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अध्याय चौबीस: कृष्ण, भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व
9.24श्रीशुक उबाचतस्यां विदर्भोडजनयत्पुत्रौ नाम्ना कुशक्रथौ ।
तृतीय रोमपादं च विदर्भकुलनन्दनम् ॥
१॥
श्री-शुकः उबाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; तस्थाम्ू--उस लड़की से; विदर्भ:--विदर्भ ने; अजनयत्--जन्म दिया; पुत्रौ--दो पुत्रोंको; नाम्ना--नामक; कुश-क्रथौ--कुश तथा क्रथ; तृतीयम्--तथा तीसरे पुत्र; रोमपादम् च--रोमपाद को भी; विदर्भ-कुल-नन्दनम्-दविदर्भ वंश का प्रिय |
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : अपने पिता द्वारा लाई गईं उस लड़की के गर्भ से विदर्भ को तीन पुत्रप्राप्त हुए--कुश, क्रथ तथा रोमपाद।
रोमपाद विदर्भ कुल का अत्यन्त प्रिय था।
रोमपादसुतो बश्रुर्बश्रो: कृतिरजायत ।
उशिकस्तत्सुतस्तस्माच्चेदिश्वेद्यादयो नृपा: ॥
२॥
रोमपाद-सुतः--रोमपाद का पुत्र; बश्लु:--बश्रु; बच्रो: --बश्रु से; कृतिः--कृति; अजायत--उत्पन्न हुआ; उशिक:--उशिक; तत्ू-सुतः--कृति का पुत्र; तस्मात्--उससे; चेदि:--चेदि; चैद्य--चैद्य ( दमघोष ); आदयः:--इत्यादि; नृपाः--राजा |
रोमपाद का पुत्र बश्रु हुआ जिससे कृति नामक पुत्र की उत्पत्ति हुईं।
कृति का पुत्र उशिक हुआऔर उशिक का पुत्र चेदि था।
चेदि से चैद्य तथा अन्य राजा पुत्र उत्पन्न हुए।
क्रथस्य कुन्तिः पुत्रो भूद्गष्णिस्तस्याथ निर्वृति: ।
ततो दशाहों नाम्नाभूत्तस्य व्योम: सुतस्ततः ॥
३॥
जीमूतो विकृतिस्तस्य यस्य भीमरथ: सुतः ।
ततो नवरथ:ः पुत्रो जातो दशरथस्ततः ॥
४॥
क्रथस्य--क्रथ का; कुन्तिः--कुन्ति; पुत्र:--पुत्र; अभूत्--हुआ; वृष्णि: --वृष्णि; तस्थ--उसका; अथ--तब ; निर्वृति:--निर्वृति;ततः--उससे; दशाहई:--दशाई; नाम्ना--नामक; अभूत्--उत्पन्न हुआ; तस्य--उसका; व्योम:--व्योम; सुतः--पुत्र; ततः--उससे;जीमूत:--जीमूत; विकृति:ः--विकृति; तस्य--उसका; यस्य--जिसका ( विकृति का ); भीमरथ: -- भीमरथ; सुतः --पुत्र; ततः--उससे ( भीमरथ ); नवरथः --नवरथ; पुत्र:--पुत्र; जात:--उत्पन्न हुआ; दशरथ: --दशरथ; ततः--उससे
क्रथ का पुत्र कुन्ति, कुन्ति का पुत्र वृष्णि, वृष्णि का निर्वृति, निर्वति का दशाई, दशाई काव्योम, व्योम का जीमूत, जीमूत का विकृति, विकृति का भीमरथ, भीमरथ का नवरथ तथा नवरथका पुत्र दशरथ हुआ।
करम्भि: शकुने:ः पुत्रो देवरातस्तदात्मज: ।
देवक्षत्रस्ततस्तस्य मधु: कुरुवशादनु: ॥
५॥
'करम्भि:ः--करम्भि; शकुने:--शकुनि से; पुत्र:--पुत्र; देवरातः --देवरात; तत्-आत्मज: --उसका पुत्र ( करम्भि ); देवक्षत्र: --देवक्षत्र;ततः--तत्पश्चात्; तस्थ--उसका; मधु: --मधु; कुरुवशात्--कुरुवश से; अनुः--अनुदशरथ का पुत्र शकुनि हुआ और शकुनि का पुत्र करम्भि था।
करम्भि का पुत्र देवरात हुआजिसका पुत्र देवक्षत्र था।
देवक्षत्र का पुत्र मधु था और उसका पुत्र कुरुवश था जिसके अनु नाम कापुत्र उत्पन्न हुआ।
पुरुहोत्रस्त्वनो: पुत्रस्तस्यायु: सात्वतस्ततः ।
भजमानो भरजिर्दिव्यो वृष्णिर्देवावृधोउन्धकः ॥
६॥
सात्वतस्य सुता: सप्त महाभोजश्न मारिष ।
भजमानस्य निम्लोचि: किड्डृणो धृष्टिरिव च ॥
७॥
एकस्यामात्मजा: पत्यामन्यस्यां च त्रयः सुता: ।
शताजिच्च सहस्त्राजिदयुताजिदिति प्रभो ॥
८॥
पुरुहोत्र:--पुरुहोत्र; तु--निस्सन्देह; अनो: --अनु का; पुत्र:--पुत्र; तस्य--पुरुहोत्र का; अयु:--अयु; सात्वतः--सात्वत; ततः--उससे ( अयु ); भजमान:-- भजमान; भजि: -- भजि; दिव्य: --दिव्य; वृष्णि:--वृष्णि; देवावृध: --देवावृध; अन्धक:--अन्धक;सात्वतस्थ--सात्वत के; सुताः--पुत्र; सप्त--सात; महाभोज: च--तथा महाभोज; मारिष--हे महान् राजा; भजमानस्यथ-- भजमानके; निम्लोचि:--निम्लोचि; किल्जलूण:--किंकण; धृष्टि: -- धृष्टि; एब--निस्सन्देह; च-- भी; एकस्याम्--एक पत्नी से; आत्मजा:--पुत्र; पल्याम्--पत्ली से; अन्यस्यथाम्--दूसरी; च--भी; त्रय:--तीन; सुता:--पुत्र; शताजित्--शताजित; च--भी; सहस्त्राजितू--सहस्त्राजित; अयुताजित्ू--अयुताजित; इति--इस प्रकार; प्रभो--हे राजा |
अनु का पुत्र पुरुहोत्र हुआ जिसके पुत्र अयु का पुत्र सात्वत था।
हे महान् आर्य राजा, सात्वत केसात पुत्र थे-- भजमान, भजि, दिव्य, वृष्णि, देवावृध, अन्धक तथा महाभोज।
भजमान की एकपतली से निम्लोचि, किंकण तथा धृष्टि नामक तीन पुत्र हुए और दूसरी पत्नी से शताजित, सहस्त्राजिततथा अयुताजित--ये तीन पुत्र उत्पन्न हुए।
बश्रुर्देवावृधसुतस्तयो: एलोकौ पठन्त्यमू ।
यथैव श्रृणुमो दूरात्सम्पश्यामस्तथान्तिकात् ॥
९॥
बश्रु:--बश्रु; देवावृध--देवावृध; सुत:--पुत्र; तयोः--उनके; शलोकौ--दो शलोक; पठन्ति-- पुरानी पीढ़ी के लोग सुनाते हैं; अमू--वे; यथा--जिस तरह; एव--निस्सन्देह; श्रुणुम:--हमने सुना है; दूरात्ू--दूर से; सम्पश्याम:--वास्तव में देख रहे हैं; तथा--उसीतरह; अन्तिकात्ू--आज भी।
देवावृध का पुत्र बच्चु था।
देवावृध तथा बश्चु से सम्बन्धित दो प्रसिद्ध प्रार्थनामय गीत हैं जिन्हेंहमारे पूर्वज गाते रहे हैं और जिन्हें हमने दूर से सुना है।
आज भी मैं वही गीत उनके गुणों के विषय मेंसुनता हूँ ( क्योंकि जो पहले सुना गया है, अभी भी लगातार गाया जाता है )।
बश्रु: श्रेष्ठो मनुष्याणां देवैर्देवावृध: सम: ।
पुरुषा: पञ्जषष्टिश्न घट्सहस्त्राणि चाष्ट च ॥
१०॥
येअमृतत्वमनुप्राप्ता बश्रोर्देवावृधादपि ।
महाभोजोतिधर्मात्मा भोजा आसंस्तदन्वये ॥
११॥
बश्रु:--राजा बश्रु; श्रेष्ठ; --सब राजाओं में श्रेष्ठ; मनुष्याणाम्--सारे मनुष्यों में; देवैः--देवताओं समेत; देवावृध:--राजा देवावृध;समः--समदर्शी; पुरुषा:--पुरुष; पश्च-षष्टि:--पैसठ; च-- भी; षट्ू-सहस्त्राणि--छह हजार; च-- भी; अष्ट-- आठ हजार; च-- भी;ये--जो; अमृतत्वम्-- भवबन्धन से मोक्ष; अनुप्राप्ता: --प्राप्त; बश्रो:--बश्चु की संगति के फलस्वरूप; देवावृधात्--तथा देवावृध कीसंगति से; अपि--निस्सन्देह; महाभोज:--राजा महाभोज; अति-धर्म-आत्मा-- अत्यन्त धार्मिक; भोजा:-- भोज नाम के राजा;आसन्--हुए; तत्-अन्वये--उसके ( महाभोज के ) कुल में |
यह निश्चय हुआ कि मनुष्यों में बश्रु सर्वश्रेष्ठ है और देवावृध देवता तुल्य है।
बश्चु तथा देवावृधकी संगति से उनके सारे वंशज, जिनकी संख्या १४०६५ थी, मोक्ष के भागी हुए।
राजा महाभोज अत्यन्त धर्मात्मा था और उसके कुल में भोज राजा हुए।
वृष्णे: सुमित्र: पुत्रोभूद्युधाजिच्च परन्तप ।
शिनिस्तस्यानमित्रश्न निघ्नो भूदनमित्रतः ॥
१२॥
वृष्णे:--सात्वत पुत्र वृष्णि का; सुमित्र:--सुमित्र; पुत्र:--पुत्र; अभूत्--हुआ; युधाजित्--युधाजित; च-- भी; परम्-तप--हे शत्रुओंका दमन करने वाले राजा; शिनि:--शिनि; तस्य--उसका; अनमित्र: --अनमित्र; च--तथा; निधघ्न:--निघ्न; अभूत्--प्रकट हुआ;अनमित्रत:ः--अनमित्र से
हे शत्रुओं के दमन करने वाले राजा परीक्षित, वृष्णि के पुत्र सुमित्र तथा युधाजित थे।
युधाजितसे शिनि तथा अनमित्र उत्पन्न हुए।
अनमित्र के एक पुत्र था जिसका नाम निघ्त था।
सत्राजितः प्रसेनश्व निध्नस्थाथासतुः सुतौ ।
अनमित्रसुतो योन्यः शिनिस्तस्य च सत्यक: ॥
१३॥
सत्राजित:--सत्राजित; प्रसेन: च--तथा प्रसेन; निध्नस्य--निघ्न के पुत्र; अथ--इस प्रकार; असतु:--थे; सुतौ--दो पुत्र; अनमित्र-सुतः--अनमित्र का बेटा; य:--जो; अन्य: --दूसरा; शिनि:--शिनि; तस्थ--उसका; च--भी; सत्यक:--सत्यक |
निघ्न के दो पुत्र हुए--सत्राजित तथा प्रसेन।
अनमित्र का दूसरा पुत्र एक अन्य शिनि था जिसकापुत्र सत्यक था।
युयुधान: सात्यकिर्व जयस्तस्य कुणिस्तत: ।
युगन्धरोनमित्रस्य वृष्णि: पुत्रोडपरस्ततः ॥
१४॥
युयुधान:--युयुधान; सात्यकि:--सत्यक का पुत्र; बै--निस्सन्देह; जय:--जय; तस्य--उसका ( युयुधान ); कुणि:--कुणि; ततः--उससे ( जय ); युगन्धर: --युगन्धर; अनमित्रस्थ--अनमित्र का पुत्र; वृष्णि: --वृष्णि; पुत्र:--पुत्र; अपर: --दूसरा; ततः--उससे
सत्यक का पुत्र युयुधान था जिसका पुत्र जय हुआ।
जय के एक पुत्र हुआ जिसका नाम कुणिथा।
कुणि का पुत्र युगन्धर था।
अनमित्र का दूसरा पुत्र वृष्णि था।
श्रफल्व श्ित्ररथश्व गान्दिन्यां च ्वफल्कत: ।
अक्रूरप्रमुखा आसम्पुत्रा द्वादश विश्रुता: ॥
१५॥
श्रफल्क:-- श्रफल्क; चित्ररथ: च--तथा चित्ररथ; गान्दिन्यामू--गान्दिनी नामक पत्नी से; च--तथा; शध्रफल्कतः: -- श्रफल्क से;अक्ूर--अक्रूर; प्रमुखा:--इत्यादि; आसनू-- थे; पुत्रा:--पुत्र; द्वादश--बारह; विश्रुता:--विख्यात वृष्णि से श्रफल्क तथा चित्ररथ नाम के दो पुत्र हुए।
श्रफल्क की पत्नी गान्दिनी से अक्रूर उत्पन्नहुआ।
अक्रूर सबसे बड़ा था, किन्तु उसके अतिरिक्त बारह पुत्र और थे जो सभी विख्यात थे।
आसउड्डः सारमेयश्व मृदुरो मृदुविदिगरिः ।
धर्मवृद्धः सुकर्मा च क्षेत्रोपेक्षोईरिमर्दन: ॥
१६॥
शत्रुध्नो गन्धमादश्च प्रतिबाहुश्न द्वादश ।
तेषां स्वसा सुचाराख्या द्वावक्रूरसुतावषि ॥
१७॥
देववानुपदेवश्च तथा चित्ररथात्मजा: ।
पृथुर्विदूरथाद्याश्न बहवो वृष्णिनन्दना: ॥
१८॥
आसड्ु:--आसंग; सारमेय: --सारमेय; च-- भी; मृदुरः--मृदुर; मृदुवित्--मृदुवित; गिरि: --गिरि; धर्मवृद्धः --धर्मवृद्ध; सुकर्मा--सुकर्मा; च--भी; क्षेत्रोपेक्ष:--श्षेत्रोपेक्ष; अरिमर्दन: --अरिमर्दन; शत्रुघ्न:--शत्रुघ्न; गन्धमाद: --गन्धमाद; च-- भी ; प्रतिबाहु: --प्रतिबाहु; च--तथा; द्वादश--बारह; तेषाम्ू--उनकी; स्वसा--बहन; सुचारा--सुचारा; आख्या--विख्यात; द्वौ--दो; अक्रूर--अक्रूरके; सुतौ--बेटे; अपि-- भी; देववान्--देववान; उपदेव: च--तथा उपदेव; तथा--तत्पश्चात्; चित्ररथ-आत्मजा:--चित्ररथ के पुत्र;पृथु; विदूरध--पृथु तथा विदूरथ; आद्या:--आदि; च-- भी; बहव:-- अनेक; वृष्णि-नन्दना: --वृष्णि के पुत्र
इन बारहों के नाम थे--आसंग, सारमेय, मृदुर, मृदुवित, गिरि, धर्मवृद्ध, सुकर्मा, क्षेत्रोपेक्ष,अरिमर्दन, शत्रुघ्न, गन्धमाद तथा प्रतिबाहु।
इन भाइयों के एक बहन भी थी जिसका नाम सुचारा था।
अक्रूर के दो पुत्र हुए जिनके नाम देववान तथा उपदेव थे।
चित्ररथ के पृथु, विदूरथ इत्यादि कई पुत्रथे।
ये सभी वृष्णिवंशी कहलाये।
कुकुरो भजमानश्न शुच्ति: कम्बलबर्हिष: ।
कुकुरस्य सुतो वह्िविलोमा तनयस्ततः ॥
१९॥
कुकुरः--कुकुर; भजमान:-- भजमान; च-- भी; शुचि: --शुचि; कम्बलबर्हिष:--कम्बलबर्हिष; कुकुरस्थ--कुकुर का; सुतः--पुत्र;वहिः--वह्ि; विलोमा--विलोमा; तनय:--पुत्र; ततः--उससे ( वह्ि)
अन्धक के चार पुत्र हुए--कुकुर, भजमान, शुचि तथा कम्बलबर्हिष।
कुकुर का पुत्र वह्नि थाऔर वह्नि का पुत्र विलोमा हुआ।
कपोतरोमा तस्यानु: सखा यस्य च तुम्बुरु: ।
अन्धकादइुन्दुभिस्तस्मादविद्योत: पुनर्वसु: ॥
२०॥
कपोतरोमा--कपोतरोमा; तस्य--उसका ( पुत्र ); अनु:-- अनु; सखा--मित्र; यस्य--जिसका; च--भी ; तुम्बुरु: --तुम्बुरु ;अन्धकात्--अन्धक ( अनुपुत्र ) से; दुन्दुभि: --दुन्दुभि नामक पुत्र; तस्मात्--उससे ( दुन्दुभि ); अविद्योत:--अविद्योत नामक पुत्र;पुनर्वसु:--पुनर्वसु नामक पुत्र
विलोमा का पुत्र कपोतरोमा था जिसका पुत्र अनु हुआ और उसका मित्र तुम्बुरु था।
अनु सेअन्धक का जन्म हुआ, अन्धक से दुन्दुभि, दुन्दुभि से अविद्योत और अविद्योत से पुनर्वसु नामक पुत्रउत्पन्न हुआ।
तस्याहुकश्चाहुकी च कन्या चैवाहुकात्मजौ ।
देवकक्षोग्रसेनश्र चत्वारो देवकात्मजा: ॥
२१॥
देववानुपदेवश्च सुदेवो देववर्धन: ।
तेषां स्वसारः सप्तासन्धृतदेवादयो नृूप ॥
२२॥
शान्तिदेवोपदेवा च श्रीदेवा देवरक्षिता ।
सहदेवा देवकी च वसुदेव उबाह ता: ॥
२३॥
तस्य--उसके; आहुक:--आहुक; च--तथा; आहुकी -- आहुकी; च-- भी; कन्या--पुत्री; च-- भी; एब--निस्सन्देह; आहुक--आहुक के; आत्मजौ--दो पुत्र; देवक:--देवक; च--तथा; उग्रसेन: --उग्रसेन; च-- भी; चत्वार:--चार; देवक-आत्मजा:--देवकके पुत्र; देववान्ू--देववान; उपदेव:--उपदेव; च--तथा; सुदेव: --सुदेव; देववर्धन:--देववर्धन; तेषाम्ू--उन सब में से; स्वसार: --बहनें; सप्त--सात; आसनू--थीं; धृतदेवा-आदय: -- धृतदेवा आदि; नृप--हे राजा परीक्षित; शान्तिदेवा--शान्तिदेवा; उपदेवा--उपदेवा; च--भी; श्रीदेवा-- श्रीदेवा; देवरक्षिता--देवरक्षिता; सहदेवा--सहदेवा; देवकी --देवकी; च--तथा; वसुदेव: --कृष्ण केपिता वसुदेव ने; उबाह--विवाह लिया; ताः:--उनको
पुनर्वसु के एक पुत्र आहुक तथा एक पुत्री आहुकी थी।
आहुक के दो पुत्र थे--देवक तथाउग्रसेन।
देवक के चार पुत्र हुए--देववान्, उपदेव, सुदेव तथा देववर्धन।
उसके सात कन्याएँ भी थींजिनके नाम शान्तिदेवा, उपदेवा, श्रीदेवा, देवरक्षिता, सहदेवा, देवकी तथा धृतदेवा थे।
इनमें धृतदेवासबसे बड़ी थी।
कृष्ण के पिता वसुदेव ने इन सबों के साथ विवाह किया।
कंसः सुनामा न्यग्रोध: कड्ढः शह्ढू : सुहूस्तथा ।
राष्ट्रपालोथ धृष्टिश्व तुष्टिमानौग्रसेनय: ॥
२४॥
कंसः--कंस; सुनामा--सुनामा; न्यग्रोध:--न्यग्रोध; कड्ढः--कंक; शह्डु : -शंकु; सुहू: --सुहू; तथा--और ; राष्ट्रपाल: --राष्ट्रपाल;अथ-तत्पश्चात्; धृष्टि:--धृष्टि; च--भी; तुष्टिमान्--तुष्टिमान; औग्रसेनय:--उग्रसेन के पुत्र |
उपग्रसेन के पुत्रों के नाम थे--कंस, सुनामा, न्यग्रोध, कंक, शंकु, सुहू, राष्ट्रपाल, धृष्टि तथातुष्टिमान।
कंसा कंसवती कड्ढा शूरभू राष्ट्रपालिका ।
उग्रसेनदुहितरो वसुदेवानुजस्त्रियः ॥
२५॥
कंसा--कंसा; कंसवती--कंसवती; कड्जा--कंका; शूरभू-शूरभू; राष्ट्रपालिका--राष्ट्रपालिका; उग्रसेन-दुहितर:--उग्रसेन कीपुत्रियाँ; बसुदेव-अनुज--वसुदेव के छोटे भाइयों की; स्त्रियः--पत्नियाँ
उमग्रसेन की पुत्रियाँ कंसा, कंसावती, कंका, शूरभू तथा राष्ट्रपालिका थीं।
वे वसुदेव के छोटेभाइयों की पत्नियाँ बनीं।
शूरो विदूरथादासीद्धजमानस्तु तत्सुतः ।
शिनिस्तस्मात्स्वयं भोजो हृदिकस्तत्सुतो मतः ॥
२६॥
शूरः--शूर; विदूरथात्--विदूरथ से, जो चित्ररथ का पुत्र था; आसीत्--उत्पन्न हुआ; भजमान:-- भजमान; तु--तथा; तत्-सुत:--उस( शूर ) का पुत्र; शिनि:--शिनि; तस्मात्-- उससे; स्वयम्--स्वयं; भोज: --प्रसिद्ध राजा भोज; हृदिक:--हृदिक; तत्-सुतः--उस( भोज ) का पुत्र; मत:ः--विख्यात है।
चित्ररथ का पुत्र विदूरथ था, जिसका पुत्र शूर था और शूर का पुत्र भजमान था।
भजमान का पुत्रशिनि हुआ, शिनि का पुत्र भोज था और भोज का पुत्र हृदिक था।
देवमीढ: शतधनु: कृतवर्मेति तत्सुता: ।
देवमीढस्य शूरस्य मारिषा नाम पत्यभूत् ॥
२७॥
देवमीढ:--देवमीढ; शतधनु:--शतधनु; कृतवर्मा--कृतवर्मा ; इति--इस प्रकार; तत्-सुता: --उस ( हृदिक ) के पुत्र; देवमीढस्य--देवमीढ का; शूरस्य--शूर का; मारिषा--मारिषा; नाम--नामक; पत्ती--पली; अभूत्-- थीहृदिक के तीन पुत्र हुए--देवमीढ, शतधनु तथा कृतवर्मा |
देवमीढ का पुत्र शूर था जिसकी पत्नीका नाम मारिषा था।
तस्यां स जनयामास दश पुत्रानकल्मषान् ।
बसुदेवं देवभागं देवश्रवसमानकम् ॥
२८॥
सृक्ञयं श्यामकं कड्ढें शमीकं वत्सक॑ वृकम् ।
देवदुन्दुभयो नेदुरानका यस्य जन्मनि ॥
२९॥
वबसुदेवं हरे: स्थानं वदन्त्यानकदुन्दुभिम् ।
पृथा च श्रुतदेवा च श्रुतकीर्ति: श्रुतअ्रवा: ॥
३०॥
राजाधिदेवी चैतेषां भगिन्यः पञ्ञ कन्यकाः ।
कुन्तेः सख्यु: पिता शूरो ह्पुत्रस्थ पृथामदात् ॥
३१॥
तस्याम्--उससे ( मारिषा ) से; सः--उस ( शूर ) ने; जनयाम् आस--उत्पन्न किया; दश--दस; पुत्रान्-पुत्रों को; अकल्मषान् --निष्कलंक; वसुदेवम्--वसुदेव को; देवभागम्--देवभाग को; देवश्रवसम्--देवश्रवा को; आनकम्--आनक को; सृज्ञयम्ू--सूझ्धयको; श्यामकम्-श्यामक; कड्ढडम्--कंक; शमीकम्--शमीक; वत्सकम्--वत्सक; वृकम्--वृक को; देव-दुन्दुभय:--देवताओंद्वारा दुन्दुभियाँ; नेदु:--बजाई गईं; आनका:--एक प्रकार की दुन्दुभी; यस्थय--जिसके; जन्मनि--जन्म होने पर; वसुदेवम्--वसुदेवको; हरेः-- भगवान् का; स्थानम्ू--स्थान; वदन्ति--लोग कहते हैं; आनकदुन्दुभिम्ू-- आनक-दुन्दुभि; पृथा--पृथा; च--तथा;श्रुतदेवा-- श्रुददेवा; च-- भी; श्रुतकीर्ति:-- श्रुतकी र्ति; श्रुतश्रवा: -- श्रुतश्रवा; राजाधिदेवी --राजाधिदेवी; च-- भी; एतेषाम्--इनसबों की; भगिन्य:--बहनें; पञ्ञच-- पाँच; कन्यकाः --शूर की पुत्रियाँ; कुन्ते:--कुन्ति का; सख्यु:--मित्र; पिता--पिता; शूर:--शूर;हि--निस्सन्देह; अपुत्रस्थ--पुत्रविहीन; पृथाम्--पृथा को; अदात्--दे दिया
राजा शूर को अपनी पत्नी मारिषा से वसुदेव, देवभाग, देवश्रवा, आनक, सूज्ञय, श्यामक,कंक, शमीक, वत्सक तथा वृक नामक दस पुत्र उत्पन्न हुए।
ये विशुद्ध पवित्र पुरुष थे।
जब वसुदेवका जन्म हुआ था तो देवताओं ने स्वर्ग से दुन्दुभियां बजाई थीं।
इसीलिए वसुदेव का नाम आनक-दुन्दुभि पड़ गया।
इन्होंने भगवान् कृष्ण के प्राकट्य के लिए समुचित स्थान प्रदान किया।
शूर केपाँच कन्याएँ भी जन्मीं, जिनके नाम थे पृथा, श्रुतदेवा, श्रुतकीर्ति, श्रुतअश्रवा तथा राजाधिदेवी।
येवसुदेव की बहनें थीं।
शूर ने अपने मित्र कुन्ति को अपनी पुत्री पृथा दे दी क्योंकि उसके कोई सनन््ताननहीं थी; इसलिए पृथा का दूसरा नाम कुन्ती था।
साप दुर्वाससो विद्यां देवहूतीं प्रतोषितात् ।
तस्या वीर्यपरीक्षार्थभाजुहाव रविं शुच्ि: ॥
३२॥
सा--उसने ( पृथा ने ); आप--प्राप्त किया; दुर्वासस:--दुर्वासा मुनि से; विद्यामू--योगशक्ति; देव-हूतीम्--किसी भी देवता काआवाहन करने की; प्रतोषितात्--प्रसन्न होकर; तस्या:--उस ( योगशक्ति ) से; वीर्य--प्रभाव; परीक्ष-अर्थम्--परीक्षा करने के लिए;आजुहाव--आवाहित किया; रविम्--सूर्यदेव को; शुचि:--पवित्र ( पृथा )॥
एक बार जब दुर्वासा पृथा के पिता कुन्ति के घर पर अतिथि बने तो पृथा ने अपनी सेवा से उन्हेंप्रसन्न कर लिया।
अतएव उसे ऐसी योगशक्ति प्राप्त हुई जिससे वह किसी भी देवता का आवाहन करसकती थी।
पवित्र कुन्ती ने इस योगशक्ति के प्रभाव की परीक्षा करने के लिए तुरन्त ही सूर्यदेव काआवाहन किया।
तदैवोषागतं देवं वीक्ष्य विस्मितमानसा ।
प्रत्ययार्थ प्रयुक्ता मे याहि देव क्षमस्व मे ॥
३३॥
तदा--उस समय; एव--निस्सन्देह; उपागतम्--( अपने समक्ष ) प्रकट हुआ; देवम्--सूर्यदेव को; वीक्ष्य--देखकर; विस्मित-मानसा--अत्यधिक चकित; प्रत्यय-अर्थम्--योग की शक्ति को देखने के लिए; प्रयुक्ता--मैंने प्रयोग किया है; मे-- मुझे; याहि--कृपया लौट जाइये; देव--हे देवता; क्षमस्व-- क्षमा कीजिये; मे--मुझको |
ज्योंही कुन्ती ने सूर्यदेव का आवाहन किया वे तुरन्त उसके समक्ष प्रकट हो गये।
इस पर वहअत्यधिक चकित हो गई।
उसने सूर्यदेव से कहा 'मैं तो इस योगशक्ति के प्रभाव की परीक्षा ही कररही थी।
खेद है कि मैंने आपको व्यर्थ ही बुलाया है।
कृपया वापस जाएँ और मुझे क्षमा कर दें'।
'अमोधघं देवसन्दर्शमादधे त्वयि चात्मजम् ।
योनिर्यथा न दुष्येत कर्ताहँ ते सुमध्यमे ॥
३४॥
अमोघम्--व्यर्थ न होने वाला; देव-सन्दर्शम्--देवताओं से भेंट; आदधे--मैं ( वीर्य ) दूँगा; त्वयि--तुममें; च-- भी; आत्मजम्--पुत्र;योनि:--योनि मार्ग; यथा--जिस तरह; न--नहीं; दुष्येत--दूषित हो; कर्ता--व्यवस्था करूँगा; अहम्--मैं; ते--तुम्हारी; सुमध्यमे--हे सुन्दरी |
सूर्यदेव ने कहा : हे सुन्दरी पृथा, देवताओं से तुम्हारी भेंट व्यर्थ नहीं जा सकती।
अतएव मैंतुम्हारे गर्भ में वीर्य स्थापित करता हूँ जिससे तुम एक पुत्र उत्पन्न कर सको।
मैं तुम्हारे कौमार्य कोअक्षत रखने की व्यवस्था कर दूँगा क्योंकि तुम अब भी अविवाहिता लड़की हो।
इति तस्यां स आधाय गर्भ सूर्यो दिवं गत: ।
सद्यः कुमार: सञ्जज्ञे द्वितीय इव भास्कर: ॥
३५॥
इति--इस प्रकार; तस्याम्--उसमें ( पृथा में ); सः--उसने ( सूर्यदेव ने )) आधाय--वीर्य स्थापित करके ; गर्भम्--गर्भ; सूर्य: --सूर्यदेव; दिवम्--स्वर्गलोक को; गत:--लौट गये; सद्य:--तुरनन््त; कुमार:--बालक; सझ्जज्ञे--उत्पन्न हुआ; द्वितीय: --दूसरा; इब--सहश; भास्कर:--सूर्यदेवयह कहकर सूर्यदेव ने पृथा के गर्भ में अपना वीर्य स्थापित किया और वे स्वर्गलोक वापस चलेगये।
उसके तुरन्त बाद कुन्ती ने एक पुत्र को जन्म दिया जो दूसरे सूर्य की तरह था।
त॑ं सात्यजन्नदीतोये कृच्छाल्लोकस्य बिभ्यती ।
प्रपितामहस्तामुवाह पाण्डुवैं सत्यविक्रम: ॥
३६॥
तम्--उस बालक को; सा--उसने ( कुन्ती ने ); अत्यजत्ू--छोड़ दिया; नदी-तोये--नदी के जल में; कृच्छात्--पश्चाताप सहित;लोकस्य--लोगों के ; बिभ्यती -- डरते हुए; प्रपितामह: --( तुम्हारे ) परबाबा; ताम्ू--उसको ( कुन्ती को ); उबाह--विवाह किया;पाण्डुः--पाण्डु ने; बै--निस्सन्देह; सत्य-विक्रम:--अत्यन्त पवित्र तथा पराक्रमी
चूँकि कुन्ती लोगों की आलोचनाओं से भयभीत थी अतएव उसे बड़ी कठिनाई से पुत्र-स्नेहछोड़ना पड़ा।
अनचाहे उसने बालक को एक मंजूषा (टोकरी ) में बन्द करके नदी के जल मेंप्रवाहित कर दिया।
हे महाराज परीक्षित, बाद में पवित्र तथा पराक्रमी तुम्हारे बाबा पाण्डु ने कुन्ती सेविवाह कर लिया।
श्रुतदेवां तु कारूषो वृद्धशर्मा समग्रहीत् ।
यस्यामभूददन्तवक्र ऋषिशप्तो दिते: सुतः ॥
३७॥
श्रुतदेवाम्ू-कुन्ती की बहन श्रुतदेवा को; तु--लेकिन; कारूष:--करूष का राजा; वृद्धशर्मा--वृद्धशर्मा ने; समग्रहीत्--विवाहलिया; यस्याम्--जिससे; अभूत्--उत्पन्न हुआ; दन््तवक्र:--दन्तवक्र; ऋषि-शप्त:--सनक तथा सनातन ऋषियों द्वारा शाप प्राप्त;दितेः--दिति का; सुतः--पुत्र
करूष के राजा वृद्धशर्मा ने कुन्ती की बहन श्रुतदेवा के साथ विवाह किया और उसके गर्भ सेदन्तवक्र उत्पन्न हुआ।
सनकादि मुनियों से शापित होने के कारण दन्तवक्र पूर्वजन्म में दिति के पुत्रहिरण्याक्ष के रूप में उत्पन्न हुआ था।
कैकेयो धृष्टकेतुश्न श्रुतकीर्तिमविन्दत ।
सन्तर्दनादयस्तस्यां पञ्ञासन्कैकया: सुता: ॥
३८ ॥
कैकेयः--केकय देश का राजा; धृष्टकेतु:-- धृष्टकेतु ने; च-- भी; श्रुतकीर्तिम्ू--कुन्ती की बहन श्रुतकीर्ति को; अविन्दत--ब्याहलिया; सन्तर्दन-आदय:--सन्तर्दन इत्यादि; तस्याम्--उससे ( श्रुतकीर्ति से ); पञ्ञ--पाँच; आसन्--हुए; कैकया:--केकय के राजाके; सुता:--पुत्र
केकयराज धृष्टकेतु ने कुन्ती की अन्य बहिन श्रुतकीर्ति के साथ विवाह किया।
श्रुतकीर्ति केसन्तर्दन इत्यादि पाँच पुत्र उत्पन्न हुए।
राजाधिदेव्यामावन्त्यौ जयसेनोजनिष्ट ह ।
दमघोषश्चेदिराज: श्रुतअ्रवसमग्रहीत् ॥
३९॥
राजाधिदेव्याम्--राजाधिदेवी ( कुन्ती की दूसरी बहन ) से; आवन्त्यौ--दो पुत्र ( विन्द तथा अनुविन्द ); जयसेन:--जयसेन;अजनिष्ट--जन्म दिया; ह-- भूतकाल में; दमघोष:--दमघोष ने; चेदि-राज:--चेदि राज्य का राजा; श्रुतअ्रवसम्-- श्रुतअ्रवा को;अग्रहीत्--ब्याह लिया।
कुन्ती की अन्य बहन राजाधिदेवी के गर्भ से जयसेन ने विन्द तथा अनुविन्द नामक दो पुत्रों कोजन्म दिया।
इसी प्रकार चेदि राज्य के राजा दमघोष ने श्रुतश्रवा से विवाह किया।
शिशुपाल: सुतस्तस्या: कथितस्तस्य सम्भव: ।
देवभागस्य कंसायां चित्रकेतुबृहद्बलौ ॥
४०॥
शिशुपाल: --शिशुपाल; सुतः --पुत्र; तस्या:-- श्रुत भ्रवा का; कथित:--पहले ही कहा जा चुका है ( सातवें स्कन्ध में ); तस्य--उसका; सम्भव:--जन्म; देवभागस्य-- वसुदेव के भाई देवभाग से; कंसायाम्--उसकी पत्नी कंसा के गर्भ से; चित्रकेतु-चित्रकेतु;बृहद्धनौ-- तथा बृहद्वल।
श्रुतश्रवा का पुत्र शिशुपाल था जिसके जन्म का वर्णन पहले ही ( श्रीमद्भागवत के सातवेंस्कन्ध में ) किया जा चुका है।
वसुदेव के भाई देवभाग की पली कंसा ने दो पुत्रों को जन्म दियाजिनके नाम थे चित्रकेतु तथा बृहद्वल।
कंसवत्यां देवश्रवस: सुवीर इषुमांस्तथा ।
बकः कह्जात्तु कड्ढायां सत्यजित्पुरुजित्तथा ॥
४१॥
कंसवत्याम्-कंसवती के गर्भ में; देवभ्रवसः --वसुदेव के भाई देवश्रवा ने; सुवीर:--सुवीर; इषुमान्--इषुमान; तथा-- और;बकः--बक; कड्ढात्ू-कंक से; तु--निस्सन्देह; कल्ढलायाम्-कंका से; सत्यजित्ू--सत्यजित; पुरुजितू--पुरुजित; तथा--और।
बसुदेव के भाई देवश्रवा ने कंसावती से विवाह किया जिसने सुवीर तथा इषुमान दो पुत्रों कोजन्म दिया।
कंक को अपनी पत्नी कंका से तीन पुत्र प्राप्त हुए जिनके नाम थे बक, सत्यजित तथा पुरुजित।
सृज्ञयो राष्ट्रपाल्यां च वृषदुर्मर्षणादिकान् ।
हरिकेशहिर ण्याक्षौ शूरभूम्यां च श्यामक: ॥
४२॥
सृश्ञय:--सूंजय ने; राष्ट्रपाल्याम्--राष्ट्रपालिका नामक पत्नी से; च--तथा; वृष-दुर्मषण-आदिकान्--वृष, दुर्मर्षण इत्यादि को उत्पन्नकिया; हरिकेश--हरिकेश; हिरण्याक्षौ --तथा हिरण्याक्ष; शूरभूम्यामू--शूरभूमि के गर्भ से; च--तथा; श्यामक:--राजा श्यामक ने |
राजा सृज्ञय के उसकी पतली राष्ट्रपालिका से वृष, दुर्मर्षण इत्यादि पुत्र हुए।
राजा श्यामक केउसकी पतली शूरभूमि से दो पुत्र उत्पन्न हुए जिनके नाम थे हरिकेश तथा हिरण्याक्ष।
मिश्रकेश्यामप्सरसि वृकादीन्वत्सकस्तथा ।
तक्षपुष्करशालादीन्दुर्वाक्ष्यां वक आदधे ॥
४३॥
मिश्रकेश्याम्-मिश्रकेशी के गर्भ से; अप्सससि--जो अप्सरा थी; वृक-आदीन्ू--वृक तथा अन्य पुत्र; बत्सक:--वत्सक; तथा--और; तक्ष-पुष्कर-शाल-आदीनू--तक्ष, पुष्कर, शाल इत्यादि पुत्र; दुर्वाक्ष्याम्--दुर्वाक्षी के गर्भ से; वृक:--वृक ने; आदधे--उत्पन्नकिया।
तत्पश्चात् राजा वत्सक की पत्नी मिश्रकेशी नाम की अप्सरा से वृक इत्यादि पुत्र उत्पन्न हुए।
वृककी पतली दुर्वाक्षी ने तक्षक, पुष्कर, शाल इत्यादि पुत्रों को जन्म दिया।
सुमित्रार्जुनपालादीन्समीकात्तु सुदामनी ।
आनक: कर्णिकायां वै ऋतधामाजयावपषि ॥
४४॥
सुमित्र--सुमित्र; अर्जुपाल--अर्जुनपाल; आदीनू--इत्यादि; समीकात्--समीक राजा से; तु--निस्सन्देह; सुदामनी--सुदामनी केगर्भ से; आनकः--आनक; कर्णिकायाम्--कर्णिका के गर्भ से; वै--निस्सन्देह; ऋतधामा--ऋतधामा; जयौ--तथा जय; अपि--निस्सन्देह
समीक की पत्नी सुदामिनी ने अपने गर्भ से सुमित्र, अर्जुनपाल तथा अन्य पुत्रों को जन्म दिया।
राजा आनक ने अपनी पत्नी कर्णिका के गर्भ से ऋतधामा तथा जय नामक दो पुत्र उत्पन्न किये।
पौरवी रोहिणी भद्गा मदिरा रोचना इला ।
देवकीप्रमुखाश्रासन्पत्य आनकदुन्दुभे: ॥
४५॥
पौरबवी--पौरवी; रोहिणी --रोहिणी; भद्रा-- भद्रा; मदिरा--मदिरा; रोचना--रोचना; इला--इला; देवकी--देवकी; प्रमुखा:--प्रधान;च--तथा; आसनू--थीं; पल्य:--पत्नियाँ; आनकदुन्दुभे:--आनकदुन्दुभि अर्थात् बसुदेव की ।
देवकी, पौरवी, रोहिणी, भद्रा, मदिरा, रोचना, इला इत्यादि आनकदुन्दुभि ( बसुदेव ) कीपत्नियाँ थीं।
इनमें देवकी प्रमुख थी।
बलं गदं सारणं च दुर्मदं विपुलं श्रुवम् ।
वसुदेवस्तु रोहिण्यां कृतादीनुदपादयत् ॥
४६॥
बलम्--बल को; गदम्--गद को; सारणम्--सारण को; च--भी; दुर्मदम्-दुर्मद को; विपुलम्--विपुल को; श्रुवम्--श्वुव को;बसुदेव:--वसुदेव ( कृष्ण के पिता ) ने; तु--निस्सन्देह; रोहिण्याम्-रोहिणी के गर्भ से; कृत-आदीन्--कृत आदि पुत्रों को;उदपादयत्--उत्पन्न किया।
बसुदेव ने अपनी पत्नी रोहिणी के गर्भ से बल, गद, सारण, दुर्मद, विपुल, ध्रुव, कृत तथा अन्यपुत्रों को उत्पन्न किया।
सुभद्रो भद्गबाहुश्न दुर्मदो भद्र एबच ।
पौरव्यास्तनया होते भूताद्या द्वादशाभवन् ॥
४७॥
नन्दोपनन्दकृतकशूराद्या मदिरात्मजा: ।
कौशल्या केशिनं त्वेकमसूत कुलनन्दनम् ॥
४८॥
सुभद्र:--सुभद्ग; भद्रबाहु:-- भद्बाहु; च--तथा; दुर्मदः--दुर्मद; भद्र:--भद्र; एब--निस्सन्देह; च-- भी; पौरव्या: --पौरवी नामकपतली के; तनया: --पुत्र; हि--निस्सन्देह; एते--ये सभी; भूत-आद्या: -- भूत इत्यादि; द्वादश--बारह; अभवनू--उत्पन्न हुए; नन्द-उपनन्द-कृतक-शूर-आद्या:--नन्द, उपनन्द, कृतक, शूर इत्यादि; मदिरा-आत्मजा:--मदिरा के पुत्र; कौशल्या--कौशल्या ने;केशिनम्--केशी नामक पुत्र को; तु एकम्--एकमात्र; असूत--जन्म दिया; कुल-नन्दनम्-पुत्र
कोपौरवी के गर्भ से बारह पुत्र हुए जिनमें भूत, सुभद्र, भद्गबाहु, दुर्मद तथा भद्र के नाम आते हैं।
मदिरा के गर्भ से ननन््द, उपनन्द, कृतक, शूर इत्यादि पुत्र उत्पन्न हुए।
कौशल्या ( भद्गा ) ने केवल एकपुत्र उत्पन्न किया जिसका नाम था केशी।
रोचनायामतो जाता हस्तहेमाड्दादयः ।
इलायामुरुवल्कादीन्यदुमुख्यानजीजनत् ॥
४९॥
रोचनायाम्--रोचना नाम की दूसरी पत्नी से; अत:ः--तत्पश्चात्; जाता:--उत्पन्न हुए; हस्त--हस्त; हेमाड्द--हेमांगद; आदय: --इत्यादि; इलायाम्--इला नामक दूसरी पली से; उरुवल्क-आदीन्--उरुवल्क इत्यादि; यदु-मुख्यान्ू--यदुवंश के मुख्य पुरुषों को;अजीजनतू--जन्म दिया।
बसुदेव ने रोचना नामक पत्नी से हस्त, हेमांगद इत्यादि पुत्रों को उत्पन्न किया और इला नामकपत्नी से उरुवल्क इत्यादि पुत्रों को उत्पन्न किया जो यदुवंश के प्रधान पुरुष थे।
विपृष्ठो धृतदेवायामेक आनकदुन्दुभे: ।
शान्तिदेवात्मजा राजन्प्रशमप्रसितादय: ॥
५०॥
विपृष्ठ:--विपृष्ठ; धृतदेवायाम्--धृतदेवा नामक पली के गर्भ से; एक:--एक पुत्र; आनकदुन्दुभेः --आनकदुन्दुभि अर्थात् बसुदेव के;शान्तिदेवा-आत्मजा:--दूसरी पत्नी शान्तिदेवा के पुत्र; राजनू--हे राजा परीक्षित; प्रशम-प्रसित-आदय: --प्रशम, प्रसित इत्या
दिधृतदेवा पत्नी के गर्भ से आनकदुन्दुभि ( वसुदेव ) को विपृष्ठ नामक पुत्र की प्राप्ति हुई।
वसुदेवकी दूसरी पत्नी शान्तिदेवा के गर्भ से प्रशम, प्रसित इत्यादि पुत्रों ने जन्म लिया।
राजन्यकल्पवर्षाद्या उपदेवासुता दश ।
वसुहंससुवंशाद्या: श्रीदेवायास्तु घट्सुता: ॥
५१॥
राजन्य--राजन्य; कल्प--कल्प; वर्ष-आद्या: --वर्ष इत्यादि; उपदेवा-सुता:--वसुदेव की दूसरी पत्नी उपदेवा के पुत्र; दश--दस;बसु--वसु; हंस--हंस; सुवंश-- सुवंश; आद्या:--इत्यादि; श्रीदेवाया: -- श्रीदेवा के; तु--लेकिन; षट्ू--छ; सुताः --पुत्र |
बसुदेव के उपदेवा नामक पत्नी थी जिससे राजन्य, कल्प, वर्ष इत्यादि दस पुत्र उत्पन्न हुए।
अन्यपली श्रीदेवा से वसु, हंस, सुवंश इत्यादि छः पुत्र जन्मे।
देवरक्षितया लब्धा नव चात्र गदादयः ।
बसुदेव: सुतानष्टावादधे सहदेवया ॥
५२॥
देवरक्षितबा--देवरक्षिता नामक पत्नी से; लब्धा:--प्राप्त किया; नव--नौ; च-- भी; अत्र--यहाँ; गदा-आदय: --गदा इत्यादि;बसुदेव:--श्रील बसुदेव ने; सुतान्--पुत्रों को; अष्टौ--आठ; आदधे--उत्पन्न किया; सहदेवया--सहदेवा नामक पत्नी से |
बसुदेव के वीर्य एवं देवरक्षिता के गर्भ से नौ पुत्र उत्पन्न हुए जिनमें गदा प्रमुख था।
साक्षात्धर्मस्वरूप वसुदेव की अन्य पत्नी सहदेवा के गर्भ से श्रुत, प्रवर इत्यादि आठ पुत्र उत्पन्न हुए।
प्रवरश्रुतमुख्यां श्व॒ साक्षाद्ध्मों वसूनिव ।
वसुदेवस्तु देवक्यामष्ट पुत्रानजीजनत् ॥
५३॥
कीर्तिमन्तं सुषेणं च भद्रसेनमुदारधी: ।
ऋलजुं सम्मर्दनं भद्गं सड्डर्षणमही श्वरम् ॥
५४॥
अष्टमस्तु तयोरासीत्स्वयमेव हरि: किल ।
सुभद्रा च महाभागा तव राजन्पितामही ॥
५५ ॥
प्रवर--प्रवर या पौवर; श्रुत-- श्रुत; मुख्यान्-- प्रमुख, इत्यादि; च--तथा; साक्षात्--साक्षात्; धर्म:--धर्म रूप; बसून् इब--स्वर्गलोक के प्रमुख बसुओं की तरह; वसुदेव:--कृष्ण के पिता वसुदेव ने; तु--निस्सन्देह; देवक्याम्-देवकी के गर्भ से; अष्ट--आठ;पुत्रानू--पुत्रों को; अजीजनत्--उत्पन्न किया; कीर्तिमन्तम्-कीर्तिमान को; सुषेणम् च--तथा सुषेण को; भद्गसेनम्-- भद्गसेन को;उदार-धी:--सभी योग्य; ऋजुम्--ऋजु को; सम्मर्दनम्--सम्मर्दन को; भद्रम्-- भद्गर को; सड्डूर्षणम्--संकर्षण को; अहि-ई श्वरमू--परम नियन्ता एवं नाग के अवतार; अष्टम: --आठवाँ; तु--लेकिन; तयो:--दोनों के ( देवकी तथा वसुदेव के ); आसीत्--प्रकट हुए;स्वयम् एब--साक्षात्; हरिः-- भगवान्; किल--क्या कहा जाय; सुभद्रा--सुभद्रा बहिन; च--तथा; महा भागा--सौभाग्यशालिनी;तब--तुम्हारी; राजनू--हे महाराज परीक्षित; पितामही--दादी |
सहदेवा से उत्पन्न प्रवर और श्रुत इत्यादि आठों पुत्र स्वर्ग के आठों बसुओं के हूबहू अवतार थे।
बसुदेव ने देवकी के गर्भ से भी आठ योग्य पुत्र उत्पन्न किये।
इनमें कीर्तिमान, सुषेण, भद्गसेन, ऋजु,सम्मर्दन, भद्र तथा शेषावतार संकर्षण सम्मिलित हैं।
आठवें पुत्र साक्षात् भगवान् कृष्ण थे।
परमसौभाग्यवती सुभद्रा एकमात्र कन्या तुम्हारी दादी थी।
यदा यदा हि धर्मस्य क्षयो वृद्धिश्व॒ पाप्मन: ।
तदा तु भगवानीश आत्मानं सृजते हरि: ॥
५६॥
यदा--जब; यदा--जब; हि--निस्सन्देह; धर्मस्य--धधर्म की; क्षय:--हानि; वृद्द्धिः--बढ़ोतरी; च--तथा; पाप्मन:--पापकृत्यों की;तदा--तब; तु--निस्सन्देह; भगवान्-- भगवान्; ईश:ः--परम नियन्ता; आत्मानम्--साक्षात्, स्वयं; सृजते--अवतरित होते हैं; हरि: --भगवान् हरि
जब जब धर्म की हानि होती है और अधर्म की वृद्ध्धि होती है तब तब परम नियन्ता भगवान् श्रीहरि स्वेच्छा से प्रकट होते हैं।
न हास्य जन्मनो हेतु: कर्मणो वा महीपते ।
आत्ममायां विनेशस्य परस्य द्रष्टरात्मन: ॥
५७॥
न--नहीं; हि--निस्सन्देह; अस्य--उनका ( भगवान् का ); जन्मन:--जन्म लेना; हेतु:--कोई कारण है; कर्मण:--या कर्म करने का;वा--अथवा; महीपते--हे राजा ( परीक्षित ); आत्म-मायाम्--पतितात्माओं के लिए उनका परम अनुग्रह; विना--बिना, रहित;ईशस्थ--परम नियन्ता का; परस्य-- भगवान् का, जो भौतिक संसार से परे है; द्रष्ट:--परमात्मा का, जो हर एक के कर्मों के साक्षी हैं;आत्मन:--हर एक के परमात्मा का।
हे महाराज परीक्षित, भगवान् के प्राकट्य, तिरोधान या कर्मो का एकमात्र कारण उनकी निजीइच्छा है, कोई अन्य कारण नहीं है।
परमात्मा रूप में वे सर्वज्ञ हैं फलस्वरूप ऐसा कोई कारण नहींजो उन्हें प्रभावित करता हो, यहाँ तक कि सकाम कर्मों के फल भी नहीं।
यन्मायाचेष्टितं पुंसः स्थित्युत्पत्त्यप्ययाय हि ।
अनुग्रहस्तत्निवृत्तेरात्मला भाय चेष्यते ॥
५८॥
यत्--जो भी; माया-चेष्टितम्-- भगवान् द्वारा बनाये गये प्रकृति के नियम; पुंसः--जीवों की; स्थिति--जीवन अवधि; उत्पत्ति--जन्म;अप्ययाय--संहार के लिए; हि--निस्सन्देह; अनुग्रह:--कृपा; तत्ू-निवृत्ते: --जन्म-पमृत्यु के चक्र को रोकने के लिए विराट शक्ति कीसृष्टि तथा प्राकट्य; आत्म-लाभाय--भगवद्धाम जाने के लिए; च--निस्सन्देह; इष्यते--इसी उद्देश्य से सृष्टि हुई है
भगवान् अपनी माया के माध्यम से इस विराट जगत के सृजन, पालन तथा संहार का कार्य करतेहैं जिससे वे अपनी दया से जीव का उद्धार कर सकें और जीव के जन्म, मृत्यु तथा भौतिक जीवनकी अवधि को रोक सकें।
इस तरह वे जीव को भगवद्धाम लौटने में सक्षम बनाते हैं।
अक्षौहिणीनां पतिभिरसुरैनपलाउ्छनै: ।
भुव आक्रम्यमाणाया अभाराय कृतोद्यम: ॥
५९॥
अक्षौहिणीनाम्--महान् सैन्य शक्ति से युक्त राजाओं की; पतिभि:--ऐसे राजाओं या सरकार के द्वारा; असुरैः--असुर ( उन्हें ऐसी सैन्यशक्ति की आवश्यकता नहीं रहती फिर भी वे व्यर्थ में ही सेना रखते हैं ); नृप-लाउ्छनै: --जो राजा बनने योग्य नहीं हैं ( यद्यपि उन्होंनेकिसी तरह सरकार हथिया रखी है ); भुवः--पृथ्वी पर; आक्रम्यमाणाया:--एक दूसरे पर आक्रमण करने का लक्ष्य बनाकर;अभाराय-- पृथ्वी से असुरों की संख्या कम करने का मार्ग प्रशस्त करते हुए; कृत-उद्यम:--उत्साही ( वे सैन्य शक्ति बढ़ाने में ही सारीपूँजी व्यय कर देते हैं )॥
यद्यपि सरकार हथियाने वाले असुरगण सरकारी व्यक्तियों का वेश बनाये रहते हैं, किन्तु उन्हेंसरकार के कर्तव्यों का ज्ञान नहीं होता।
फलस्वरूप ईश्वर की व्यवस्था से ऐसे महान् सैन्यशक्तिसम्पन्न असुर एक दूसरे से लड़ते-भिड़ते हैं और इस तरह पृथ्वी की सतह से असुरों का महान्भार घटता है।
ये असुर भगवान् की इच्छा से अपनी सैन्य शक्ति बढ़ाते हैं जिससे उनकी संख्या घटजाए और भक्तों को कृष्णभावनामृत में प्रगति करने का अवसर प्राप्त हो।
कर्माण्यपरिमेयाणि मनसापि सुरे श्र: ।
सहसद्डूर्षणश्चक्रे भगवान्मधुसूदन: ॥
६०॥
कर्माणि--कार्यकलाप; अपरिमेयाणि--- असीम; मनसा अपि--यहाँ तक कि मन के भीतर सोची गई योजनाओं से भी; सुर-ईश्वर: --ब्रह्मा तथा शिव जैसे ब्रह्माण्ड के नियन्ताओं द्वारा; सह-सड्डूर्षण: --संकर्षण ( बलदेव ) समेत; चक्रे --सम्पन्न किया; भगवानू--भगवान्; मधु-सूदन:--मधु नामक असुर को मारने वाले ने |
भगवान् कृष्ण ने संकर्षण बलराम के सहयोग से ऐसे कार्यकलाप कर दिखलाये जो ब्रह्माजीतथा शिवजी जैसे पुरुषों की भी समझ के परे हैं ( उदाहरणार्थ कृष्ण ने सारे संसार को राक्षसों सेछुटकारा दिलाने के लिए असुरों का वध करने के लिए कुरुक्षेत्र युद्ध की आयोजना की )।
कलौ जनिष्यमाणानां दुःखशोकतमोनुदम् ।
अनुग्रहाय भक्तानां सुपुण्यं व्यतनोद्यश: ॥
६१॥
कलौ--कलियुग में; जनिष्यमाणानाम्--ऐसे बद्धजीवों का जो भविष्य में जन्म लेंगे; दुःख-शोक-तमः-नुदम्--उनके असीम दुखतथा शोक को कम करने के लिए जो अज्ञान के कारण उत्पन्न हैं; अनुग्रहाय--दया दिखाने के लिए; भक्तानाम्ू-भक्तों के प्रति; सु-पुण्यमू-- अत्यन्त पवित्र दिव्य कार्यकलाप; व्यतनोत्--विस्तार किया; यश: --महिमा या ख्याति |
भगवान् ने इस कलियुग में भविष्य में जन्म लेने वाले भक्तों पर अहैतुकी कृपा दर्शाने के लिएइस तरह से कार्य किया कि मात्र उनका स्मरण करने से मनुष्य संसार के सारे शोक-संताप से मुक्त होजायेगा।
( दूसरे शब्दों में, उन्होंने इस तरह कार्य किया जिससे सारे भावी भक्तजन भगवदगीता मेंकथित कृष्णभावनामृत के उपदेशों को ग्रहण करके संसार के कष्टों से छुटकारा पा सकें )।
यस्मिन्सत्कर्णपीयुषे यशस्तीर्थवरे सकृत् ।
श्रोत्राज्अलिरुपस्पृश्य धुनुते कर्मवासनाम् ॥
६२॥
यस्मिन्ू--धरा पर कृष्ण के दिव्य कार्यकलापों के इतिहास में; सत्-कर्ण-पीयुषे--जो दिव्य एवं शुद्ध कानों की आवश्यकताओं कोपूरा करता है; यशः-तीर्थ-वरे-- भगवान् के दिव्य कार्यकलापों का श्रवण करके पवित्र स्थानों में रखते हुए; सकृत्ू--एक बार ही,तुरन्त; श्रोत्र-अद्जलि: --दिव्य संदेश का श्रवण करते हुए; उपस्पृश्य--स्पर्श करके ( जिस तरह गंगाजल को ); धुनुते--नष्ट कर देताहै; कर्म-वासनाम्--सकाम कर्मों के लिए प्रबल इच्छा को |
शुद्ध हुए दिव्य कानों से भगवान् के यश को ग्रहण करने मात्र से भक्तगण प्रबल भौतिकइच्छाओं एवं सकाम कर्मो की व्यस्तता से तुरन्त ही मुक्त हो जाते हैं।
भोजवृष्ण्यन्धकमधुशूरसेनदशा्कै: ।
एलाघनीयेहितः शश्वत्कुरुसृझ्यपाण्डुभि: ॥
६३॥
स्निग्धस्मितेक्षितोदारैर्वाक्यर्विक्रमलीलया ।
नूलोक॑ रमयामास मूर्त्या सर्वाड्ररम्यया ॥
६४॥
भोज--भोज; वृष्णि--तथा वृष्णि वंश द्वारा; अन्धक--तथा अन्थकों द्वारा; मधु--तथा मधुवंशियों द्वारा; शूरसेन--तथा शूरसेनोंद्वारा; दशाईकै:--तथा दशार्ईकों द्वारा; शलाघनीय-- प्रशंसनीय; ईहित: -- प्रयास करते हुए; शश्वत्--सदैव; कुरु-सूझ्य-पाण्डुभि:--पांडवों, कौरवों तथा सृज्ञयों की सहायता से; स्निग्ध--स्नेहिल; स्मित--हँसी; ईक्षित--माने जाने वाले; उदारैः--उदार; वाक्यै: --बचनों द्वारा; विक्रम-लीलया--वीरतापूर्ण लीलाऐ; नृू-लोकम्--मानव समाज को; रमयाम् आस--प्रसन्न किया; मूर्त्या--अपनेसाकार रूप से; सर्व-अड्ग-रम्यया--ऐसा स्वरूप जो अपने सारे शारीरिक अंगों से हर एक को प्रमुदित करता है।
भगवान् कृष्ण ने भोज, वृष्णि, अन्धक, मधु, शूरसेन, दशाह, कुरु, सृज्ञय तथा पाण्डु केबंशजों की सहायता से विविध कार्यकलाप सम्पन्न किये।
अपनी मोहक मुस्कान, अपने स्नेहिलआचरण, अपने उपदेशों और गोवर्धन पर्वत धारण करने जैसी अलौकिक लीलाओं के द्वारा भगवान्ने अपने दिव्य शरीर में प्रकट होकर सारे मानव समाज को प्रमुदित किया।
यस्याननं मकरकुण्डलचारुकर्ण-भ्राजत्कपोलसुभगं सविलासहासम् ।
नित्योत्सवं न ततृपुर्टशिभि: पिबन्त्योनार्यो नराश्न मुदिता: कुपिता निमेश्च ॥
६५॥
यस्य--जिसके; आननम्--मुखमंडल; मकर-कुण्डल-चारू-कर्ण--मगर जैसे कुण्डलों से आभूषित तथा सुन्दर कानों से; भ्राजत्ू--चमचमाते हुए; कपोल--मस्तक; सुभगम्--सारे ऐ श्वर्य की घोषणा करने वाले; स-विलास-हासम्-- भोग की हँसी से युक्त; नित्य-उत्सवम्--जब भी कोई उन्हें देखता है उत्सव जैसा अनुभव होता है; न ततृपु:--सन्तुष्ट नहीं हुआ; इशिभि:-- भगवान् के स्वरूप कोदेखकर; पिबन्त्यः--आँखों से मानो पी रही हों; नार्य: --वृन्दावन की सारी स्त्रियाँ; नराः--सारे पुरुष भक्त; च-- भी; मुदिता:--पूर्णतया सन्तुष्ट; कुपिता:--क्रुद्ध; निमेः--आँखे झपकने के कारण होनेवाले व्यवधान से; च--भी |
कृष्ण का मुखमण्डल मकराकृति के कुण्डलों से सुसज्जित है।
उनके कान सुन्दर हैं, उनके गालचमकीले हैं और उनकी हँसी हर एक को आकृष्ट करने वाली है।
जो भी कृष्ण का दर्शन करता हैमानो उत्सव देख रहा हो।
उनका मुख तथा शरीर देखने में हर एक को पूर्णतया तुष्ट करनेवाले हैंलेकिन भक्तगण स्रष्टा से क्रुद्ध हैं कि उन्होंने भक्तोंकी आँखों के झपकने में व्यवधान उत्पन्न कर दियाहै।
जातो गतः पितृगृहादव्रजमेधितार्थोंहत्वा रिपून्सुतशतानि कृतोरुदार: ।
उत्पाद्य तेषु पुरुष: क्रतुभि: समीजेआत्मानमात्मनिगमं प्रथयज्ञनेषु ॥
६६॥
जातः--वसुदेव के पुत्र रूप में जन्म लेकर; गत:--चला गया; पितृ-गृहात्--अपने पिता के घर से; ब्रजम्--वृन्दावन को; एधित-अर्थ:--वृन्दावन के पद को ऊँचा बनाने; हत्वा--मारकर; रिपूनू--अनेक असुरों को; सुत-शतानि--सैकड़ों पुत्र; कृत-उरुदार:--हजारों श्रेष्ठ स्त्रियों को पत्नी रूप में स्वीकार करके; उत्पाद्य--उत्पन्न किया; तेषु--उनमें; पुरुष: --परम पुरुष, जो मनुष्य के समान है;क्रतुभि:ः--अनेक यज्ञों द्वारा; समीजे--पूजा की; आत्मानम्--अपनी ( क्योंकि सभी यज्ञों में उन्हीं की पूजा की जाती है ); आत्म-निगमम्--वेदों के अनुष्ठानों के अनुसार; प्रथयन्--वैदिक नियमों का विस्तार करते हुए; जनेषु--जनता में |
भगवान् कृष्ण लीला पुरुषोत्तम कहलाते हैं।
वे वसुदेव के पुत्र रूप में उत्पन्न हुए, किन्तु तुरन्त हीअपने पिता का घर छोड़कर अपने विश्वासपात्र भक्तों के साथ प्रेम व्यवहार बढ़ाने के लिए वृन्दावनचले गये।
वृन्दावन में उन्होंने अनेक असुरों का वध किया और फिर द्वारका लौट गये जहाँ उन्होंनेवैदिक नियमों के अनुसार अनेक श्रेष्ठतम स्त्रियों के साथ विवाह किये, उनसे सैकड़ों पुत्र उत्पन्न कियेऔर गृहस्थ जीवन के सिद्धान्तों को स्थापित करने के लिए अपनी ही पूजा के लिए अनेक यज्ञ सम्पन्नकिये।
पृथ्व्या: स वै गुरुभरं क्षपयन्कुरूणा-मन्तःसमुत्थकलिना युधि भूपचम्व: ।
इष्ट्या विधूय विजये जयमुद्रिघोष्यप्रोच्योद्धवाय च परं समगात्स्वधाम ॥
६७॥
पृथ्व्या:--पृथ्वी पर; सः--वह ( कृष्ण ); बै--निस्सन्देह; गुरु-भरम्--बहुत बड़ा भार; क्षपयन्--पूरी तरह हटाने में; कुरूणाम्--कुरुवंशियों का; अन्तः-समुत्थ-कलिना-- भाइयों में मनमुटाव द्वारा शत्रुता उत्पन्न करके; युधि--कुरुक्षेत्र के युद्ध में; भूप-चम्बः--सारे असुर राजा; दृष्टया--अपने दृष्टिपात से; विधूय--उनके पापकर्मो को शुद्ध करके ; विजये--विजय में; जयम्--विजय;उद्विघोष्य--घोषणा करके ( अर्जुन की विजय ); प्रोच्य--उपदेश देकर; उद्धवाय--उद्धव को; च-- भी; परम्--दिव्य; समगात्--वापस गया; स्व-धाम--अपने धाम को |
तत्पश्चात् भगवान् श्रीकृष्ण ने संसार का भार कम करने के लिए पारिवारिक सदस्यों के बीचमनमुटाव उत्पन्न किया।
उन्होंने अपनी चितवन मात्र से कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि में सारे आसुरी राजाओंका संहार कर दिया और अर्जुन को विजयी घोषित किया।
अन्त में वे उद्धव को दिव्य जीवन तथाभक्ति के विषय में उपदेश देकर अपने आदि रूप में अपने धाम को वापस चले गये।
