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अध्याय आठ: सगर के पुत्र भगवान कपिलदेव से मिले
9.8श्रीशुक उबाचहरितो रोहितसुतश्चम्पस्तस्माद्विनिर्मिता ।
अम्पापुरी सुदेवोइतो विजयो यस्य चात्मज: ॥
१॥
श्री-शुक: उवाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; हरितः--हरित नामक; रोहित-सुतः--रोहित का पुत्र; चम्प:--चम्प नामक;तस्मात्ू--हरित से; विनिर्मिता--बनवाया गया; चम्पा-पुरी--चम्पापुरी नामक नगर; सुदेव: --सुदेव; अत:--तत्पश्चात् ( चम्प से );विजय: --विजय नामक; यस्य--जिसका ( सुदेव का ); च-- भी; आत्म-ज: --पुत्र |
शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : रोहित का पुत्र हरित हुआ और हरित का पुत्र चम्प हुआ जिसनेचम्पापुरी नामक नगर का निर्माण कराया।
चम्प का पुत्र सुदेव हुआ और सुदेव का पुत्र विजय था।
भरुक स्तत्सुतस्तस्माद्गकस्तस्यापि बाहुकः ।
सोरिभिईतभू राजा सभार्यो वनमाविशत् ॥
२॥
भरूकः--भरूक नामक; ततू-सुतः--विजय का पुत्र; तस्मात्--उससे ( बहक ); वृक:ः--वृक; तस्य--उसका; अपि-- भी;बाहुक:--बाहुक; सः--वह; अरिभि:--अपने शत्रुओं द्वारा; हत-भूः--जिसकी धरती छीन ली गई है; राजा--राजा ( बाहुक ); स-भार्य:--पत्नी सहित; वनम्--जंगल में; आविशतू--प्रविष्ट हुआ
विजय का पुत्र भरुक, भरूक का पुत्र वृक और उसका पुत्र बाहुक हुआ।
राजा बाहुक केशत्रुओं ने उसकी सारी सम्पत्ति छीन ली जिससे उसने वानप्रस्थ आश्रम ग्रहण कर लिया और अपनीपत्नी सहित वन में चला गया।
वृद्ध तं पञ्ञतां प्राप्तं महिष्यनुमरिष्यती ।
और्वेण जानतात्मानं प्रजावन्तं निवारिता ॥
३॥
वृद्धमू--वृद्ध को; तम्ू--उस; पञ्ञताम्-मृत्यु; प्राप्तम्--प्राप्त हुए; महिषी--रानी; अनुमरिष्यती --सती होना चाहती थी; और्वेण--और्व मुनि द्वारा; जानता--समझते हुए; आत्मानम्--रानी का शरीर; प्रजा-वन्तम्--गर्भ में शिशु है; निवारिता--मना किया गया।
जब बाहुक वृद्ध होकर मर गया तो उसकी एक पत्नी उसके साथ सती होना चाहती थी।
किन्तु उस समय और्व मुनि ने यह जानते हुए कि वह गर्भवती है उसे सती होने से मना किया।
आज्ञायास्थै सपत्नीभिर्गरो दत्तोडन्धसा सह ।
सह तेनैव सझ्जञातः सगराख्यो महायशा: ।
सगरकश्नक्रवर्त्यासीत्सागरो यत्सुतेः कृत: ॥
४॥
आज्ञाय--( यह ) जानते हुए; अस्यै--गर्भवती रानी को; सपत्नीभि:--बाहुक की अन्य पत्रियों के द्वारा; गरः--विष; दत्त:--दियागया; अन्धसा सह--उसके भोजन के साथ; सह तेन--उस विष के साथ; एव-- भी; सज्ञात: --उत्पन्नहुआ; सगर-आख्य: --सगर नामसे विख्यात; महा-यशा: --अत्यन्त ख्याति वाला; सगर:--राजा सगर; चक्रवर्ती --सम्राट; आसीत्--हुआ; सागर: --गंगासागर नामकस्थान; यत्-सुतैः --जिसके पुत्रों द्वारा; कृत:--खोदा गया था।
यह जानते हुए कि वह गर्भवती थी, उसकी सौतों ने उसको भोजन के साथ विष देने की मंत्रणाकी लेकिन यह फलीभूत नहीं हुईं।
किन्तु इस विष सहित एक पुत्र उत्पन्न हुआ जो सगर ( विषसहित ) कहलाया।
बाद में सगर सप्राट बना।
गंगासागर नामक स्थान उसके पुत्रों द्वारा खोदा गयाथा।
यस्तालजड्ञन्यवनाज्छकान्हैहयबर्बरान् ।
नावधीदगुरुवाक्येन चक्रे विकृतवेषिण: ॥
५॥
मुण्डाज्छम श्रुधरान्कांश्रिन्मुक्तकेशार्धमुण्डितान् ।
अनन्तर्वासस: कांश्विदबहिर्वाससोपरान् ॥
६॥
यः--जो, महाराज सगर; तालजझन्--तालजंघ नामक असभ्य जाति; यवनान्--वैदिक साहित्य को न मानने वाले; शकान्ू--अन्यनास्तिक जाति; हैहय--असभ्य; बर्बरान्--तथा बर्बरों को; न--नहीं; अवधीतू--मारा; गुरु-वाक्येन-- अपने गुरु के आदेश से;चक्रे--उन्हें बनाया; विकृत-वेषिण: --बेढंगे वस्त्र पहने; मुण्डान्--सिर घुटवाये; श्मश्रु-धरान्ू--मूँछों वाले; कांश्वित्--उनमें से कुछ;मुक्त-केश--बिखरे बाल; अर्ध-मुण्डितान्ू--आधा सिर घुटवाये; अनन्त:-वासस:--बिना भीतरी वस्त्र के; कांश्वित्ू--उनमें से कुछ;अबहिः-वासस:--बाहरी वस्त्रों के बिना; अपरान्-- अन्यों को |
सगर महाराज ने अपने गुरु और्व के आदेशानुसार तालजंघ, यवन, शक, हैहय तथा बर्बरजातियों के असभ्य लोगों का वध नहीं किया अपितु उनमें से कुछ को भद्दे वस्त्र पहनने को बाध्य करदिया, कुछ के सिर घुटवा दिये लेकिन मूँछें रखने दीं, कुछ के बालों को खुलवा दिया, कुछ के सिरआधे घुटवा दिए, कुछ को बिना भीतरी वस्त्र के कर दिया और कुछ को निर्वस्त्र करा दिया।
इसप्रकार ये जातियाँ भिन्न-भिन्न वस्त्र धारण करने के लिए बाध्य की गईं, किन्तु राजा सगर ने इन्हें मारानहीं।
सो श्रमेधेरयजत सर्ववेदसुरात्मकम् ।
और्वोपदिष्टयोगेन हरिमात्मानमी श्वरम् ।
तस्योत्सूष्टे पशुं यज्ञे जहाराश्चं पुरन्दरः ॥
७॥
सः--उसने; अश्वमेथै:--अश्वमेध यज्ञ करके; अयजत--पूजा की; सर्व-वेद--सारे वैदिक ज्ञान का; सुर--तथा सारे विद्वान् साधुओंका; आत्मकम्--परमात्मा; और्व-उपदिष्ट-योगेन--और्व की योग विधि द्वारा; हरिम्ू-- भगवान् को; आत्मानम्--परमात्मा को;ईश्वरम्--ई श्वर को; तस्य--उसका ( सगर का ); उत्सृष्टम्--बलि के निमित्त; पशुम्--बलि पशु को; यज्ञे--यज्ञ में; जहार--चुरालिया; अश्वम्--धघोड़े को; पुरन्दरः--स्वर्ग के राजा इन्द्रने।
और्व मुनि के आदेशानुसार सगर महाराज ने अश्वमेध यज्ञ सम्पन्न किया और इस तरह भगवान्को प्रसन्न किया जो परम नियन्ता, समस्त दिद्वानों के परमात्मा तथा सभी वेदों के ज्ञाता हैं।
किन्तुस्वर्ग के राजा इन्द्र ने यज्ञ में बलि दिये जाने वाले घोड़े को चुरा लिया।
सुमत्यास्तनया हृ्ता: पितुरादेशकारिण: ।
हयमन्वेषमाणास्ते समन्ताज््यखनन्महीम् ॥
८॥
सुमत्या: तनया:--रानी सुमति से उत्पन्न पुत्र; हृप्ता:--अपने पराक्रम तथा प्रभाव से गर्वित; पितु:--अपने पिता ( सगर ) का; आदेश-'कारिण:--आदेश का पालन करते हुए; हयम्--( इन्द्र द्वारा चुराये ) घोड़े को; अन्वेषमाणा:--ढूँढते हुए; ते--वे सब; समन्तात्--सर्वत्र; न््यखनन्--खोद डाला; महीम्--पृथ्वी को |
( राजा सगर के दो पत्लियाँ थीं--सुमति तथा केशिनी )।
सुमति के पुत्रों ने, जिन्हें अपने पराक्रमतथा प्रभाव पर गर्व था, अपने पिता के आदेशानुसार खोये हुए घोड़े को सर्वत्र ढूँढा।
ऐसा करते हुएउन्होंने पृथ्वी को बहुत दूर तक खोद डाला।
प्रागुदीच्यां दिशि हयं दहशु: कपिलान्तिके ।
एष वाजिहरश्लौर आस्ते मीलितलोचन: ॥
९॥
हन्यतां हन्यतां पाप इति षष्टिसहस्त्रिण: ।
उदायुधा अभिययुरुन्मिमेष तदा मुनि: ॥
१०॥
प्राकू-उदीच्याम्--उत्तरपूर्व; दिशि--दिशा में; हयम्--घोड़े को; ददशुः--देखा; कपिल-अन्तिके--कपिल के आश्रम के निकट;एप: --यह रहा; वाजि-हरः --घोड़ा चुराने वाला; चौर:--चोर; आस्ते--स्थित; मीलित-लोचन:--आँखें बन्द किये; हन्यताम्हन्यताम्--मारो मारो; पाप:--पापी पुरुष; इति--इस प्रकार; षष्टि-सहस्त्रिण: --सगर के साठ हजार पुत्र; उदायुधा: -- अपने-अपनेहथियार लिए; अभिययु:--पास आये; उन्मिमेष-- अपनी आँखें खोलीं; तदा--उस समय; मुनिः--कपिल मुनि ने
तत्पश्चात् जब उन्होंने उत्तरपूर्व दिशा में कपिल मुनि के आश्रम के निकट घोड़े को देखा तो वेबोल उठे 'यह रहा घोड़ाचोर! यह आँखें बन्द किये बैठा है।
यह निश्चय ही बड़ा पापी है।
इसे मारो,मारो।
इस प्रकार चिल्लाते हुए सगर के साठ हजार पुत्रों ने एकसाथ अपने हथियार उठा लिये।
जबवे मुनि के निकट पहुँचे तो मुनि ने अपनी आँखें खोलीं।
स्वशरीराग्निना तावन्महेन्द्रहतचेतस: ।
महद्व्यतिक्रमहता भस्मसादभवन्क्षणात् ॥
११॥
स्व-शरीर-अग्निना--अपने शरीरों से निकली अग्नि से; तावत्ू--तुरन्त; महेन्द्र--इन्द्र की चाल से; हत-चेतस:--जिनकी बुद्धि हर लीगई है; महत्--महापुरुष; व्यतिक्रम-हताः--अपमान के कारण पराजित; भस्मसात्--जलकर राख; अभवनू--हो गये; क्षणात्--क्षणभर में |
स्वर्ग के राजा इन्द्र के प्रभाव से सगर के पुत्रों की बुद्धि मारी गई जिससे उन्होंने एक महापुरुषका अपमान कर दिया।
फलस्वरूप उनके शरीरों से अग्नि निकलने लगी और वे तुरन्त जलकर राखहो गये।
न साधुवादो मुनिकोपभर्जितानृपेन्द्रपुत्रा इति सत्त्वधामनि ।
कथं तमो रोषमयं विभाव्यतेजगत्पवित्रात्मनि खे रजो भुवः ॥
१२॥
न--नहीं; साधु-वाद:--विद्वान पुरुषों का मत; मुनि-कोप--कपिल मुनि के क्रोध से; भर्जिता:--जल कर राख हो गए; नृपेन्द्र-पुत्राः--सगर महाराज के सररे पुत्र; इति--इस प्रकार; सत्त्त-धामनि--कपिल मुनि में, जिनमें सतोगुण प्रधान था; कथम्--कैसे;तमः--तमोगुण; रोष-मयम्-क्रोध के रूप में; विभाव्यते--प्रकट हो सकता है; जगत्ू-पवित्र-आत्मनि--उसमें, जिसका शरीर सारेसंसार को पवित्र कर सकता है; खे--आकाश में; रज:--धूल; भुवः--पार्थिव |
कभी-कभी यह तर्क दिया जाता है कि राजा सगर के सारे पुत्र कपिल मुनि की आँखों सेनिकली अग्नि से भस्मसात् हुए थे।
लेकिन विद्वान पुरुष इस मत की पुष्टि नहीं करते क्योंकि कपिल मुनि का शरीर नितान्त सात्विक था अतएव उससे क्रोध के रूप में तमोगुण प्रकट नहीं हो सकताजिस तरह निर्मल आकाश को पृथ्वी की धूल दूषित नहीं कर सकती।
यस्येरिता साड्ख्यमयी हढेह नौ-या मुमुक्षुस्तरते दुरत्ययम् ।
भवार्णवं मृत्युपर्थ विपश्चितःपरात्मभूतस्य कथं पृथड्मति: ॥
१३॥
यस्य--जिसके द्वारा; ईरिता--बतलाया गया; साड्ख्य-मयी-- भौतिक संसार का विश्लेषण करते हुए सांख्य दर्शन के रूप में; हढा--अत्यन्त प्रबल ( इस जगत से लोगों का उद्धार करने के लिए ); इह--इस जगत में; नौ:--नाव; यया--जिससे; मुमुक्षु;--मोक्ष कीकामना करने वाला व्यक्ति; तरते--पार कर सकता है; दुरत्ययमू--दुर्लध्य; भव-अर्गणवम्--अज्ञान के समुद्र को; मृत्यु-पथम्--बारम्बार जन्म-मृत्यु का जीवन; विपश्चित:--विद्वान पुरुष का; परात्म-भूतस्य--दिव्य पद को प्राप्त; कथम्--कैसे; पृथक्-मतिः--( मित्र तथा शत्रु का ) भेदभाव
कपिल मुनि ने इस जगत में सांख्य दर्शन का प्रवर्तन किया जो अज्ञानरूपी सागर को पार करनेके लिए हढ़ नाव है।
निस्सन्देह, भवसागर को पार करने के इच्छुक व्यक्ति को इस दर्शन का आश्रयग्रहण करना चाहिए।
ऐसे महापुरुष में, जो अध्यात्म के उच्चपद को प्राप्त हो, एक मित्र तथा शत्रु मेंकोई अन्तर कैसे हो सकता है?
योसमझ्स हइत्युक्त: स केशिन्या नृपात्मज: ।
तस्य पुत्रो$शुमान्नाम पितामहहिते रत: ॥
१४॥
यः--सगर का एक पुत्र, जो; असमझस: --असमंजस नामक; इति--इस तरह; उक्त:--ज्ञात; सः--वह; केशिन्या:--राजा सगर कीअन्य पत्नी केशिनी के गर्भ से; नृप-आत्मज:--राजा का पुत्र; तस्थ--उसका; पुत्र: --पुत्र; अंशुमान् नाम--अंशुमान के रूप में ज्ञातथा; पितामह-हिते--अपने बाबा सगर महाराज के हित में; रतः--सदा लगा हुआ।
महाराज सगर के पुत्रों में एक का नाम असमंजस था जो राजा की दूसरी पत्नी केशिनी के गर्भ सेउत्पन्न हुआ था।
असंमजस का पुत्र अंशुमान था और वह अपने बाबा सगर महाराज के कल्याण-कार्य में सदैव लगा रहता था।
असमझञझ्जस आत्मानं दर्शयन्नसमझजसम् ॥
जातिस्मर: पुरा सड्राद्योगी योगाद्विचालित: ॥
१५॥
आचरनार््ितं लोके ज्ञातीनां कर्म विप्रियम् ।
सरय्वां क्रीडतो बालान्प्रास्यदुद्देजयद्ञनम् ॥
१६॥
असमझ्जसः--सगर महाराज का पुत्र; आत्मानम्--स्वयं; दर्शयन्--प्रकट करते हुए; असमझसम्--अत्यन्त विश्लुब्धकारी; जाति-स्मर:--अपने विगत जीवन को स्मरण रखने में समर्थ; पुरा--प्राचीन काल में; सड्भात्-बुरी संगति से; योगी--योगी होते हुए भी;योगात्--योग पथ से; विचालित: --नीचे गिर गया; आचरन्-- आचरण; गर्हितम्ू--अशोभनीय; लोके --समाज में; ज्ञातीनामू--अपने सम्बन्धियों का; कर्म--कार्य ; विप्रियम्--अधिक अनुकूल नहीं; सरय्वाम्--सरयू नदी में; क्रीडत:--खेल में रत; बालान्--सारेलड़कों को; प्रास्यत्-फेंक देता; उद्देजयन्--कष्ट देता हुआ; जनम्--सामान्य लोगों को
पिछले जन्म में असमंजस एक महान् योगी था, किन्तु कुसंगति के कारण वह अपने उच्चपद सेनीचे गिर गया था।
अब, इस जन्म में वह राजपरिवार में उत्पन्न हुआ था और जाति-स्मर था अर्थात्वह अपने पूर्वजन्म को स्मरण करने में समर्थ था।
फिर भी वह अपने आपको दुर्जन के रूप मेंदिखलाना चाहता था; अतएवं वह ऐसा कार्य किया करता था जो जनता तथा उसके परिजनों कीइृष्टि में गर्हित तथा प्रतिकूल होता।
वह सरयू नदी में खेल करते बालकों को गहरे जल में फेंककरउन्हे तगं करता रहता था।
एवं वृत्त: परित्यक्त: पित्रा स्नेहमपोहा वे ।
योगैश्वर्येण बालांस्तान्दर्शयित्वा ततो ययौ ॥
१७॥
एवम् वृत्त:--इस प्रकार ( गर्हित कार्यो में ) व्यस्त; परित्यक्त:--निकाला हुआ; पित्रा--पिता द्वारा; स्नेहमू--स्नेह; अपोह्म--त्यागकर;वै--निस्सन्देह; योग-ऐश्वर्येग--योगशक्ति से; बालान् तानू--उन बालकों को जो जल में गिराए गए थे और मारे गए थे; दर्शयित्वा--उनके माता पिता को फिर से दिखलाकर; ततः ययौ--उस स्थान से चला गया।
चूँकि असमंजस ऐसे गर्हित कार्यो में लगा रहता था अतएव उसके पिता ने उससे स्नेह करना छोड़दिया और उसे घर से निकाल दिया।
तब असमंजस ने उन बालकों को जीवित करके उन्हें राजा तथाउनके माता-पिताओं को दिखलाकर अपनी योगशक्ति का प्रदर्शन किया।
तत्पश्चात् असमंजस ने अयोध्या छोड़ दिया।
अयोध्यावासिन: सर्वे बालकान्पुनरागतान् ।
इृष्ठा विसिस्मिरे राजन्राजा चाप्यन्वतप्यत ॥
१८॥
अयोध्या-वासिन: --अयोध्या के निवासी; सर्वे--सारे; बालकान्--उनके पुत्र; पुन:--फिर; आगतान्--पुन: जीवित होकर; हृध्ला--इसे देखकर; विसिस्मिरे--स्तम्भित हो गये; राजन्--हे राजा परीक्षित; राजा--राजा सगर ने; च-- भी; अपि--निस्सन्देह;अन्वतप्यत--( अपने पुत्र की अनुपस्थिति के लिए ) अत्यन्त शोक किया।
हे राजा परीक्षित, जब सारे अयोध्यावासियों ने देखा कि उनके लड़के पुनः जीवित हो उठे हैं तोवे स्तम्भित रह गये और राजा सगर को अपने पुत्र की अनुपस्थिति पर अत्यधिक पश्चाताप हुआ।
अंशुमांश्रोदितो राज्ञा तुरगान्वेषणे ययौ ।
पितृव्यखातानुपथं भस्मान्ति दहशे हयम् ॥
१९॥
अंशुमान्--असमंजस का पुत्र; चोदित:--आदेश पाकर; राज्ञा--राजा से; तुरग--घोड़ा; अन्वेषणे--खोजने के लिए; ययौ--बाहरचला गया; पितृव्य-खात--जैसा कि चाचा लोगों ने वर्णन किया था; अनुपथम्--उस रास्ते से जाकर; भस्म-अन्ति--राख के ढेर केनिकट; ददशे--उसने देखा; हयम्--घोड़े को |
तत्पश्चात् महाराज सगर ने अपने पौत्र अंशुमान को घोड़ा ढूँढ लाने का आदेश दिया।
अंशुमान अपने चाचाओं के पथ से होकर धीरे-धीरे राख के ढेर तक पहुँचा और उसने उसी के निकट घोड़े कोपाया।
तत्रासीनं मुनि वीक्ष्य कपिलाख्यमधोक्षजम् ।
अस्तौत्समाहितमना: प्राज्ललि: प्रणतो महान् ॥
२०॥
तत्र--वहाँ; आसीनम्-- आसन ग्रहण किये; मुनिम्--मुनि को; वीक्ष्य--देखकर; कपिल-आख्यम्--कपिल मुनि के रूप में ज्ञात;अधोक्षजम्--विष्णु के अवतार; अस्तौत्--प्रार्थना की; समाहित-मना:--बड़े ध्यान से; प्राज्ललि:--हाथ जोड़कर; प्रणत: --नीचेगिरकर, नमस्कार करते हुए; महान्ू--महापुरुष अंशुमान ने
महान् अंशुमान ने विष्णु अवतार कपिल नामक मुनि को देखा जो घोड़े के निकट आसीन थे।
अंशुमान ने उन्हें हाथ जोड़कर नमस्कार किया और दत्तचित्त होकर उनकी प्रार्थना की।
अंशुमानुवाचन पश्यति त्वां परमात्मनोजनोन बुध्यतेउद्यापि समाधियुक्तिभि: ।
कुतोपरे तस्य मनःशरीरधी-विसर्गसृष्टा वयमप्रकाशा: ॥
२१॥
अंशुमान् उवाच--अंशुमान ने कहा; न--नहीं; पश्यति--देख सकता है; त्वामू--आपको ; परम्--दिव्य; आत्मन:--हम जीवों का;अजनः--ब्रह्मा; न--नहीं; बुध्यते--समझ सकता है; अद्य अपि--आज भी; समाधि--ध्यान से; युक्तिभि:--या चिन्तन से; कुतः--कैसे; अपरे-- अन्य; तस्थ--उसका; मन:-शरीर-धी--जो शरीर या मन को स्वयं ( आत्मा ) मानते हैं; विसर्ग-सृष्टा:--इस संसार केप्राणी; वयम्--हम; अप्रकाशा:--दिव्य ज्ञान से रहित |
अंशुमान ने कहा : हे भगवान्, आज तक ब्रह्मजी भी आपके अगम्य पद को ध्यान या चिन्तनद्वारा समझ पाने में असमर्थ हैं तो हम जैसों की कौन कहे जो ब्रह्मा द्वारा देवता, पशु, मनुष्य, पक्षीतथा पशु इत्यादि के विविध रूपों में उत्पन्न किये गये हैं?
हम पूरी तरह अज्ञान में हैं।
अतएव हमसाक्षात् ब्रह्म स्वरूप आपको कैसे जान सकते हैं ?
ये देहभाजस्त्रिगुणप्रधानागुणान्विपश्यन्त्युत वा तमश्न ।
यन्मायया मोहितचेतसस्त्वांविदु: स्वसंस्थं न बहिःप्रकाशा: ॥
२२॥
ये--जिन पुरुषों ने; देह-भाज:--भौतिक शरीर धारण किया है; त्रि-गुण-प्रधाना:-- भौतिक प्रकृति के तीनों गुणों द्वारा प्रभावित;गुणान्ू--तीनों गुणों की अभिव्यक्ति; विपश्यन्ति--केवल देख सकते हैं; उत--ऐसा कहा जाता है; वा--अथवा; तम:--तमोगुण;च--और; यत्-मायया--जिसकी माया से; मोहित--मोहित; चेतस:--जिनके हृदय; त्वामू--आपको; विदुः--जानते हैं; स्व-संस्थम्--अपने शरीर में स्थित; न--नहीं; बहिः-प्रकाशा:--जो केवल बहिरंगा शक्ति के फलों को देख पाते हैं।
हे स्वामी, आप सबों के हृदयों मे भलीभाँति स्थित हैं, किन्तु भौतिक शरीर से आवृत सारे जीवआपको नहीं देख पाते क्योंकि वे त्रिगुणमयी माया द्वारा प्रेरित बहिरंगा शक्ति के द्वारा प्रभावित रहतेहैं।
उनकी बुद्धि सतो, रजो तथा तमो गुणों से ढकी होने से वे प्रकृतिके इन तीनों गुणों की क्रियाओं-प्रतिक्रियाओं को ही देख पाते हैं।
तमोगुण की क्रिया-प्रतिक्रियाओं के कारण जाग्रत या सुप्त जीवप्रकृति की कार्यविधि को ही देख पाते हैं; वे आप ( भगवान्) को नहीं देख सकते।
त॑ त्वां अहं ज्ञानघनं स्वभाव-प्रध्वस्तमायागुणभेदमोहै: ।
सनन्दनाहैर्मुनिभिर्विभाव्यंकथं विमूढ: परिभावयामि ॥
२३॥
तमू--उस; त्वामू--आपको; अहम्-मैं; ज्ञान-घनम्--घनीभूत ज्ञान स्वरूप आप; स्वभाव--स्वभाव से; प्रध्वस्त--कल्मषरहित;माया-गुण--तीन गुणों से उत्पन्न; भेद-मोहैः-- भेदरूपी मोह के प्रदर्शन द्वारा; सनन्दन-आइ्यि:--चारों कुमारों जैसे व्यक्तियों द्वारा;मुनिभि:--ऐसे मुनियों द्वारा; विभाव्यमू--पूज्य; कथम्--कैसे; विमूढ: --प्रकृति द्वारा मूर्ख बनाया गया; परिभावयामि-- आपकेविषय में सोच सकता हूँ।
हे प्रभु, प्रकृति के तीनों गुणों के प्रभाव से मुक्त हुए साधुपुरुष, यथा चारों कुमार ( सनत्,सनक, सनन्दन तथा सनातन ) ही ज्ञान के पुंज आपके विषय में सोच सकते हैं।
भला मुझ जैसाअज्ञानी व्यक्ति आपके विषय में कैसे सोच सकता है ?
प्रशान्त मायागुणकर्मलिड्ग-मनामरूप॑ सदसद्रिमुक्तम् ।
ज्ञानोपदेशाय गृहीतदेहंनमामहे त्वां पुरुष पुराणम् ॥
२४॥
प्रशान्त--हे पूर्णतया शान्त; माया-गुण--प्रकृति के गुण; कर्म-लिड्रमू--सकाम कर्मो से जाना जाने वाला; अनाम-रूपम्--जिसकेकोई नाम या रूप न हो; सत्-असत्-विमुक्तम्-प्रकृति के व्यक्त तथा अव्यक्त गुणों से परे; ज्ञान-उपदेशाय--दिव्य ज्ञान ( यथा भगवदगीता का ) वितरित करने के लिए; गृहीत-देहम्--जिसने शरीर धारण किया है; नमामहे--मैं नमस्कार करता हूँ; त्वाम्--तुमको; पुरुषम्ू--परमपुरुष को; पुराणम्--आदि।
हे परम शान्तिमय स्वामी, यद्यपि यह प्रकृति, सारे सकाम कर्म तथा उनके फलस्वरूप भौतिकनाम तथा रूप आपकी सृष्टि हैं, तथापि आप उनसे अप्रभावित रहते हैं।
अतएवं आपका दिव्य नामभौतिक नामों से भिन्न है और आपका स्वरूप भौतिक स्वरूपों से भिन्न है।
आप भयगवद्गीता जैसेज्ञान का हमें उपदेश देने के लिए ही भौतिक शरीर के ही समान रूप धारण करते हैं लेकिन वस्तुतःआप रहते हैं परम आदि पुरुष ही।
अतएव मैं आपको सादर नमस्कार करता हूँ।
डेत्वन्मायारचिते लोके वस्तुबुद्धया गृहादिषु ।
भ्रमन्ति कामलोभेष्यामोहविभ्रान्नचेतस: ॥
२५॥
त्वत्ू-माया--आपकी माया से; रचिते--निर्मित; लोके--इस जगत में; वस्तु-बुद्धया--वास्तविक मानते हुए; गृह-आदिषु--घर आदिमें; भ्रमन्ति--घूमते हैं; काम--विषयवासनाओं से; लोभ--लालच से; ईर्ष्या--द्वेष से; मोह--तथा मोह से; विध्रान्त--मोह ग्रस्त;चेतस:ः--जिनके हृदय
हे भगवन्, जिनके मन काम, लोभ, ईर्ष्या तथा मोह से मोहित हैं वे आपकी माया द्वारा सृजितइस जगत में झूठे ही घर, गृहस्थी आदि में रुचि रखते हैं।
वे घर, पत्नी तथा सन््तान में आसक्त रहकरइसी जगत में निरन्तर घूमते रहते हैं।
अद्य नः सर्वभूतात्मन्कामकर्मेन्द्रियाशय: ।
मोहपाशो हृढछश्छन्नो भगवंस्तव दर्शनात् ॥
२६॥
अद्य--आज; न: --हमारा; सर्व-भूत-आत्मन्--हे परमात्मा स्वरूप; काम-कर्म-इन्द्रिय-आशय:--कामवासनाओं तथा सकाम कर्मोके अधीन रहकर; मोह-पाश:--मोह की यह कठिन ग्रन्थि; दृढ:--अत्यन्त प्रबल; छिन्न:--टूट गई; भगवन्--हे भगवान्; तवदर्शनातू--आपके दर्शन मात्र से |
हे समस्त जीवों के परमात्मा, हे भगवान्, मैं अब आपके दर्शनमात्र से सारी कामवासनाओं सेमुक्त हो गया हूँ जो दुर्लघ्य मोह तथा संसार-बन्धन के मूल कारण हैं।
श्रीशुक उबाचइत्थं गीतानुभावस्तं भगवान्कपिलो मुनि: ।
अंशुमन्तमुवाचेदमनुग्राह्न धिया नूप ॥
२७॥
श्री-शुकः उबाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; इत्थम्--इस तरह; गीत-अनुभाव: --जिनकी महिमा का वर्णन किया जाता है;तम्--उस; भगवान्-- भगवान्; कपिल:--कपिल ने; मुनि:--महान् साधु; अंशुमन्तम्--अंशुमान से; उवाच--कहा; इृदम्--यह;अनुग्राह्म--दयालु होकर; धिया--ज्ञान के मार्ग सहित; नृप--राजा परीक्षित
हे राजा परीक्षित, जब अंशुमान ने भगवान् का इस प्रकार महिमागायन किया तो महामुनि कपिलने, जो विष्णु के सशक्त अवतार हैं, उस पर कृपालु होकर उसे ज्ञान का मार्ग बतलाया।
श्रीभगवानुवाचअश्वोयं नीयतां वत्स पितामहपशुस्तव ।
इमे च पितरो दग्धा गड़ाम्भोईन्ति नेतरत् ॥
२८॥
श्री-भगवान् उबाच--कपिल मुनि ने कहा; अश्व:--घोड़ा; अयम्--यह; नीयताम्ू--ले लो; वत्स--हे पुत्र; पितामह--अपने बाबाका; पशु:--यह पशु; तब--तुम्हारे; इमे--ये सारे; च-- भी; पितर: --पूर्वजों के शरीर; दग्धा:--भस्म हुए; गड्ज-अम्भ:--गंगाजल;अ्हन्ति--उबारे जा सकते हैं; न--नहीं; इतरत्--किसी अन्य साधन से
भगवान् कपिल ने कहा : हे प्रिय अंशुमान, यह रहा तुम्हारे बाबा द्वारा खोजा जा रहा यज्ञ-पशु।
इसे लो।
दग्ध हुए तुम्हारे इन पुरखों का उद्धार केवल गंगाजल से हो सकता है, किसी अन्य साधन सेनहीं।
त॑ परिक्रम्य शिरसा प्रसाद्य हयमानयत् ।
सगरस्तेन पशुना यज्ञशेषं समापयत् ॥
२९॥
तम्--उस मुनि की; परिक्रम्य--परिक्रमा लगाकर; शिरसा--सिर के बल ( प्रणाम करके ); प्रसाद्य--उसे सन्तुष्ट करके; हयम्--घोड़ेको; आनयत्--वापस ले आया; सगरः--राजा सगर ने; तेन--उस; पशुना--पशु से; यज्ञ-शेषम्--यज्ञ का अन्तिम संस्कार;समापयतू--सम्पन्न किया।
तत्पश्चात् अंशुमान ने कपिल मुनि की परिक्रमा की और अपना सिर झुकाकर उन्हें सादरनमस्कार किया।
इस तरह उन्हें पूरी तरह सन्तुष्ट करके अंशुमान यज्ञ-पशु को वापस ले आया औरमहाराज सगर ने इस घोड़े से यज्ञ का शेष अनुष्ठान सम्पन्न किया।
राज्यमंशुमते न्यस्य निःस्पूहो मुक्तबन्धन: ।
और्वोषदिष्टमार्गेण लेभे गतिमनुत्तमाम् ॥
३०॥
राज्यमू--अपना राज्य; अंशुमते--अंशुमान को; न्यस्य--देकर; निःस्पृह:--इच्छारहित; मुक्त-बन्धन: -- भवबन्धन से पूरी तरह मुक्त;और्व-उपदिष्ट--ओऔर्व मुनि द्वारा आदेशित; मार्गेग--उस मार्ग का अनुसरण करके; लेभे--प्राप्त किया; गतिमू--गन्तव्य;अनुत्तमाम्-परम
अंशुमान को अपने राज्य की बागडोर देकर तथा सारी भौतिक चिन्ता एवं बन्धन से मुक्त होकरसगर महाराज ने और्व मुनि के द्वारा उपदिष्ट साधनों का पालन करते हुए परम गति प्राप्त की।
