पन्न हुआ; सर्व-सम्पत्‌--सारे ऐश्वर्य से; समन्वित:--अलंकृतसोमक के एक सौ पुत्र थे जिनमें सबसे छोटा पृषत था।

पृषत से राजा द्वुपद उत्पन्न हुआ जो सभीप्रकार से ऐश्वर्यवान था।

ब्रुपदादद्रौपदी तस्य धुृष्टद्युम्नादय: सुता: ।

धृष्टयुम्नाद्धृष्टकेतुर्भाम्या: पाञ्ञालका इमे ॥

३॥

ब्रुपदात्‌-द्गुपद से; द्रौपदी --पाण्डवों की विख्यात पत्नी द्रौपदी; तस्य--उसके ( द्रुपद के ); धृष्टद्युम्म-आदय: -- धृष्टद्युम्न इत्यादि;सुता:--पुत्र; धृष्टद्युम्नातू-- धृष्ट्युम्न से; धृष्टकेतु: --धृष्टकेतु नामक पुत्र; भार्म्या:--भर्म्या श्व के सारे वंशज; पाजञ्ञालका:--पाञज्ञालककहलाते हैं; इमे--ये सभी +महाराज द्वुपद से द्रौपदी उत्पन्न हुई।

महाराज द्रुपद के कई पुत्र भी थे जिनमें धृष्टद्युम्न प्रमुख था।

उसके पुत्र का नाम धृष्टकेतु था।

ये सारे पुरुष भर्म्याश्व॒ के वंशज या पाञ्ञालवंशी कहलाते हैं।

योजमीढसुतो ह्ान्य ऋक्ष: संवरणस्ततः ।

तपत्यां सूर्यकन्यायां कुरुक्षेत्रपति: कुरु: ॥

४॥

परीक्षि: सुधनुर्जहर्निषधश्च कुरो: सुता: ।

सुहोत्रो भूत्सुधनुषश्च्यवनो थ ततः कृती ॥

५॥

यः--जो; अजमीढ-सुतः --अजमीढ का पुत्र; हि--निस्सन्देह; अन्य: --दूसरा; ऋक्ष: --ऋक्ष; संवरण: --संवरण; तत:--उससे ( ऋश्षसे ); तपत्याम्‌--तपती; सूर्य-कन्यायाम्‌--सूर्यदेव की पुत्री के गर्भ से; कुरुक्षेत्र-पति:--कुरुक्षेत्र का राजा; कुरु:--कुरु का जन्महुआ; परीक्षि: सुधनु: जह्ु: निषध: च--परीक्षि, सुधनु, जह्वु तथा निषध; कुरो:--कुरु के; सुता:--पुत्र; सुहोत्र:--सुहोत्र; अभूत्‌--उत्पन्न हुआ; सुधनुष:--सुधनु से; च्यवन: --च्यवन; अथ--सुहोत्र से; ततः--च्यवन से; कृती--कृती नामक पुत्र |

अजमीढ का दूसरा पुत्र ऋक्ष नाम से विख्यात था।

ऋक्ष से संवरण, संवरण के उसकी पत्नीसूर्यपुत्री तपती के गर्भ से कुरु हुआ जो कुरुक्षेत्र का राजा बना।

कुरु के चार पुत्र थे--परीक्षि,सुधनु, जह्न तथा निषध।

सुधनु से सुहोत्र, सुहोत्र से च्यवन और च्यवन से कृती उत्पन्न हुआ।

वसुस्तस्योपरिचरो बृहद्रथमुखास्ततः ।

कुशाम्बमस्सयप्रत्यग्रचेदिपाद्याश्न चेदिपा: ॥

६॥

वसु:--वसु नामक पुत्र; तस्थ--उसका ( कृती का ); उपरिचरः --वसु का उपनाम; बृहद्रथ-मुखा:--बृहद्रथ इत्यादि; ततः--उससे( बसु से ); कुशाम्ब--कुशाम्ब; मत्स्य--मत्स्य; प्रत्यग्र--प्रत्यग्र; चेदिप-आद्या: --चेदिप आदि; च-- भी; चेदि-पा:--चेदि राज्य केसभी शासक।

कृती का पुत्र उपरिचर बसु था और उसके पुत्रों में, जिनमें बृहद्रथ प्रमुख था, कुशाम्ब, मत्स्य,प्रत्यग्र तथा चेदिप थे।

उपरिचर वसु के सारे पुत्र चेदि राज्य के शासक बने।

बृहद्रथात्कुशाग्रो भूडषभस्तस्य तत्सुतः ।

जज्ञे सत्यहितोपत्यं पुष्पवांस्तत्सुतो जहु: ॥

७॥

बृहद्रथात्‌-बृहद्रथ से; कुशाग्र:--कुशाग्र; अभूत्‌--उत्पन्न हुआ; ऋषभ:--ऋषभ; तस्य--उसका ( कुशाग्र का ); तत्‌-सुतः--उसका( ऋषभ का ) पुत्र; जज्ञे--उत्पन्न हुआ; सत्यहित:--सत्यहित; अपत्यम्‌ू--सन्तान; पुष्पवान्‌--पुष्पवान; तत्‌-सुतः--उसका ( पुष्पवानका ) पुत्र; जहुः--जहु

बृहद्रथ से कुशाग्र उत्पन्न हुआ, कुशाग्र से ऋषभ, ऋषभ से सत्यहित, सत्यहित से पुष्पवान तथापुष्पवान से जहु उत्पन्न हुआ।

अन्यस्यामपि भार्यायां शकले द्वे बृहद्रथात्‌ ।

ये मात्रा बहिरुत्सृष्ट जरया चाभिसन्धिते ।

जीव जीवेति क्रीडन्त्या जरासन्धोभवत्सुत: ॥

८ ॥

अन्यस्यथाम्‌--दूसरी; अपि-- भी; भार्यायाम्‌--पत्नी के; शकले-- भाग; द्वे-- दो; बृहद्रथात्‌--बृहद्रथ से; ये--जो; मात्रा--माता द्वारा;बहिः उत्सृष्ट--छोड़ दिये जाने पर; जरया--जरा नामक राक्षसी; च--तथा; अभिसन्धिते--जोड़ दिये गये; जीव जीव इति--हे जीव,तुम जी उठो; क्रीडन्त्या--खेलते हुए; जरासन्ध:--जरासन्ध; अभवत्‌--उत्पन्न हुआ; सुत:--पुत्र

बृहद्रथ की दूसरी पत्नी के गर्भ से दो आधे आधे खण्डों में एक पुत्र उत्पन्न हुआ।

जब माता ने इनदो आधे आधे खण्डों को देखा तो उसने इन्हें फेंक दिया, किन्तु बाद में जरा नाम की एक राक्षसी नेखेल-खेल में उन्हें जोड़ते हुए कहा, 'जीवित हो उठो, जीवित हो उठो।

इस तरह जरासन्ध नामकपुत्र उत्पन्न हुआ।

ततश्न सहदेवोभूत्सोमापिर्यच्छुतश्रवा: ।

परीक्षिरनपत्यो भूत्सुरथो नाम जाह्नवः ॥

९॥

ततः च--तथा उससे ( जरासंध से ); सहदेव:ः--सहदेव; अभूत्‌--उत्पन्न हुआ; सोमापि:--सोमापि; यत्‌--उसके ( सोमापि );श्रुतश्रवा:-- श्रुत भ्रवा नामक पुत्र; परीक्षिः--कुरु को परीक्षि नामक पुत्र; अनपत्य:--निःसन्‍्तान; अभूत्‌--रह गया; सुरथ:--सुरथ;नाम--नामक; जाह्नव:--जह्लु का पुत्र

जरासन्ध से सहदेव नाम का पुत्र उत्पन्न हुआ।

फिर सहदेव से सोमापि और सोमापि से श्रुतश्रवाहुआ।

कुरु के पुत्र परीक्षि के कोई पुत्र नहीं था, किन्तु कुरुपुत्र जह्ु के एक पुत्र था जिसका नामसुरथ था।

ततो विदूरथस्तस्मात्सार्वभौमस्ततो भवत्‌ ।

जयसेनस्तत्तनयो राधिकोतोयुताय्वभूत्‌ू ॥

१०॥

ततः--उससे ( सुरथ से ); विदूरथः --विदूरथ नामक पुत्र; तस्मात्‌ू--उससे ( विदूरथ से ); सार्वभौम:--सार्वभौम नाम का पुत्र; ततः--उससे ( सार्वभौम से ); अभवत्‌--उत्पन्न हुआ; जयसेन:--जयसेन; तत्‌-तनय:--जयसेन का पुत्र; राधिक:--राधिक; अत:ः--औरउससे ( राधिक से ); अयुतायु:--अयुतायु; अभूत्‌--उत्पन्न हुआ

सुरथ के विदूरथ नाम का पुत्र उत्पन्न हुआ और विदूरथ से सार्वभौम हुआ।

सार्वभौम से जयसेन,जयसेन से राधिक तथा राधिक से अयुतायु उत्पन्न हुआ।

ततश्चाक्रोधनस्तस्माद्देवातिथिरमुष्य च ।

ऋक्षस्तस्य दिलीपो<भूत्प्रतीपस्तस्य चात्मज: ॥

११॥

ततः--उससे; च-- भी; अक्रोधन: --अक्रो धन नामक पुत्र; तस्मात्‌--उससे; देवातिथि: --देवातिथि; अमुष्य--उसका; च--भी;ऋक्ष:--ऋक्ष; तस्य--उसके; दिलीप: --दिलीप; अभूत्‌--उत्पन्न हुआ; प्रतीप: --प्रतीप; तस्य--उसका; च--तथा; आत्म-ज:--पुत्र

अयुतायु का पुत्र अक्रोधन, अक्रोधन का देवातिथि, देवातिथि का ऋक्ष, ऋक्ष का दिलीप औरदिलीप का पुत्र प्रतीप हुआ।

देवापि: शान्तनुस्तस्य बाह्कीक इति चात्मजा: ।

पितृराज्यं परित्यज्य देवापिस्तु बनं गत: ॥

१२॥

अभवच्छान्तनू राजा प्राइमहाभिषसंज्ञित: ।

यं यं कराभ्यां स्पृशति जीर्ण यौवनमेति सः ॥

१३॥

देवापि:ः--देवापि; शान्तनु:--शान्तनु; तस्थ--उसके ( प्रतीप के ); बाहीक:--बाह्ीक; इति--इस प्रकार; च--भी; आत्म-जा:--पुत्र; पितृ-राज्यमू--पिता की सम्पत्ति या राज्य को; परित्यज्य--छोड़कर; देवापि:--देवापि, जो सबसे बड़ा पुत्र था; तु--निस्सन्देह;वनमू--वन में; गत:--चला गया; अभवत्‌-- था; शान्तनु: --शान्तनु; राजा--राजा; प्राकु--पहले; महाभिष--महाभिष; संज्ञित:--सुप्रसिद्ध; यम्‌ यमू--जिस जिसको; कराभ्याम्‌--अपने हाथों से; स्पृशति--छूता था; जीर्णम्‌--यद्यपि अत्यन्त वृद्ध; यौवनम्‌--युवावस्था को; एति--प्राप्त हुआ; सः--वह प्रतीप के तीन पुत्र थे--देवापि, शान्तनु तथा बाह्लीक।

देवापि अपने पिता का राज्य त्याग करजंगल चला गया अतएव शान्तनु राजा हुआ।

शान्तनु अपने पूर्वजन्म में महाभिष नाम से विख्यात था।

उसमें किसी को भी अपने हाथों के स्पर्श द्वारा बूढ़े से जवान में बदलने की शक्ति थी।

शान्तिमाष्नोति चैवाछयां कर्मणा तेन शान्तनु: ।

समा द्वादश तद्राज्ये न ववर्ष यदा विभु: ॥

१४॥

शान्तनुर्ब्राह्मणैरुक्त: परिवेत्तायमग्रभुक्‌ ।

राज्यं देह्मग्रजायाशु पुरराष्ट्रविवृद्धये ॥

१५॥

शान्तिमू--इन्द्रियतृप्ति के लिए जवानी; आणोति-- प्राप्त करता है; च-- भी; एव--निस्सन्देह; अछयाम्‌--मुख्यतः ; कर्मणा-- अपनेहाथ के स्पर्श से; तेन--उसके कारण; शान्तनुः--शान्तनु; समा: --वर्षो; द्वादश--बारह; तत्‌-राज्ये--उसके राज्य में; न--नहीं;ववर्ष--पानी बरसा; यदा--जब; विभु:--वर्षा का स्वामी इन्द्र; शान्तनु:--शान्तनु ने; ब्राह्मणै:--ब्राह्मणों के द्वारा; उक्त:--सलाहदिये जाने पर; परिवेत्ता--शोषक होने के कारण दोषमय; अयम्‌--यह; अग्र-भुकू--बड़े भाई के होते हुए भी भोग करते हुए;राज्यमू--राज्य; देहि--दे दो; अग्रजाय-- अपने बड़े भाई को; आशु--तुरन्त; पुर-राष्ट्र--अपने घर तथा राज्य की; विवृद्धये--उन्नतिके लिए

चूँकि यह राजा अपने हाथ के स्पर्श मात्र से ही सबों की इन्द्रियतृप्ति करके सुखी बनाने में समर्थथा इसीलिए इसका नाम शान्तनु था।

एक बार जब राज्य में बारह वर्षो तक वर्षा नहीं हुई तो राजा नेविद्वान ब्राह्मणों से परामर्श किया।

उन्होंने कहा, 'तुम अपने बड़े भाई की सम्पत्ति भोगने के दोषीहो।

तुम अपने राज्य तथा अपने घर की उन्नति के लिए यह राज्य उसे लौटा दो।

वमुक्तो द्विजेज्येप्ठं छन्दयामास सोउब्रवीत्‌ ।

तन्मन्त्रिप्रहितैर्विप्रैवेदाद्विभ्रंशितो गिरा ॥

१६॥

वेदवादातिवादान्वै तदा देवो ववर्ष ह ।

देवापियोंगमास्थाय कलापग्राममाश्रित: ॥

१७॥

एवम्‌--इस तरह; उक्त:--सलाह दिये जाने पर; द्विजैः -ब्राह्मणों द्वारा; ज्येप्ठमू-बड़े भाई देवापि को; छन्‍्दयाम्‌ आस--राज्य ग्रहणकरने के लिए प्रार्थना की; सः--उसने; अब्रवीत्‌--कहा; तत्‌ू-मन्त्रि--शान्तनु के मंत्री द्वारा; प्रहिति:--बहकाये जाने पर; विप्रै:--ब्राह्मणों द्वारा; वेदातू-वेदों के नियमों से; विश्रंशित:ः--गिरा हुआ; गिरा--ऐसी वाणी से; वेद-वाद-अतिवादान्‌ू--वैदिक आदेशों की निन्दा करने वाले शब्द; वै--निस्सन्देह; तदा--उस समय; देव: --देवता ने; ववर्ष--वर्षा की; ह-- भूतकाल में; देवापि:--देवापि ने;योगम्‌ आस्थाय--योगविधि स्वीकार करके; कलाप-ग्रामम्‌--कलाप नामक गाँव में; आश्रित:--शरण ले ली ( और आज भी जीवितहै

जब ब्राह्मणों ने यह कहा तो महाराज शान्तनु जंगल चला गया और उसने अपने बड़े भाई देवापिसे प्रार्था की कि वह राज्य का भार ग्रहण करे क्योंकि प्रजा का पालन करना राजा का धर्म है।

किन्तु इसके पूर्व शान्तनु के मंत्री अश्ववार ने कुछ ब्राह्मणों को फुसलाकर देवापि से वेदों के आदेशोंका उल्लंघन करने के लिए प्रेरित किया था जिससे वह शासक पद के अयोग्य हो गया था।

ब्राह्मणोंने देवापि को वैदिक सिद्धान्तों के मार्ग से विचलित कर दिया था अतएव जब शान्तनु ने शासक पदग्रहण करने के लिए कहा तो उसने मना कर दिया।

उल्टे, वह वैदिक सिद्धान्तों की निन्दा करने लगाअतएव पतित हो गया।

ऐसी परिस्थिति में शान्तनु पुनः राजा बन गया और इन्द्र ने प्रसन्न होकर वर्षाकी।

बाद में देवापि ने अपने मन तथा इन्द्रियों का दमन करने के लिए योगमार्ग का अनुसरण कियाऔर वह कलापग्राम नामक गाँव में चला गया जहाँ वह अब भी जीवित है।

सोमवंशे कलौ नष्टे कृतादौ स्थापयिष्यति ।

बाह्लीकात्सोमदत्तो भूद्धूरिभूरिश्रवास्तत: ॥

१८॥

शलकश्च शान्तनोरासीद्गड्रायां भीष्म आत्मवान्‌ ।

सर्वधर्मविदां श्रेष्ठी महाभागवत: कवि: ॥

१९॥

सोम-वंशे--सोमवंश के; कलौ--कलियुग में; नष्टे--नष्ट होने पर; कृत-आदौ--अगले सत्ययुग के प्रारम्भ में; स्थापयिष्यति--स्थापना करेगा; बाह्नीकात्‌--बाहीक से; सोमदत्त: --सोमदत्त; अभूत्‌--उत्पन्न हुआ; भूरि: -- भूरि; भूरि-श्रवा: -- भूरिश्रवा; तत: --तत्पश्चात्‌; शल: च--शल; शान्तनो: --शान्तनु से; आसीतू--उत्पन्न हुआ; गड्भायाम्‌--शान्तनु की पतली गंगा के गर्भ से; भीष्म: --भीष्म; आत्मवान्‌--स्वरूपसिद्ध; सर्व-धर्म-विदाम्‌--सारे धार्मिक व्यक्तियों का; श्रेष्ठ: -- श्रेष्ठ, महा-भागवत:--महान्‌ भक्त; कवि:--तथा दिद्वान।

इस कलियुग में सोमवंश के समाप्त होने पर और अगले सतयुग के प्रारम्भ में देवापि पुनः: इससंसार में सोमवंश की स्थापना करेगा।

( शान्तनु के भाई ) बाह्लीक से सोमदत्त नामक पुत्र उत्पन्न हुआजिसके तीन पुत्र हुए-- भूरि, भूरिश्रवा तथा शल।

शान्तनु की दूसरी पत्नी गंगा के गर्भ से भीष्म उत्पन्नहुआ जो स्वरूपसिद्ध, सभी धार्मिक व्यक्तियों में श्रेष्ठ, महान्‌ भक्त एवं विद्वान था।

वीरयूथाग्रणीर्येन रामोपि युधि तोषितः ।

शान्तनोर्दासकन्यायां जज्जे चित्राड्दः सुतः ॥

२०॥

बीर-यूथ-अग्रणी:--सारे योद्धाओं में अग्रणी, भीष्मदेव; येन--जिससे; राम: अपि-- भगवान्‌ के अवतार परशुराम भी; युधि--युद्धमें; तोषित:--सन्तुष्ट हुआ ( भीष्मदेव के हराने पर ); शान्तनो: --शान्तनु से; दास-कन्यायाम्‌--एक शूद्र की कन्या सत्यवती के गर्भसे; जज्ञे--उत्पन्न हुआ; चित्राड़्द:--चित्रांगद; सुत:--पुत्र

भीष्मदेव सारे योद्धाओं में सर्वश्रेष्ठ था।

जब उसने भगवान्‌ परशुराम को युद्ध में हरा दिया तोपरशुराम उससे अत्यन्त संतुष्ट हुए।

शान्तनु के वीर्य से धीवर की कन्या सत्यवती के गर्भ से चित्रांगदने जन्म लिया।

विचित्रवीर्य श्वावरजो नाम्ना चित्राड्रदो हतः ।

यस्यां पराशरात्साक्षादवतीर्णो हरे: कला ॥

२१॥

वेदगुप्तो मुनि: कृष्णो यतोहमिदमध्यगाम्‌ ।

हित्वा स्वशिष्यान्पैलादीन्भगवान्बादरायण: ॥

२२॥

महं पुत्राय शान्ताय परं गुहामिदं जगौ ।

विचित्रवीर्योथोवाह काशीराजसुते बलातू ॥

२३॥

स्वयंवरादुपानीते अम्बिकाम्बालिके उभे ।

तयोरासक्तहदयो गृहीतो यक्ष्मणा मृत: ॥

२४॥

विचित्रवीर्य:--शान्तनु पुत्र विचित्रवीर्य; च--तथा; अवरज:--छोटा भाई; नाम्ना--नामक; चित्राड्रद:--चित्रांगद नामक गंधर्व द्वारा;हतः--मारा गया; यस्याम्‌--शान्तनु से विवाह होने के पूर्व सत्यवती के गर्भ में; पराशरात्‌--पराशर मुनि के वीर्य से; साक्षात्‌- प्रत्यक्ष;अवतीर्ण:--अवतार लेकर; हरेः-- भगवान्‌ का; कला--अंश; वेद-गुप्त:--वेदों का रक्षक; मुनि:--मुनि; कृष्ण:--कृष्ण द्वैपायन;यतः--जिससे; अहम्‌--मैंने ( शुकदेव गोस्वामी ); इदम्‌--इस श्रीमद्भागवत को; अध्यगाम्‌--गहन अध्ययन किया; हित्वा--त्यागकर; स्व-शिष्यान्‌--अपने शिष्यों को; पैल-आदीनू्‌--पैल इत्यादि को; भगवान्‌-- भगवान्‌ का अवतार; बादरायण: --व्यासदेव ने;महाम्‌--मुझ; पुत्राय--पुत्र को; शान्ताय--इन्द्रियतृप्ति को दमित करने वाले; परम्‌--परम; गुहाम्‌--अत्यन्त गोपनीय; इृदमू--इसवैदिक ग्रंथ ( श्रीमद्भागवत ) को; जगौ--उपदेश दिया; विचित्रवीर्य:--विचित्रवीर्यने; अथ--तत्पश्चात्‌; उबाह--विवाह ली;'काशीराज-सुते--काशिराज की दो कन्याएँ; बलात्‌--बलपूर्वक; स्वयंवरात्‌--स्वयंवर स्थल से; उपानीते--लाई जाकर; अम्बिका-अम्बालिके--अम्बिका तथा अम्बालिका; उभे--दोनों; तयो:--उनके प्रति; आसक्त--अनुरक्त; हृदयः--हृदय; गृहीत:--कलुषित;यक्ष्मणा--यक्ष्मा ( तपेदिक ) से; मृत:--मर गया ।

चित्रांगद, जिसका छोटा भाई विचित्रवीर्य था, चित्रागंद नाम के ही गन्धर्व द्वारा मारा गया।

सत्यवती ने शान्तनु से विवाह होने के पूर्व वेदों के ज्ञाता व्यासदेव को जन्म दिया था।

ये कृष्णद्वैपायन कहलाये और पराशर मुनि के वीर्य से उत्पन्न हुए थे।

व्यासदेवसे मैं ( शुकदेव गोस्वामी )उत्पन्न हुआ और मैंने उनसे इस महान ग्रंथ श्रीमदृभागवत का अध्ययन किया।

भगवान्‌ के अवतारवेदव्यास ने पैल इत्यादि अपने शिष्यों को छोड़कर मुझे श्रीमद्भागवत पढ़ाया क्योंकि मैं सभीभौतिक कामनाओं से मुक्त था।

जब काशीराज की दो कन्याओं, अम्बिका और अम्बालिका काबलपूर्वक अपहरण हो गया तो विचित्रवीर्य ने उनसे विवाह कर लिया, किन्तु इन दोनों पत्नियों सेअत्यधिक आसक्त रहने के कारण उसे तपेदिक हो गया जिससे वह मर गया।

क्षेत्रेउप्रजस्य बे भ्रातुर्मात्रोक्तो बादरायण: ।

धृतराष्ट्रं च पाण्डुं च विदुरं चाप्यजीजनतू ॥

२५॥

क्षेत्रे--पत्तियों तथा दासियों में; अप्रजस्थ--निःसन्तान विचित्रवीर्य की; बै--निस्सन्देह; भ्रातु:-- भाई की; मात्रा उक्त:--माता केआदेश से; बादरायण: --वेदव्यास ने; धृतराष्ट्रमू--धृतराष्ट्र को; च--तथा; पाण्डुमू--पाण्डु को; च-- भी; विदुरम्‌--विदुर को; च--भी; अपि--निस्सन्देह; अजीजनत्‌--उत्पन्न किया।

बादरायण, श्री व्यासदेव, ने अपनी माता सत्यवती के आदेशानुसार तीन पुत्र उत्पन्न किये--दोपुत्र अपने भाई विचित्रवीर्य की पत्नियों अम्बिका तथा अम्बालिका के गर्भ से और तीसरा विचित्रवीर्यकी दासी से।

तीनों पुत्रों के नाम थे धृतराष्ट्र, पाण्डु तथा विदुर।

गाश्धार्या धृतराष्ट्रस्थ जज्ने पुत्रशतं नृप ।

तत्र दुर्योधनो ज्येष्ठो दुःशला चापि कन्‍्यका ॥

२६॥

गान्धार्याम्‌-गाच्धारी के गर्भ में; धृतराष्ट्स्थ-- धृतराष्ट्र का; जज्ञे--उत्पन्न हुए; पुत्र-शतम्‌--एक सौ पुत्र; नृप--हे राजा परीक्षित;तत्र--उन पुत्रों में; दुर्योधन: --दुर्योधन नामक पुत्र; ज्येष्ठ;:--सबसे बड़ा; दुःशला--दुःशला; च अपि-- भी; कनन्‍्यका--एक पुत्री

हे राजाधृतराष्ट्र की पत्नी गांधारी ने एक सौ पुत्र तथा एक कन्या को जन्म दिया।

सबसे बड़ापुत्र दुर्योधन था और कन्या का नाम दुःशला था।

शापान्मैथुनरुद्धस्य पाण्डो: कुन्त्यां महारथा: ।

जाता धर्मानिलेन्द्रेभ्यो युथिष्ठिरमुखास्त्रय: ॥

२७॥

नकुलः सहदेवश्च माद्र्‌यां नासत्यदस्त्रयो: ।

द्रौपद्यां पञ्ञ पद्ञभ्य: पुत्रास्ते पितरोभवन्‌ ॥

२८॥

शापात्‌--शाप से; मैथुन-रुद्धस्य--विषयी जीवन रोक देने से; पाण्डो:--पाण्डु का; कुन्त्याम्‌-कुन्ती के गर्भ में; महा-रथा:--बड़े-बड़े वीर; जाता: --उत्पन्न हुए; धर्म--महाराज धर्म या धर्मराज; अनिल--वायुदेव; इन्द्रेभ्य:;--तथा वर्षा के देवता इन्द्र के द्वारा;युथिष्ठटिर--युधिष्टिर; मुखा:--इत्यादि; त्रयः--तीन पुत्र ( युधिष्ठटिर, भीम तथा अर्जुन ); नकुल:--नकुल; सहदेव: --सहदेव; च--भी;मादर्‌याम्‌--माद्री के गर्भ से; नासत्य-दस्त्रयो:--नासत्य और दस्त्र अश्विनीकुमारों द्वारा; द्रौपद्याम्‌ू-द्रौपदी के गर्भ से; पञ्ञ-पाँच;पञ्ञभ्यः--पाँचों भाइयों युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव द्वारा; पुत्रा:--पुत्र; ते--वे; पितर:ः--चाचा; अभवनू--बने |

एक मुनि के द्वारा शापित होने से पाण्डु का विषयी जीवन अवरुद्ध हो गया अतएवं उसकी पत्नीकुन्ती के गर्भ से तीन पुत्र युधिष्ठटिर, भीम तथा अर्जुन उत्पन्न हुए जो क्रमशः धर्मराज, वायुदेव तथाइन्द्रदेव के पुत्र थे।

पाण्डु की दूसरी पत्नी माद्री ने नकुल तथा सहदेव को जन्म दिया जो दोनोंअश्विनीकुमारों द्वारा उत्पन्न थे।

युधिष्ठिर इत्यादि पाँचों भाइयों ने द्रौपदी के गर्भ से पाँच पुत्र उत्पन्नकिये।

ये पाँचों पुत्र तुम्हारे चाचा थे।

युधिष्टिरात्प्रतिविन्ध्य: श्रुतसेनो वृकोदरात्‌ ।

अर्जुनाच्छुतकीर्तिस्तु शतानीकस्तु नाकुलि: ॥

२९॥

युधिष्ठटिरात्‌--महाराज युधिष्ठिर से; प्रतिविन्ध्य: --प्रतिविन्ध्य; श्रुतसेन:-- श्रुतसेन; वृकोदरात्‌-- भीम से; अर्जुनात्‌ू--अर्जुन से;श्रुतकीर्ति: -- श्रुतकीर्ति; तु--निस्सन्देह; शतानीक:--शतानीक; तु--निस्सन्देह; नाकुलिः--नकुल केयुधिष्टिर से प्रतिविन्ध्य, भीम से श्रुतसेन, अर्जुन से श्रुतकीर्ति तथा नकुल से शतानीक नामक पुत्रहुए।

सहदेवसुतो राजज्छृतकर्मा तथापरे ।

युधिष्ठिरात्तु पौरव्यां देवकोथ घटोत्कच: ॥

३०॥

भीमसेनाड्विडिम्बायां कालयां सर्वगतस्ततः ।

सहदेवात्सुहोत्रं तु विजयासूत पार्वती ॥

३१॥

सहदेव-सुतः--सहदेव का पुत्र; राजनू--हे राजा; श्रुतकर्मा--श्रुतकर्मा; तथा-- और; अपरे-- अन्य; युधिष्ठटिरात्‌--युधिष्ठिर से; तु--निस्सन्देह; पौरव्यामू--पौरवी के गर्भ से; देवक:--देवक; अथ--तथा; घटोत्कच: --घटोत्कच; भीमसेनात्‌-- भीमसेन से;हिडिम्बायाम्‌--हिडिम्बा के गर्भ से; काल्याम्‌--काली के गर्भ से; सर्वगत: --सर्वगत; ततः--तत्पश्चात्‌; सहदेवात्‌--सहदेव से;सुहोत्रम्‌--सुहोत्र; तु--निस्सन्देह; विजया--विजया ने; असूत--जन्म दिया; पार्वती--हिमालय राज की पुत्री |

हे राजा, सहदेव का पुत्र श्रुतकर्मा था।

यही नहीं, युधिष्ठिर तथा उनके भाइयों की अन्य पत्रियोंसे और भी पुत्र उत्पन्न हुए।

युथिष्ठिर ने पौरवी के गर्भ से देवक को और भीमसेन ने अपनी पत्नीहिडिम्बा के गर्भ से घटोत्कच तथा अपनी अन्य पत्नी काली के गर्भ से सर्वगत नामक पुत्रों को जन्मदिया।

इसी प्रकार सहदेव को उसकी पत्नी विजया से सुहोत्र नाम का पुत्र प्राप्त हुआ।

विजया पर्वतोंके राजा की पुत्री थी।

करेणुमत्यां नकुलो नरमित्र॑ तथार्जुन: ।

इरावन्तमुलुप्यां वै सुतायां बध्रुवाहनम्‌ ।

मणिपुरपते: सोपि तत्पुत्र: पुत्रिकासुत: ॥

३२॥

करेणुमत्याम्‌--करेणुमती नामक पत्नी से; नकुल:--नकुल ने; नरमित्रम्‌ू--नरमित्र को; तथा--भी; अर्जुन:--अर्जुन ने; इरावन्तम्‌--इरावान को; उलुप्याम्‌--नागकन्या उलुपी के गर्भ से; बै--निस्सन्देह; सुतायाम्‌--पुत्री से; बश्रुवाहनम्‌--बश्रुवाहन; मणिपुर-पते:--मणिपुर के राजा की; सः--वह; अपि--यद्यपि; ततू-पुत्र:ः--अर्जुन का पुत्र; पुत्रिका-सुतः--अपने नाना का पुत्र |

नकुल की पत्नी करेणुमती से नरमित्र नामक पुत्र हुआ।

इसी प्रकार अर्जुन को नागकन्या उलुपी नामक अपनी पत्नी से इरावान नामक पुत्र तथा मणिपुर की राजकुमारी के गर्भ से बश्रुवाहन नामकपुत्र की प्राप्ति हुई।

बश्रुवाहन मणिपुर के राजा का दत्तक पुत्र बन गया।

तब तात: सुभद्रायामभिमन्युरजायत ।

सर्वातिरथजिद्धीर उत्तरायां ततो भवान्‌ ॥

३३॥

तब--तुम्हारा; तात:ः--पिता; सुभद्रायाम्‌--सुभद्रा के गर्भ से; अभिमन्यु:--अभिमन्यु; अजायत--उत्पन्न हुआ था; सर्व-अतिरथ-जित्‌--अतिरथों को पराजित करने वाला महान्‌ योद्धा; वीर:--वीर; उत्तरायाम्‌--उत्तरा के गर्भ में; ततः--अभिमन्यु से; भवान्‌--आप।

हे राजा परीक्षित, तुम्हारे पिता अभिमन्यु अर्जुन के पुत्र रूप में सुभद्रा के गर्भ से उत्पन्न हुए।

वेसभी अतिरथों ( जो एक हजार रथवानों से युद्ध कर सके ) के विजेता थे।

उनके द्वारा विराड्राज कीपुत्री उत्तरा के गर्भ से तुम उत्पन्न हुए।

परिक्षीणेषु कुरुषु द्रौणेब्रह् मास्त्रतेजसा ।

त्वं च कृष्णानुभावेन सजीवो मोचितोन्तकात्‌ ॥

३४॥

परिक्षीणेषु-- कुरुक्षेत्र युद्ध में विनष्ट हो जाने पर; कुरुषु--कुरुवंशियों, यथा दुर्योधन के; द्रौणेः--द्रोणाचार्य का पुत्र अश्वत्थामा द्वारा;ब्रह्मास्त्र-तेजसा--ब्रह्मास्त्र की गर्मी से; त्वम्‌ च--तुम भी; कृष्ण-अनुभावेन--कृष्ण के अनुग्रह से; सजीव: --जीवित; मोचित:--छुड़ा लिये गये; अन्तकातू--मृत्यु से

जब कुरुक्षेत्र के युद्ध में कुरुवंश का विनाश हो गया तो तुम भी द्रोणाचार्य के पुत्र द्वारा छोड़ेगये ब्रह्मास्त्र के द्वारा विनष्ट होने वाले थे, किन्तु भगवान्‌ कृष्ण की कृपा से तुम्हें मृत्यु से बचा लियागया।

तवेमे तनयास्तात जनमेजयपूर्वका: ।

श्रुतसेनो भीमसेन उग्रसेनश्व वीर्यवान्‌ ॥

३५॥

तव--तुम्हारे; इमे--ये सभी; तनया:--पुत्र; तात--हे राजा परीक्षित; जनमेजय--जनमेजय; पूर्वका: --प्रमुख, इत्यादि; श्रुतसेन:--श्रुतसेन; भीमसेन: -- भीमसेन; उग्रसेन: --उग्रसेन; च-- भी; वीर्यवान्‌--शक्तिमान |

हे राजा, तुम्हारे चारों पुत्र--जनमेजय, श्रुतसेन, भीमसेन तथा उग्रसेन अत्यन्त शक्तिशाली हैं।

जनमेजय उनमें सबसे बड़ा है।

जनमेजयस्त्वां विदित्वा तक्षकान्निधनं गतम्‌ ।

सर्पान्वि सर्पयागाग्नौ स होष्यति रुषान्वित: ॥

३६॥

जनमेजय:--जनमेजय; त्वामू--तुमको; विदित्वा--जानकर; तक्षकात्‌--तक्षक नाग द्वारा; निधनम्‌-- मृत्यु को; गतम्‌--प्राप्त हुआ;सर्पानू--साँपों को; वै--निस्सन्देह; सर्प-याग-अग्नौ--सर्पों को मारने के लिए यज्ञ अग्नि में; सः--वह ( जनमेजय ); होष्यति--आहुति डालेगा; रुषा-अन्वितः --अ त्यन्त क्रोधित होने के कारण |

तक्षक सर्प द्वारा तुम्हारी मृत्यु हो जाने के कारण तुम्हारा पुत्र जनमेजय अत्यन्त क्रुद्ध होगा औरसंसार के सारे सर्पों को मारने के लिए यज्ञ करेगा।

कालषपेयं पुरोधाय तुरं तुरगमेधषाट्‌ ।

समन्तात्पृथिवीं सर्वा जित्वा यक्ष्यति चाध्वरै: ॥

३७॥

कालषेयम्‌--कलबष के पुत्र को; पुरोधाय--पुरोहित के रूप में मानकर; तुरम्‌--तुर को; तुरग-मेधघाट्‌ू--तुरग-मेधषाट्‌ के नाम से( अनेक तुरग यज्ञ करने वाला ) जाना जायेगा; समन्तात्‌--सारे भागों सहित; पृथिवीम्‌--संसार को; सर्वाम्‌--सर्वत्र; जित्वा--जीतकर; यक्ष्यति--यज्ञ करेगा; च--तथा; अध्वरै:--अश्वमेध यज्ञ सम्पन्न करके |

सारे संसार को जीतने के बाद और कलष के पुत्र तुर को अपना पुरोहित बनाकर, जनमेजयअश्वमेध यज्ञ करेगा जिसके कारण वह तुरग-मेधषाट्‌ कहलायेगा।

तस्य पुत्र: शतानीको याज्ञवल्क्यात्त्रयीं पठन्‌ ।

अख्तज्ञानं क्रियाज्ञानं शौनकात्परमेष्यति ॥

३८ ॥

तस्य--उसका; पुत्र:--पुत्र; शतानीक:--शतानीक; याज्ञवल्क्यात्‌--ऋषि याज्ञवल्क्य से; त्रयीम्‌--तीनों वेद ( साम, यजुर तथाऋग्‌ ); पठन्‌-- भलीभाँति अध्ययन करते हुए; अस्त्र-ज्ञाममू--सैनिक शासन कला; क्रिया-ज्ञानम्‌ू--कर्मकाण्ड सम्पन्न करने कीकला; शौनकात्‌--शौनक ऋषि से; परम्‌--दिव्य ज्ञान; एष्यति--प्राप्त करेगा ।

जनमेजय का पुत्र शतानीक ऋषि याज्ञवल्क्य से तीनों वेद और कर्मकाण्ड सम्पन्न करने कीकला को सीखेगा।

वह कृपाचार्य से सैन्य कला भी सीखेगा तथा शौनक मुनि से दिव्य ज्ञान प्राप्तकरेगा।

सहस्त्रानीकस्तत्पुत्रस्ततश्चैवा श्रमेधज: ।

असीमकृष्णस्तस्यापि नेमिचक्रस्तु तत्सुत: ॥

३९॥

सहस्त्रानीक:--सहस्त्रानीक; ततू-पुत्र:ः--शतानीक का पुत्र; ततः--सहस्त्रानीक से; च--भी; एब--निस्सन्देह; अश्वमेधज: --अश्वमेधज; असीमकृष्ण: -- असीमकृष्ण; तस्य--उसका ( अश्वमेधज ); अपि--भी; नेमिचक्र:--नेमिचक्र; तु--निस्सन्देह; ततू-सुतः--उसका पुत्र

शतानीक का पुत्र सहस्त्रानाक होगा और उसके पुत्र का नाम अश्वमेधज होगा।

अश्वेमधज से असीम कृष्ण उत्पन्न होगा और उसका पुत्र नेमिचक्र होगा।

गजाह्ये हते नद्या कौशा म्ब्यां साधु वत्स्यति ।

उत्तस्ततश्नित्ररथस्तस्माच्छुचिरथ: सुत: ॥

४०॥

गजाह्ये--हस्तिनापुर नगरी ( नई दिल्‍ली ) में; हते--जलमग्न होने पर; नद्या--नदी के द्वारा; कौशाम्ब्यामू--कौशाम्बी नामक स्थानमें; साधु-- भलीभाँति; वत्स्यति--वहाँ निवास करेगा; उक्त:--विख्यात; तत:--तत्पश्चात्‌; चित्ररथ:--चित्ररथ; तस्मात्‌--उससे;शुचिरथः --शुचिरथ; सुतः --पुत्र |

जब हस्तिनापुर नगरी ( नई दिल्‍ली ) नदी की बाढ़ से जलमग्न हो जायेगी तो नेमिचक्र कौशाम्बीनामक स्थान में निवास करेगा।

उसका पुत्र चित्ररथ नाम से विख्यात होगा और चित्ररथ का पुत्रशुचिरथ होगा।

तस्माच्च वृष्टिमांस्तस्थ सुषेणोथ महीपति: ।

सुनीथस्तस्य भविता नृचश्षुर्यत्सुखीनल: ॥

४१॥

तस्मात्‌--उससे ( शुचिरथ ); च--भी; वृष्टिमान्‌ू--वृष्टिमान; तस्थ--उसका पुत्र; सुषेण: --सुषेण; अथ--तत्पश्चात्‌; मही-पति: --सारेसंसार का सम्राट; सुनीथ:--सुनीथ; तस्य--उसका; भविता--होगा; नृचश्षु:--पुत्र नूचक्षु; यत्‌--उससे; सुखीनलः--सुखीनल |

शुचिरथ का पुत्र वृष्टिमान होगा और उसका पुत्र सुषेण नाम का चक्रवर्ती राजा होगा।

सुषेण कापुत्र सुनीथ होगा, उसका पुत्र नृचक्षु होगा और नृचक्षु का पुत्र सुखीनल होगा।

परिप्लव: सुतस्तस्मान्मेधावी सुनयात्मज: ।

नृपञ्जयस्ततो दूर्वस्तिमिस्तस्माज्ननिष्यति ॥

४२॥

परिप्लव:ः--परिप्लव; सुतः--पुत्र; तस्मात्‌--उससे ( परिप्लव ); मेधाबी--मेधावी; सुनय-आत्मज: --सुनय का पुत्र; नृपल्ञय:--नृपञ्ञय; ततः--उससे; दूर्व:--दूर्व; तिमि:ः--तिमि; तस्मात्‌--उससे; जनिष्यति--जन्म लेगा |

सुखीनल का पुत्र परिप्लब, परिप्लव का सुनय और सुनय का पुत्र मेधावी होगा।

मेधावी सेनृपञ्ञय, नृपञ्जञय से दूर्व तथा दूर्व से तिमि का जन्म होगा।

तिमेर्बुहद्रथस्तस्माच्छतानीक: सुदासज: ।

शतानीकाहुर्दमनस्तस्यापत्यं महीनर: ॥

४३॥

तिमेः--तिमि का; बृहद्रथ:--बृहद्रथ; तस्मात्‌--उससे; शतानीक:--शतानीक; सुदास-ज:--सुदास का पुत्र; शतानीकातू--शतानीकसे; दुर्दमन:--दुर्दमन; तस्य अपत्यम्‌--उसका पुत्र; महीनर: --महीनर |

तिमि का पुत्र बृहद्रथ, बृहद्रथ का सुदास, सुदास का शतानीक, शतानीक का दुर्दमन औरदुर्दमन का पुत्र महीनर होगा।

दण्डपाणिर्निमिस्तस्य क्षेमको भविता यतः ।

ब्रह्मक्षत्रस्य वै योनिर्वशो देवर्षिसत्कृत: ॥

४४॥

क्षेमकं प्राप्य राजानं संस्थां प्राप्स्यति वै कलौ ।

अथ मागधराजानो भाविनो ये वदामि ते ॥

४५॥

दण्डपाणि:--दण्डपाणि; निमि: --निमि; तस्य--उसका ( महीनर के ); क्षेमक:--क्षेमक; भविता--जन्म लेगा; यतः--जिससे; ब्रह्म-क्षत्रस्थ--ब्राह्मणों तथा क्षत्रियों का; वै--निस्सन्देह; योनि:--स्त्रोत; वंशः--वंश; देव-ऋषि-सत्कृत:ः--ऋषियों तथा देवताओं द्वारासम्मानित; क्षेमकम्‌--राजा क्षेमक को; प्राप्प--यहाँ तक; राजानम्‌--राजा को; संस्थाम्‌--उन तक; प्राप्स्यति--हो जायेगा; बै--निस्सन्देहद; कलौ--इस कलियुग में; अथ--तत्पश्चात्‌; मागध-राजान:--मागध वंशी राजा; भाविन: -- भावी; ये-- जो; वदामि--कहूँगा; ते--तुमसे |

महीनर का पुत्र दण्डपाणि होगा और उसका पुत्र निमि होगा जिससे राजा क्षेमक की उत्पत्तिहोगी।

मैंने अभी तुमसे सोमवंश का वर्णन किया है जो ब्राह्मणों तथा क्षत्रियों का उद्गम है औरदेवताओं तथा ऋषियों-मुनियों द्वारा पूजित है।

इस कलियुग में क्षेमक अन्तिम राजा होगा।

अब मैं तुमसे मागध वंश का भविष्य बतलाऊँगा।

उसे सुनो ।

भविता सहदेवस्य मार्जारियच्छुतश्रवा: ।

ततो युतायुस्तस्यापि निरमित्रोथ तत्सुतः ॥

४६॥

सुनक्षत्रः सुनक्षत्राद्रहत्सेनोथ कर्मजित्‌ ।

ततः सुतञ्जयाद्विप्र: शुचिस्तस्य भविष्यति ॥

४७॥

क्षेमोथ सुव्रतस्तस्माद्धर्मसूत्र: समस्ततः ।

झुमत्सेनोथ सुमति: सुबलो जनिता ततः ॥

४८॥

भविता--जन्म लेगा; सहदेवस्य--सहदेव का पुत्र; मार्जारि:ः--मार्जारि; यत्‌--उसका पुत्र; श्रुतश्रवा: -- श्रुतअ्रवा; तत: -- उससे ;युतायु;:--युतायु; तस्थ--उसका पुत्र; अपि-- भी; निरमित्र:--निरमित्र; अथ--तत्पश्चात्‌; तत्‌-सुतः--उसका पुत्र; सुनक्षत्र: --सुनक्षत्र;सुनक्षत्रात्‌--सुनक्षत्र से; बृहत्सेन:--बृहत्सेन; अथ--उससे; कर्मजित्‌ू--कर्मजित; ततः--उससे; सुतझ्जयात्‌--सुतझ्जय से; विप्र: --विप्र; शुचचिः--शुचि; तस्य--उसका; भविष्यति--होगा; क्षेम:--क्षेम; अथ--तत्पश्चात्‌; सुब्रत: --सुव्रत; तस्मात्‌-- उससे; धर्मसूत्र: --धर्मसूत्र; सम:--सम; ततः--उससे; झ्युमत्सेन: --द्युमत्सेन; अथ--तत्पश्चात्‌; सुमतिः --सुमति; सुबल:--सुबल; जनिता--जन्म लेगा;ततः--तत्पश्चात्‌ |

जरासन्धपुत्र सहदेव के पुत्र का नाम मार्जारि होगा।

मार्जारि से श्रुतश्रवा, श्रुतश्रवा से युतायु,युतायु से निरमित्र, निरमित्र से सुनक्षत्र, सुनक्षत्र से बृहत्सेन, बृहत्सेन से कर्मजित, कर्मजित सेसुतझ्ञय, सुतञ्जय से विप्र, विप्र से शुचि, शुचि से क्षेम, क्षेम से सुब्रत, सुब्रत से धर्मसूत्र, धर्मसूत्र सेसम, सम से झुमत्सेन, द्युमत्सेन से सुमति और सुमति से सुबल नाम का पुत्र उत्पन्न होगा।

सुनीथ: सत्यजिदथ विश्वजिद्यद्रिपुश्लयः ।

बाईद्रथाश्व भूपाला भाव्या: साहस्त्रवत्सरम्‌ ॥

४९॥

सुनीथ:--सुबल से सुनीथ उत्पन्न होगा; सत्यजित्‌ू--सत्यजित; अथ--उससे; विश्वजित्‌-विश्वजित; यत्‌--उससे; रिपुञ्लय:--रिपुञ्ञय;बाईद्रथा: --बृहद्रथ की वंशावली में; च-- भी; भूपाला: --सारे राजा; भाव्या: --होंगे; साहस्त्र-वत्सरम्‌--एक हजार वर्षो तक

लगातारसुबल से सुनीथ, सुनीथ से सत्यजित, सत्यजित से विश्वजित एवं विश्वजित से रिपुञ्जय उत्पन्नहोगा।

ये सभी पुरुष बृहद्रथवंशी होंगे और ये संसार पर एक हजार वर्षो तक राज्य करेंगे।

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