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अध्याय सात: राजा मान्धाता के वंशज
9.7श्रीशुक उबाचमाच्धातुः पुत्रप्रवरो योउम्बरीष: प्रकीर्तितः ।
पितामहेनप्रवृतो यौवनाश्रस्तु तत्सुतः ।
हारीतस्तस्य पुत्रो भून्मान्धातृप्रवरा इमे ॥
१॥
श्री-शुकः उबाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; मान्धातु:--मान्धाता का; पुत्र-प्रवर:--प्रमुख पुत्र; यः--जो; अम्बरीष:--अम्बरीष;प्रकीर्तित:--विख्यात; पितामहेन-- अपने बाबा युवनाश्र द्वारा; प्रवृत:--स्वीकृत; यौवनाश्र: --यौवना श्र; तु--तथा; तत्-सुत:--अम्बरीष का पुत्र; हारीत:--हारीत; तस्य--यौवनाश्व का; पुत्र:--पुत्र; अभूत्ू--हुआ; मान्धातृ--मान्धाता के वंश में; प्रवरा: -- अत्यन्तप्रमुख; इमे--ये सभी |
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : मान्धाता का सर्वप्रमुख पुत्र अम्बरीष नाम से विख्यात हुआ।
अम्बरीषको उसके बाबा युवनाश्च ने पुत्र रूप में स्वीकार किया।
अम्बरीष का पुत्र यौवनाश्व हुआ औरयौवनाश्च का पुत्र हारीत था।
मान्धाता के वंश में अम्बरीष, हारीत तथा यौवनाश्च अत्यन्त प्रमुख थे।
नर्मदा भ्रातृभिर्दत्ता पुरुकुत्साय योरगै: ।
तया रसातलं नीतो भुजगेन्द्रप्रयुक्तया ॥
२॥
नर्मदा--नर्मदा नामक; भ्रातृभि:ः--अपने भाइयों से; दत्ता--दान में दी गई; पुरुकुत्साय--पुरुकुत्स को; या--जो; उरगै: --सर्पो( सर्पगण ) द्वारा; तया--उसके द्वारा; रसातलमू्--ब्रह्माण्ड के निम्न भागों को; नीत:--ले जाया गया; भुजग-इन्द्र-प्रयुक्तया--सर्पों केराजा वासुकि द्वारा लगाया गया।
नर्मदा के सर्प-भाइयों ने उसे पुरुकुत्स को दे दिया।
वासुकि द्वारा भेजे जाने पर नर्मदा पुरुकुत्सको ब्रह्माण्ड के निम्न भाग ( रसातल ) में ले गई।
गन्धर्वानवधीत्तत्र वध्यान्वै विष्णुशक्तिधृक् ।
नागाल्लब्धवर: सर्पादभयं स्मरतामिदम् ॥
३॥
गन्धर्वानू--गन्धर्वलोक के निवासियों को; अवधीत्--मार डाला; तत्र--वहाँ ( रसातल में ); वध्यान्ू--वध करने के योग्य; वै--निस्सन्देह; विष्णु-शक्ति-धृक्-- भगवान् विष्णु द्वारा शक्ति प्रदत्त; नागातू-नागों से; लब्ध-बरः--वर प्राप्त करके ; सर्पातू--सर्पो से;अभयमू--आश्वासन; स्मरताम्--स्मरण करने वालों को; इृदम्--यह घटना।
रसातल में भगवान् विष्णु द्वारा शक्ति प्रदान किये जाने के कारण पुरुकुत्स मारे जाने के योग्यसभी गन्धर्वों का वध करने में समर्थ हो गया।
पुरुकुत्स को सर्पों से यह वर प्राप्त हुआ कि जो कोईनर्मदा द्वारा रसातल में उसके लाये जाने के इतिहास को स्मरण करेगा उसे सर्पों के आक्रमण सेसुरक्षा प्रदान की जायेगी।
असहस्यु: पौरुकुत्सो योउनरण्यस्य देहकृत् ।
हर्यश्वस्तत्सुतस्तस्मात्प्रारुणोथ त्रिबन्धन: ॥
४॥
असहस्यु:ः--त्रसहस्यु नामक; पौरुकुत्स:--पुरुकुत्स का पुत्र; यः--जो; अनरण्यस्य--अनरण्य का; देह-कृत्ू--पिता; हर्यश्च:--हर्य श्;ततू-सुत:--अनरण्य का पुत्र; तस्मात्--उस ( हर्यश्व ) से; प्रारुण:--प्रारुण; अथ--तब, प्रारुण से; त्रिबन्धन: --उसका पुत्रत्रिबन्धन।
पुरुकुत्स का पुत्र त्रसहस्यु हुआ जो अनरण्य का पिता था।
अनरण्य का पुत्र हर्यश्च हुआ जोप्रारुण का पिता बना।
प्रारुण का पुत्र त्रिबन्धन हुआ।
तस्य सत्यत्रतः पुत्रस्त्रिश्डु रिति विश्रुत: ।
प्राप्तश्चाण्डालतां शापादगुरो: कौशिकतेजसा ॥
५॥
सशरीरो गतः स्वर्गमद्यापि दिवि हश्यते ।
पातितोवाक्शिरा देवैस्तेनेव स्तम्भितो बलात् ॥
६॥
तस्य--त्रिबन्धन का; सत्यव्रतः--सत्यक्रत; पुत्र: -पुत्र; त्रिशड्लु :-त्रिशंकु; इति--इस प्रकार; विश्रुतः--विख्यात; प्राप्त:--प्राप्तकिया था; चाण्डालताम्--चण्डाल के गुण, जो शूद्र से भी अधम होता है; शापात्--शाप से; गुरो:--अपने गुरु के; कौशिक-तेजसा--कौशिक ( विश्वामित्र ) की शक्ति से; सशरीर:--इस शरीर सहित; गत:--गया; स्वर्गमू--स्वर्गलोक को; अद्य अपि--आजभी; दिवि--आकाश में; दृश्यते--देखा जा सकता है; पातित:--गिराया जाकर; अवाक्-शिरा:--सिर नीचे किये लटकता हुआ;देवैः--देवताओं की शक्ति से; तेन--विश्वामित्र द्वारा; एब--निस्सन्देह; स्तम्भित:--स्थिर; बलातू--बल से।
त्रिबन्धन का पुत्र सत्यव्रत था जो त्रिशंकु नाम से विख्यात है।
चूँकि उसने विवाह-मण्डप से एकब्राह्मणपुत्री का अपहरण कर लिया था इसलिए उसके पिता ने उसे चण्डाल बनने का शाप दे दियाजो शूद्र से भी नीचे होता है।
तत्पश्चात् विश्वामित्र के प्रभाव से वह सदेह स्वर्गलोक गया, किन्तु देवताओं के पराक्रम से वह पुनः नीचे गिर गया।
तो भी विश्वामित्र की शक्ति से वह एकदम नीचे नहींगिरा।
आज भी वह आकाश में सिर के बल लटकता देखा जा सकता है।
त्रैशड्डवो हरिश्वन्द्रो विश्वामित्रवसिष्ठयो: ।
यन्निमित्तमभूदुद्धं पक्षिणोर्बहुवार्षिकम् ॥
७॥
त्रैशड्डृब:ः--त्रिशंकु का पुत्र; हरिश्वन्द्र:--हरिश्वन्द्र; विश्वामित्र-वसिष्ठयो:--विश्वामित्र तथा वसिष्ठ के मध्य; यत्-निमित्तम्--हरिश्वन्द्र कोलेकर; अभूत्--हुआ; युद्धमू-- भीषण लड़ाई; पक्षिणो:--दोनों पक्षी के रूप में बदल दिये गये थे; बहु-वार्षिकम्-- अनेक वर्षोतक
त्रिशंकु का पुत्र हरिश्वन्द्र हुआ।
हरिश्वन्द्र को लेकर विश्वामित्र तथा वसिष्ठ में युद्ध हुआ।
वे दोनोंपक्षी के रूप में बदले जाकर वर्षों तक लड़ते रहे।
सोनपत्यो विषण्णात्मा नारदस्योपदेशतः ।
वरुणं शरणं यातः पुत्रो मे जायतां प्रभो ॥
८॥
सः--वह; अनपत्य: --सन्तानहीन; विषणण-आत्मा--अत्यन्त खिन्न; नारदस्य--नारद के; उपदेशत:--उपदेश से; वरुणमू--वरुणकी; शरणम् यात:--शरण में गया; पुत्र:--पुत्र; मे--मेरे; जायताम्--उत्पन्न हो; प्रभो--हे प्रभु।
हरिश्वन्द्र के कोई पुत्र न था; अतएव वह अत्यन्त खिन्न रहता था।
अतएवं एक बार नारद मुनि केउपदेश से उसने वरुण की शरण ग्रहण की और उनसे कहा ' हे प्रभु, मेरे कोई पुत्र नहीं है।
क्या आपमुझे एक पुत्र दे सकेंगे ?
'! यदि वीरो महाराज तेनैव त्वां यजे इति ।
तथेति वरुणेनास्य पुत्रो जातस्तु रोहित: ॥
९॥
यदि--यदि; वीर:ः--पुत्र होगा; महाराज--हे महाराज परीक्षित; तेन एव--उस पुत्र से भी; त्वामू--तुमको; यजे--मैं यज्ञ करूँगा;इति--इस प्रकार; तथा-- जैसी तुम्हारी इच्छा; इति--इस प्रकार स्वीकार किया गया; वरुणेन--वरुण द्वारा; अस्य--महाराज हरिश्न्द्रका; पुत्र:--पुत्र; जात:--उत्पन्न हुआ; तु--निस्सन्देह; रोहित:--रोहित नामक |
हे राजा परीक्षित, हरिश्वन्धर ने वरुण से याचना की, 'हे प्रभु, यदि मेरे पुत्र उत्पन्न होगा तो मैंआपकी तुष्टि के लिए उसी से एक यज्ञ करूँगा।
' जब हरिश्वन्द्र ने यह कहा तो वरुण ने उत्तर दिया'एवमस्तु, ' वरुण के आशीर्वाद से हरिश्वन्द्र के रोहित नाम का पुत्र हुआ।
जातः सुतो हानेनाड़ मां यजस्वेति सोब्रवीतू ।
यदा पशुर्निर्देशः स्थादथ मेध्यो भवेदिति ॥
१०॥
जातः--उत्पन्न हो गया; सुतः--पुत्र; हि--निस्सन्देह; अनेन--इस पुत्र से; अड़--हे हरिश्वन्द्र; मामू--मुझको; यजस्व--यज्ञ करना;इति--इस प्रकार; सः--वह ( वरुण ); अब्नवीत्--कहा; यदा--जब; पशु: --पशु; निर्दश: --दस दिन बीतें; स्थात्--हो जाये;अथ--तब; मेध्य:--यज्ञ में भेंट करने योग्य; भवेत्--हो जाये; इति--इस प्रकार ( हरिश्वन्द्र ने कहा )
अतः जब पुत्र उत्पन्न हो गया तो वरुण ने हरिश्वन्द्र के पास आकर कहा 'अब तुम्हारे पुत्र होगया है।
तुम इस पुत्र से मेरा यज्ञ कर सकते हो।
' इसके उत्तर में हरिश्वन्द्र ने कहा 'पशु अपने जन्मके दस दिन बाद ही यज्ञ ( बलि दिये जाने ) के योग्य होता है।
'निर्दशे च स आगत्य यजस्वेत्याह सोउब्रवीत् ।
दन्ताः पशोर्यज्ञायेरन्नथ मेध्यो भवेदिति ॥
११॥
निर्दशे--दस दिन बाद; च-- भी; सः--वह, वरुण; आगत्य--यहाँ आकर; यजस्व--अब यज्ञ करो; इति--इस प्रकार; आह--कहा;सः--उसने, हरिश्वन्द्र ने; अब्रवीत्--उत्तर दिया; दन््ता:--दाँत; पशो:--पशु के; यत्ू--जब; जायेरनू-- प्रकट हो जाएँ; अथ--तब;मेध्य:--बलि देने के योग्य; भवेत्--हो जायेगा; इति--इस प्रकार।
दस दिन बाद वरुण पुनः आया और हरिश्वन्द्र से कहा ' अब तुम यज्ञ कर सकते हो।
' हरिश्वन्द्रने उत्तर दिया, 'जब पशु के दाँत आ जाते हैं तो वह बलि देने के योग्य शुद्ध बनता है।
'दन्ता जाता यजस्वेति स प्रत्याहाथ सोब्रवीत् ।
यदा पतनन्त्यस्य दन््ता अथ मेध्यो भवेदिति ॥
१२॥
दनन््ता:ः--दाँत; जाता:--उग आये; यजस्व--अब बलि दो; इति--इस प्रकार; सः--वह वरुण; प्रत्याह--बोला; अथ--तत्पश्चात्;सः--उसने, हरिश्वन्द्र ने; अब्रवीत्--उत्तर दिया; यदा--जब; पतन्ति--गिरते हैं; अस्य--उसके; दन्ता:--दाँत; अथ--तब; मेध्य:--बलि के योग्य; भवेत्--हो जायेगा; इति--इस प्रकार |
जब दाँत उग आये तो वरुण ने आकर हरिश्वन्द्र से कहा, 'अब पशु के दाँत उग आये हैं।
तुमयज्ञ कर सकते हो।
' हरिश्वन्द्र ने उत्तर दिया, 'जब इसके सारे दाँत गिर जायेंगे तो यह बलि के योग्यहो जायेगा।
'पशोर्निपतिता दन्ता यजस्वेत्याह सोउब्रवीत् ।
यदा पशोः पुनर्दन्ता जायन्तेथ पशु: शुच्चि: ॥
१३॥
'पशो:--पशु के; निपतिता:--गिर चुके हैं; दन््ता:--दाँत; यजस्व--अब यज्ञ करो; इति--इस प्रकार; आह--कहा; सः--उसने,हरिश्वन्द्र ने; अब्नवीत्--उत्तर दिया; यदा--जब; पशो:--पशु के; पुन:ः--फिर; दन्ता:--दाँत; जायन्ते--उगते हैं; अथ--तब; पशु:--पशु; शुचिः:--बलि देने के लिए पवित्र होता है।
जब दाँत गिर चुके तो वरुण फिर आया और हरिश्वन्द्र से बोला 'अब पशु के दाँत गिर चुके हैंऔर तुम यज्ञ कर सकते हो ।
' किन्तु हरिश्वन्द्र ने उत्तर दिया, 'जब पशु के दाँत फिर से उग आयेंगे तोवह बलि देने के लिए अत्यन्त शुद्ध होगा।
'पुनर्जाता यजस्वेति स प्रत्याहाथ सोउब्रवीतू ।
सान्नाहिको यदा राजन्राजन्योथ पशु: शुचि: ॥
१४॥
पुनः--फिर से; जाता:--उग आये हैं; यजस्व--बलि चढ़ाओ; इति--इस प्रकार; सः--उसने, वरुण ने; प्रत्याह--उत्तर दिया; अथ--तत्पश्चात्; सः--वह, हरिश्वन्द्र; अब्रवीत्--बोला; सान्नाहिक:--ढाल से अपने को सजाने में समर्थ; यदा--जब; राजन्--हे राजावरुण; राजन्य:--क्षत्रिय; अथ--तब; पशु:--बलि पशु; शुचि:--पवित्र हो जाता है।
जब दाँत फिर से उग आये तो वरुण फिर आया और हरिश्वन्द्र से बोला, 'अब तुम यज्ञ करसकते हो।
' किन्तु तब हरिश्वन्द्र ने कहा, 'हे राजा, जब बलि का पशु क्षत्रिय बन जाता है और वहअपने शत्रु से अपनी रक्षा करने में समर्थ हो जाता है, तभी वह शुद्ध बनेगा।
'इति पुत्रानुरागेण स्नेहयन्त्रितचेतसा ।
काल वज्ञयता तं तमुक्तो देवस्तमैक्षत ॥
१५॥
इति--इस प्रकार; पुत्र-अनुरागेण -- अपने पुत्र-स्नेह के कारण; स्नेह-यन्त्रित-चेतसा--मन ऐसे स्नेह के वशीभूत होकर; कालम्--समय को; वज्ञयता--ठगते हुए; तम्--उसको; तम्ू--वह; उक्त:--कहा; देव:--वरुण देव; तम्--उसको, हरिश्वन्द्र को; ऐक्षत--अपना वचन पालन किये जाने की प्रतीक्षा करता रहा।
हरिश्वन्द्र अपने पुत्र के प्रति अत्यधिक अनुरक्त था।
इस स्नेह के कारण उसने वरुण देव सेप्रतीक्षा करने के लिए कहा।
इस तरह वरुण समय आने की प्रतीक्षा करता रहा।
रोहितस्तदभिज्ञाय पितु: कर्म चिकीर्षितम् ।
प्राणप्रेप्सुर्धनुष्पाणिररण्यं प्रत्यपद्यत ॥
१६॥
रोहित:--हरिश्वन्द्र का पुत्र; तत्ू--यह तथ्य; अभिज्ञाय--ठीक से समझकर; पितु:--पिता का; कर्म--काम; चिकीर्षितम्--जिसे वहव्यावहारिक रूप से कर रहा था; प्राण-प्रेप्सु; --जीवन बचाने की इच्छा से; धनु:-पाणि:--अपना धनुष बाण लेते हुए; अरण्यम्--जंगल; प्रत्यपद्यत--चला गया।
रोहित समझ गया कि उसके पिता उसे बलि का पशु बनाना चाहते हैं।
अतएव मृत्यु से बचने केलिए उसने धनुष-बाण से अपने आपको सज्जित किया और वह जंगल में चला गया।
पितरं वरुणग्रस्तं श्रुत्ता जातमहोदरम् ।
रोहितो ग्राममेयाय तमिन्द्र: प्रत्यषेधत ॥
१७॥
पितरम्ू--अपने पिता के विषय में; वरुण-ग्रस्तम्--वरुण द्वारा जलोदर रोग से आक्रमण किया गया; श्रुत्वा--सुनकर; जात--बढ़गया था; महा-उदरम्--फूला पेट; रोहित:--उसके पुत्र रोहित ने; ग्रामम् एयाय--राजधानी आना चाहता था; तम्ू--उसको; इन्द्र: --राजा इन्द्र ने; प्रत्यषेधत--वहाँ जाने से मना कर दिया।
जब रोहित ने सुना कि वरुण के कारण उसके पिता को जलोदर रोग हो गया है और उसका पेट'फूल गया है तो वह राजधानी लौट आना चाहता था लेकिन राजा इन्द्र ने ऐसा करने से उसे मना करदिया।
भूमेः पर्यटन पुण्य तीर्थक्षेत्रनिषिवणै: ।
रोहितायादिशच्छक्र: सोप्यरण्येउवसत्समाम् ॥
१८॥
भूमे:--संसार भर का; पर्यटनम्-- भ्रमण; पुण्यम्--पतवित्र स्थानों को; तीर्थ-क्षेत्र--तीर्थ स्थल; निषेवणै:--ऐसे स्थानों में सेवा करनेया आने जाने से; रोहिताय--रोहित को; आदिशत्--आज्ञा दी; शक्र:--इन्द्ध ने; सः--वह, रोहित; अपि-- भी; अरण्ये--जंगल में;अवसत्--रहता रहा; समाम्--एक वर्ष तक ।
राजा इन्द्र ने रोहित को सलाह दी कि वह विभिन्न तीर्थस्थानों तथा पवित्र स्थलों की यात्रा करेक्योंकि ऐसे कार्य पवित्र होते हैं।
इस आदेश का पालन करते हुए रोहित एक वर्ष के लिए जंगल मेंचला गया।
एवं द्वितीये तृतीये चतुर्थ पञ्ञमे तथा ।
अभ्येत्याभ्येत्य स्थविरो विप्रो भूत्वाह वृत्रहा ॥
१९॥
एवम्--इस प्रकार; द्वितीये--दूसरे वर्ष; तृतीये--तीसरे वर्ष; चतुर्थे--चौथे वर्ष; पदञ्ञमे--पाँचवें वर्ष; तथा-- और; अभ्येत्य--उसकेसामने आकर; अभ्येत्य--फिर से उसके सामने आकर; स्थविर: --अत्यन्त वृद्ध पुरुष; विप्र: --ब्राह्मण; भूत्वा--बनकर; आह--कहा;वृत्र-हा--इन्द्र ने।
इस तरह द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ तथा पंचम वर्षों के अन्त में जब-जब रोहित अपनी राजधानीलौटना चाहता तो इन्द्र एक वृद्ध ब्राह्मण के वेश में उसके पास पहुँचता और वापस जाने के लिए उसेमना करता।
वह गत वर्ष जैसे ही शब्दों को फिर से दुहराता।
षष्ठे संवत्सरं तत्र चरित्वा रोहित: पुरीम् ।
उपक्रजन्नजीगर्तादक्रीणान्मध्यमं सुतम् ।
शुनःशेफं पशु पित्रे प्रदाय समवन्दत ॥
२०॥
षष्ठम्--छठवें; संवत्सरम्--वर्ष; तत्र--उस जंगल में; चरित्वा--घूमकर; रोहित:--हरिश्वन्द्र का पुत्र; पुरीमू-- अपनी राजधानी में;उपब्रजन्ू--वहाँ जाकर; अजीगर्तात्--अजीगर्त से; अक्रीणात्--मोल लिया; मध्यमम्--दूसरा; सुतम्--पुत्र; शुनःशेफम्--जिसकानाम शुनःशेफ था; पशुम्--बलि-पशु के रूप में; पित्रे--अपने पिता को; प्रदाय--देते हुए; समवन्दत--सादर नमस्कार किया।
तत्पश्चात् छठे वर्ष जंगल में घूमने के बाद रोहित अपने पिता की राजधानी में लौट आया।
उसनेअजीगर्त से उसके दूसरे पुत्र शुन:शेफ को मोल लिया।
फिर उसे लाकर अपने पिता हरिश्वन्द्र को भेंटकिया जिससे वह बलि-पशु के रूप में प्रयुक्त किया जा सके।
उसने हरिश्वन्द्र को सादर नमस्कार किया।
ततः पुरुषमेधेन हरिश्चन्द्रोी महायशा: ।
मुक्तोदरोयजद्देवान्वरुणादीन्महत्कथ: ॥
२१॥
ततः--तत्पश्चात्; पुरुष-मेधेन--यज्ञ में मनुष्य की बलि देने से; हरिश्वन्द्रः--राजा हरिश्वन्द्र; महा-यशा:--अत्यन्त विख्यात; मुक्त-उदरः--जलोदर रोग से मुक्त हो गया; अयजत्--यज्ञ किया; देवानू--देवताओं को; वरुण-आदीन्--वरुण तथा अन्यों को; महत्-कथः--अन्य महापुरुषों के साथ इतिहास प्रसिद्ध |
तत्पश्चात् इतिहास के महापुरुष एवं सुप्रसिद्ध राजा हरिश्वन्द्र ने एक मनुष्य की बलि देकर महान्यज्ञ सम्पन्न किया और सारे देवताओं को प्रसन्न किया।
इस प्रकार वरुण द्वारा उत्पन्न किया गयाउसका जलोदर रोग जाता रहा।
विश्वामित्रो भवत्तस्मिन्होता चाध्वर्युरात्मवान् ।
जमदग्निरभूद्हा वसिष्ठो यास्य: सामग: ॥
२२॥
विश्वामित्र:--ऋषि तथा योगी विश्वामित्र; अभवत्--बना; तस्मिनू--उस महान् यज्ञ में; होता--आहुति डालने वाला मुख्य पुरोहित;च--भी; अध्वर्यु:--यजुर्वेद से स्तोत्र गाने वाला तथा कर्मकाण्ड कराने वाला व्यक्ति; आत्मवान्--पूर्णतया स्वरूपसिद्ध; जमदग्नि: --जमदग्नि; अभूत्--बना; ब्रह्मा--मुख्य ब्राह्मण के रूप में; वसिष्ठ:--एक मुनि; अयास्य:--अयास्य मुनि; साम-ग:--सामवेद मंत्रों कोगाने में लगा हुआ |
उस पुरुषमेध यज्ञ में विश्वामित्र होता थे, आत्मवान जमदग्नि अध्वर्यु थे, वसिष्ठ ब्रह्म थे औरअयास्य मुनि साम-गायक थे।
तस्मै तुष्टो ददाविन्द्र: शातकौम्भमयं रथम् ।
शुनःशेफस्य माहात्म्यमुपरिष्टात्प्रचक्ष्यते ॥
२३॥
तस्मै--राजा हरिश्वन्द्र को; तुष्ट:-- अत्यन्त प्रसन्न होकर; ददौ--प्रदान किया; इन्द्र: --इन्द्र ने; शातकौम्भ-मयम्--स्वर्णनिर्मित;रथम्--रथ; शुनःशेफस्थ--शुन:शेफ का; माहात्म्यम्-ख्याति; उपरिष्टातू-विश्वामित्र के पुत्रों का वर्णन करते समय; प्रचक्ष्यते--वर्णन किया जायेगा।
हरिश्वन्द्र से अत्यन्त प्रसन्न होकर राजा इन्द्र ने उसे सोने का रथ दान में दिया।
शुनःशेफ कीमहिमाओं का वर्णन विश्वामित्र के पुत्र के वर्णन के साथ-साथ प्रस्तुत किया जायेगा।
सत्य सारं धृतिं दृष्ठा सभार्यस्य च भूपते: ।
विश्वामित्रो भृशं प्रीतो ददावविहतां गतिम्ू ॥
२४॥
सत्यमू--सत्य; सारम्ू--हृढ़ता; धृतिमू--सहनशीलता; हृष्ठा--देखकर; स-भार्यस्य--अपनी पत्नी सहित; च--तथा; भूपते:--महाराज हरिश्वन्द्र का; विश्वामित्र:--मुनि विश्वामित्र; भूशम्--अत्यधिक; प्रीतः--प्रसन्न होकर; ददौ--उसे दिया; अविहताम् गतिम्--अक्षय ज्ञान)
विश्वामित्र ने देखा कि महाराज हरिश्वन्द्र अपनी पत्नी सहित सत्यप्रिय, सहिष्णु तथा हढ़ था।
इसतरह उन्होंने मानव उद्देश्य की पूर्ति के लिए उन्हें अक्षय ज्ञान प्रदान किया।
मनः पृथिव्यां तामद्धिस्तेजसापोनिलेन तत् ।
खे वायुं धारयंस्तच्च भूतादौ तं महात्मनि ।
तस्मिज्ज्ञानकलां ध्यात्वा तयाज्ञानं विनिर्दहन् ॥
२५॥
हित्वा तां स्वेन भावेन निर्वाणसुखसंविदा ।
अनिर्देश्याप्रतक््येण तस्थौ विध्वस्तबन्धन: ॥
२६॥
मनः--मन ( जो खाने, सोने, मैथुन करने तथा रक्षा करने की इच्छाओं से पूर्ण रहता है ); पृथिव्याम्--पृथ्वी में; तामू--उस; अद्धि:--जल से; तेजसा--तथा अग्नि से; अप:--जल; अनिलेन--अग्नि से; तत्ू--उस; खे--आकाश में; वायुमू--हवा; धारयन्--मिलाकर;तत््--वह; च-- भी; भूत-आदौ--मिथ्या अहंकार में, जो संसार का उद्गम है; तम्--उस ( मिथ्या अहंकार ); महा-आत्मनि--महत्तत्त्व में; तस्मिनू--समग्र भौतिक शक्ति ( महत्-तत्त्व ) में; ज्ञान-कलाम्--आध्यात्मिक ज्ञान तथा इसकी विभिन्न शाखाएँ; ध्यात्वा--ध्यान द्वारा; तया--इस विधि से; अज्ञानम्--अज्ञान को; विनिर्दहन्ू--विशेष रूप से दमित; हित्वा--त्यागकर; ताम्-- भौतिक इच्छाको; स्वेन--आत्म-साक्षात्कार के द्वारा; भावेन--भक्ति में; निर्वाण-सुख-संविदा--संसार का अन्त करके दिव्य आनच्द द्वारा;अनिर्देश्य--अवर्णनीय; अप्रतर्क्येण --- अचिन्त्य; तस्थौ--रहता रहा; विध्वस्त--पूर्णतया मुक्त; बन्धन:-- भौतिक बन्धन से
इस प्रकार महाराज हरिश्वन्द्र ने पहले भौतिक भोग से पूर्ण अपने मन को पृथ्वी के साथ मिलाकरशुद्ध किया।
तब उसने पृथ्वी को जल के साथ, जल को अग्नि के साथ, अग्नि को वायु के साथतथा वायु को आकाश के साथ मिला दिया।
तत्पश्चात् उसने आकाश को महतू-तत्त्व से और महत्-तत्त्व को आध्यात्मिक ज्ञान से मिला दिया।
यह आध्यात्मिक ज्ञान अपने आपको भगवान् के अंशरूप में अनुभव करना है।
जब स्वरूपसिद्ध जीव भगवान् की सेवा में लगता है तो वह नित्य रूप से अवर्णनीय तथा अच्चन्त्य होता है।
इस प्रकार आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त हो जाने पर वह भव-बन्धन सेपूर्णतः मुक्त हो जाता है।
