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अध्याय चार: अंबरीष महाराज का दुर्वासा मुनि द्वारा अपमान
9.4श्रीशुक उवाचनाभागो नभगापत्य॑ यं ततं भ्रातर: कविम् ।
यविष्ठ॑व्यभजन्दायं ब्रह्मचारिणमागतम् ॥
१॥
श्री-शुकः उबाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; नाभाग:--नाभाग; नभग-अपत्यम्--जो महाराज नभग का पुत्र था; यमू--जिस;ततम्--पिता को; भ्रातर:--बड़े भाइयों ने; कविम्--विद्वान; यविष्ठम्--सबसे छोटा; व्यभजन्--बाँट दिया; दायम्-- धन;ब्रह्मचारिणम्--ब्रह्मचारी जीवन स्वीकार करके ( नैष्ठिक )।
आगतम्--वापस आया।
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : नभग का पुत्र नाभाग बहुत काल तक अपने गुरु के पास रहा।
अतएव उसके भाइयों ने सोचा कि अब वह गृहस्थ नहीं बनना चाहता और वापस नहीं आएगा।
'फलस्वरूप उन्होंने अपने पिता की सम्पत्ति में उसका हिस्सा न रख कर उसे आपस में बाँट लिया।
जब नाभाग अपने गुरु के स्थान से वापस आया तो उन्होंने उसके हिस्से के रूप में उसे अपने पिता कोदे दिया।
भ्रातरोभाड़ू कि मह्यंं भजाम पितरं तव ।
त्वां ममार्यासतताभाडुक्षु्मा पुत्रक तदाहथा: ॥
२॥
भ्रातरः--हे मेरे भाइयो; अभाडु --आपने हमारे पिता की सम्पत्ति का हिस्सा दिया है; किम्--क्या; महाम्--मुझको; भजाम--हमदेते हैं; पितरम--पिता को; तब--तुम्हारे हिस्से के रूप में; त्वामू--तुम्हें; मम--मुझको; आर्या:--मेरे बड़े भाइयों ने; तत--हे पिता;अभादडक्षु:--हिस्सा दिया है; मा--नहीं; पुत्रक-हे पुत्र; तत्ू--इस वचन को; आहथा:--कोई महत्त्व दोना
भाग ने पूछा, 'मेरे भाइयो, आप लोगों ने पिता की सम्पत्ति में से मेरे हिस्से में मुझे क्या दियाहै?
' उसके भाई बोले, 'हमने तुम्हारे हिस्से में पिताजी को रख छोड़ा है।
' तब नाभाग अपने पिताके पास गया और बोला, 'हे पिताजी, मेरे भाइयों ने मेरे हिस्से में आपको दिया है।
' इस पर पिता नेउत्तर दिया, 'मेरे बेटे, तुम इनके ठगने वाले शब्दों पर विश्वास मत करना।
मैं तुम्हारी सम्पत्ति नहीं हू।
इमे अड्डिरसः सत्रमासतेद्य सुमेधस: ।
षष्ठ॑ षष्ठमुपेत्याह: कवे मुहान्ति कर्मणि ॥
३॥
इमे--ये सब; अड्भिरसः--अंगिरा के वंशज; सत्रम्-यज्ञ; आसते--कर रहे हैं; अद्य--आज; सुमेधस: --जो अत्यन्त बुद्धिमान हैं;षष्ठटम्--छठवाँ; षष्ठम्--छठवाँ; उपेत्य--प्राप्त करके; अह:--दिन; कवे--हे विद्वान पुरुष; मुहान्ति--मोह ग्रस्त होते हैं; कर्मणि--सकाम कर्मों में।
नाभाग के पिता ने कहा : अंगिरा के वंशज इस समय एक महान् यज्ञ सम्पन्न करने जा रहे हैं,किन्तु अत्यन्त बुद्धिमान होते हुए भी वे हर छठे दिन यज्ञ करते हुए मोहग्रस्त होंगे और अपने नैत्यिककर्मो में त्रुटि करेंगे।
तांस्त्वं शंसय सूक्ते द्वे वैश्वदेवे महात्मन: ।
ते स्वर्यन्तो धनं सत्रपरिशेषितमात्मन: ॥
४॥
दास्यन्ति तेडथ तानर्च्छ तथा स कृतवान्यथा ।
तस्मै दत्त्वा ययु: स्वर्ग ते सत्रपरिशेषणम् ॥
५॥
तान्ू--उन सबको; त्वमू--तुम; शंसब--वर्णन करो; सूक्ते--वैदिक स्तुतियाँ; द्वे--दोनों; वैश्वदेवे-- भगवान् वैश्वदेव के विषय में;महात्मन: --महात्माओं को; ते--वे; स्व: यन्तः--अपने-अपने स्वर्गधामों को जाते हुए; धनम्--सम्पत्ति; सत्र-परिशेषितम्--यज्ञ केअन्त में शेष रहने वाली; आत्मन: --अपनी निजी सम्पत्ति; दास्यन्ति--दे देंगे; ते--तुमको; अथ--इसलिए; तान्ू--उनको; अर्च्छ--वहाँ जाओ; तथा--उस तरह से ( अपने पिता की आज्ञानुसार ); सः--वह ( नाभाग ); कृतवान्--सम्पन्न किया हुआ; यथा--अपनेपिता की आज्ञानुसार; तस्मै--उसको; दत्त्वा--देकर; ययुः--चले गये; स्वर्गम्--स्वर्गलोक को; ते--वे सभी; सत्र-परिशेषणम्--यज्ञका अवशेषनाभाग के
पिता ने आगे कहा : 'उन महात्माओं के पास जाओ और उन्हें वैश्वदेव सम्बन्धी दोवैदिक मंत्र सुनाओ।
जब वे महात्मा यज्ञ समाप्त करके स्वर्गलोक को जा रहे होंगे तो वे यज्ञ में प्राप्तशेष दक्षिणा तुम्हें दे देंगे।
अतएव तुम तुरन्त जाओ।
इस तरह नाभाग ने वैसा ही किया जैसा उसकेपिता ने सलाह दी थी और अंगिरा वंश के सारे मुनियों ने उसे अपना सारा धन दे दिया और फिर वेस्वर्गलोक को चले गये।
त॑ कश्चित्स्वीकरिष्यन्तं पुरुष: कृष्णदर्शन: ।
उवाचोत्तरतो भ्येत्य ममेदं वास्तुकं बसु ॥
६॥
तम्--नाभाग को; कश्चित्--कोई; स्वीकरिष्यन्तम्-मुनियों द्वारा दिये गये धन को स्वीकार करते हुए; पुरुष: --व्यक्ति; कृष्ण-दर्शन:--देखने में काला; उबाच--कहा; उत्तरत:--उत्तर से; अभ्येत्य--आकर; मम--मेरा; इृदम्--यह; वास्तुकम्-यज्ञ काअवशेष; वसु--सारा धन।
जब नाभाग सारा धन ले रहा था तो उत्तर दिशा से एक काला कलूटा व्यक्ति उसके पास आयाऔर बोला, 'इस यज्ञशाला की सारी सम्पत्ति मेरी है।
'ममेदमृषिभिर्दत्तमिति तहिं सम मानव: ।
स्यान्नौ ते पितरि प्रश्न: पृष्टवान्पितरे यथा ॥
७॥
मम--मेरा; इदम्--यह; ऋषिभि: --ऋषियों द्वारा; दत्तम्-प्रदत्त; इति--इस प्रकार; तहि--अतएव; स्म--निस्सन्देह; मानव: --नाभाग; स्यात्--हो; नौ--हमारा; ते--तुम्हारा; पितरि--पिता के पास; प्रश्न: --प्रश्न; पृष्टवान्ू-- उसने भी पूछा; पितरम्--अपने पितासे; यथा--जैसी प्रार्थना की गई ।
तब नाभाग ने कहा : 'यह धन मेरा है।
इसे ऋषियों ने मुझे प्रदान किया है।
' जब नाभाग ने यहकहा तो उस काले कलूटे ने उत्तर दिया, 'चलो तुम्हारे पिता के पास चलें और उनसे इसका निपटाराकरने के लिए कहें।
' तदनुसार नाभाग ने अपने पिता से पूछा।
यज्ञवास्तुगतं सर्वमुच्छिष्टमृषय: क्वचित् ।
अक्रु्हिं भागं रुद्राय स देव: सर्वमहति ॥
८॥
यज्ञ-वास्तु-गतम्--यज्ञशाला से सम्बन्धित वस्तुएँ; सर्वम्--सारी; उच्छिष्टमू--बची हुई; ऋषय:--ऋषिगण; क्वचित्--कभी, दक्षयज्ञमें; चक्कः--ऐसा किया; हि--निस्सन्देह; भागम्--हिस्सा; रुद्राय--शिवजी को; सः--वह; देव: --देवता; सर्वम्--हर वस्तु का;अ्ईति-पात्र है।
नाभाग के पिता ने कहा : ऋषियों ने दक्ष यज्ञशाला में जो भी आहुति दी थी, वह शिवजी कोउनके भाग के रूप में दी गई थी।
अतएवं इस यज्ञशाला की प्रत्येक वस्तु निश्चित रूप से शिवजी कीहै।
नाभागस्तं प्रणम्याह तवेश किल वास्तुकम् ।
इत्याह मे पिता ब्रह्मज्छिरसा त्वां प्रसादये ॥
९॥
नाभाग:--नाभाग ने; तमू--उसको ( शिवजी को ); प्रणम्य-- प्रणाम करके; आह--कहा; तव--तुम्हारा; ईश--हे भगवान्; किल--निश्चय ही; वास्तुकम्--यज्ञशाला की हर वस्तु; इति--इस प्रकार; आह--कहा; मे--मेरे; पिता--पिता ने; ब्रह्मनू--हे ब्राह्मण;शिरसा--सिर के बल नमन करके; त्वामू--तुमसे; प्रसादये--कृपा की भीख माँगता हूँ।
तत्पश्चात् शिवजी को नमस्कार करने के बाद नाभाग ने कहा : हे पूज्यदेव, इस यज्ञशाला कीप्रत्येक वस्तु आपकी है--ऐसा मेरे पिता का मत है।
अब मैं विनम्रतापूर्वक आपके समक्ष अपना सिरझुकाकर आपसे कृपा की भीख माँगता हूँ।
यत्ते पितावदद्धर्म त्वं च सत्यं प्रभाषसे ।
ददामि ते मन्त्रहशो ज्ञानं ब्रह्न सनातनम् ॥
१०॥
यत्--जो कुछ; ते--तुम्हारे; पिता--पिता ने; अवदत्--कहा है; धर्मम्--सत्य; त्वम् च--तुम भी; सत्यम्--सत्य; प्रभाषसे--बोल रहेहो; ददामि--दूँगा; ते--तुम्हें; मन्त्र-हश: --मंत्र-विज्ञान को जानने वाले; ज्ञानमू--ज्ञान; ब्रह्मय--दिव्य; सनातनम्-शाश्रवत।
शिवजी ने कहा : तुम्हारे पिता ने जो कुछ कहा है वह सत्य है और तुम भी वही सत्य कह रहे हो।
अतएव वेदमंत्रों का ज्ञाता मैं तुम्हें दिव्य ज्ञान बतलाऊँगा।
गृहाण द्रविणं दत्त मत्सत्रपरिशेषितम् ।
इत्युक्त्वान्तर्हितो रुद्रो भगवान्धर्मवत्सल: ॥
११॥
गृहाण--अब ग्रहण करो; द्रविणम्--सारा धन; दत्तम्ू--दिया गया; मत्-सत्र-परिशेषितम्--मेरे लिए किये गये यज्ञ का अवशेष; इतिउक्त्वा--ऐसा कहकर; अन्तर्हित:--ओझल हो गये; रुद्र:--शिवजी; भगवान्--अत्यन्त शक्तिशाली देवता; धर्म-वत्सल:--धार्मिकसिद्धान्तों का हृढ़ता से पालन करने वाले |
शिवजी ने कहा : 'अब तुम यज्ञ का बचा सारा धन ले सकते हो क्योंकि मैं इसे तुम्हें दे रहा>>हूँ।
' यह कहकर धार्मिक सिद्धान्तों में अटल रहने वाले शिवजी उस स्थान से अहृश्य हो गये।
य एतत्संस्मरेत्प्रातः सायं च सुसमाहितः ।
कविर्भवति मन्त्रज्ञो गतिं चेव तथात्मन: ॥
१२॥
यः--जो कोई; एतत्--इस घटना के विषय में ; संस्मरेत्--स्मरण करेगा; प्रातः--प्रातःकाल; सायम् च--तथा सायंकाल;सुसमाहितः--अत्यन्त ध्यानपूर्वक; कविः--विद्वान; भवति--बन जाता है; मन्त्र-ज्ञः--समस्त वैदिक मंत्रों का ज्ञाता; गतिम्ू--गन्तव्य,लक्ष्य; च-- भी; एव--निस्सन्देह; तथा आत्मन:--स्वरूपसिद्ध व्यक्ति की तरह |
जो कोई इस कथा को प्रातःकाल एवं सायंकाल अत्यन्त ध्यानपूर्वक सुनता या स्मरण करता हैवह निश्चय ही विद्वान, वैदिक स्तोत्रों को समझने वाला एवं स्वरूपसिद्ध हो जाता है।
नाभागादम्बरीषो भून्महा भागवत: कृती ।
नास्पृशद्वह्यशापोपि य॑ न प्रतिहतः क्वचित् ॥
१३॥
नाभागात्--नाभाग से; अम्बरीष: --महाराज अम्बरीष ने; अभूत्--जन्म लिया; महा- भागवत: --अत्यन्त पूज्य भक्त; कृती--अत्यन्तविख्यात; न अस्पृशत्--स्पर्श भी नहीं कर पाया; ब्रह्म-शाप: अपि--ब्राह्मण का शाप भी; यम्--जिसको ( अम्बरीष को ); न--नतो; प्रतिहतः--विफल हुआ; क्वचित्--किसी समय ।
नाभाग से महाराज अम्बरीष ने जन्म लिया।
महाराज अम्बरीष उच्च भक्त थे और अपने महान्गुणों के लिए विख्यात थे।
यद्यपि उन्हें एक अच्युत ब्राह्मण ने शाप दिया था, किन्तु वह शाप उनका स्पर्श भी न कर पाया।
श्रीराजोबाचभगवज्छोतुमिच्छामि राजर्षेस्तस्य धीमतः ।
न प्राभूदात्र निर्मुक्तो ब्रह्मदण्डो दुरत्ययः ॥
१४॥
श्री-राजा उबाच--राजा परीक्षित ने पूछा; भगवन्--हे ब्राह्मण श्रेष्ठ; श्रोतुम् इच्छामि--आपसे सुनना चाहता हूँ; राजर्षे:--महान् राजाअम्बरीष का; तस्य--उस; धीमत: --अत्यन्त गम्भीर; न--नहीं; प्राभूत्--कार्य कर सका; यत्र--जिस पर ( अम्बरीष पर ); निर्मुक्त:--मुक्त होकर; ब्रह्म-दण्ड:--ब्राह्मण का शाप; दुरत्यय:--दुर्लघ्य |
राजा परीक्षित ने पूछा: हे महापुरुष, महाराज अम्बरीष निश्चय ही अत्यन्त उच्च एवं सच्चरित्र थे।
मैं उनके विषय में सुनना चाहता हूँ।
यह कितना आश्चर्यजनक है कि एक ब्राह्मण का दुर्लघ्य शाप उनपर अपना कोई प्रभाव नहीं दिखला सका।
श्रीशुक उवाचअम्बरीषो महाभागः सप्तद्वीपवर्ती महीम् ।
अव्ययां च श्रियं लब्ध्वा विभवं चातुलं भुवि ॥
१५॥
मेनेउतिदुर्लभं पुंसां सर्व तत्स्वप्नसंस्तुतम् ।
विद्वान्विभवनिर्वाणं तमो विशति यत्पुमान् ॥
१६॥
श्री-शुकः उवाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; अम्बरीष: --राजा अम्बरीष; महा-भाग: --अत्यन्त भाग्यशाली राजा; सप्त-द्वीपवतीम्--सात द्वीपों वाले; महीम्--सारे विश्व को; अव्ययाम् च--तथा न घटने वाली; थियम्--सुन्दरता को; लब्ध्वा--प्राप्तकरके; विभवम् च--तथा ऐश्वर्य; अतुलमू-- असीम; भुवि--पृथ्वी पर; मेने--उसने निश्चय किया; अति-दुर्लभमू--बहुत कम प्राप्त;पुंसामू--अनेक व्यक्तियों का; सर्वम्--सर्वस्व; तत्--जो; स्वप्न-संस्तुतम्--मानो स्वप्न में कल्पना की गई हो; विद्वान्ू--पूरी तरहजानते हुए; विभव-निर्वाणम्--उस ऐश्वर्य का विनाश; तम:ः--अज्ञान; विशति--प्रवेश करता है; यत्--जिससे; पुमान्--व्यक्ति |
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : अत्यन्त भाग्यवान महाराज अम्बरीष ने सात द्वीपों वाले समस्त विश्वपर शासन किया और पृथ्वी का अक्षय असीम ऐश्वर्य तथा सम्पन्नता प्राप्त की ।
यद्यपि ऐसा पद विरलेही मिलता है, किन्तु महाराज अम्बरीष ने इसकी तनिक भी परवाह नहीं की क्योंकि उन्हें पता था किऐसा सारा ऐश्वर्य भौतिक है।
ऐसा ऐश्वर्य स्वप्नतुल्य है और अन्ततोगत्वा विनष्ट हो जायेगा।
राजाजानता था कि कोई भी अभक्त ऐसा ऐश्वर्य प्राप्त करके प्रकृति के तमोगुण में अधिकाधिक प्रविष्टहोता है।
वबासुदेवे भगवति तद्धक्तेषु च साधुषु ।
प्राप्तो भावं परं विश्व येनेदं लोष्ट्वत्स्मृतम् ॥
१७॥
बासुदेवे--सर्वव्यापी परम पुरुष में; भगवति-- भगवान्; तत्-भक्तेषु--उनके भक्तों में; च-- भी; साथुषु--साथधु पुरुषों में; प्राप्त: --प्राप्त; भावम्--सम्मान तथा भक्ति; परमू-दिव्य; विश्वम्--सारा ब्रह्माण्ड; येन--जिससे ( आध्यात्मिक चेतना ); इदम्--यह; लोष्ट-बत्-पत्थर के टुकड़े के समान नगण्य; स्मृतम्-स्वीकार्य है ( ऐसे भक्त द्वारा )।
महाराज अम्बरीष भगवान् वासुदेव के तथा भगवद्भक्त सन्त पुरुषों के महान् भक्त थे।
इसभक्ति के कारण वे सारे विश्व को एक पत्थर के टुकड़े के समान नगण्य मानते थे।
स वै मनः कृष्णपदारविन्दयो-व॑चांसि वैकुण्ठगुणानुवर्णने ।
करीौ हरेर्मन्दिरमार्जनादिषुश्रुति चकाराच्युतसत्कथोदये ॥
१८॥
मुकुन्दलिड्रालयदर्शने दृशौतद्धृत्यगात्रस्पर्शे उड्रसड्रमम् ।
घ्राणं च तत्पादसरोजसौरभेश्रीमत्तुलस्या रसनां तदर्पिते ॥
१९॥
पादौ हरेः क्षेत्रपदानुसर्पणेशिरो हषीकेशपदाभिवन्दने ।
काम च दास्ये न तु कामकाम्ययायथोत्तमएलोकजनाश्रया रति: ॥
२०॥
सः--वह ( महाराज अम्बरीष ); बै--निस्सन्देह; मनः--जिसका मन; कृष्ण-पद-अरविन्दयो:--कृष्ण के दोनों चरणकमलों पर( स्थिर ); वचांसि--जिसके शब्द; बैकुण्ठ-गुण-अनुवर्णने--कृष्ण का गुणानुवाद करने; करौ--दोनों हाथ; हरे: मन्दिर-मार्जन-आदिषु--हरि मन्दिर की सफाई करने जैसे कार्यों में; श्रुतिमू--जिसका कान; चकार--संलग्न; अच्युत--कभी न गिरने वाले कृष्णके विषय में; सत्-कथा-उदये--दिव्य कथाओं के श्रवण करने में; मुकुन्द-लिड्र-आलय-दर्शने--मुकुन्दके अर्चाविग्रह, मन्दिर तथापवित्र धामों का दर्शन करने में; हशौ--उसकी दोनों आँखें; तत्-भृत्य--कृष्ण के सेवकों का; गात्र-स्पर्शे--शरीर का स्पर्श करने में;अड्ड-सड्रमम्--उनके शरीर का स्पर्श; घ्राणम् च--तथा उनकी प्राणेन्द्रिय; तत्ू-पाद--उनके चरणों के; सरोज--कमल के फूल की;सौरभे--सुगन्धि में; श्रीमत्-तुलस्या:--तुलसी दलों का; रसनाम्ू--उसकी जीभ; ततू-अर्पिते-- भगवान् को चढ़ाये गये प्रसाद में;'पादौ--दोनों पाँव; हरेः-- भगवान्के; क्षेत्र-- मन्दिर या वृन्दावन एवं द्वारकाधाम जैसे पवित्र स्थान; पद-अनुसर्पणे--उन स्थानों तकचलते हुए; शिर:--सिर; हषीकेश--इन्द्रियों के स्वामी कृष्ण के; पद-अभिवन्दने--चरणकमल को नमस्कार करने में; कामम् च--तथा उसकी इच्छाएँ; दास्ये--सेवक की भाँति लगी होने में; न--नहीं; तु--निस्सन्देह; काम-काम्यया--इन्द्रियतृप्ति की इच्छा सेयुक्त; यथा--जिस तरह; उत्तमशलोक-जन-आश्रया--जो प्रह्मद जैसे भक्त की शरण लेता है; रतिः--आसक्ति
महाराज अम्बरीष सदैव अपने मन को कृष्ण के चरणकमलों का ध्यान करने में, अपने शब्दोंको भगवान् का गुणगान करने में, अपने हाथों को भगवान् का मन्दिर झाड़ने-बुहारने में तथा अपनेकानों को कृष्ण द्वारा या कृष्ण के विषय में कहे गये शब्दों को सुनने में लगाते रहे।
वे अपनी आँखोंको कृष्ण के अर्चाविग्रह, कृष्ण के मन्दिर तथा कृष्ण के स्थानों, यथा मथुरा तथा वृन्दावन, कोदेखने में लगाते रहे।
वे अपनी स्पर्श-इन्द्रिय को भगवद्भक्तों के शरीरों का स्पर्श करने में, अपनीघ्राण-इन्द्रिय को भगवान् पर चढ़ाई गई तुलसी की सुगन्ध को सूँघने में और अपनी जीभ को भगवान्का प्रसाद चखने में लगाते रहे।
उन्होंने अपने पैरों को पवित्र स्थानों तथा भगवत् मन्दिरों तक जाने में,अपने सिर को भगवान् के समक्ष झुकाने में और अपनी इच्छाओं को चौबीसों घण्टे भगवान् की सेवाकरने में लगाया।
निस्सन्देह, महाराज अम्बरीष ने अपनी इन्द्रियतृप्ति के लिए कभी कुछ भी नहींचाहा।
वे अपनी सारी इन्द्रियों को भगवान् से सम्बन्धित भक्ति के कार्यो में लगाते रहे।
भगवान् केप्रति आसक्ति बढ़ाने की और समस्त भौतिक इच्छाओं से पूर्णतः मुक्त होने की यही विधि है।
भागवत में वर्णित प्रत्येक कथा कृष्ण से सम्बन्धित है।
एवं सदा कर्मकलापमात्मनःपरेधियज्ञे भगवत्यधोक्षजे ।
सर्वात्मभाव॑ विदधन्महीमिमांतन्निष्ठविप्राभिहित: शशास ह ॥
२१॥
एवम्--इस प्रकार ( भक्तिमय जीवन बिताते हुए ); सदा--सदैव; कर्म-कलापम्ू--क्षत्रिय राजा के रूप में नियत कार्य; आत्मन:--अपना, स्वयं; परे--परब्रह्म में; अधियज्ञे--परम नियंत्रक, परम भोक्ता में; भगवति-- भगवान् में; अधोक्षजे--इन्द्रियबोध से परे जो हैउस; सर्व-आत्म-भावम्-भक्ति के विविध प्रकार; विदधत्--सम्पन्न करते हुए, अर्पित करते हुए; महीम्-पृथ्वीलोक को; इमाम्--इस; तत्ू-निष्ठट--जो भगवान् के निष्ठावान भक्त हैं; विप्र--ऐसे ब्राह्मणों द्वारा; अभिहितः--निर्देशित; शशास--शासन किया; ह--भूतकाल में ।
राजा के रूप में अपने नियत कर्तव्यों का पालन करते हुए महाराज अम्बरीष अपने राजसीकार्यकलापों के फलों को सदैव भगवान् कृष्ण को अर्पित करते थे, जो प्रत्येक वस्तु के भोक्ता हैंऔर भौतिक इन्द्रियों के बोध के परे हैं।
वे निश्चित रूप से निष्ठावान भगवद्भक्त ब्राह्मणों से सलाहलेते थे और इस प्रकार वे बिना किसी कठिनाई के पृथ्वी पर शासन करते थे।
ईजे< श्वमे धैरधियज्ञमी धरेमहाविभूत्योपचिताड्डदक्षिणै: ।
ततैर्वसिष्ठासितगौतमादिभिर्धन्वन्यभिस्त्रोतमसौ सरस्वतीम् ॥
२२॥
ईजे--पूजा किया; अश्वमेथै:--अश्वमेध यज्ञ करके; अधियज्ञम्--सारे यज्ञों के स्वामी को तुष्ट करने के लिए; ईश्वरम्-- भगवान् को;महा-विभूत्या--महान् ऐश्वर्य से; उपचित-अड्ग-दक्षिणैः --समस्त सामग्री तथा ब्राह्मणों को दी गई दक्षिणा समेत; ततैः--सम्पन्न किया;वसिष्ठ-असित-गौतम-आदिभि: --वसिष्ठ, असित तथा गौतम जैसे ब्राह्मणों के द्वारा; धन्वनि--रेगिस्तान में; अभिसत्रोतमू--नदी के जलसे प्लावित; असौ--महाराज अम्बरीष; सरस्वतीम्--सरस्वती नदी के तट पर।
महाराज अम्बरीष ने उस मरुस्थल में अश्वमेध यज्ञ जैसे महान् यज्ञ सम्पन्न किये जिसमें से होकरसरस्वती नदी बहती है और समस्त यज्ञों के स्वामी भगवान् को प्रसन्न किया।
ऐसे यज्ञ महान् ऐश्वर्यतथा उपयुक्त सामग्री द्वारा तथा ब्राह्मणों को दक्षिणा देकर सम्पन्न किये जाते थे और इन यज्ञों कानिरीक्षण वसिष्ठ, असित तथा गौतम जैसे महापुरुषों द्वारा किया जाता था जो यज्ञों के सम्पन्नकर्ताराजा के प्रतिनिधि होते थे।
अस्य क्रतुषु गीर्वाणै: सदस्या ऋत्विजो जना: ।
तुल्यरूपाश्चानिमिषा व्यहश्यन्त सुवासस: ॥
२३॥
यस्य--जिसके ( अम्बरीष के ); क्रतुषु--( उसके द्वारा सम्पन्न ) यज्ञों में; गीर्वाणै:--देवताओं के साथ; सदस्या:--यज्ञ करने वालेसदस्य; ऋत्विज: --पुरोहित; जना:--तथा अन्य कुशल व्यक्ति; तुल्य-रूपा:--समान रूप वाले; च--तथा; अनिमिषा: --देवताओंकी तरह निर्निमेष दृष्टि से, बिना पलक भाँजे; व्यहृश्यन्त--देखे जाकर; सु-वासस:--कीमती वस्त्रों से सज्जित।
महाराज अम्बरीष द्वारा आयोजित यज्ञ में सभा के सदस्य तथा पुरोहित ( विशेष रूप से होता,उद्गाता, ब्रह्मा तथा अध्वर्यु ) वस्त्रों से बहुत अच्छी तरह से सज्जित थे और वे सब देवताओं की तरहलग रहे थे।
उन्होंने उत्सुकतापूर्वक यज्ञ को समुचित रूप से सम्पन्न कराया।
स्वर्गो न प्रार्थितो यस्य मनुजैरमरप्रिय: ।
श्रुण्वद्धिरुपगायद्धिरुत्तमशलोकचेष्टितम् ॥
२४॥
स्वर्ग:ः--स्वर्गलोक का जीवन; न--नहीं; प्रार्थित:--इच्छा का विषय; यस्य--जिसका ( अम्बरीष महाराज का ); मनुजैः--नागरिकों( प्रजा ) द्वारा; अमर-प्रिय:--देवताओं तक को परम प्रिय; श्रृण्वद्धिः --सुनने के आदी; उपगायद्धिः--तथा कीर्तन करने के आदी;उत्तमएलोक- भगवान् के; चेष्टितम्--महिमामय कार्यकलापों के विषय में |
महाराज अम्बरीष की प्रजा भगवान् के महिमामय कार्यकलापों के विषय में कीर्तन एवं श्रवणकरने की आदी थी।
इस प्रकार वह कभी भी देवताओं के परम प्रिय स्वर्गलोक में जाने की इच्छानहीं करती थी।
संवर्धयन्ति यत्कामा: स्वाराज्यपरिभाविता: ।
दुर्लभा नापि सिद्धानां मुकुन्दं हदि पश्यत:ः ॥
२५॥
संवर्धयन्ति--सुख को बढ़ाती हैं; यत्--क्योंकि; कामाः--ऐसी इच्छाएँ; स्वा-राज्य-- भगवान् की सेवा करने के अपने स्वाभाविकपद पर स्थित; परिभाविता: --ऐसी इच्छाओं से पूरित; दुर्लभा:--दुर्लभ; न--नहीं; अपि-- भी; सिद्धानाम्-महान् योगियों के;मुकुन्दम्--कृष्ण को; हृदि--हृदय में; पश्यतः--उनका दर्शन करने के आदी व्यक्ति
जो लोग भगवान् की सेवा करने के दिव्य सुख से परिपूर्ण हैं वे महान् योगियों की उपलब्धियों मेंभी कोई रुचि नहीं रखते क्योंकि ऐसी उपलब्धियाँ उस भक्त के द्वारा अनुभव किये गये दिव्य आनन्दको वर्धित नहीं करतीं जो अपने हृदय के भीतर सदैव कृष्ण का चिन्तन करता रहता है।
स इत्थं भक्तियोगेन तपोयुक्तेन पार्थिव: ।
स्वधर्मेण हरिं प्रीणन्सर्वान्कामान्शनैर्जहौ ॥
२६॥
सः--उस ( अम्बरीष ); इत्थम्--इस प्रकार; भक्ति-योगेन-- भगवान् की भक्ति के द्वारा; तपः-युक्तेन--जो तपस्या की श्रेष्ठ विधि भीहै; पार्थिव: --राजा ने; स्व-धर्मेण-- अपने वैधानिक कार्यकलापों से; हरिम्--परमे श्वर को; प्रीणन्--सन्तुष्ट करते हुए; सर्वानू--सभीप्रकार की; कामान्ू-- भौतिक इच्छाओं को; शनै: -- धीरे-धीरे; जहौ--त्याग दिया ॥
इस तरह इस लोक के राजा महाराज अम्बरीष ने भगवान् की भक्ति की और इस प्रयास में उन्होंनेकठिन तपस्या की।
उन्होंने अपने वैधानिक कार्यकलापों से भगवान् को सदैव प्रसन्न करते हुए धीरे-धीरे सारी भौतिक इच्छाओं का परित्याग कर दिया।
गृहेषु दारेषु सुतेषु बन्धुषुद्विपोत्तमस्यन्दनवाजिवस्तुषु ।
अक्षय्यरलाभरणाम्बरादिष्व्अनन्तकोशेष्वकरोदसन्मतिम् ॥
२७॥
गृहेषु--धरों में; दारेषु--स्त्रियों में; सुतेषु--सन्तानों में; बन्धुषु--मित्रों तथा सम्बन्धियों में; द्विप-उत्तम-- श्रेष्ठ शक्तिशाली हाथियों में;स्वन्दन--उत्तम रथों में; वाजि--उत्तम घोड़ों में; वस्तुषु--ऐसी सारी वस्तुओं में; अक्षय्य--जिनका महत्त्व कभी घटता नहीं; रतत--रत्नों में; आभरण --गहनों में; अम्बर-आदिषु-- कपड़े, गहने इत्यादि में; अनन्त-कोशेषु-- अक्षय खजाने में; अकरोत्--स्वीकारकिया; असतू-मतिम्--अनासक्ति।
महाराज अम्बरीष ने घरेलू कार्यों, पत्नियों, सन्तानों, मित्रों तथा सम्बन्धियों, श्रेष्ठ शक्तिशालीहाथियों, सुन्दर रथों, गाड़ियों, घोड़ों, अक्षय रत्नों, गहनों, बस्त्रों तथा अक्षय कोश के प्रति सारीआसक्ति छोड़ दी।
उन्होंने इन वस्तुओं को नश्वर तथा भौतिक मानकर इनकी आसक्ति छोड़ दी।
तस्मा अदाद्धरिश्वक्रं प्रयनीकभयावहम् ।
एकान्तभक्तिभावेन प्रीतो भक्ताभिरक्षणम् ॥
२८ ॥
तस्मै--उसको ( महाराज अम्बरीष को ); अदात्--प्रदान किया; हरिः--भगवान् ने; चक्रम्--अपना चक्र; प्रत्यनीक-भय-आवहम्--जो भगवान् तथा उनके भक्तों के शत्रुओं के लिए अत्यन्त भयावह है; एकान्त-भक्ति-भावेन--अनन्य भक्ति करने के कारण; प्रीतः--भगवान् इस प्रकार प्रसन्न होकर; भक्त-अभिरक्षणम्--अपने भक्तों की रक्षा के लिए।
महाराज अम्बरीष की अनन्य भक्ति से अतीव प्रसन्न होकर भगवान् ने राजा को अपना चक्रप्रदान किया जो शत्रुओं के लिए भयावह है और जो शत्रुओं तथा विपत्तियों से भक्तों की सदैव रक्षाकरता है।
आरिराधयिषु: कृष्णं महिष्या तुल्यशीलया ।
युक्त: सांवत्सरं वीरो दधार द्वादशीत्रतम् ॥
२९॥
आरिराधयिषु:--पूजा करने के लिए इच्छुक; कृष्णम्-- भगवान् कृष्ण को; महिष्या--अपनी रानी सहित; तुल्य-शीलया--महाराजअम्बरीष के ही समान योग्य; युक्त:--साथ-साथ; सांवत्सरम्--एक वर्ष तक; वीर:--राजा ने; दधार--स्वीकार किया; द्वादशी-ब्रतम्ू--एकादशी तथा द्वादशी मनाने का ब्रत।
महाराज अम्बरीष ने अपने ही समान योग्य अपनी रानी के साथ भगवान् कृष्ण की पूजा करने केलिए एक वर्ष तक एकादशी तथा द्वादशी का व्रत रखा।
ब्रतान्ते कार्तिके मासि त्रिरात्रं समुपोषितः ।
स्नातः कदाचित्कालिन्द्रां हरिं मधुवनेउर्चयत् ॥
३०॥
ब्रत-अन्ते--ब्रत रखने के अन्त में; कार्तिके--कार्तिक ( अक्टूबर-नवम्बर ) मास में; मासि--महीने में; त्रि-रात्रमू--तीन रातों तक;समुपोषित:--पूर्णतया व्रत रखने के पश्चात्; स्नातः:--स्नान करके; कदाचित्--कभी; कालिन्द्यामू-यमुना नदी के तट पर; हरिम्ू--भगवान् को; मधुवने--वृन्दावन के मधुवन नामक क्षेत्र में; अर्चयत्-- भगवान् की पूजा की
एक वर्ष तक उस ब्रत को रखने के बाद, तीन रातों तक उपवास रखकर तथा युमना में स्नानकरके महाराज अम्बरीष ने कार्तिक के महीने में भगवान् हरि की मधुवन में पूजा की।
महाभिषेकविधिना सर्वोपस्करसम्पदा ।
अभिषिच्याम्बराकल्पैर्गन्धमाल्याहणादिभि: ॥
३१॥
तद्गतान्तरभावेन पूजयामास केशवम् ।
ब्राह्मणांश्व महाभागान्सिद्धार्थानपि भक्तित: ॥
३२॥
महा-अभिषेक-विधिना-- अर्चाविग्रह को नहलाने के अनुष्ठान द्वारा; सर्व-उपस्कर-सम्पदा--अर्चा विग्रह की पूजा की सारी सामग्री से;अभिषिच्य--नहलाकर; अम्बर-आकल्पै: --सुन्दर वस्त्रों तथा गहनों से; गन्ध-माल्य--सुगन्धित फूल की मालाओं से; अर्हण-आदिभि:--अर्चाविग्रह की पूजा की अन्य सामग्री सहित; तत्-गत-अन्तर-भावेन--भक्ति से पूरित अपने मन से; पूजयाम् आस--उसने पूजा की; केशवम्--कृष्ण को; ब्राह्मणान् च--तथा ब्राह्मणों को; महा-भागान्--अत्यन्त भाग्यशाली; सिद्ध-अर्थान्--आत्मतुष्ट, किसी पूजा के लिए प्रतीक्षा किये बिना; अपि-- भी; भक्तित:--अत्यन्त भक्तिपूर्वक ।
महाभिषेक के विधि-विधानों के अनुसार महाराज अम्बरीष ने सारी सामग्री से भगवान् कृष्ण केअर्चाविग्रह को स्नान कराया।
फिर उन्हें सुन्दर बस्त्रों, आभूषणों, सुगन्धित फूलों की मालाओं तथापूजा की अन्य सामग्री से अलंकृत किया।
उन्होंने ध्यानपूर्वक तथा भक्तिपूर्वक कृष्ण की तथाभौतिक इच्छाओं से मुक्त परम भाग्यशाली ब्राह्मणों की पूजा की।
गवां रुक्मविषाणीनां रूप्याड्य्रीणां सुवाससाम् ।
'पयःशीलवयोरूपवत्सोपस्करसम्पदाम् ॥
३३॥
प्राहिणोत्साधुविप्रेभ्यो गृहेषु न्यर्बुदानि घटू ।
भोजयित्वा द्विजानग्रे स्वाद्वन्नं गुणवत्तमम् ॥
३४॥
लब्धकामैरनुज्ञातः पारणायोपचक्रमे ।
तस्य तह्ा॑तिथि: साक्षादुर्वासा भगवानभूत् ॥
३५॥
गवाम्--गाएँ; रुक्म-विषाणीनाम्--सोने के पत्तर से मढ़े सींगों वाली; रूप्य-अड्ख्नीणाम्--चाँदी के पत्तर से मढ़े खुरों वाली; सु-वाससाम्--वस्त्रों से सुसज्जित; पय:-शील--खूब दूध देने वाली; वयः--तरूण; रूप--सुन्दर; बत्स-उपस्कर-सम्पदाम्--सुन्दरबछड़ों सहित; प्राहिणोत्--दान में दिया; साधु-विप्रेभ्य:--ब्राह्मणों तथा साधु पुरुषों को; गृहेषु--उनके घर में ( पहुँचे हुए );न्यर्बुदानि--दस करोड़; षट्ू--छः गुणा; भोजयित्वा--उन्हें खिलाकर; द्विजान् अग्रे--पहले ब्राह्मणों को; स्वादु अन्नम्ू-- अत्यन्तस्वादिष्ट खाद्यपदार्थ; गुणवत्-तमम्--अत्यन्त स्वादिष्ट; लब्ध-कामै:--परम सम्तुष्ट ब्राह्मणों के द्वारा; अनुज्ञात:--उनकी अनुमति से;'पारणाय--द्वादशी का ब्रत पूरा करने के लिए; उपचक्रमे-- अन्तिम उत्सव मनाने जा रहे; तस्थय--उसका ( अम्बरीष ); तहिं--तुरन्त;अतिथि:--अनिच्छित मेहमान; साक्षात्-- प्रत्यक्ष; दुर्वासा:--योगी दुर्वासा; भगवान्--अत्यन्त शक्तिशाली; अभूत्--अतिथि रूप मेंवहाँ प्रकट हुए।
तत्पश्चात् महाराज अम्बरीष ने अपने घर में आये सारे अतिथियों को, विशेषकर ब्राह्मणों कोसंतुष्ट किया।
उन्होंने दान में साठ करोड़ गौवें दीं जिनके सींग सोने के पत्तर से और खुर चाँदी केपत्तर से मढ़े थे।
सारी गौवें वस्त्रों से खूब सजाई गई थीं और उनके थन दूध से भरे थे।
वे सुशील,तरुण तथा सुन्दर थीं और अपने-अपने बछड़ों के साथ थीं।
इन गौवों का दान देने के बाद राजा नेसर्वप्रथम सारे ब्राह्मणों को पेटभर भोजन कराया और जब वे पूरी तरह संतुष्ट हो गये तो वे उनकीआज्ञा से एकादशी ब्रत तोड़कर उस का पारण करने वाले थे।
किन्तु ठीक उसी समय महान् एवंशक्तिशाली दुर्वासा मुनि अनामंत्रित अतिथि के रूप में वहाँ पर प्रकट हुए।
तमानर्चातिथि भूपः प्रत्युत्थानासनाईणै: ।
ययाचे भ्यवहाराय पादमूलमुपागतः ॥
३६॥
तम्--उसको ( दुर्वासा को ); आनर्च--पूजा की; अतिथिम्--यद्यपि वे अनाहूत आये थे; भूप:ः--राजा ( अम्बरीष ) ने; प्रत्युत्थान--खड़े हो करके; आसन--आसन देकर; अर्हणैः--पूजा की सामग्री से; ययाचे--प्रार्थना की; अभ्यवहाराय-- भोजन करने के लिए;पाद-मूलम्--पाँवों पर; उपागत:--गिर कर |
दुर्वासा मुनि का स्वागत करने के लिए राजा अम्बरीष ने खड़े होकर उन्हें आसन तथा पूजा कीसामग्री प्रदान की।
तब उनके पाँवों के पास बैठकर राजा ने मुनि से भोजन करने के लिए प्रार्थनाकी।
प्रतिनन्द्य स तां याच्ञां कर्तुमावश्यकं गतः ।
निममज्न बृहद्धय्यायन्कालिन्दीसलिले शुभे ॥
३७॥
प्रतिनन्द्य--प्रसन्नतापूर्वक ग्रहण करके; सः--दुर्वासा मुनि ने; तामू--उस; याच्ञाम्--प्रार्थना को; कर्तुमू-करने के लिए;आवश्यकम्--आवश्यक धार्मिक अनुष्ठान; गत:--चला गया; निममजज--जल में डुबकी लगाई; बृहत्-परब्रह्म; ध्यायन्--ध्यानकरते हुए; कालिन्दी--यमुना के; सलिले--जल में; शुभे--अत्यन्त शुभ
दुर्वासा मुनि ने प्रसन्नतापूर्वक महाराज अम्बरीष की प्रार्थना स्वीकार कर ली, किन्तु आवश्यकअनुष्ठान करने के लिए वे यमुना नदी में गये।
वहाँ उन्होंने पवित्र यमुना नदी के जल में डुबकी लगाईऔर निराकार ब्रह्म का ध्यान किया।
मुहूर्तार्धावशिष्टायां द्वादश्यां पारणं प्रति ।
चिन्तयामास धर्मज्ञो द्विजैस्तद्धर्मसड्डटे ॥
३८॥
मुहूर्त-अर्ध-अवशिष्टायाम्-- आधे मुहूर्त के शेष रहने पर; द्वादश्याम्-द्वादशी के दिन; पारणम्--ब्रत तोड़ना; प्रति--मनाने के लिए;चिन्तयाम् आस--सोचने लगा; धर्म-ज्ञ:--धार्मिक नियमों का ज्ञाता; द्विजैः--ब्राह्मणों के द्वारा; ततू-धर्म--उस धर्म से सम्बन्धित;सड्डूटे--विकट परिस्थिति में तब तक ब्रत तोड़ने के लिए द्वादशी का केवल आधा मुहूर्त शेष था।
फलस्वरूप ब्रत को तुरन्ततोड़ा जाना अनिवार्य था।
ऐसी विकट परिस्थिति में राजा ने विद्वान ब्राह्मणों से परामर्श किया।
ब्राह्मणातिक्रमे दोषो द्वादश्यां यदपारणे ।
यत्कृत्वा साधु मे भूयादधर्मो वा न मां स्पृशेत् ॥
३९॥
अम्भसा केवलेनाथ करिष्ये ब्रतपारणम् ।
आहुरब्भक्षणं विप्रा ह्शितं नाशितं च तत् ॥
४०॥
ब्राह्मण-अतिक्रमे--ब्राह्मणों के प्रति सत्कार के नियमों का उल्लंघन करने में; दोष:--दोष है; द्वादश्याम्--द्वादशी के दिन; यत्--क्योंकि; अपारणे--समय से ब्रत न तोड़ने पर; यत् कृत्वा--जिसे करने पर; साधु--जो शुभ है; मे--मेरे लिए; भूयात्--ऐसा हो;अधर्म:--जो धर्म से रहित है; वा--अथवा; न--नहीं; माम्ू-- मुझको; स्पृशेत्--स्पर्श करे; अम्भसा--जल से; केवलेन--केवल;अथ--अतएव; करिष्ये--मैं करूँगा; ब्रत-पारणम्--ब्रत की पूर्ति; आहुः:--कहा; अप्-भक्षणम्--पीने का पानी; विप्रा:--हेब्राह्मणो; हि--निस्सन्देह; अशितम्--खाना; न अशितम् च--तथा न खाना; तत्--ऐसा कार्य |
राजा ने कहा : 'ब्राह्मणों के प्रति सत्कार के नियमों का उल्लंघन करना निश्चय ही, महान्अपराध है।
दूसरी ओर यदि कोई द्वादशी की तिथि में अपने व्रत को नहीं तोड़ता तो व्रत के पालन मेंदोष आता है।
अतएव हे ब्राह्मणो, यदि आप लोग यह सोचें कि यह शुभ है तथा अधर्मनहीं है तो मेंजल पीकर ब्रत तोड़ दूँ।
इस प्रकार ब्राह्मणों से परामर्श करने के बाद राजा इस निर्णय पर पहुँचा कि ब्राह्मणों के मतानुसार जल का पीना भोजन करना स्वीकार किया जा सकता है और नहीं भी।
इत्यप: प्राश्य राजर्षिश्विन्तयन्मनसाच्युतम् ।
प्रत्यचष्ट कुरु श्रेष्ठ द्विजागमनमेव सः ॥
४१॥
इति--इस प्रकार; अप: --जल; प्राश्य--पीकर; राजर्षि:--राजर्षि अम्बरीष; चिन्तयन्-- ध्यान करते हुए; मनसा--मन से;अच्युतम्-- भगवान् को; प्रत्यचष्ट--प्रतीक्षा करने लगा; कुरु-श्रेष्ठ--हे कुरु राजाओं में श्रेष्ठ; द्विजन-आगमनम्--महान् योगी ब्राह्मणदुर्वासा मुनि के आने की; एव--निस्सन्देह; सः--वह राजा |
हे कुरुश्रेष्ठ, थोड़ा सा जल पीकर राजा अम्बरीष ने अपने मन में भगवान् का ध्यान किया औरफिर वे महान् योगी दुर्वासा मुनि के वापस आने की प्रतीक्षा करने लगे।
दुर्वासा यमुनाकूलात्कृतावश्यक आगत: ।
राज्ञाभिनन्दितस्तस्य बुबुधे चेष्टितं धिया ॥
४२॥
दुर्वासा:--महर्षि; यमुना-कूलात्--यमुना नदी के तट से; कृत--करके; आवश्यक: --आवश्यक अनुष्ठान; आगत:--वापस आया;राज्ञा-राजा के द्वारा; अभिनन्दित:ः-- भली भाँति सत्कार किया जाकर; तस्य--उसका; बुबुधे--समझ सका; चेष्टितम्--चेष्टा, कृत्य;धिया--बुद्धि से |
दोपहर के समय सम्पन्न होने वाले अनुष्ठानों को संपन्न कर लेने के बाद दुर्वासा मुनि यमुना केतट से वापस आये।
राजा ने अच्छी प्रकार से उनका स्वागत किया, किन्तु दुर्वासा मुनि ने अपने योगबल से जान लिया कि राजा ने उनकी अनुमति के बिना जल पी लिया है।
मन्युना प्रचलद्गात्रो भ्रुकुटीकुटिलानन: ।
बुभुक्षितश्व सुतरां कृताझ्ललिमभाषत ॥
४३॥
मन्युना--क्रोध से उद्दिग्न मन वाला; प्रचलत्-गात्र:--काँपते शरीर से; भ्रु-कुटी--भौहों से; कुटिल--वक्र; आनन: --मुख; बुभुक्षितःच--तथा भूखा; सुतराम्--अत्यधिक ; कृत-अद्लिमू--हाथ जोड़कर खड़े अम्बरीष महाराज से; अभाषत--कहा |
भूखे, काँपते शरीर, टेढ़े मुँह तथा क्रोध से टेढ़ी भौहें किये दुर्वासा मुनि ने अपने समक्ष हाथ जोड़ेखड़े राजा अम्बरीष से क्रोधपूर्वक इस प्रकार कहा।
अहो अस्य नृशंसस्य श्रियोन्मत्तस्य पश्यत ।
धर्मव्यतिक्रमं विष्णोरभक्तस्येशमानिन: ॥
४४॥
अहो--ओह; अस्य--इस पुरुष का; नृ-शंसस्य--इतने निर्दय का; श्रिया उन्मत्तस्य--अपने ऐश्वर्य के कारण गर्वित; पश्यत--देखोतो; धर्म-व्यतिक्रमम्-धार्मिक सिद्धान्तों का उल्लंघन; विष्णो; अभक्तस्थ--जो विष्णु का भक्त नहीं है उसका; ईश-मानिन:--अपनेआपको ईश्वर मानने वाला।
ओह! जरा इस निर्दय व्यक्ति का आचरण तो देखो, यह भगवान् विष्णु का भक्त नहीं है।
यहअपने ऐश्वर्य एवं पद के गर्व के कारण अपने आपको ईश्वर समझ रहा है।
देखो न, इसने धर्म केनियमों का उल्लंघन किया है।
यो मामतिथिमायातमातिथ्येन निमन्त्रय च ।
अदचत्त्वा भुक्तवांस्तस्य सह्यस्ते दर्शये फलम् ॥
४५॥
यः--जो व्यक्ति; मामू--मुझ; अतिथिम्-- अतिथि को; आयातम्--आया हुआ; आतिथ्येन-- अतिथि के रूप में सत्कार द्वारा;निमन्य--निमंत्रण देकर; च--भी; अदत्त्वा--( भोजन ) दिये बिना; भुक्तवान्-- स्वयं खा लिया; तस्य--उसका; सद्य:--तुरन्त; ते--तुम्हारा; दर्शये--दिखलाऊँगा; फलम्--परिणाम, फल
महाराज अम्बरीष, तुमने मुझे अतिथि के रूप में भोजन के लिए बुलाया है लेकिन तुमने मुझे नखिलाकर स्वयं पहले खा लिया है।
तुम्हारे इस दुर्व्यवहार के कारण मैं तुमको इसका मजाचखाऊँगा।
एवं ब्रुवाण उत्कृत्य जटां रोषप्रदीपित: ।
तया स निर्ममे तस्मै कृत्यां कालानलोपमाम् ॥
४६॥
एवम्--इस प्रकार; ब्रुवाण: --बोलकर ( दुर्वासा मुनि ); उत्कृत्य--उखाड़कर; जटाम्--बालों के समूह को; रोष-प्रदीपित:ः --क्रो ध केमारे लाल होकर; तया--सिर से उखाड़ी अपनी जटा से; सः--दुर्वासा मुनि ने; निर्ममे--उत्पन्न कर दिया; तस्मै--महाराज अम्बरीष कोदण्ड देने के लिए; कृत्यामू--कृत्या; काल-अनल-उपमाम्--प्रलयाग्नि के समान प्रकट होकर।
जब दुर्वासा मुनि ने ऐसा कहा तो क्रोध से उनका मुख लाल पड़ गया।
उन्होंने अपने सिर कीजटा से एक बाल उखाड़कर महाराज अम्बरीष को दण्ड देने के लिए एक कृत्या उत्पन्न कर दी जोप्रलयाग्नि के समान प्रज्वलित हो रही थी।
तामापतन्तीं ज्वलतीमसिहस्तां पदा भुवम् ।
वेपयन्तीं समुद्री क्ष्य न चचाल पदान्नूप: ॥
४७॥
ताम्ू--उसको; आपतन्तीम्--उस पर आक्रमण करने के लिए जो आगे बढ़ती हुई; ज्वलतीम्--अग्नि के समान प्रज्वलित; असि-हस्ताम्--हाथ में त्रिशूल लिए हुए; पदा--अपने पगों से; भुवम्--पृथ्वी को; वेपयन्तीम्--कंपाती हुईं; समुद्रीक्ष्य--उसे ठीक सेदेखकर; न--नहीं; चचाल--हिला या हटा; पदात्-- अपने स्थान से; नृप:--राजा |
वह देदीप्यमान कृत्या अपने हाथ में त्रिशूल लेकर तथा अपने पदचाप से धरती को कंपाती हुईमहाराज अम्बरीष के सामने आई।
किन्तु उसे देखकर राजा तनिक भी विचलित नहीं हुआ और अपनेस्थान से रंचभर भी नहीं हटा।
प्राग्दिष्टे भृत्यरक्षायां पुरुषेण महात्मना ।
ददाह कृत्यां तां चक्र क्रुद्धाहिमिव पावक: ॥
४८ ॥
प्राक् दिष्टम्--पूर्व आयोजित; भृत्य-रक्षायाम्--अपने दासों की रक्षा करने के लिए; पुरुषेण--परम पुरुष द्वारा; महा-आत्मना--परमात्मा द्वारा; ददाह--जलाकर राख कर दिया; कृत्याम्ू--सूजित कृत्या को; तामू--उस; चक्रम्--चक्र; क्रुद्ध-क्रुद्ध: अहिम्ू--सर्प को; इब--सहृश; पावक:-- अग्नि
जिस प्रकार दावाग्नि एक क्रुद्ध सर्प को तुरन्त जला देती है उसी प्रकार पहले से आदिष्ट भगवान्के सुदर्शन चक्र ने भगवदभक्त की रक्षा करने के लिए उस सृजित कृत्या को जलाकर क्षार करदिया।
तदभिद्रवदुद्वी क्ष्य स्वप्रयासं च निष्फलम् ।
दुर्वासा दुद्रुवे भीतो दिश्लु प्राणपरीप्सया ॥
४९॥
तत्--उस चक्र को; अभिद्रवत्--अपनी ओर आते; उद्दीक्ष्य--देखकर; स्व-प्रयासम्--अपने निजी प्रयास को; च--तथा;निष्फलमू--व्यर्थ हुआ; दुर्वासा:--दुर्वासा मुनि; दुद्रुंबे-- भगने लगा; भीत:-- भयभीत हो गए; दिक्षु--हर दिशा में; प्राण-परीप्सया--अपने जीवन की रक्षा करने की इच्छा से |
जब दुर्वासा मुनि ने देखा कि उनका निजी प्रयास विफल हो गया है और सुदर्शन चक्र उनकीओर बढ़ रहा है तो वे अत्यधिक भयभीत हो उठे और अपनी जान बचाने के लिए सारी दिशाओं मेंदौने लगे।
तमन्वधावद्धगवद्रथाडुंदावाग्निरुद्धृतशिखो यथाहिम् ।
तथानुषक्तं मुनिरीक्षमाणोगुहां विविश्षु: प्रससार मेरो: ॥
५०॥
तमू--दुर्वासा का; अन्वधावत्--पीछा करने लगा; भगवत्-रथ-अड्भम्-- भगवान् के रथ के पहिए से निकला चक्र; दाव-अग्नि:--जंगल की अग्नि के समान; उद्धृूत--ऊपर उठती; शिख:--लपटें; यथा अहिम्--जिस तरह साँप का पीछा करती हैं; तथा--उसीप्रकार; अनुषक्तम्--मानो दुर्वासा मुनि की पीठ को छूता हुआ; मुनि:--मुनि; ईक्षमाण: --इस तरह देखता; गुहाम्-गुफा में;विविक्षु:--प्रवेश करना चाहा; प्रससार--तेजी से आगे बढ़ने लगा; मेरो:ः--मेरु पर्वत की |
जिस प्रकार दवाग्नि की लपटें साँप का पीछा करती हैं उसी तरह भगवान् का चक्र दुर्वासा मुनिका पीछा करने लगा।
दुर्वासा मुनि ने देखा कि यह चक्र उनकी पीठ को छूने वाला है अतएव वे तेजीसे दौकर सुमेरु पर्वत की गुफा में घुस जाना चाह रहे थे।
दिशो नभ: क्ष्मां विवरान्समुद्रान्लोकान्सपालांस्ब्रिदिवं गत: सः ।
यतो यतो धावति तत्र तत्रसुदर्शन दुष्प्रस॒ह॑ दरदर्श ॥
५१॥
दिशः--सारी दिशाएँ; नभः--आकाश में; क्ष्माम्-पृथ्वी पर; विवरान्ू--छेदों में; समुद्रान्--समुद्रों के भीतर; लोकान्ू--सारे स्थानोंमें; स-पालानू--तथा उनके शासकों समेत; त्रिदिवम्--स्वर्गलोकों में; गत:--गया हुआ; सः--वह दुर्वासा मुनि; यतः यत:--जहाँ-जहाँ; धावति--गया; तत्र तत्र--वहीं-वहीं; सुदर्शनम्--भगवान् का चक्र; दुष्प्रसहम्--अत्यन्त भयावह; ददर्श--दुर्वासा मुनि नेदेखा।
अपनी रक्षा करने के लिए दुर्वासा मुनि सर्वत्र भागते रहे--वे आकाश, पृथ्वीतल, गुफाओं,समुद्र, तीनों लोकों के शासकों के विभिन्न लोकों तथा स्वर्गलोक में भी गये, किन्तु जहाँ-जहाँ गयेवहीं उन्होंने सुदर्शन चक्र की असह्ा अग्नि को उनका पीछा करते देखा।
अलब्धनाथ: स सदा कुतश्चित्सन्त्रस्तचित्तोरणमेषमाण: ।
देवं विरिज्ञं समगाद्विधात-स्त्राह्मात्मयोनेडजिततेजसो माम् ॥
५२॥
अलब्ध-नाथ:--रक्षक की शरण पाये बिना; सः--दुर्वासा मुनि; सदा--सदैव; कुतश्चित्--कहीं; सन्त्रस्त-चित्त:-- भयभीत मन से;अरणम्--शरणदाता को; एषमाण:--ढूँढते हुए; देवम्--प्रमुख देवता; विरिज्ञम्--ब्रह्माजी के पास; समगात्--पहुँचा; विधात:--हेप्रभु; त्राहि--मेरी रक्षा कीजिये; आत्म-योने--हे ब्रह्मजी; अजित-तेजस:ः --अजित अर्थात् भगवान् द्वारा छोड़ी गयी अग्नि से; माम्--मुझको ।
दुर्वासा मुनि भयभीत मन से इधर उधर शरण खोजते रहे, किन्तु जब उन्हें कोई शरण न मिलसकी तो अन्ततः वे ब्रह्माजी के पास पहुँचे और कहा-हे प्रभु, हे ब्रह्मजी, कृपा करके भगवान् द्वाराश़ भेजे गये इस ज्वलित सुदर्शन चक्र से मेरी रक्षा कीजिये।
श्रीब्रह्मोवाचस्थान मदीयं सहविश्वमेतत्क्रीडावसाने द्विपरार्धसंज्ञे ।
भ्रूभड्रमात्रेण हि सन्दिधक्षो:कालात्मनो यस्य तिरोभविष्यति ॥
५३॥
अहं भवो दक्षभृगुप्रधाना:प्रजेशभूतेशसुरेशमुख्या: ।
सर्वे वयं यन्नियमं प्रपन्नामूर्ध्यार्पितं लोकहितं वबहाम: ॥
५४॥
श्री-ब्रह्मा उवाच--ब्रह्माजी ने कहा; स्थानम्--वह स्थान जहाँ मैं हूँ; मदीयम्--मेरा आवास, ब्रहालोक; सह--सहित; विश्वम्-साराब्रह्माण्ड; एतत्--यह; क्रीडा-अवसाने-- भगवान् की लीला-अवधि के अन्त में; द्वि-परार्ध-संज्ञे--द्वि परार्थ के अन्त के नाम से जानाजाने वाला समय; भ्रू-भड़-मात्रेण--भौहों के टेढ़ा होने मात्र से; हि--निस्सन्देह; सन्दिधक्षो: -- भगवान् का, जब वे सारे ब्रह्माण्ड कोभस्म करना चाहते हैं; काल-आत्मन:--विनाश रूपी; यस्य--जिसका; तिरोभविष्यति--लुप्त हो जायेगा; अहम्--मैं; भव: --शिवजी; दक्ष--प्रजापति दक्ष; भूगु-- भूगुमुनि; प्रधाना: --तथा अन्य; प्रजा-ईश--प्रजाओं के नियंत्रक; भूत-ईश--जीवों के नियन्ता;सुर-ईश--देवताओं के नियन्ता; मुख्या:--उनके नेतृत्व में; सर्वे--सभी; वयम्--हम भी; यत्-नियमम्--जिसके नियम; प्रपन्ना:--शरणागत; मूर्ध्या अर्पितमू--हम अपने-अपने सिर झुकाकर; लोक-हितम्--जीवों के कल्याण हेतु; वहाम:--जीवों के ऊपर शासनकरने वाले आदेशों का पालन करते हैं।
ब्रह्माजी ने कहा : द्वि-परार्ध के अन्त में, जब भगवान् की लीलाएँ समाप्त हो जाती हैं तो भगवान्विष्णु अपनी एक भृकुटि के टेढ़ा होने से सारे ब्रह्माण्ड का, जिसमें हमारे निवास स्थान भीसम्मिलित हैं, विनाश कर देते हैं।
मैं तथा शिवजी जैसे पुरुष तथा दक्ष, भूृगु इत्यादि प्रधान ऋषिमुनिएवं जीवों के शासक, मानव समाज के शासक एवं देवताओं के शासक, हम सभी उन भगवान्विष्णु को अपने अपने सिर झुकाकर समस्त जीवों के कल्याण हेतु उनके आदेशों का पालन करनेके लिए उनकी शरण में जाते हैं।
प्रत्याख्यातो विरिज्ञेन विष्णुच्क्रोपतापित: ।
दुर्वासा: शरणं यात: शर्व कैलासवासिनम् ॥
५५॥
प्रत्याख्यात:--मना किये जाने पर; विरिज्लेन--ब्रह्माजी द्वारा; विष्णु-चक्र-उपतापित: -- भगवान् विष्णु के चक्र की ज्वलित अग्नि सेझुलस कर; दुर्वासा:--दुर्वासा मुनि; शरणम्--शरण में; यात:--गया; शर्वम्--शिवजी की; कैलास-वासिनमू--कैलासवासी |
जब सुदर्शन चक्र की ज्वलित अग्नि से संतप्त दुर्वासा को ब्रह्माजी ने इस प्रकार मना कर दियातो उन्होंने कैलास लोक में सदैव निवास करने वाले शिवजी की शरण लेने का प्रयास किया।
श्रीशड्डर उबाचबयं न तात प्रभवाम भूम्नियस्मिन्परेडन्येडउप्पजजीवकोशा: ।
भवन्ति काले न भवन्ति हीहशाःसहस्त्रशो यत्र वयं भ्रमाम: ॥
५६॥
श्री-शद्भूरः उबाच--शंकरजी ने कहा; वयम्--हम; न--नहीं; तात-हे पुत्र; प्रभवाम:--पर्याप्त सक्षम; भूम्नि-- भगवान् को;यस्मिनू--जिसमें; परे--अध्यात्म में; अन्ये--अन्य लोग; अपि-- भी; अज--ब्रह्म जी; जीव--सारे जीव; कोशा:--ब्रह्माण्ड;भवन्ति--हो सकते हैं; काले--कालक्रम से; न--नहीं; भवन्ति--हो सकते हैं; हि--निस्सन्देह; ईहशा:-- इसकी तरह; सहस्त्रश: --कई हजार तथा लाख; यत्र--जिसमें; वयम्--हम सभी; भ्रमाम:--घूम रहे हैं।
शिवजी ने कहा : हे पुत्र, मैं, ब्रह्माजी तथा अन्य देवता जो अपनी-अपनी महानता की भ्रान्तधारणा के कारण इस ब्रह्माण्ड के भीतर चक्कर लगाते रहते हैं, भगवान् से स्पर्धा करने की क्षमतानहीं रखते क्योंकि भगवान् के निर्देशन मात्र से असंख्य ब्रह्माण्डों एवं उनके निवासियों का जन्म औरसंहार होता रहता है।
अह सनत्कुमारश्च नारदो भगवानज: ।
कपिलोपान्तरतमो देवलो धर्म आसुरि: ॥
५७॥
मरीचिप्रमुखाश्चान्ये सिद्धेशा: पारदर्शना: ।
विदाम न वयं सर्वे यन्मायां माययावृता: ॥
५८ ॥
तस्य विश्रेश्वरस्येदं शस्त्र दुर्विषहं हि नः ।
तमेवं शरणं याहि हरिस्ते शं विधास्यति ॥
५९॥
अहम्-मैं; सनत्-कुमार: च--तथा चारों कुमार ( सनक, सनातन, सनत्कुमार तथा सनन्द ); नारद:ः--नारद मुनि; भगवान् अज:--ब्रह्माण्ड के श्रेष्ठतम प्राणी, ब्रह्माजी की; कपिल: --देवहूति के पुत्र; अपान्तरतम: --व्यासदेव; देवल:--देवलऋषि; धर्म:--यमराज;आसुरि:--महान् सन्त आसुरि; मरीचि--महान् सन्त मरीचि; प्रमुखा:--इत्यादि; च-- भी; अन्ये-- अन्य; सिद्ध-ईशा: --सभी अपने-अपने ज्ञान में पूर्ण; पार-दर्शना:--जिन्होंने सारे ज्ञान का अन्त देखा है; विदाम:--समझ सकते हैं; न--नहीं; वयम्--हम सभी;सर्वे--पूर्णत:; यत्-मायाम्-- जिसकी माया को; मायया--माया द्वारा; आवृता:--ढका हुआ; तस्य--उसका; विश्व-ई श्वरस्थ --ब्रह्माण्ड के स्वामी का; इदम्--यह; शस्त्रमू--हथियार ( चक्र ); दुर्विषहम--असहा; हि--निस्सन्देह; नः--हमारा; तमू--उसकी;एवम्--इसलिए; शरणम् याहि--शरण में जाओ; हरि:ः-- भगवान्; ते--तुम्हारा; शम्--कल्याण; विधास्यति-- अवश्यमेव करेंगे |
मैं (शिवजी ), सनत्कुमार, नारद, परमादरणीय ब्रह्माजी, कपिल ( देवहूति पुत्र ), अपान्तरतम( व्यासदेवजी ), देवल, यमराज, आसुरि, मरीचि इत्यादि अनेक सन्तपुरुष एवं सिद्ध्िप्राप्त अन्यअनेक लोग भूत, वर्तमान तथा भविष्य को जानने वाले हैं।
फिर भी भगवान् की माया से प्रच्छन्न होनेके कारण हम यह नहीं समझ पाते कि यह माया कितनी विस्तीर्ण है।
तुम उन्हीं भगवान् के पास राहतप्राप्त करने के लिए जाओ क्योंकि यह सुदर्शन चक्र हम लोगों के लिए भी दुःसह है।
तुम भगवान्विष्णु के पास जाओ।
वे अवश्य ही दयाद्र होकर तुम्हें सौभाग्य प्रदान करेंगे।
ततो निराशो दुर्वासा: पदं भगवतो ययौ ।
वैकुण्ठाख्यं यदध्यास्ते श्रीनिवास: भ्रिया सह ॥
६०॥
ततः--तत्पश्चात्; निराश:--निराश हुआ; दुर्वासा:--दुर्वासा मुनि; पदम्ू--स्थान; भगवतः -- भगवान् विष्णु के; ययौ--गया;वैकुण्ठ-आख्यम्--वैकुण्ठ नामक; यत्--जहाँ पर; अध्यास्ते--नित्य वास करते हैं; श्रीनिवास:-- भगवान् विष्णु; थ्रिया--लक्ष्मी;सह--सहित।
तत्पश्चात् शिवजी के द्वारा भी शरण न दिये जाने से निराश होकर दुर्वासा मुनि वैकुण्ठधाम गयेजहाँ भगवान् नारायण अपनी प्रियतमा लक्ष्मीदेवी के साथ निवास करते हैं।
सन्दह्ममानो जितशस्त्रवह्निनातत्पादमूले पतितः सवेपथु: ।
आहाच्युतानन्त सदीप्सित प्रभो कृतागसं मावहि विश्वभावन ॥
६१॥
सन्दह्ममान: --दग्ध होकर; अजित-शस्त्र-वह्िना-- भगवान् के हथियार की ज्वलित अग्नि से; तत्-पाद-मूले--उनके चरणकमलों पर;'पतितः--गिरते हुए; स-वेपथु:--काँपते शरीर से; आह--कहा; अच्युत--हे अच्युत भगवान्; अनन्त--हे असीम पराक्रम वाले; सतू-ईप्सित--सन्तों द्वारा वांछित भगवान्; प्रभो--हे परमेश्वर; कृत-आगसम्--महानतम अपराधी; मा--मुझको; अवहि--शरण दो;विश्व-भावन--समस्त विश्व के हितैषी।
सुदर्शन चक्र की गर्मी से झुलसे हुए महान् योगी दुर्वासा मुनि नारायण के चरणकमलों पर गिरपड़े।
काँपते शरीर से वे इस तरह बोले, 'हे अच्युत, हे अनन्त, हे समस्त ब्रह्माण्ड के रक्षक, आपसभी भक्तों के अभीष्ट हैं।
हे प्रभु, मैं महान् अपराधी हूँ।
कृपया मुझे संरक्षण प्रदान करें।
'अजानता ते परमानुभावंकृत॑ मयाघं भवतः प्रियाणाम् ।
विधेहि तस्यापचितिं विधात-मुच्येत यन्नाम्न्युदिते नारकोपि ॥
६२॥
अजानता--अनजाने; ते--तुम्हारी; परम-अनुभावम्--अचिन्त्य शक्ति; कृतम्--किया गया है; मया--मेरे द्वारा; अधम्--महान्अपराध; भवत:--आपके; प्रियाणाम्--भक्तों के चरणों पर; विधेहि--अब कृपा करके जो आवश्यक हो करें; तस्य--ऐसे अपराधका; अपचितिम्-- प्रतिक्रिया; विधात:ः--हे परम नियन्ता; मुच्येत--उद्धार हो सकता है; यत्ू--जिसका; नाम्नि--जब नाम; उदिते--जगाया जाता है; नारकः अपि--नरक जाने योग्य व्यक्ति भी।
हे प्रभु, हे परम नियन्ता, मैंने आपकी असीम शक्ति समझे बिना आपके परम प्रिय भक्त के प्रतिअपराध किया है।
कृपया मुझे इस अपराध के फल से बचा लें।
आप हर काम कर सकते हैं क्योंकियदि कोई व्यक्ति नरक जाने के लायक हो, उसके भी हृदय में अपने पवित्र नाम को जगाकर आपउसका उद्धार कर सकते हैं।
श्रीभगवानुवाचअहं भक्तपराधीनो हास्वतन्त्र इव द्विज ।
साधुभिग्रस्तहदयो भक्तैर्भक्तजनप्रिय: ॥
६३॥
श्री-भगवान् उवाच-- भगवान् ने कहा; अहम्--मैं; भक्त-पराधीन: --मैं अपने भक्तों के वशीभूत हूँ; हि--निस्सन्देह; अस्वतन्त्र:--स्वतंत्र नहीं हूँ; इब--के समान; द्विज-हे ब्राह्मण; साधुभि:--शुद्ध भक्तों से, जो सारी भौतिक इच्छाओं से मुक्त हैं; ग्रस्त-हदय:--मेरा हृदय नियंत्रण में है; भक्तै:--क्योंकि वे भक्त हैं; भक्त-जन-प्रियः--मैं न केवल अपने भक्त पर आश्रित हूँ लेकिन भक्त के भीभक्त के अश्नित हूँ ( मुझे अपने भक्त का भक्त अत्यन्त प्रिय होता है )
भगवान् ने उस ब्राह्मण से कहा : मैं पूर्णतः अपने भक्तों के वश में हूँ।
निस्सन्देह, मैं तनिक भी स्वतंत्र नहीं हूँ।
चूँकि मेरे भक्त भौतिक इच्छाओं से पूर्णतः रहित होते हैं अतएव मैं उनके हृदयों में हीनिवास करता हूँ।
मुझे मेरे भक्त ही नहीं, मेरे भक्तों के भक्त भी अत्यन्त प्रिय हैं।
नाहमात्मानमाशासे मद्धक्तेः साधुभिर्विना ।
श्रियं चात्यन्तिकीं ब्रह्मन्येषां गतिरहं परा ॥
६४॥
न--नहीं; अहम्--मैं; आत्मानम्-दिव्य आनन्द; आशासे--चाहता हूँ; मत्-भक्तै: --मेरे भक्तों के साथ; साधुभि:--साथुपुरुषों केसाथ; विना--उनके बिना; थ्रियम्--मेंरे छहो ऐश्वर्य; च-- भी; आत्यन्तिकीम्--परम; ब्रह्मनू--हे ब्राह्मण; येषामू--जिसका; गति: --लक्ष्य; अहम्-मैं; परा--परम, चरम ।
हे ब्राह्मणश्रेष्ठ, मैं उन साधुपुरुषों के बिना अपना दिव्य आनन्द तथा अपने परम ऐश्वर्यों का भोगनहीं करना चाहता जिनके लिए मैं ही एकमात्र गन्तव्य हूँ।
ये दारागारपुत्राप्तप्राणान्वित्तमिमं परम् ।
हित्वा मां शरणं याता: कथ॑ तांस्त्यक्तुमुत्सहे ॥
६५॥
ये--जो भक्त; दार--पत्ती; अगार--घर; पुत्र--लड़के, बच्चे; आप्त--सम्बन्धी समाज; प्राणान्ू--यहाँ तक कि प्राण भी; वित्तम्--सम्पत्ति; इमम्--ये सब; परम्ू--स्वर्गलोक को जाना या ब्रह्म से एकाकार होना; हित्वा--त्यागकर ( ये सब आकांक्षाएँ और सम्पत्ति );माम्--मुझको ( मेरी ); शरणम्--शरण में; याता:--ग्रहण करके; कथम्--कैसे; तान्ू--ऐसे पुरुषों को; त्यक्तुमू--त्यागने के लिए;उत्सहे--मैं किस तरह उत्साहित हो सकता हूँ ( जो सम्भव नहीं है )॥
चूँकि शुद्ध भक्तमण इस जीवन में या अगले जीवन में किसी भौतिक उन्नति की इच्छा से रहितहोकर अपने घर, पत्नियों, बच्चों, सम्बन्धियों, धन और यहाँ तक कि अपने जीवन का भी परित्याग,मात्र मेरी सेवा करने के लिए, करते हैं तो मैं ऐसे भक्तों को कभी भी किस तरह छोड़ सकता हूँ ?
मयि निर्बद्धहृदया: साधवः समदर्शना: ।
वशे कुर्वन्ति मां भक्त्या सत्स्त्रिय: सत्पतिं यथा ॥
६६॥
मयि--मुझको; निर्बद्ध-हदया:--हृदय में हढ़ता से संयुक्त; साधव: --शुद्ध भक्तगण; सम-दर्शना:--समदर्शी; वशे--नियंत्रण में;कुर्वन्ति--कर लेते हैं; मामू--मुझको; भक्त्या--भक्ति से; सत्-स्त्रियः--सती स्त्रियाँ; सत्ू-पतिमू--अपने सदाचारी पति को; यथा--जिस तरह।
जिस तरह सती स्त्रियाँ अपने भद्र पतियों को अपनी सेवा से अपने वश में कर लेती हैं उसी प्रकारसे समदर्शी एवं हृदय से मुझमें अनुरक्त शुद्ध भक्तगण मुझको पूरी तरह अपने वश में कर लेते हैं।
मत्सेवया प्रतीतं ते सालोक्यादिचतुष्टयम् ।
नेच्छन्ति सेवया पूर्णा: कुतोउन्यत्कालविप्लुतम् ॥
६७॥
मत्ू-सेवया--मेरी प्रेमाभक्ति में पूर्णरूपेण संलग्न रहने से; प्रतीतम्--स्वतः प्राप्त; ते--ऐसे भक्त पूर्णतया तुष्ट होते हैं; सालोक्य-आदि-चतुष्टयम्--चार प्रकार के मोक्ष ( सालोक्य, सारूप्य, सामीप्य तथा साष्टि, सायुज्य का तो कहना ही कया ); न--नहीं;इच्छन्ति--इच्छा करते हैं; सेवया--केवल भक्ति से; पूर्णा:--पूर्ण; कुतः--कोई प्रश्न ही नहीं है; अन्यत्-- अन्य वस्तुएँ; काल-विप्लुतम्--कालक्रम से विनष्ट होने वाली |
मेरे जो भक्त मेरी प्रेमाभक्ति में लगे रहकर सदैव सन्तुष्ट रहते हैं वे मोक्ष के चार सिद्धान्तों(सालोक्य, सारूप्य, सामीप्य तथा सा्टि ) में भी तनिक रुचि नहीं रखते यद्यपि उनकी सेवा से ये उन्हेंस्वतः प्राप्त हो जाते हैं।
तो फिर स्वर्गलोक जाने के नश्वर सुख के विषय में क्या कहा जाए?
साधवो हृदयं मह्यं साधूनां हृदयं त्वहम् ।
मदन्यत्ते न जानन्ति नाहं तेभ्यो मनागपि ॥
६८ ॥
साधव:--शुद्ध भक्तगण; हृदयम्--हृदय में; महाम्--मेरे; साधूनाम्--शुद्ध भक्तों के भी; हृदयम्--हृदयों में; तु--निस्सन्देह; अहम्--मैं हूँ; मत्-अन्यत्--मेंरे अतिरिक्त अन्य कुछ; ते--वे; न--नहीं; जानन्ति--जानते हैं; न--नहीं; अहम्--मैं; तेभ्य:--उनकी अपेक्षा;मनाक् अपि--एक अंश भी
शुद्ध भक्त सदैव मेरे हृदय में रहता है और मैं शुद्ध भक्त के हृदय में सदैव रहता हूँ।
मेरे भक्त मेरेसिवाय और कुछ नहीं जानते और मैं उनके अतिरिक्त और किसी को नहीं जानता।
उपायं कथयिष्यामि तब विप्र श्रृणुष्व तत् ।
अयं ह्ात्माभिचारस्ते यतस्तं याहि मा चिरम् ।
साधुषु प्रहितं तेज: प्रहर्तु: कुरुतेईशिवम् ॥
६९॥
उपायम्--इस भयावह स्थिति से बचने का उपाय; कथयिष्यामि--तुम्हें बतलाऊँगा; तब--इस संकट से तुम्हारे उद्धार का; विप्र--हेब्राह्मण; श्रृणुष्व--मुझसे सुनो; तत्--जो मैं कहूँ; अयम्--तुम्हारे द्वारा की गई कार्यवाही; हि--निस्सन्देह; आत्म-अभिचार:--स्वयंसे ईर्ष्या ( तुम्हारा मन ही तुम्हारा शत्रु बन गया है ); ते--तुम्हारे लिए; यतः--जिसके कारण; तम्--उसको ( अम्बरीष महाराज को );याहि--तुरन््त जाओ; मा चिरमू--एक क्षण भी देरी न करो; साधुषु-- भक्तों को; प्रहितम्--प्रयुक्त; तेज:--शक्ति; प्रहर्तु:--कर्ता का;कुरुते--करता है; अशिवम्ू--अमंगल।
हे ब्राह्मण, अब मैं तुम्हारी रक्षा के लिए उपदेश देता हूँ।
मुझसे सुनो।
तुमने महाराज अम्बरीष काअपमान करके आत्म-द्वेष से कार्य किया है।
अतएवं तुम एक क्षण की भी देरी किये बिना तुरन्तउनके पास जाओ।
जो व्यक्ति अपनी तथाकथित शक्ति का प्रयोग भक्त पर करता है उसकी वह शक्तिप्रयोक्ता को ही हानि पहुँचाती है।
इस प्रकार कर्ता ( विषयी ) को हानि पहुँचती है विषय को नहीं।
तपो विद्या च विप्राणां नि: श्रेयसकरे उभे ।
ते एव दुर्विनीतस्य कल्पेते कर्तुरन्यथा ॥
७०॥
तपः--तपस्या; विद्या--ज्ञान; च-- भी; विप्राणाम्--ब्राह्मणों की; नि: श्रेयस--उन्नति के लिए अत्यन्त शुभ है जो उसका; करे--कारण हैं; उभे--दोनों; ते--ऐसी तपस्या तथा विद्या; एब--निस्सन्देह; दुर्विनीतस्थ--उद्द्धत व्यक्ति का; कल्पेते--हो जाते हैं; कर्तु:ः--कर्ता का; अन्यथा--विपरीत |
ब्राह्मण के लिए तपस्या तथा विद्या निश्चय ही कल्याणप्रद हैं, किन्तु जब तपस्या तथा विद्या ऐसेव्यक्ति के पास होती हैं जो विनीत नहीं है तो वे अत्यन्त घातक होती हैं।
ब्रह्मंस्तद्गच्छ भद्रं ते नाभागतनयं नृपम् ।
क्षमापय महाभागं ततः शान्तिर्भविष्यति ॥
७१॥
ब्रह्मनू--हे ब्राह्मण; तत्-- अतएव; गच्छ--जाओ; भद्गरमू--कल्याण हो; ते--तुम्हारा; नाभाग-तनयम्--महाराज नाभाग के पुत्र;नृपम्--राजा ( अम्बरीष ) को; क्षमापय--उसे जाकर शान्त करने का यत्न करो; महा-भागम्--महापुरुष, शुद्ध भक्त; ततः--तत्पश्चात्; शान्तिः--शान्ति; भविष्यति--हो जायेगी ।
अतएव हे ब्राह्मण श्रेष्ठ, तुम तुरन्त महाराज नाभाग के पुत्र राजा अम्बरीष के पास जाओ।
मैं तुम्हारे कल्याण की कामना करता हूँ।
यदि तुम महाराज अम्बरीष को प्रसन्न कर सके तो तुम्हें शान्ति मिलजायेगी।
