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अध्याय तेईसवाँ: ययाति के पुत्रों के राजवंश
9.23श्रीशुक उबाचअनोः सभानरक्षक्षु: परेष्णुश्न त्रयः सुता: ।
सभानरात्कालनरः सृझ्धयस्तत्सुतस्तत: ॥
१॥
श्री-शुकः उवाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; अनो:--अनु का, जो ययाति के चार पुत्रों में से चौथा बेटा था; सभानर:--सभानर;चक्षु:--चक्षु; परेष्णु: --परेष्णु; च-- भी; त्रय:--तीन; सुता:--बेटे; सभानरात्--सभानर से; कालनर:--कालनर; सृज्ञय:--सूझ्ञय;तत्-सुतः--कालनर का पुत्र; ततः--तत्पश्चात् |
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : ययाति के चतुर्थ पुत्र अनु के तीन पुत्र हुए जिनके नाम थे--सभानर,चक्षु तथा परेष्णु।
हे राजा, सभानर के कालनर नाम का एक पुत्र हुआ और कालनर से सृझ्षय नामकपुत्र उत्पन्न हुआ।
जनमेजयस्तस्य पुत्रो महाशालो महामना: ।
उशीनरस्तितिक्षुश्ष महामनस आत्मजौ ॥
२॥
जनमेजय: --जनमेजय; तस्य--उसका; पुत्र: --पुत्र; महाशाल:--महाशाल; महामना:--महामना; उशीनरः --उशीनर; तितिक्षु:--तितिक्षु; च--तथा; महामनसः --महामना से; आत्मजौ--दो पुत्र सृद्धय का पुत्र जनमेजय हुआ
जनमेजय का पुत्र महाशाल, महाशाल का पुत्र महामना औरमहामना के दो पुत्र उशीनर तथा तितिक्षु हुए।
शिबिरवरः कृमिर्दक्षश्चवत्वारोशीनरात्मजा: ।
वृषादर्भ: सुधीरश्च मद्र: केकय आत्मवान् ॥
३॥
शिबेश्चत्वार एवासंस्तितिक्षोश्व रुषद्रथ: ।
ततो होमोथ सुतपा बलि: सुतपसोभवत् ॥
४॥
शिबि:--शिबि; वर: --वर; कृमि:--कृमि; दक्ष:--दक्ष; चत्वार:--चार; उशीनर-आत्मजा:--उशीनर के पुत्र; वृषादर्भ:--वृषादर्भ;सुधीर: च--तथा सुधीर; मद्र:--मद्र; केकयः--केकय; आत्मवान्--स्वरूपसिद्ध; शिबे: --शिबि के; चत्वार:--चार; एव--निस्सन्देह; आसनू--थे; तितिक्षो: --तितिक्षु का; च--भी; रुषद्रथ:--रुषद्रथ; तत:ः--उससे ( रुषद्रथ ); होम: --होम; अथ--उससे( होम ); सुतपा:--सुतपा; बलि:--बलि; सुतपसः--सुतपा के; अभवत्--हुआउशीनर के चार पुत्र थे--शिबि, वर, कृमि तथा दक्ष।
शिबरि के भी चार पुत्र हुए--वृषादर्भ,सुधीर, मद्र तथा आत्मतत्त्ववित् केकय।
तितिक्षु का पुत्र रुषद्रथ था; रुषद्रथ का पुत्र होम था; होमका सुतपा और सुतपा का पुत्र बलि था।
अड्डबड्रकलिड्ञाद्या: सुहापुण्ड्रौड़संज्ञिता: ।
जज्ञिरे दीर्घतमसो बले: क्षेत्रे महीक्षितः ॥
५॥
अड्ड--अंग; बड़--वंग; कलिड्र--कलिंग; आद्या:--इत्यादि; सुह्ा--सुहा; पुण्ड्र--पुण्डू; ओड़--ओड़; संज्ञिता:--नाम से विख्यात;जज्ञिरि--उत्पन्न हुए; दीर्घतमस:--दीर्घतमा के वीर्य से; बले:--बलि की; क्षेत्रे--पत्नी से; मही-क्षित:ः--जगत के राजा
चक्रवर्ती राजा बलि की पत्नी से दीर्घतमा के वीर्य से छह पुत्रों ने जन्म लिया जिनके नाम थेअंग, बंग, कलिंग, सुहा, पुण्ड् तथा ओड़।
चक्रुः स्वनाम्ना विषयान्षडिमान्प्राच्यकां श्व ते ।
खलपानोडड्डढतो जज्ञे तस्माद्वविरथस्तत: ॥
६॥
चक्कु:--उत्पन्न किया; स्व-नाम्ना--अपने-अपने नामों से; विषयान्ू--विभिन्न राज्य; घट्ू--छ:; इमानू--ये सभी; प्राच्यकान् च--भारत की पूर्व दिशा में; ते--वे ( छह राजा ); खलपान:--खलपान; अड्डभतः--राजा अंग से; जज्ञे--जन्म लिया; तस्मात्--उससे;दिविरथ:--दिविरथ; ततः--तत्पश्चात्
बाद में अंगादि ये छहों पुत्र भारत की पूर्व दिशा में छः राज्यों के राजा बने।
ये राज्य अपने-अपनेराजा के नाम के अनुसार विख्यात हुए।
अंग से खलपान नामक पुत्र हुआ जिससे दिविरथ उत्पन्नहुआ।
सुतो धर्मरथो यस्य जन्ने चित्ररथोप्रजा: ।
रोमपाद इति ख्यातस्तस्मै दशरथ: सखा ॥
७॥
शान्तां स्वकन्यां प्रायच्छद्ृष्यश्रुड्र उवाह याम् ।
देवेवर्षति यं रामा आनिन्युहरिणीसुतम् ॥
८ ॥
नाट्यसड्डीतवादित्रैविभ्रमालिड्रनाहणै: ।
स तु राज्ञोउनपत्यस्य निरूप्येष्टिं मरुत्वते ॥
९॥
प्रजामदादइशरथो येन लेभेउप्रजा: प्रजा: ।
चतुरज्जो रोमपादात्पृथुलाक्षस्तु तत्सुतः: ॥
१०॥
सुतः--पुत्र; धर्मरथः --धर्मरथ; यस्य--जिसके; जज्ञे--उत्पन्न हुआ; चित्ररथ: --चित्ररथ; अप्रजा:--निःसन्तान; रोमपाद: --रोमपाद;इति--इस प्रकार; ख्यातः--विख्यात; तस्मै--उसको; दशरथ: -- दशरथ; सखा--मित्र; शान्ताम्ू--शान्ता को; स्व-कन्याम्--अपनीपुत्री; प्रायच्छत्--दे दिया; ऋष्यश्रुड्र:--ऋष्य श्रृंग ने; उबाह--विवाह कर लिया; याम्--जिससे; देवे--वर्षा के देवता ने; अवर्षति--वर्षा नहीं की; यमू--जिसको ( ऋष्यश्रृंग को ); रामा:--वेश्याएँ; आनिन्यु:--ले आईं; हरिणी-सुतम्--हरिणी पुत्र ऋष्यश्रृंग को;नाट्य-सड्डीत-वादित्रै: --नाच, गाना तथा वाद्ययंत्रों के द्वारा; विध्रम--मोहित करके; आलिड्रन--आलिगंन करके; अर्हणै:--पूजाद्वारा; सः--वह ( ऋष्यश्रृंग ); तु--निस्सन्देह; राज्अ:--महाराज दशरथ से; अनपत्यस्य--सन्तानहीन; निरूप्य--स्थापित करके;इष्टिमू--यज्ञ; मरुत्वते--मरुत्वान नामक देवता की; प्रजामू--सन्तान; अदात्--प्रदान किया; दशरथ: --दशरथ ने; येन--जिससे(यज्ञ के फलस्वरूप ); लेभे--प्राप्त किया; अप्रजा:--निस्संतान होते हुए; प्रजा:--पुत्र; चतुरड्र:--चतुरंग; रोमपादात्--चित्ररथ से;पृथुलाक्ष:--पृथुलाक्ष; तु--निस्सन्देह; तत्-सुतः--चतुरंग का पुत्र |
दिविरथ का पुत्र धर्मरथ हुआ और उसका पुत्र चित्ररथ था जो रोमपाद के नाम से विख्यात था।
किन्तु रोमपाद के कोई सन््तान न थी अतएव उसके मित्र महाराज दशरथ ने उसे अपनी पुत्री शान्ता देदी।
रोमपाद ने उसे पुत्री रूप में स्वीकार किया।
तत्पश्चात् उस पुत्री ने ऋष्यश्रृंग से विवाह कर लिया।
जब स्वर्गलोक के देवताओं ने वर्षा नहीं की तो ऋष्यश्रृंग को वेश्याओं के द्वारा आकर्षित करकेजंगल से लाया गया और उसे एक यज्ञ सम्पन्न करने के लिए पुरोहित नियुक्त किया गया।
ये वेश्याएँनाचकर तथा संगीत के साथ नाटक करके और उनका आलिंगन तथा पूजन करके उन्हें ले आईं थीं।
ऋष्यश्रृंग के आने के बाद वर्षा हुई।
तत्पश्चात् ऋष्यश्रृंग ने महाराज दशरथ के लिए पुत्र-यज्ञ कियाक्योंकि उनका कोई पुत्र न था।
इससे महाराज दशरथ को पुत्र-प्राप्ति हुई।
ऋष्यश्रृंग की कृपा सेरोमपाद के एक पुत्र चतुरंग हुआ और चतुरंग से पृथुलाक्ष का जन्म हुआ।
बृहद्रथो बृहत्कर्मा बृहद्धानुश्च तत्सुताः ।
आद्याह्रहन्मनास्तस्माज्जयद्रथ उदाहत: ॥
११॥
बृहद्रथ: --बृहद्रथ; बृहत्कर्मा--बृहत्कर्मा; बृहद्धानु:--बृहद्भानु; च-- भी; तत्-सुता: --पृथुलाक्ष के पुत्र; आद्यातू--सबसे बड़े( बृहद्रथ ) से; बृहन्मना:--बृहद्वाना उत्पन्न हुआ; तस्मात्--उससे; जयद्रथ:--जयद्रथ; उदाहत:ः--उसके पुत्र के रूप में विख्यात हुआ।
पृथुलाक्ष के पुत्र थे बृहद्रथ, बृहत्कर्मा तथा बृहदभानु।
ज्येष्ठ पुत्र बृहद्रथ से बृहद्यना नाम का पुत्रहुआ और बृहद्मना से जयद्रथ हुआ।
विजयस्तस्य सम्भूत्यां ततो धृतिरजायत ।
ततो धृतक्रतस्तस्य सत्कर्माधिरथस्तत: ॥
१२॥
विजय:--विजय; तस्य--उसका; सम्भूत्यामू--पत्नी के गर्भ से; ततः--तत्पश्चात्; धृति:-- धृति; अजायत--उत्पन्न हुआ; ततः--उससे( धृति से ); धृतब्रत:ः-- धृतब्रत; तस्य--उसका; सत्कर्मा--सत्कर्मा; अधिरथ:--अधिरथ; ततः--उससे ( सत्कर्मा से
)जयद्रथ की पतली सम्भूति के गर्भ से विजय उत्पन्न हुआ, विजय से धृति, धृति से ध्रृतिव्नत,धृतिब्रत से सत्कर्मा तथा सत्कर्मा से अधिरथ हुआ।
योउसौ गझ्जतटे क्रीडन्मझ्ूषान्तर्गत॑ं शिशुम् ।
कुन्त्यापविद्धं कानीनमनपत्योकरोत्सुतम् ॥
१३॥
यः असौ--वह जो ( अधिरथ ); गड्ज-तटे--गंगा नदी के किनारे; क्रीडन्ू--खेलते समय; मञ्जूष-अन्तःगतम्--टोकरी के भीतर बन्द;शिशुम्--बालक को; कुन्त्या अपविद्धम्--कुन्ती द्वारा परित्यक्त; कानीनम्ू--कुमारी होने पर उत्पन्न; अनपत्य:--अधिरथ केनिःसन्तान होने से; अकरोत्--शिशु को स्वीकार कर लिया; सुतम्--अपने पुत्र रूप में |
गंगा नदी के तट पर खेलते समय अधिरथ को एक टोकरी में बंद एक शिशु प्राप्त हुआ।
इसशिशु को कुन्ती ने छोड़ दिया था क्योंकि यह उसके विवाह होने के पूर्व ही उत्पन्न हुआ था।
चूँकिअधिरथ के कोई पुत्र न था अतएव उसने इस शिशु को अपने ही पुत्र की तरह पाला पोसा।
( बाद मेंयही पुत्र कर्ण कहलाया ) वृषसेन: सुतस्तस्य कर्णस्य जगतीपते ।
ब्ुह्मोश्व तनयो बश्चु: सेतुस्तस्यात्मजस्तत: ॥
१४॥
वृषसेन: --वृषसेन; सुतः--पुत्र; तस्य कर्णस्य--उसी कर्ण का; जगती पते--हे महाराज परीक्षित; द्रुद्मंः च--ययाति के तृतीय पुत्रब्रह्म का; तनय:--पुत्र; बश्लु:--ब श्रु; सेतु: --सेतु; तस्य--उसका; आत्मज: तत:--तत्पश्चात् उसका पुत्र |
हे राजा, कर्ण का एकमात्र पुत्र वृषसेन था।
ययाति के तृतीय पुत्र द्ह्मु का पुत्र बश्चु था और बचश्चुका पुत्र सेतु था।
आरब्थस्तस्य गान्धारस्तस्य धर्मस्ततो धृतः ।
धृतस्य दुर्मदस्तस्मात्प्रचेता: प्राचेतस: शतम् ॥
१५॥
आरब्ध: --आरब्ध ( सेतु का पुत्र ); तस्य--उसका ( आरब्ध का ); गान्धार: --गान्धार; तस्य--उसका पुत्र; धर्म: --धर्म; ततः--उससे;धृत:ः--धृत; धृतस्य--धृत का; दुर्मदः--दुर्मद; तस्मात्--उससे; प्रचेता:--प्रचेता; प्राचेतस: --प्रचेता के; शतम्--एक सौ पुत्र थे।
सेतु का पुत्र आरब्ध था, आरब्ध का पुत्र गान्धार हुआ और गान्धार का पुत्र धर्म था।
धर्म का पुत्रधृत, धृत का दुर्मद और दुर्मद का पुत्र प्रचेता था जिसके एक सौ पुत्र हुए।
म्लेच्छाधिपतयोभूवच्नुदीचीं दिशमाश्रिता: ।
तुर्वसोश्च सुतो बह्नि्वह्नर्भगोथ भानुमान् ॥
१६॥
म्लेच्छ--म्लेच्छ देश के ( जहाँ वैदिक सभ्यता नहीं पाई जाती ); अधिपतय:--राजा; अभूवन्--बने; उदीचीम्-- भारत की उत्तरी;दिशम्--दिशा को; आश्रिता:--सीमा मानकर; तुर्वबसो: च--महाराज ययाति के द्वितीय पुत्र तुर्वसु का; सुत:--पुत्र; वहिः--वहि;वह्ेः--वह्ि का; भर्ग:--भर्ग नाम का पुत्र; अथ--तत्पश्चात् उसका पुत्र; भानुमान्ू-- भानुमान |
प्रचेताओं ( प्रचेता के पुत्रों ) ने भारत की उत्तरी दिशा में कब्जा कर लिया जो वैदिक सभ्यता सेविहीन थी और वे वहाँ के राजा बन गये।
ययाति का दूसरा पुत्र तुर्वसु था।
तुर्वसु का पुत्र वह्नि था,वह्नि का पुत्र भर्ग था और भर्ग का पुत्र भानुमान था।
त्रिभानुस्तत्सुतो स्थापि करन्धम उदारधीः ।
मरुतस्तत्सुतो पुत्र: पुत्रं पौरवमन्वभूत् ॥
१७॥
त्रिभानु:--त्रिभानु; ततू-सुतः-- भानुमान का पुत्र; अस्य--उसका ( त्रिभानु का ); अपि-- भी; करन्धम:--करन्धम; उदार-धी: --अत्यन्त उदार बुद्धिवाला; मरुत:--मरूत; तत्-सुतः--करन्धम का पुत्र; अपुत्र:--निःसन्तान; पुत्रम्--पुत्र के रूप में; पौरवम्--पूरुवंश का पुत्र महाराज दुष्मन्त; अन्वभूत्ू-गोद ले लिया।
भानुमान का पुत्र त्रिभानु था और उसका पुत्र उदारचेता करन्धम था।
करन्धम का पुत्र मरुत थाजिसके कोई पुत्र न था अतएव उसने पूरुवंशी पुत्र ( महाराज दुष्मन्त ) को पुत्र रूप में गोद ले लिया।
दुष्मन्तः स पुनर्भेजे स्ववंशं राज्यकामुक: ।
ययातेर्ज्येप्ठपुत्रस्थ यदोर्वशं नरर्षभ ॥
१८॥
वर्णयामि महापुण्यं सर्वपापहरं नृणाम् ।
यदोर्व॑शं नरः श्रुत्वा सर्वपापै: प्रमुच्यते ॥
१९॥
दुष्मन्त:ः--महाराज दुष्मन्त ने; सः--उस; पुनः भेजे--फिर से स्वीकार किया; स्व-वंशम्--अपने मूलवंश ( पूरुवंश ) को; राज्य-कामुकः--राजसिंहासन का इच्छुक होने के कारण; ययाते:--महाराज ययाति के; ज्येष्ठ-पुत्रस्य--पहले पुत्रयदु का; यदो: वंशम्--यदुवंश; नर-ऋषभ-हे मनुष्यों में श्रेष्ठ महाराज परीक्षित; वर्णयामि--वर्णन करूँगा; महा-पुण्यम्--अत्यन्त पवित्र; सर्व-पाप-हरम्--सारे पापकर्मो के फलों को दूर करने वाला; नृणाम्--मनुष्यों का; यदो: वंशम्--यदुवंश का वर्णन; नर: --कोई व्यक्ति; श्रुत्वा--केवल सुनने से; सर्व-पापैः--सारे पापपूर्ण कर्मों के फलों से; प्रमुच्यते--मुक्त हो जाता है।
महाराज दुष्मन्त सिंहासन में बैठने की इच्छा से अपने मूलबंश ( पूरुवंश ) में लौट गये यद्यपि वेमरुत को अपना पिता स्वीकार कर चुके थे।
हे महाराज परीक्षित, अब मैं महाराज ययाति के ज्येष्ठपुत्र यदु के वंश का वर्णन करता हूँ।
यह वर्णन अत्यन्त पवित्र है और मानवसमाज के सारे पापों केफलों को दूर करने वाला है।
इस वर्णन को सुनने मात्र से मनुष्य सारे पापों के फलों से मुक्त हो जाताहै।
यत्रावतीर्णो भगवान्परमात्मा नराकृति: ।
यदोः सहस्त्रजित्क्रोष्टा नलो रिपुरिति श्रुताः ॥
२०॥
चत्वारः सूनवस्तत्र शतजित्प्रथमात्मज: ।
महाहयो रेणुहयो हैहयश्वेति तत्सुता: ॥
२१॥
यत्र--जिस वंश में; अवतीर्ण:--अवतार लिया; भगवान्-- भगवान् कृष्ण; परमात्मा--सारे जीवों के परमात्मा; नर-आकृति:--मनुष्यके रूप में; यदो: --यदु का; सहस्त्रजित्ू--सहस्त्रजित; क्रोष्टा--क्रोष्टा; नलः--नल; रिपुः--रिपु; इति श्रुता:--इस प्रकार से विख्यात;चत्वार:--चारों; सूनव:--पुत्र; तत्र--वहाँ; शतजित्--शतजित; प्रथम-आत्मज:--पहला पुत्र; महाहय:--महाहय; रेणुहयः --रेणुहय;हैहयः--हैहय; च--तथा; इति--इस प्रकार; तत्-सुताः --उसके पुत्र |
भगवान् कृष्ण, जो सारे जीवों के हृदयों में परमात्मा स्वरूप हैं, मनुष्य के अपने आदि रूप में यदुकुल में अवतरित हुए।
यदु के चार पुत्र थे--सहस्त्रजित्ू, क्रोष्टा, नल तथा रिपु।
इन चारों में से सबसेबड़े सहस्त्रजित के एक पुत्र था जिसका नाम शतजित था।
उसके तीन पुत्र हुए--महाहय, रेणुहयतथा हैहय।
धर्मस्तु हैहयसुतो नेत्र: कुन्तेः पिता ततः ।
सोहजझिरभवत्कुन्तेर्महिष्मान्भद्रसेनक: ॥
२२॥
धर्म: तु--किन्तु धर्म; हैहय-सुतः--हैहय का पुत्र बना; नेत्र:--नेत्र; कुन्ते:--कुन्ति का; पिता--पिता; ततः--उससे; सोहज्ञि:--सोहज्लि; अभवत्--हुआ; कुन्ते:--कुन्ति पुत्र; महिष्मान्ू--महिष्मान; भद्गसेनक:-- भद्रसेनकहैहय का पुत्र धर्म था और धर्म का पुत्र नेत्र था जो कुन्ति का पिता था।
कुन्ति से सोहझ्नि,सोहझ्ञि से महिष्मान तथा महिष्मान से भद्गसेनक उत्पन्न हुए।
दुर्मदो भद्रसेनस्थ धनकः कृतवीर्यसू: ।
कृताग्नि: कृतवर्मा च कृतौजा धनकात्मजा: ॥
२३॥
दुर्मदः--दुर्मद; भद्गसेनस्थ-- भद्रसेन का; धनकः--धनक; कृतवीर्य-सू:--कृतवीर्य को जन्म देने वाला; कृताग्नि:--कृताग्नि नामक;कृतवर्मा--कृतवर्मा; च-- भी; कृतोौजा:--कृतौजा; धनक-आत्मजा:--धनक के पुत्रभद्गसेन के पुत्र दुर्मद तथा धनक कहलाये।
धनक कृतवीर्य के अतिरिक्त कृताग्नि, कृतवर्मा तथाकृतौजा का भी पिता था।
अर्जुन: कृतवीर्यस्य सप्तद्वीपेश्वरोभवत् ।
दत्तात्रेयाद्धरेरंशात्प्राप्योगमहागुण: ॥
२४॥
अर्जुन:--अर्जुन; कृतवीर्यस्य--कृतवीर्य का; सप्त-द्वीप--सातों द्वीपों ( पूरे संसार ) का; ईश्वर: अभवत्--सप्राट बन गया;दत्तात्रेयात्-दत्तात्रेय से; हरे: अंशात्- भगवान् के अंशावतार से; प्राप्त--प्राप्त; योग-महागुण:--योगशक्ति का गुण।
कृतवीर्य का पुत्र अर्जुन था।
वह ( कार्तवीर्यार्जुन ) सातों द्वीप वाले सारे संसार का सम्राट बनगया।
उसे भगवान् के अवतार द्त्तात्रेय से योगशक्ति प्राप्त हई थी।
इस तरह उसने अष्ट सिद्धियाँ प्राप्तकर लीं।
न नूनं॑ कार्तवीर्यस्य गतिं यास्यन्ति पार्थिवा: ।
यज्ञदानतपोयोगै: श्रुतवीर्यदयादिभि: ॥
२५॥
न--नहीं; नूनम्--निस्सन्देह; कार्तवीर्यस्थ--कार्तवीर्य के; गतिमू--कार्यकलाप; यास्यन्ति--समझ या प्राप्त कर सकते थे;पार्थिवा:--पृथ्वी के रहने वाले; यज्ञ--यज्ञ; दान--दान; तप:--तपस्या; योगैः --योगशक्ति से; श्रुत--शिक्षा; वीर्य--बल; दया--दया; आदिभि:--इन गुणों से |
इस संसार का कोई भी राजा यज्ञ, दान, तपस्या, योगशक्ति, शिक्षा, बल या दया मेंकार्तवीर्यार्जुन की बराबरी नहीं कर सकता था।
पञ्ञाशीति सहस्त्राणि हाव्याहतबल: समा: ।
अनष्टवित्तस्मरणो बुभुजेक्षय्यघड्वसु ॥
२६॥
पञ्ञाशीति--पचासी; सहस््राणि--हजार; हि--निस्सन्देह; अव्याहत--न चुकने वाला; बल:--जिसका बल; समा:ः--वर्ष; अनष्ट--नष्ट हुए बिना; वित्त-- भौतिक एऐश्वर्य; स्मरण:--तथा स्मरण शक्ति; बुभुजे-- भोग किया; अक्षय्य--अक्षय; षट्ू-वसु--छः प्रकार काभोग्य भौतिक ऐश्वर्य
कार्तवीर्यार्जुन ने लगातार पचासी हजार वर्षो तक पूर्ण शारीरिक बल तथा त्रुटिरहित स्मरणशक्ति से भौतिक ऐश्वर्यों का भोग किया।
दूसरे शब्दों में, उसने अपनी छों इन्द्रियों से अक्षय भौतिकऐश्वर्यो का भोग किया।
तस्य पुत्रसहस्त्रेषु पञ्जैवोर्वरिता मृथे ।
जयध्वज: शूरसेनो वृषभो मधुरूजित: ॥
२७॥
तस्य--उसके ( कार्तवीर्यार्जुन के ); पुत्र-सहस्त्रेषु--एक हजार पुत्रों में; पञ्ञ--पाँच; एब--केवल; उर्बरिता:--जीवित रहे; मृधे--( परशुराम के साथ हुए ) युद्ध में; जयध्वज:-- जयध्वज; शूरसेन: --शूरसेन; वृषभ: --वृषभ; मधु:--मधु; ऊर्जित:--तथा ऊर्जित।
कार्तवीर्यार्जुन के एक हजार पुत्रों में से परशुराम से युद्ध करने के बाद केवल पाँच पुत्र जीवितबचे।
उनके नाम थे जयध्वज, शूरसेन, वृषभ, मधु तथा ऊर्जित।
जयध्वजात्तालजड्डस्तस्य पुत्रशतं त्वभूत् ।
क्षत्रं यत्तालजजझ्जख्यमौर्वतेजोपसंहतम् ॥
२८ ॥
जयध्वजात्--जयध्वज से; तालजड्ड:--तालजंघ नाम का पुत्र; तस्थ--उसके; पुत्र-शतम्--एक सौ पुत्र; तु--निस्सन्देह; अभूत्--उत्पन्न हुए; क्षत्रम्ू--क्षत्रिय वंश; यत्ू--जो; तालजड्ढ-आख्यम्--तालजंघ नाम से विख्यात; और्ब-तेज: --अत्यन्त शक्तिशाली होने से;उपसंहतम्--महाराज सगर द्वारा मार डाले गयेजयध्वज के तालजंघ नाम का एक पुत्र था जिसके एक सौ पुत्र उत्पन्न हुए।
उस तालजंघ नामकवंश के सररे क्षत्रियों का विनाश महाराज सगर द्वारा किया गया जिन्हें और्व ऋषि से महान् शक्ति प्राप्तहुई थी।
तेषां ज्येष्ठो वीतिहोत्रो वृष्णि: पुत्रों मधो: स्मृतः ।
तस्य पुत्रशतं त्वासीद्वृष्णिज्येष्ठं यत: कुलम् ॥
२९॥
तेषाम्--उन सबों में; ज्येष्ठ: --सबसे बड़ा पुत्र; बीतिहोत्र: --वीतिहोत्र; वृष्णि:--वृष्णि; पुत्र:--पुत्र; मधो:--मधु का; स्मृत:--विख्यात था; तस्य--वृष्णि के; पुत्र-शतम्--एक सौ पुत्र; तु--लेकिन; आसीतू--हुए; वृष्णि--वृष्णि; ज्येष्ठम्--ज्येष्ठ; यत: --जिससे; कुलमू--वंश ताल
जंघ के पुत्रों में से वीतिहोत्र सबसे बड़ा था।
वबीतिहोत्र का पुत्र मधु था जिसका पुत्र वृष्णिविख्यात था।
मधु के एक सौ पुत्र हुए जिनमें वृष्णि सबसे बड़ा था।
यादव, माधव तथा वृष्णि नामकवबंशों का उद्गम यदु, मधु तथा वृष्णि से हुआ।
माधवा वृष्णयो राजन्यादवाश्वैति संज्ञिता: ।
यदुपुत्रस्य च क्रोष्टो: पुत्रो वृजिनवांस्ततः ।
स्वाहितोतो विषद्गुर्ब तस्य चित्ररथस्तत: ॥
३०॥
शशबिन्दुर्महायोगी महाभागो महानभूत् ।
चतुर्दशमहारलकश्षक्रवर्त्पपराजित: ॥
३१॥
माधवा:--मधु से चलने वाला वंश; वृष्णय:--वृष्णि से चलने वाला वंश; राजनू--हे राजा ( महाराज परीक्षित ); यादवा: --यदुवंशी;च--और; इति--इस प्रकार; संज्ञिता:--इन विभिन्न पुरुषों के कारण ऐसा कहलाते हैं; यदु-पुत्रस्थ--यदु के पुत्र का; च-- भी;क्रोष्टोः--क्रोष्टा का; पुत्र:--पुत्र; वृजिनवान्ू--जिसका नाम वृजिनवान था; ततः--उससे; स्वाहित:--स्वाहित; अतः--तत्पश्चात्;विषद्गु:--विषदगु; बै--निस्सन्देह; तस्य--उसका; चित्ररथ:--चित्ररथ; तत:--उससे; शशबिन्दु:--शशबिन्दु; महा-योगी--महान्योगी; महा-भाग: --अत्यधिक भाग्यशाली; महान्ू--महापुरुष; अभूत्--हुआ; चतुर्दश-महारत्त:--चौदह प्रकार के महान् ऐश्वर्य;अक्रवर्ती--सप्राट के रूप में; अपराजित:--न हराया जा सकने वाला।
हे महाराज परीक्षित, चूँकि यदु, मधु तथा वृष्णि में से हर एक ने वंश चलाये अतएवं उनके वंशयादव, माधव तथा वृष्णि कहलाते हैं।
यदु के पुत्र क्रोष्टा के वृजिनवान नाम का एक पुत्र हुआ।
वृजिनवान का पुत्र स्वाहित था, स्वाहित का विषदगु, विषद्गु का चित्ररथ और चित्ररथ का पुत्रशशबिन्दु हुआ जो महान् योगी था और चौदहों ऐश्वर्यों से युक्त था तथा वह चौदह महान् रत्नों कास्वामी था।
इस तरह वह संसार का सम्राट बना।
तस्य पत्नीसहस्त्राणां दशानां सुमहायशा: ।
दशलक्षसहस्त्राणि पुत्राणां तास्वजीजनत् ॥
३२॥
तस्य--शशबिन्दु की; पत्ती--पत्नियाँ; सहस्त्राणामू--हजारों में से; दशानाम्--दस; सु-महा-यशा:--अत्यन्त विख्यात; दश--दस;लक्ष--लाख; सहस्त्राणि--हजार; पुत्राणाम्--पुत्रों का; तासु--उनमें; अजीजनत्--उसने उत्पन्न किया।
सुप्रसिद्ध शशबिन्दु के दस हजार पत्लियाँ थीं और उनमें से हर एक से एक लाख पुत्र उत्पन्न हुए।
इसलिए उसके पुत्रों की संख्या एक अरब थी।
तेषां तु षट्प्रधानानां पृथुश्रवस आत्मज: ।
धर्मो नामोशना तस्य हयमेधशतस्य याट् ॥
३३॥
तेषाम्--उन पुत्रों में से; तु--लेकिन; षट् प्रधानानाम्--जिसमें छह प्रमुख थे; पृथुअ्रवसः --पृथु श्रवा का; आत्मज:--पुत्र; धर्म: --धर्म;नाम--नामक; उशना--उशना; तस्य--उसका; हयमेध-शतस्य--एक सौ अश्वमेघ यज्ञों का; याट्--सम्पन्न करने वाला |
इन अनेक पुत्रों में से छह अग्रणी थे यथा पृथुश्रवा तथा पृथुकीर्ति।
पृथुश्रवा का पुत्र धर्मकहलाया और उसका पुत्र उशना कहलाया।
उशना ने एक सौ अश्वमेध यज्ञ सम्पन्न किये।
तत्सुतो रुचकस्तस्य पद्ञासन्नात्मजा: श्रुणु ।
पुरुजिद्रुक्मरुक्मेषुप् थुज्यामघसंज्ञिता: ॥
३४॥
ततू-सुतः--उशना का पुत्र; रुचकः--रुचक; तस्य--उसके; पञ्ञ--पाँच; आसनू-- थे; आत्मजा:--पुत्र; श्रुणु--सुनो ( उनके नाम );पुरुजित्ू--पुरुजित; रुक्म--रुक्म; रुक्मेषु--रुक्मेषु; पृथु--पृथु; ज्यामघ--ज्यामघ; संज्ञिता:--नाम वालेउशना का पुत्र रुचक था जिसके पाँच पुत्र थे--पुरुजित, रुक््म, रुक्मेषु, पृथु तथा ज्यामघ।
कृपया मुझसे इनके विषय में सुनें।
ज्यामघस्त्वप्रजो प्यन्यां भार्यां शैब्यापतिर्भयात् ।
नाविन्दच्छब्रुभवनाद्धोज्यां कन्यामहारषीत् ।
रथस्थां तां निरीक्ष्याह शैब्या पतिममर्षिता ॥
३५॥
केयं कुहक मत्स्थानं रथमारोपितेति वै ।
स्नुषा तवेत्यभिहिते स्मयन्ती पतिमब्रवीत् ॥
३६॥
ज्यामघः --ज्यामघ; तु--निस्सन्देह; अप्रज: अपि--यद्यपि निःसन्तान; अन्याम्--दूसरी; भार्याम्--पत्नी; शैब्या-पति: --शैब्या कापति होने के कारण; भयात्-- भय से; न अविन्दत्--स्वीकार नहीं किया; शत्रु-भवनात्--शत्रु के खेमे से; भोज्याम्-वेश्या को;कन्याम्--कन्या; अहारषीत्ू--ले आया; रथ-स्थाम्ू--रथ में बैठी; तामू--उसको; निरीक्ष्य--देखकर; आह--कहा; शैब्या-- ज्यामघ की पली जशैब्या ने; पतिम्--पति पर; अमर्पषिता--अत्यन्त क्रुद्ध; का इयमू--यह कौन है; कुहक--ओरे धूर्त; मत्-स्थानम्--मेरा स्थान;रथम्--रथ पर; आरोपिता--बैठने के लिए अनुमति प्राप्त; इति--इस प्रकार; बै--निस्सन्देह; स्नुषा--बहू; तव--तुम्हारी; इति--इसप्रकार; अभिहिते--सूचित किये जाने पर; स्मयन्ती--हँसती हुई; पतिम्--पति से; अब्नवीत्--बोली
ज्यामघ के कोई पुत्र न था, किन्तु क्योंकि वह अपनी पत्नी शैब्या से डरता था अतएवं उसनेदूसरा विवाह नहीं किया।
एक बार ज्यामघ किसी शत्रु राजा के खेमे से एक लड़की ले आया जोएक वेश्या थी।
किन्तु उसे देखकर शैब्या अत्यन्त क्रुद्ध हुई और उसने अपने पति से कहा 'क्यों रेधूर्त) यह लड़की कौन है जो रथ में मेरे आसन पर बैठी है ?
' तब ज्यामघ ने उत्तर दिया 'यह लड़कीतुम्हारी बहू ( पुत्रवधू ) होगी।
इन विनोदपूर्ण शब्दों को सुनकर शैब्या ने हँसते हुए उत्तर दिया।
अहं बन्ध्यासपत्नी च स्नुषा मे युज्यते कथम् ।
जनयिष्यसि य॑ राज्ञि तस्येयमुपयुज्यते ॥
३७॥
अहमू--ैं; बन्ध्या--बाँझ; अस-पत्नी--सौत रहित; च-- भी; स्नुषा--बहू; मे--मेरी; युज्यते--हो सकती है; कथम्--किस तरह;जनयिष्यसि--तुम जन्म दोगी; यम्--जो पुत्र; राज्ञि--हे रानी; तस्य--उसके; इयम्--यह लड़की; उपयुज्यते--उपयुक्त होगीशैब्या ने कहा, 'मैं बाँझ हूँ और मेरी कोई सौत भी नहीं है'।
भला यह लड़की मेरी बहू( पुत्रवधू ) कैसे बन सकती है?
' ज्यामघ ने उत्तर दिया, 'मेरी रानी! मैं देखूँगा कि तुम्हारे सचमुचपुत्र होगा और यह लड़की तुम्हारी बहू बनेगी।
अन्वमोदन्त तद्विश्वेदेवा: पितर एव च ।
जैब्या गर्भमधात्काले कुमारं सुषुवे शुभम् ।
स विदर्भ इति प्रोक्त उपयेमे स्नुषां सतीम् ॥
३८ ॥
अन्वमोदन्त--स्वीकार कर लिया; तत्--यह भविष्यवाणी कि उसके पुत्र होगा; विश्वेदेवा:--विश्वेदेव देवतागण; पितर:--पितृगण;एव--निस्सन्देह; च-- भी; शैब्या-- शै ब्या ने; गर्भगू-गर्भ; अधात्-- धारण किया; काले--समय आने पर; कुमारम्--पुत्र को;सुषुवे--जन्म दिया; शुभम्--अत्यन्त शुभ; सः--वह पुत्र; विदर्भ:--विदर्भ; इति--इस प्रकार; प्रोक्त:--विख्यात हुआ; उपयेमे--बादमें विवाह कर लिया; स्नुषाम्--बहू रूप में स्वीकृत; सतीम्--सती साध्वी लड़की को।
बहुत काल पूर्व ज्यामघ ने देवताओं तथा पितरों की पूजा करके उन्हें प्रसन्न कर लिया था।
अब उन्हीं की दया से ज्यामघ के शब्द सही उतरे।
यद्यपि शैब्या बाँझ थी लेकिन देवताओं की कृपा से वहगर्भिणी हुई और समय आने पर उसने विदर्भ नामक शिशु को जन्म दिया।
चूँकि शिशु के जन्म केपूर्व ही उस लड़की को बहू रूप में स्वीकार किया जा चुका था अतएवं जब विदर्भ सयाना हुआ तो उसने उसके साथ विवाह कर लिया।
