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अध्याय तीन: सुकन्या और च्यवन मुनि का विवाह
9.3श्रीशुक उबाचशर्यातिर्मानवो राजा ब्रह्मिष्ठ: सम्बभूव ह ।
यो वा अड्विरसां सत्रे द्वितीयमहरूचिवान् ॥
१॥
श्री-शुक: उवाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; शर्यातिः--शर्याति नामक राजा; मानव:--मनु का पुत्र; राजा--शासक ; ब्रह्मिष्ठ: --वैदिक ज्ञान से पूर्णतः भिन्न; सम्बभूव ह--वह बना; य:ः--जो; वा--अथवा; अड्विरसाम्--अंगिरा के वंशजों की; सत्रे--यज्ञशाला में;द्वितीयम् अहः--दूसरे दिन सम्पन्न होने वाले उत्सव; ऊचिवान्ू--कह सुनाया।
श्री शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : हे राजा, मनु का दूसरा पुत्र राजा शर्याति बैदिक ज्ञान मेंपारंगत था।
उसने अंगिरावंशियों द्वारा सम्पन्न होने वाले यज्ञ के दूसरे दिन के उत्सवों के विषय मेंआदेश दिए।
सुकन्या नाम तस्यासीत्कन्या कमललोचना ।
तया सार्ध वनगतो हागमच्च्यवना भ्रमम् ॥
२॥
सुकन्या--सुकन्या; नाम--नामक; तस्थ--उसकी ( शर्याति की ); आसीतू-- थी; कन्या--पुत्री; कमल-लोचना--कमल जैसे नेत्रोंवाली; तया सार्धम्--उसके साथ; वन-गत:--जंगल में गया हुआ; हि--निस्सन्देह; अगमत्--वह गया; च्यवन-आश्रमम्--च्यवनमुनि के आश्रम में |
शर्याति के सुकन्या नामक एक सुन्दर कमलनेत्री कन्या थी जिसके साथ वे जंगल में च्यवन मुनिके आश्रम को देखने गये।
सा सखीभि: परिवृता विचिन्वन्त्यड्प्रिपान्चने ।
वल्मीकरन्ध्रे दहशे खद्योते इव ज्योतिषी ॥
३॥
सा--वह सुकन्या; सखीभि:--अपनी सहेलियों से; परिवृता--घिरी हुई; विचिन्वन्ती--चुनती हुई; अद्प्रिपान्ू--वृक्षों से फल तथा'फूल; बने--जंगल में; वल्मीक-रन्श्रे--बाँबी के छेद में; ददशे--देखा; खद्योते--दो जुगुनू; इब--सह्ृश; ज्योतिषी--दो चमकीलीव्स्तुएँ॥
जब वह सुकन्या जंगल में अपनी सहेलियों से घिरी हुई, वृक्षों से विविध प्रकार के फल एकत्रकर रही थी तो उसने बाँबी के छेद में दो जुगुनू जैसी चमकीली वस्तुएँ देखीं।
ते दैवचोदिता बाला ज्योतिषी कण्टकेन वै ।
अविध्यन्मुग्धभावेन सुस्त्रावासृक्ततो बहि: ॥
४॥
ते--उन दोनों; दैव-चोदिता--मानो विधाता द्वारा प्रेरित; बाला--तरुणी ने; ज्योतिषी--बाँबी के भीतर दो जुगुनुओं को; कण्टकेन--काँटे से; बै--निस्सन्देह; अविध्यत्--छेद दिया; मुग्ध-भावेन--बिना जाने; सुस्राव--बाहर निकल आया; असृक्ू--रक्त; ततः--वहाँसे; बहिः--बाहर।
मानो विधाता से प्रेरित होकर उस तरुणी ने बिना जाने उन दोनों जुगुनुओं को एक काँटे से छेददिया जिससे उनमें से रक्त फूटकर बाहर आने लगा।
शकृन्मूत्रनिरोधो भूत्सैनिकानां च तत्क्षणात् ।
राजर्षिस्तमुपालक्ष्य पुरुषान्विस्मितोब्रवीत् ॥
५॥
शकृत्--मल का; मूत्र--तथा मूत्र का; निरोध:--अवरोध; अभूत्--हो गया; सैनिकानाम्--सारे सिपाहियों का; च--तथा; तत्ू-क्षणात्--तुरन्त; राजर्षि: --राजा; तम् उपालक्ष्य--उस घटना को देखकर; पुरुषानू--अपने आदमियों से; विस्मित:--आश्चर्यचकितहोकर; अब्रवीत्ू--बोला
उसके बाद ही शर्याति के सारे सैनिकों को तुरन्त ही मल-मूत्र में अवरोध होने लगा।
यह देखकरशर्याति बड़े अचम्भे में आकर अपने संगियों से बोला।
अप्यभद्रं न युष्माभिर्भार्गवस्य विचेष्टितम् ।
व्यक्त केनापि नस्तस्य कृतमाश्रमदूषणम् ॥
६॥
अपि--ओह; अभद्रमू--कुछ अशुभ; न: --हम लोगों में से; युष्माभि:--तुम लोगों द्वारा; भार्गवस्थ--च्यवन मुनि का; विचेष्टितम्--प्रयत्न किया गया है; व्यक्तम्--अब यह स्पष्ट है; केन अपि--किसी के द्वारा; न:--हमारा; तस्य--उसका ( च्यवन मुनि का );कृतम्-किया गया है; आश्रम-दूषणम्--आश्रम का प्रदूषण ।
यह कितनी विचित्र बात है कि हममें से किसी ने भृगुपुत्र च्यवन मुनि का कुछ अहित करने काप्रयास किया है।
निश्चय ही, ऐसा लगता है कि हममें से किसी ने इस आश्रम को अपवित्र कर दियाहै।
सुकन्या प्राह पितरं भीता किज्ञित्कृतं मया ।
द्वे ज्योतिषी अजानन्त्या निर्भिन्ने कण्टकेन वै ॥
७॥
सुकन्या--सुकन्या ने; प्राह--कहा; पितरमू--अपने पिता से; भीता--डरी हईं; किल्लित्ू--कुछ; कृतम्--किया गया है; मया--मेरेद्वारा; द्वे--दो; ज्योतिषी--चमकती वस्तुएँ; अजानन्त्या--अज्ञान के कारण; निर्भिन्ने--छेद दी गईं; कण्टकेन--काँटे से; बै--निस्सन्देह।
अत्यन्त भयभीत सुकन्या ने अपने पिता से कहा : मैंने कुछ गलती की है क्योंकि मैंने अज्ञानवश इन दो चमकीली वस्तुओं को काँटे से छेद दिया है।
दुहितुस्तद्वच: श्रुत्वा शर्यातिर्जातसाध्वस: ।
मुनि प्रसादयामास वल्मीकान्तर्हितं शनै: ॥
८ ॥
दुहितु:--अपनी पुत्री का; तत् वचः--वह कथन; श्रुत्वा--सुनकर; शर्यातिः--राजा शर्याति ने; जात-साध्वस: --भयभीत होकर;मुनिमू--च्यवन मुनि को; प्रसादयाम् आस--शांत करने का प्रयास किया; वल्मीक-अन्तर्हितम्--बाँबी के भीतर बैठे; शनै: -- धीरे-धीरे
अपनी पुत्री से यह सुनकर राजा शर्याति अत्यधिक डर गये।
उन्होंने अनेक प्रकार से च्यवन मुनिको शांत करने का प्रयत्न किया क्योंकि वे ही उस बाँबी के छेद के भीतर बैठे थे।
तदभिप्रायमाज्ञाय प्रादाहुहितरं मुनेः ।
कृच्छान्मुक्तस्तमामन्त्र्य पुरं प्रायात्ममाहित: ॥
९॥
ततू--च्यवन मुनि का; अभिप्रायम्-प्रयोजन; आज्ञाय--समझकर; प्रादात्--प्रदान कर दिया; दुहितरम्--अपनी पुत्री; मुने:--च्यवनमुनि को; कृच्छात्--बड़ी कठिनाई से; मुक्त:--मुक्त बनाया; तम्ू--मुनि को; आमन्य--अनुमति लेकर; पुरमू--अपने स्थान को;प्रायात्--चला गया; समाहित:--अत्यधिक विचारमग्न।
अत्यन्त विचारमग्न होकर और च्यवन मुनि के प्रयोजन को समझकर राजा शर्याति ने मुनि कोअपनी कन्या दान में दे दी।
इस प्रकार बड़ी मुश्किल से संकट से मुक्त होकर उसने च्यवन मुनि सेअनुमति ली और वह घर लौट गया।
सुकन्या च्यवनं प्राप्य पतिं परमकोपनम् ।
प्रीणयामास चित्तज्ञा अप्रमत्तानुवृत्तिभि: ॥
१०॥
सुकन्या--राजा शर्याति की पुत्री सुकन्या ने; च्यवनम्--च्यवन मुनि को; प्राप्प--पाकर; पतिम्ू--पति रूप में; परम-कोपनम्ू--जोसदैव अत्यन्त क्रुद्ध रहता था; प्रीणगयाम् आस--उसको प्रसन्न किया; चित्त-ज्ञा--अपने पति के मन की बात जानने वाली; अप्रमत्ताअनुवृत्तिभि:--घबराए बिना सेवा करके ।
च्यवन मुनि अत्यन्त क्रोधी थे, किन्तु क्योंकि सुकन्या ने उन्हें पति रूप में प्राप्त किया था, अतःउसने सावधानी से उनके मनोनुकूल व्यवहार किया।
उसने बिना घबराए उनकी सेवा की।
'कस्यचित्त्वथ कालस्य नासत्यावा श्रमागतौ ।
तौ पूजयित्वा प्रोवाच् बयो मे दत्तमीश्वरा ॥
११॥
'कस्यचित्--कुछ ( समय ) बाद; तु--लेकिन; अथ--इस प्रकार; कालस्य--समय के बीतने पर; नासत्यौ--दोनों अश्विनीकुमार;आश्रम--च्यवन मुनि के स्थान पर; आगतौ--पहुँचे; तौ--उन दोनों को; पूजयित्वा--सत्कार तथा नमस्कार करके ; प्रोवाच--कहा;वयः--तारुण्य; मे--मुझको; दत्तम--कृपा करके दे दो; ईश्वरा-- क्योंकि तुम दोनों ऐसा करने में समर्थ हो।
कुछ काल बीतने के बाद दोनों अश्विनीकुमार जो स्वर्गलोक के वैद्य थे, च्यवन मुनि के आश्रमआये।
उनका सत्कार करने के बाद च्यवन मुनि ने उनसे यौवन प्रदान करने के लिए प्रार्थना कीक्योंकि वे ऐसा करने में सक्षम थे।
ग्रह ग्रहीष्ये सोमस्य यज्ञे वामप्यसोमपो: ।
क्रियतां मे वयोरूपं प्रमदानां यदीप्सितम् ॥
१२॥
ग्रहमू-पूर्ण पात्र; ग्रहीष्ये--मैं दूँगा; सोमस्थ--सोमरस का; यज्ञे--यज्ञ में; वाम--तुम दोनों का; अपि--यद्यपि; असोम-पो: --तुमदोनों का, जो सोमरस पीने के अधिकारी नहीं हो; क्रियताम्--पूरा करो; मे--मेरा; वयः--यौवन; रूपमू--नवयुवक का सौन्दर्य;प्रमदानाम्--स्त्री-वर्ग का; यत्--जो; ईप्सितम्-- अभीष्ट है।
च्यवन मुनि ने कहा : यद्यपि तुम दोनों यज्ञ में सोमरस पीने के पात्र नहीं हो, किन्तु मैं वचन देताहूँ कि मैं तुम्हें सोमरस का पूरा बर्तन भर कर दूँगा।
कृपा करके मेरे लिए सौन्दर्य तथा तारुण्य की व्यवस्था करो क्योंकि तरुणी स्त्रियों को ये आकर्षक लगते हैं।
बाढमित्यूचतुर्विप्रमभिनन्द्य भिषक्तमौ ।
निमज्तां भवानस्मिन्ह्दे सिद्धविनिर्मिते ॥
१३॥
बाढम्--हाँ, हम ऐसा करेंगे; इति--इस प्रकार; ऊचतु:--दोनों ने उत्तर दिया, च्यवन मुनि का प्रस्ताव स्वीकार किया; विप्रम्--ब्राह्मण ( च्यवन मुनि ) को; अभिनन्द्य--बधाई देकर; भिषक्-तमौ--दोनों महान् वैद्य अश्विनीकुमार; निमज्जताम्--डुबकी लगाइये;भवान्--आप; अस्मिनू--इस; ह॒दे--झील में; सिद्ध-विनिर्मिते--सभी प्रकार की सिद्ध्रियों के लिए विशेषतः बनाई गई।
उन महान् वैद्य अश्विनीकुमारों ने च्यवन मुनि के प्रस्ताव को सहर्ष स्वीकार कर लिया।
उन्होंने उसब्राह्मण से कहा 'आप इस सिद्धिदायक झील में गोता लगाइये।
( जो इस झील में नहाता है उसकीकामनाएँ पूरी होती हैं )।
इत्युक्तो जरया ग्रस्तदेहो धमनिसन्ततः ।
हृदं प्रवेशितो उश्चि भ्यां वलीपलितविग्रह: ॥
१४॥
इति उक्त:--इस प्रकार कहे जाने पर; जरया--वृद्धावस्था तथा अशक्तता के कारण; ग्रस्त-देह:--रुग्ण देह; धमनि-सन्तत:--जिसकीधमनियाँ शरीर भर में झलक रही थीं; हृदम्--झील में; प्रवेशित:--प्रविष्ट हुए; अश्विभ्याम्ू--अश्विनीकुमारों की सहायता से; वली-'पलित-विग्रह:--जिसके शरीर की चमड़ी झूल रही थी तथा बाल सफेद थे।
यह कहकर अश्विनीकुमारों ने च्यवन मुनि को पकड़ा जो वृद्ध थे और जिनके रुग्ण शरीर कीचमड़ी झूल रही थी, बाल सफेद थे तथा सारे शरीर में नसें दिख रही थीं और वे तीनों उस झील मेंघुस गये।
पुरुषास्त्रय उत्तस्थुरपीव्या बनिताप्रिया: ।
पदास्त्रज: कुण्डलिनस्तुल्यरूपा: सुवासस: ॥
१५॥
पुरुषा:--मनुष्य; त्रय:--तीन; उत्तस्थु:--( झील से ) ऊपर निकल आये; अपीव्या: --अत्यन्त सुन्दर; वनिता-प्रिया: --स्त्रियों कोआकर्षक लगने वाला पुरुष; पद्मा-सत्रज:--कमल की मालाओं से अलंकृत; कुण्डलिन:--कुण्डल पहिने; तुल्य-रूपा:--समानस्वरूप वाले; सु-वासस:--सुन्दर वस्त्र पहने।
तत्पश्चात् झील से तीन अत्यन्त सुन्दर स्वरूप वाले व्यक्ति ऊपर उठे।
वे अच्छे बस्त्र धारण किये थे और कुण्डलों तथा कमल की मालाओं से विभूषित तीनों ही समान सुन्दरता वाले थे।
तान्निरीक्ष्य वरारोहा सरूपान्सूर्यवर्चसः ।
अजानती पति साध्वी अश्विनौ शरणं ययौ ॥
१६॥
तान्ू--उनको; निरीक्ष्य--देखकर; वर-आरोहा--सुन्दरी सुकन्या; स-रूपान्ू--समान सुन्दरता वाले; सूर्य-वर्चस:--सूर्य के समानतेजस्वी; अजानती--न जानती हुई; पतिम्--अपने पति को; साध्वी --उस सती स्त्री ने; अश्विनौ--अश्विनीकुमारों की; शरणम्--शरण; ययौ--ग्रहण की।
साध्वी एवं परम सुन्दरी सुकन्या अपने पति एवं उन दोनों अश्विनीकुमारों में अन्तर न कर पाईक्योंकि वे समान रूप से सुन्दर थे।
अतएवं अपने असली पति को पहचान पाने में असमर्थ होने केकारण उसने अश्विनीकुमारों की शरण ग्रहण की।
दर्शयित्वा पतिं तस्ये पातिब्रत्येन तोषितौ ।
ऋषिमामन्त्रय ययतुर्विमानेन त्रिविष्टपम् ॥
१७॥
दर्शयित्वा--दिखलाने के बाद; पतिम्--पति; तस्यै--सुकन्या को; पाति-ब्रत्येन--उसके पातित्रत्य से; तोधितौ--उसपर प्रसन्न होकर;ऋषिम्--च्यवन मुनि को; आमन््य--उसकी अनुमति लेकर; ययतु:--चले गये; विमानेन--अपने विमान से; त्रिविष्टपम्--स्वर्गलोकको
दोनों अश्विनीकुमार सुकन्या के सतीत्व एवं निष्ठा को देखकर अत्यन्त प्रसन्न हुए।
अतः उन्होंने उसेउसके पति च्यवन मुनि को दिखलाया और फिर उनसे अनुमति लेकर वे अपने विमान से स्वर्गलोकको वापस लौट गये।
यक्ष्यमाणोथ शर्यातिएच्यवनस्या श्रमं गत: ।
ददर्श दुहितुः पाश्चें पुरुष सूर्यवर्चसम् ॥
१८ ॥
यक्ष्यमाण:--यज्ञ करने की इच्छा से; अथ--इस प्रकार; शर्यातिः--शर्याति; च्यवनस्य--च्यवन मुनि के; आश्रमम्--आवास तक;गतः--जाकर; ददर्श--देखा; दुहितु:--अपनी कन्या के; पाश्चें--बगल में; पुरुषम्--पुरुष को; सूर्य-वर्चसम्--सूर्य के समान सुन्दरतथा तेजवान।
तत्पश्चात् यज्ञ सम्पन्न करने की इच्छा से राजा शर्याति च्यवन मुनि के आवास में गये।
वहाँ उन्होंनेअपनी पुत्री के बगल में सूर्य के समान एक तेजस्वी सुन्दर तरुण पुरुष को देखा।
राजा दुहितरं प् राह कृतपादाभिवन्दनाम् ।
आशिषश्चाप्रयुज्ञानो नातिप्रीतिमना इव ॥
१९॥
राजा--राजा ( शर्याति ) ने; दुहितरम्--अपनी पुत्री से; प्राह--कहा; कृत-पाद-अभिवन्दनाम्--जो अपने पिता को पहले ही सादरनमस्कार कर चुकी थी; आशिष:--आशीर्वाद; च--तथा; अप्रयुज्ञान: --अपनी पुत्री को दिये बिना; न--नहीं; अतिप्रीति-मना:--अत्यधिक प्रसन्न; इब--सहृश |
राजा की पुत्री ने पिता के चरणों की वन्दना की, किन्तु राजा उसे आशीष देने की बजाय उससेअत्यधिक अप्रसन्न प्रतीत हुआ और उससे इस प्रकार बोला।
चिकीर्षितं ते किमिदं पतिस्त्वयाप्रलम्भितो लोकनमस्कृतो मुनि: ।
यत्त्वं जराग्रस्तमसत्यसम्मतंविहाय जारं भजसेमुमध्वगम् ॥
२०॥
चिकीर्पितम्--तुम जो करना चाहती हो; ते--तुम्हारा; किम् इदम्--यह क्या है; पति:--अपना पति; त्वया--तुम्हारे द्वारा;प्रलम्भित:--ठगा गया है; लोक-नमस्कृत:--जिसका सभी लोग आदर करते हैं; मुनिः--महान् साधु; यत्--क्योंकि; त्वमू--तुम;जरा-ग्रस्तमू--अत्यन्त वृद्ध एवं अशक्त; असति-हे दुष्ट लड़की; असम्मतम्--अनाकर्षक; विहाय--छोड़कर; जारम्--परपति, धृष्ट;भजसे--स्वीकार किया है; अमुम्--इस व्यक्ति को; अध्वगम्--जो भिखारी के तुल्य है।
हे दुष्ट लड़की, तुमने यह क्या कर दिया ?
तुमने अपने अत्यन्त सम्माननीय पति को धोखा दिया हैक्योंकि मैं देख रहा हूँ कि उसके वृद्ध, रोगग्रस्त तथा अनाकर्षक होने के कारण तुमने उसका साथछोड़कर इस तरुण पुरुष को अपना पति बनाना चाहा है जो भिक्षुक जैसा प्रतीत होता है।
कथं मतिस्तेउवगतान्यथा सतांकुलप्रसूते कुलदूषणं त्विदम् ।
बिभर्षि जारं यदपत्रपा कुलंपितुश्न भर्तुश्ष नयस्यधस्तम: ॥
२१॥
'कथम्--कैसे; मतिः ते--तुम्हारी चेतना; अवगता--नीचे चली गई; अन्यथा--अन्यथा; सताम्--सर्वाधिक पूज्य; कुल-प्रसूते--कुलमें उत्पन्न; कुल-दूषणम्--कुलकलंक; तु--लेकिन; इृदम्--यह; बिभर्षि--रख रही हो!; जारम्--परपति को; यत्--क्योंकि यह;अपत्रपा--लज्जारहित है; कुलमू--कुल; पितु:--तुम्हारे पिता का; च--तथा; भर्तुः--पति का; च--तथा; नयसि--नीचे ले जा रहीहो; अधः तम:--नीचे अंधकार या नरक में ।
हे पूज्य कुल में उत्पन्न मेरी पुत्री, तुमने अपनी चेतना को किस तरह इतना नीचे गिरा दिया है?
तुम किस तरह परपति को इतनी निर्लज्जतापूर्वक रख रही हो ?
इस तरह तुम अपने पिता तथा अपनेपति दोनों के कुलों को नरक में धकेल कर बदनाम करोगी।
एवं ब्रुवाणं पितरं स्मयमाना शुचिस्मिता ।
उवाच तात जामाता तवैष भृगुनन्दन: ॥
२२॥
एवम्--इस प्रकार; ब्रुवाणम्--बातें करते तथा फटकारते हुए; पितरम्--अपने पिता से; स्मयमाना--मुस्काती हुई ( क्योंकि सतीथी ); शुचि-स्मिता--हँसती हुई; उवाच--बोली; तात--हे पिता; जामाता--दामाद; तव--तुम्हारा; एष:--यह तरुण; भूृगु-नन्दन:--च्यवन मुनि ही हैं ( अन्य कोई नहीं )
किन्तु अपने सतीत्व पर गर्वित सुकन्या अपने पिता की डाँट फटकार सुनकर मुस्काने लगी।
उसने हँसते हुए कहा 'हे पिता, मेरी बगल में बैठा यह तरुण व्यक्ति आपका असली दामाद, भूगुवंशमें उत्पन्न, च्यवन मुनि है।
'शशंस पित्रे तत्सर्व वयोरूपाभिलम्भनम् ।
विस्मितः परमप्रीतस्तनयां परिषस्वजे ॥
२३॥
शशंस--उसने वर्णन किया; पित्रे--अपने पिता से; तत्ू--वह; सर्वम्--हर बात; वय: --आयु परिवर्तन का; रूप--तथा सौन्दर्य का;अभिलम्भनमू--किस तरह उपलब्धि मिली ( पति को ); विस्मित:--चकित; परम-प्रीत:--अत्यधिक प्रसन्न; तनयाम्--अपनी पुत्रीको; परिषस्वजे--हर्षित होकर गले से लगा लिया।
तब सुकन्या ने बतलाया कि किस तरह उसके पति को तरुण पुरुष का सुन्दर शरीर प्राप्त हुआ।
जब राजा ने इसे सुना तो वह अत्यधिक चकित हुआ और परम हर्षित होकर उसने अपनी प्रिय पुत्रीको गले से लगा लिया।
सोमेन याजयन्वीरं ग्रह सोमस्य चाग्रहीत् ।
असोमपोरप्यश्चिनोश्च्यवन: स्वेन तेजसा ॥
२४॥
सोमेन--सोम से; याजयन्--यज्ञ कराते हुए; वीरम्--राजा ( शर्याति ) को; ग्रहम्--पूर्ण पात्र; सोमस्थ--सोमरस का; च--भी;अग्रहीत्ू--प्रदान किया; असोम-पो:--जिन्हें सोमरस पीना वर्जित था; अपि--यद्यपि; अश्विनो:--अश्विनीकुमारों का; च्यवन:--च्यवन मुनि; स्वेन--अपने; तेजसा--पराक्रम से |
च्यवन मुनि ने अपने पराक्रम से राजा शर्याति से सोमयज्ञ सम्पन्न कराया।
मुनि ने अश्विनीकुमारोंको सोमरस का पूरा पात्र प्रदान किया यद्यपि वे इसे पीने के अधिकारी नहीं थे।
हन्तुं तमाददे बज्ज॑ सद्यो मन्युरमर्षित: ।
सवचज्ज स्तम्भयामास भुजमिन्द्रस्थ भार्गव: ॥
२५॥
हन्तुमू--मारने के लिए; तमू--उस ( च्यवन ) को; आददे--इन्द्र ने धारण किया; वज़म्--अपना वज्ञ; सद्यः--तुरन्त; मन्यु:--बिनासोचे-विचारे, क्रोध में आकर; अमर्षित:--अत्यन्त उद्विग्न होकर; स-वज़म्--अपने वज् से; स्तम्भयाम् आस--निश्चेष्ट कर दिया;भुजम्ू-बाँह को; इन्द्रस्य--इन्द्र की; भार्गव: --भूगुवंशी च्यवन मुनि
उद्विग्न एवं क्रुद्ध होने से इन्द्र ने च्यवन मुनि को मार डालना चाहा अतएवं उसने बिना सोचे-विचारे अपना वज् धारण कर लिया।
लेकिन च्यवन मुनि ने अपने पराक्रम से इन्द्र की उस बाँह कोसंज्ञाशून्य कर दिया ज
िससे उसने वज्ञ पकड़ रखा था।
अन्वजानंस्ततः सर्वे ग्रह सोमस्य चाश्विनो: ।
भिषजाविति यत्पूर्व सोमाहुत्या बहिष्कृतौ ॥
२६॥
अन्वजानन्--उनकी अनुमति से; ततः--तत्पश्चात्; सर्वे--सारे देवता; ग्रहम्--भरा पात्र; सोमस्थ--सोमरस का; च-- भी; अश्विनो: --अश्विनीकुमारों के; भिषजौ--यद्यपि केवल वैद्य; इति--इस प्रकार; यत्--क्योंकि; पूर्वम्ू--इसके पहले; सोम-आहुत्या--सोमयज्ञ मेंभाग देकर; बहिः-कृतौ--निकाला गया |
यद्यपि अश्विनीकुमार मात्र वैद्य थे और इसी कारण से उन्हें यज्ञों में सोमरस-पान से बाहर रखाजाता था, किन्तु देवताओं ने इसके बाद उन्हें सोमरस पीने के लिए अनुमति प्रदान कर दी।
उत्तानबर्हिरानर्तों भूरिषेण इति त्रयः ।
शर्यातेरभवन्पुत्रा आनर्तद्रेवतो भवत् ॥
२७॥
उत्तानबर्हि: --उत्तानबर्हि; आनर्त:--आनर्त; भूरिषेण: -- भूरिषेण; इति--इस प्रकार; त्रय:ः--तीन; शर्यातेः--राजा शर्याति के;अभवन्ू--त्पन्न हुए; पुत्रा:--पुत्र; आनर्तात्--आनर्त से; रेबतः--रेवत; अभवत्--उत्पन्न हुआ।
राजा शर्याति के उत्तानबर्हि, आनर्त तथा भूरिषेण नामक तीन पुत्र हुए।
आनर्त के पुत्र का नामरेबत था।
सोडन्तःसमुद्रे नगरीं विनिर्माय कुशस्थलीम् ।
आस्थितोभुड्डः विषयानानर्तादीनरिन्दम ।
तस्य पुत्रश॒तं जज्ञे ककुद्धिज्येप्ठमुत्तमम् ॥
२८ ॥
सः-रेवत; अन्तः-समुद्रे--समुद्र के नीचे; नगरीम्--शहर; विनिर्माय--बनवाकर; कुशस्थलीम्--कुशस्थली नामक; आस्थितः --वहाँ रहा; अभुड्डू -- भौतिक सुख का भोग किया; विषयान्--राज्य; आनर्त-आदीन्--आनर्त तथा अन्य; अरिम्ू-दम--हे शत्रुओं कादमन करने वाले महाराज परीक्षित; तस्य--उसके; पुत्र-शतम्--एक सौ पुत्र; जज्ञे--उत्पन्न हुए; ककुद्धि-ज्येष्ठम्--जिनमें से ककुद्यीज्येष्ठ था; उत्तमम्--अत्यन्त शक्तिशाली तथा ऐश्वर्यवान्।
हे शत्रुओं के दमनकर्ता महाराज परीक्षित, इस रेवत ने समुद्र के भीतर कुशस्थली नामक राज्यका निर्माण कराया।
वहाँ रहकर उसने आनर्त इत्यादि भूखण्डों पर शासन किया।
उसके एक सौसुन्दर पुत्र थे जिनमें सबसे बड़ा ककुद्यी था।
ककुद्गी रेवतीं कन्यां स्वामादाय विभुं गत: ।
पुत्रया वरं परिप्रष्टं ब्रह्यलोकमपावृतम् ॥
२९॥
ककुद्यी--राजा ककुद्ली; रेवतीम्-रेवती को; कन्याम्--ककुद्ी की पुत्री; स्वामू--निजी; आदाय--लेकर; विभुम्-ब्रह्मा केसमक्ष; गत:--गया; पुत्र्याः:--अपनी पुत्री का; वरम्--पति; परिप्रष्टम्--पूछने के लिए; ब्रह्मलोकम्--ब्रह्मलोक में; अपावृतम्--तीनोंगुणों से परे
ककुदी अपनी पुत्री रेवती को लेकर ब्रह्मा के पास ब्रह्मलोक में गया जो भौतिक प्रकृति के तीनोंगुणों से परे है और उसके लिए पति के विषय में पूछताछ की।
आवर्तमाने गान्धर्वे स्थितोडलब्धक्षण: क्षणम् ।
तदन्त आद्यमानम्य स्वाभिप्रायं न्यवेदयत् ॥
३०॥
आवर्तमाने--लगा रहने के कारण; गान्धर्वे--गन्धर्वो से गाने सुनने में; स्थित:--स्थित; अलब्ध-क्षण:--बात करने के लिए समय नथा; क्षणमू--क्षणभर के लिए भी; तत्-अन्ते--समाप्त होने पर; आद्यम्--ब्रह्माण्ड के आदि गुरु ( ब्रह्माजी ) को; आनम्य--नमस्कारकरके; स्व-अभिप्रायम्--अपनी निजी इच्छा; न्यवेदयत्--ककुझी ने निवेदन किया।
जब ककुद्मी वहाँ पहुँचा तो ब्रह्माजी गन्धर्वों का संगीत सुनने में व्यस्त थे और उन्हें बात करने कीतनिक भी फुरसत न थी।
अतएव ककुदी प्रतीक्षा करता रहा और संगीत समाप्त होने पर उसनेब्रह्माजी को नमस्कार करके अपनी चिरकालीन इच्छा व्यक्त की।
तच्छुत्वा भगवान्त्रह्मा प्रहस्थ तमुवाच्र ह ।
अहो राजन्निरुद्धास्ते कालेन हृदि ये कृता: ॥
३१॥
तत्--उसे; श्रुत्वा--सुनकर; भगवानू्--अत्यन्त शक्तिशाली; ब्रह्मा--ब्रह्माजी ने; प्रहस्थ--हँसकर; तम्ू--ककुद्यी राजा से; उवाचह-कहा; अहो--ओह; राजन्--हे राजा; निरुद्धा:--सभी चले गये; ते--वे; कालेन--कालक्रम से; हृदि--हृदय में; ये--वे सभी;कृताः--जिन्होंने तुम्हारे दामाद के रूप में स्वीकृति दे दी है।
उसके वचन सुनकर शक्तिशाली ब्रह्माजी जोर से हँसे और ककुञ्मी से बोले: हे राजा, तुमने अपनेहृदय में जिन लोगों को अपना दामाद बनाने का निश्चय किया है वे कालक्रम से मर चुके हैं।
तत्पुत्रपौत्रनप्तृणां गोत्राणि च न श्रुण्महे ।
कालोभियातस्त्रिणवचतुर्युगविकल्पित: ॥
३२॥
तत्--वहाँ; पुत्र--पुत्रों का; पौत्र--पौत्रों का; नप्तृणाम्ू--तथा वंशजों का; गोत्राणि--गोत्र; च--भी; न--नहीं; श्रृण्महे--हम सुनतेहैं; काल:--काल; अभियातः--चले गये; त्रि--तीन; नव--नौ; चतुर-युग--चारों युग ( सत्य, त्रेता, द्वापर तथा कलि );विकल्पित:--इस प्रकार मापा गया।
सत्ताईस चतुर्युग बीत चुके हैं।
तुमने जिन लोगों को रेवती का पति बनाना चाहा होगा वे अबसब चले गये हैं और उनके पुत्र, पौत्र तथा अन्य वंशज भी नहीं रहे हैं।
अब तुम्हें उनके नाम भी नहींसुनाई पड़ेंगे।
तदगच्छ देवदेवांशो बलदेवो महाबल: ।
कन्यारतनमिदं राजन्नररत्नाय देहि भो: ॥
३३॥
तत्--इसलिए; गच्छ--जाओ; देव-देव-अंश:--जिनके स्वांश विष्णु हैं; बलदेव:--बलदेव; महा-बल:--अत्यन्त शक्तिशाली;कन्या-रलम्--अपनी सुन्दर पुत्री को; इदम्--इस; राजन्--हे राजा; नर-रलाय-- भगवान् को, जो सदैव तरुण रहते हैं; देहि--दो( दान में ); भोः--हे राजा |
है राजा, तुम यहाँ से जाओ और अपनी पुत्री भगवान् बलदेव को अर्पित करो जो अभी भी उपस्थित हैं।
वे अत्यन्त शक्तिशाली हैं।
निस्सन्देह, वे भगवान् हैं और उनके स्वांश विष्णु हैं।
उन्हें दानमें दिये जाने के लिए तुम्हारी पुत्री सर्वथा उपयुक्त है।
भुवो भारावताराय भगवान्भूतभावन: ।
अवतीर्णो निजांशेन पुण्यश्रवणकीर्तन: ॥
३४॥
भुव:ः--जगत का; भार-अवताराय-- भार कम करने के लिए; भगवान्--भगवान्; भूत-भावन:--सारे जीवों के नित्य हितैषी;अवतीर्ण:--अवतरित हुए हैं; निज-अंशेन--अपने अंशस्वरूप समस्त साज-सामान सहित; पुण्य-श्रवण-कीर्तन:--उनकी पूजा श्रवणतथा कीर्तन से की जाती है जिससे मनुष्य पवित्र हो जाता है।
बलदेवजी भगवान् हैं।
जो कोई उनका श्रवण और उनका कीर्तन करता है वह पवित्र हो जाताहै।
चूँकि वे समस्त जीवों के सतत हितैषी हैं अतएव वे अपने सारे साज-सामान सहित सारे जगत कोशुद्ध करने तथा इसका भार कम करने के लिए अवतरित हुए हैं।
इत्यादिष्टोउभिवन्द्याजं नृप: स्वपुरमागतः ।
त्यक्त पुण्यजनत्रासादशभ्रातृभिर्दिक्ष्ववस्थितै: ॥
३५॥
इति--इस प्रकार; आदिष्ट: --ब्रह्माजी द्वारा आज्ञा दिये जाने पर; अभिवन्द्य--नमस्कार करके; अजम्--ब्रह्म जी को; नृप:--राजा;स्व-पुरमू--अपने आवास को; आगत:--लौट आया; त्यक्तम्--जो शून्य था; पुण्य-जन--उच्चतर जीवों का; त्रासातू-- भय से;भ्रातृभि: --अपने भाइयों के द्वारा; दिक्षु--विभिन्न दिशाओं में; अवस्थितैः--रह रहे
ब्रह्मजी से यह आदेश पाकर ककुद्गी ने उन्हें नमस्कार किया और अपने निवासस्थान को लौटगया।
तब उसने देखा कि उसका आवास रिक्त है, उसके भाई तथा अन्य कुट॒म्बी उसे छोड़कर चलेगये हैं और यक्षों जैसे उच्चतर जीवों के भय से वे समस्त दिशाओं में रह रहे हैं।
सुतां दत्त्वानवद्याड़ीं बलाय बलशालिने ।
बदर्याख्यं गतो राजा तप्तुं नारायणा श्रमम् ॥
३६॥
सुताम्--अपनी पुत्री को; दत्त्वा--देकर; अनवद्य-अड्रीम्--सुगठित शरीर वाली; बलाय--बलदेव; बल-शालिने--अत्यन्त बलवान;बदरी-आख्यम्--बदरिका भ्रम नामक; गत:ः--चला गया; राजा--राजा; तप्तुमू--तपस्या करने के लिए; नारायण-आश्रमम्--नर-नारायण के स्थान को
तत्पश्चात् राजा ने अपनी परम सुन्दरी पुत्री परम शक्तिशाली बलदेव को दान में दे दी औरसांसारिक जीवन से विरक्त होकर वह नर-नारायण को प्रसन्न करने के लिए बदरिका श्रम चला गया।
