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26. ऐला-गीता

श्रीभगवानुवाचमल्लक्षणमिमं कायं॑ लब्ध्वा मद्धर्म आस्थित: ।आनन्द परमात्मानमात्मस्थं समुपैति माम्‌ ॥

१॥

श्री-भगवान्‌ उबाच-- भगवान्‌ ने कहा; मत्‌-लक्षणम्‌--जिसमें मेरा साक्षात्कार हो सकता है; इममू--यह; कायम्‌--मानवशरीर; लब्ध्वा--प्राप्त करके; मत्‌-धर्मे--मेरी भक्ति में; आस्थित:--स्थित; आनन्दम्‌--शुद्ध आनन्द रूप; परम-आत्मानम्‌--परमात्मा को; आत्म-स्थम्‌--हृदय के भीतर स्थित; समपैति--प्राप्त करता है; माम्‌--मुझको

भगवान्‌ ने कहा : इस मनुष्य जीवन को, जो मनुष्य को मेरा साक्षात्कार करने का अवसरप्रदान करता है, पाकर और मेरी भक्ति में स्थित होकर, मनुष्य मुझे प्राप्त कर सकता है, जो किसमस्त आनन्द का आगार तथा हर जीव के हृदय में वास करने वाला परमात्मा स्वरूप है।

गुणमय्या जीवयोन्या विमुक्तो ज्ञाननिष्ठया ।गुणेषु मायामात्रेषु दृश्यमानेष्ववस्तुतः ।वर्तमानोपि न पुमान्युज्यतेवस्तुभिर्गुणै:; ॥

२॥

गुण-मय्या--प्रकृति के गुणों पर आधारित; जीव-योन्या-- भौतिक जीवन के कारण से, झूठी पहचान; विमुक्त:--पूर्णतया मुक्तव्यक्ति; ज्ञान--दिव्य ज्ञान में; निष्ठया--पूरी तरह स्थिर होने से; गुणेषु--गुणों के फलों में से; माया-मात्रेषु--जो केवल मोह है;हृश्यमानेषु-- आँखों के सामने प्रकट; अवस्तुतः--यद्यपि सत्य नहीं है; वर्तमान: --रहते हुए; अपि--यद्यपि; न--नहीं; पुमानू--वह व्यक्ति; युज्यते--फँस जाता है; अवस्तुभि:--असत्य; गुणैः--गुणों की अभिव्यक्ति से।

दिव्य ज्ञान में स्थिर व्यक्ति प्रकृति के गुणों के फलों से अपनी झूठी पहचान त्याग कर, बद्धजीवन से मुक्त हो जाता है। इन फलों को मात्र मोह समझ कर उन्हीं के बीच निरन्तर रहते हुए वहप्रकृति के गुणों में फँसने से अपने को बचाता है। चूँकि गुण तथा उनके फल सत्य नहीं होते,अतएबव वह उन्हें स्वीकार नहीं करता।

सड़ं न कुर्यादसतां शिश्नोदरतृपां क्वचित्‌ ।तस्यानुगस्तमस्यन्धे पतत्यन्धानुगान्धवत्‌ ॥

३॥

सड्डम--साथ; न कुर्यातू-- नहीं करे; असताम्‌-- भौतिकतावादी लोगों का; शिश्न--जननांग; उदर--तथा पेट; तृपाम्‌--तृप्ति मेंलगे हुए; क्वचित्‌--किसी भी समय; तस्य--ऐसे व्यक्ति का; अनुग:--अनुयायी; तमसि अन्धे--अँधेरे गड्ढे में; पतति--गिरपड़ता है; अन्ध-अनुग--अंधे मनुष्य के पीछे चलने वाला; अन्ध-वत्‌--दूसरे अन्धे व्यक्ति की ही तरह

मनुष्य को कभी ऐसे भौतिकतावादियों की संगति नहीं करनी चाहिए जो अपने जननांगतथा उदर की तृप्ति में लगे रहते हों। उनका अनुसरण करने पर मनुष्य अंधकार के गहरे गड्ढे मेंगिर जाता है, जिस तरह एक अंधे व्यक्ति द्वारा दूसरे अंधे व्यक्ति का अनुगमन करने पर होता है।

ऐलः सप्राडिमां गाथामगायत बृहच्छुवा: ।उर्वशीविरहान्मुह्यन्निर्विण्ग: शोकसंयमे ॥

४॥

ऐलः:--राजा पुरूरवा; सम्राट्‌--महान्‌ राजा; इमामू--इस; गाथामू--गीत को; अगायत--गाया; बृहत्‌--विस्तृत; श्रवा:--यशवाला; उर्वशी-विरहात्‌--उर्वशी से वियोग के कारण; मुहान्‌ू--मोहित होकर; निर्विण्ण:--विरक्त-सा; शोक--शोक; संयमे--अन्ततः अपने वश में होकर |

निम्नलिखित गीत सुप्रसिद्ध सम्राट पुरूरवा द्वारा गाया गया था। अपनी पत्नी उर्वशी सेविलग होने पर सर्वप्रथम वह संभ्रमित हुआ किन्तु अपने शोक को वश में करने से वह विरक्तिका अनुभव करने लगा।

त्यक्त्वात्मानं ब्रयन्तीं तां नग्न उन्मत्तवन्नूप: ।विलपन्नन्वगाज्ञाये घोरे तिष्ठेति विक्‍्लव: ॥

५॥

त्यक्त्वा--छोड़ कर; आत्मानम्‌--उसे; ब्रजन्तीम्‌--दूर जाती हुई; तामू--उसको; नग्नः--नंगा; उन्मत्त-वत्‌--पागल व्यक्ति कीतरह; नृप:--राजा; विलपन्‌--विलाप करता; अन्वगात्‌--पीछे पीछे गया; जाये--हे मेरी पत्नी; घोरे--हे निष्ठर स्त्री; तिष्ठ--रुको; इति--इस प्रकार कहते हुए; विक्लव: --दुख से अभिभूत |जब वह उसको छोड़ रही थी, तो वह नंगा होते हुए भी, उसके पीछे पागल की तरह दौड़नेलगा और अत्यन्त दुख से चिल्लाने लगा, 'मेरी पत्नी, ओरे निष्ठर नारी! जरा ठहर।

'कामानतृप्तोनुजुषन्भ्षुल्लकान्वर्षयामिनी: ।न वेद यान्तीर्नायान्तीरुर्वश्याकृष्टचेतन: ॥

६॥

कामान्‌--विषय-भोग की इच्छा; अतृप्त:--अपूर्ण; अनुजुषन्‌--तृप्त करते हुए; क्षुल्लकानू--श्षुद्र; वर्ष--अनेक वर्षो की;यामिनी:--रातें; न वेद--नहीं जाना; यान्ती:--जाते हुए; न--न तो; आयान्ती:--आतेहुए; उर्वशी --उर्वशी द्वारा; आकृष्ट--आकर्षित; चेतन:--मन।

यद्यपि पुरूरवा ने वर्षों तक सायंकाल की घड़ियों में यौन आनन्द भोगा था, फिर भी ऐसेतुच्छ भोग से वह तृप्त नहीं हुआ था। उसका मन उर्वशी के प्रति इतना आकृष्ट था कि वह यह भीदेख नहीं पाया कि रातें किस तरह आती और चली जाती है।

चआच जज प्वअहो मे मोहविस्तार: कामकश्मलचेतसः ।देव्या गृहीतकण्ठस्य नायु:खण्डा इमे स्मृता: ॥

७॥

ऐल: उवाच--राजा पुरूरवा ने कहा; अहो--हाय; मे--मेरा; मोह--मोह का; विस्तार:--फैलाव; काम--काम द्वारा;कश्मल--दूषित; चेतस:--चेतना; देव्या--इस देवी द्वारा; गृहीत--पकड़ी गई; कण्ठस्य--जिसकी गर्दन; न--नहीं; आयु: --मेरी आयु के; खण्डा:--विभाग, टुकड़े; इमे--ये; स्मृता:--देखे गये।

राजा ऐल ने कहा : हाय! मेरे मोह के विस्तार को तो देखो! यह देवी मेरा आलिंगन करतीथी और मेरी गर्दन अपनी मुट्ठी में किये रहती थी। मेरा हृदय काम-वासना से इतना दूषित था किमुझे इसका ध्यान ही न रहा कि मेरा जीवन किस तरह बीत रहा है।

नाहं वेदाभिनिर्मुक्त: सूर्यो वाभ्युदितोमुया ।मूषितो वर्षपूगानां बताहानि गतान्युत ॥

८॥

न--नहीं; अहम्‌--मै; वेद--जानता हूँ; अभिनिर्मुक्त:--अस्त हुआ; सूर्य:--सूर्य; वा--अथवा; अभ्युदित:--उदय हुआ;अमुया--उसके द्वारा; मूषित:--धोखा दिया गया; वर्ष--वर्षो; पूगानामू-- अनेक; बत--हाय; अहानि--दिन; गतानि--बीतेहुए; उत--निश्चय ही।

इस स्त्री ने मुझे इतना ठगा कि मै उदय होते अथवा अस्त होते सूर्य को भी देख नहीं सका।हाय! मै इतने वर्षों से व्यर्थ ही अपने दिन गँवाता रहा।

अहो मे आत्मसम्मोहो येनात्मा योषितां कृत: ।क्रीडामृगश्नक्रवर्ती नरदेवशिखामणि: ॥

९॥

अहो--ओह; मे--मेरा; आत्म--मेरा; सम्मोह: --पूर्ण मोह; येन--जिससे; आत्मा--मेरा शरीर; योषिताम्‌--स्त्रियों के; कृत:--हो गया; क्रीडा-मृग:--खिलौना; चक्रवर्ती --शक्तिशाली सम्राट; नरदेब--राजाओं का; शिखा-मणि:--मुकुट का मणि।

हाय! यद्यपि मै शक्तिशाली सम्राट तथा इस पृथ्वी पर समस्त राजाओं का मुकुटमणि मानाजाता हूँ, किन्तु देखो न! मोह ने मुझे स्त्रियों के हाथों का खिलौने जैसा पशु बना दिया है।

सपरिच्छदमात्मानं हित्वा तृणमिवेश्वरम्‌ ।यान्तीं स्त्रियं चान्वगमं नग्न उन्मत्तवद्वुदन्‌ू ॥

१०॥

स-परिच्छदम्‌--मेरे राज्य तथा सारी साज-सामग्री सहित; आत्मानम्‌--अपने आप; हित्वा--त्याग कर; तृणम्‌--घास को;इब--मानो; ईश्वरम-शक्तिमान प्रभु; यान्तीम्‌--जाते हुए; स्त्रियमू--स्त्री को; च--तथा; अन्वगमन्‌--मै पीछा करने लगा;नग्न:ः--नंगा; उन्मत्त-वत्‌--पागल जैसा; रुदन्‌ू-चिल्लाते हुए।

यद्यपि मै प्रचुर ऐश्वर्य से युक्त शक्तिशाली राजा था, किन्तु उस स्त्री ने मुझे त्याग दिया मानोमै कोई घास की तुच्छ पत्ती होऊँ। फिर भी मै, नग्न तथा लज्जारहित पागल व्यक्ति की तरहचिल्लाते हुए, उसका पीछा करता रहा।

कुतस्तस्यानुभाव: स्यात्तेज ईशत्वमेव वा ।योअन्वगच्छ स्त्रियं यान्‍्तीं खरवत्पादताडितः ॥

११॥

कुतः--कहाँ; तस्य--उस व्यक्ति का ( मेरा ); अनुभाव:--प्रभाव; स्थात्‌--है; तेज:--बल; ईशत्वम्‌--स्वामित्व; एव--निस्सन्देह; वा--अथवा; य:--जो; अन्वगच्छम्‌--पीछे पीछे दौड़ा; स्त्रियम्‌--यह स्त्री; यान्तीम्‌--जाते हुए; खर-वत्‌--गधे कीतरह; पाद--पाँव से; ताडित:--दण्डित |

कहाँ है मेरा तथाकथित अत्यधिक प्रभाव, बल तथा स्वामित्व? जिस स्त्री ने मुझे पहले हीछोड़ दिया था उसके पीछे मै उसी तरह भागा जा रहा हूँ जैसे कि कोई गधा जिसके मुँह परउसकी गधी दुलत्ती झाड़ती है।

कि विद्यया कि तपसा किं त्यागेन श्रुतेन वा ।कि विविक्तेन मौनेन स्त्रीभिर्यस्थ मनो हतम्‌ ॥

१२॥

किम्‌--क्या लाभ; विद्यया--ज्ञान का; किम्‌--क्या; तपसा--तपस्याएँ; किम्‌-- क्या; त्यागेन--त्याग का; श्रुतेन-- श्रुतियोंका; वा--अथवा; किमू--क्या; विविक्तेन--एकान्त रहने से; मौनेन--मौन रहने से; स्त्रीभि: --स्त्रियों से; यस्थ--जिसका;मनः--मन; हतम्‌ू--हर लिया गया हो |

ऊँची शिक्षा या तपस्या तथा त्याग से क्‍या लाभ ? इसी तरह धार्मिक शास्त्रों का अध्ययनकरने, एकान्त तथा मौन होकर रहने और फिर स्त्री द्वारा किसी का मन चुराये जाने से क्‍यालाभ ? स्वार्थस्याकोविदं धिड्मां मूर्ख पण्डितमानिनम्‌ ।योहमीश्वरतां प्राप्य स्रीभि्गोखरवज्जित: ॥

१३॥

स्व-अर्थस्य--अपना हित; अकोविदम्‌--न जानने वाला; धिक्‌-धिक्कार है; माम्‌--मुझसे; मूर्खम्‌--मूर्ख; पण्डित-मानिनम्‌--अपने को बड़ा भारी विद्वान मानते हुए; य:ः--जो; अहम्‌--मै; ईश्वरताम्‌-- प्रभुता का पद; प्राप्प--पाकर; स्त्रीभि:--स्त्रियोंद्वारा; गो-खर-वत्‌--बैलों या गधे जैसा; जितः--जीता गया।

धिक्कार है मुझे! मै इतना बड़ा मूर्ख हूँ कि मैने यह भी नहीं जाना कि मेरे लिए कया अच्छा है।मैने तो उद्धत भाव से यह सोचा था कि मै अत्यधिक बुद्धिमान हूँ। यद्यपि मुझे स्वामी का उच्चपद प्राप्त हो गया, किन्तु मै स्त्रियों से अपने को परास्त करवाता रहा मानो मै कोई बैल या गधाहोऊँ।

सेवतो वर्षपूगान्मे उर्वश्या अधरासवम्‌ ।न तृप्यत्यात्म भू: कामो वह्विराहुतिभिर्यथा ॥

१४॥

सेवत:--सेवा करता हुआ; वर्ष-पूगान्‌--अनेक वर्षो तक; मे--मेरा; उर्वश्या: --उर्वशी का; अधर--होठों का; आसवम्‌--अमृत; न तृप्यति--तृप्त नहीं होता; आत्म-भू:--मन से उत्पन्न; काम:--काम-वासना; वह्विः--आग; आहुतिभि:--आहुतियोंसे; यथा--तिस तरह

यद्यपि मै उर्वशी के होठों के तथाकथित अमृत का सेवन वर्षों तक कर चुका था किन्तु मेरीकाम-वासनाएँ मेरे हृदय में बारम्बार उठती रहीं और कभी तुष्ट नहीं हुईं जिस तरह घी की आहुतिडालने पर, अग्नि कभी भी बुझाई नहीं जा सकती।

पुंश्रल्यापहतं चित्तं को न्वन्यो मोचितु प्रभु: ।आत्मारामे श्वरमृते भगवन्तमधोक्षजम्‌ ॥

१५॥

पुंश्वल्य--वेश्या द्वारा; अपहतम्‌--चुराया गया; चित्तमू--मन; कः--कौन; नु--निस्सन्देह; अन्य: --अन्य व्यक्ति; मोचितुम्‌--मुक्त करने के लिए; प्रभु;:--सक्षम; आत्म-आराम--आत्म-तुष्ट साधुओं का; ईश्वरम्‌-- भगवान्‌; ऋते--के अतिरिक्त;भगवन्तमू-- भगवान्‌; अधोक्षजम्‌--इन्द्रियों की परिधि से परे रहने वाला।

जो भौतिक अनुभूति के परे है और आत्माराम मुनियों के स्वामी है, उन भगवान्‌ केअतिरिक्त मेरी इस चेतना को जो वेश्या के द्वारा चुराई जा चुकी है, भला और कौन बचा सकताहै? बोधितस्यापि देव्या मे सूक्तवाक्येन दुर्मते: ।मनोगतो महामोहो नापयात्यजितात्मन: ॥

१६॥

बोधितस्य--सूचना-प्राप्त; अपि-- भी; देव्या--देवी उर्वशी द्वारा; मे--मेरा; सु-उक्त--सुभाषित; वाक्येन--शब्दों द्वारा;दुर्मतेः--मन्द बुद्धि वाला; मन:ः-गत:--मन के भीतर; महा-मोह:--महान्‌ संशय; न अपयाति--नहीं रूकता; अजित-आत्मन:--अपनी इन्द्रियों को वश में करने में असफल।

चूँकि मैने अपनी बुद्धि को मन्द बनने दिया और चूँकि मै अपनी इन्द्रियों को वश में नहीं करसका, इसलिए मेरे मन का महान्‌ मोह मिटा नहीं यद्यपि उर्वशी ने सुन्दर वचनों द्वारा मुझे अच्छीसलाह दी थी।

किमेतया नोपकृतं रज्वा वा सर्पचेतस: ।द्रष्ठ: स्वरूपाविदुषो योहं यदजितेन्द्रिय:ः ॥

१७॥

किम्‌--क्या; एतया--उसके द्वारा; न:--हमको; अपकृतम्‌-- अपराध हुआ; रज्वा--रस्सी द्वारा; वा--अथवा; सर्प-चेतस: --सर्प मानते हुए; द्रष्ट:--ऐसे दर्शन का; स्वरूप--असली पहचान; अविदुष:--न समझने वाला; यः--जो; अहम्‌--मै; यत्‌--क्योंकि; अजित-इन्द्रियः--इन्द्रियों पर वश न पा सकने वाला

भला मै अपने कष्ट के लिए उसे कैसे दोष दे सकता हूँ जबकि मै स्वयं अपने असलीआध्यात्मिक स्वभाव से अपरिचित हूँ? मै अपनी इन्द्रियों को वश में नहीं कर पाया, इसीलिए मैउस व्यक्ति की तरह हूँ जो निर्दोष रस्सी को भ्रमवश सर्प समझ बैठता है।

क्वायं मलीमस: कायो दौर्गन्ध्याद्यात्मकोडशुचि: ।व गुणा: सौमनस्याद्या ह्ाध्यासोविद्यया कृत: ॥

१८॥

क्व--कहाँ; अयम्‌--यह; मलीमस: --अत्यन्त गन्दा; काय:--शरीर; दौर्गनध्य--दुर्गन्‍ध; आदि--इत्यादि; आत्मक:--से युक्त;अशुचि:ः--अस्वच्छ; क्व--कहाँ; गुणा:--तथाकथित सद्गुण; सौमनस्थ--फूलों की सुगन्धि तथा कोमलता; आद्या:--इत्यादि; हि--निश्चय ही; अध्यास:--ऊपर से थोपे गये; अविद्यया--अज्ञान से; कृत:--उत्पन्न |

आखिर यह दूषित शरीर है क्या--इतना गन्दा तथा दुर्गन्‍्ध से भरा हुआ? मै एक स्त्री केशरीर की सुगन्धि तथा सुन्दरता से आकृष्ट हुआ था किन्तु आखिर वे आकर्षक स्वरूप है क्‍या?वे माया ( मोह ) द्वारा उत्पन्न छद्ा आवरण ही तो है! पित्रो: किं स्वं नु भार्याया: स्वामिनोग्ने: श्रगृश्षयो: ।किमात्मन: कि सुहृदामिति यो नावसीयते ॥

१९॥

तस्मिन्कलेवरे*मेध्ये तुच्छनिष्ठे विषज्जते ।अहो सुभद्रं सुनसं सुस्मितं च मुखं स्त्रियः ॥

२०॥

पित्रो:--माता-पिता के; किम्‌ू--क्या; स्वम्‌--सम्पत्ति; नु--अथवा; भार्याया:--पत्नी का; स्वामिन:--मालिक का; अग्ने: --अग्नि का; श्व-गृश्नयो:--कुत्तों तथा सियारों का; किमू--क्या; आत्मन:--आत्मा का; किम्‌--क्या; सुहृदम्‌--मित्रों का;इति--इस प्रकार; यः--जो; न अवसीयते--निश्चित नहीं कर सकता; तस्मिन्‌ू--उस; कलेवरे--शरीर में; अमेध्ये --गर्हित;तुच्छ-निष्ठे--अधम स्थान की ओर बढ़ते हुए; विषज्ञते--अनुरक्त हो जाता है; अहो--ओह; सु-भद्रमू--अत्यन्त आकर्षक; सु-नसम्‌--सुन्दर नाक वाली; सु-स्मितमू--सुन्दर हँसी; च--तथा; मुखम्‌--मुख; स्त्रियः--स्त्री का

कोई यह निश्चित नहीं कर सकता है कि शरीर वास्तव में किसकी सम्पत्ति है। क्या यह उसमाता-पिता की है, जिसने उसे जन्म दिया है, अथवा इसे सुख देने वाली पत्नी की है या इसकेमालिक की है, जो शरीर को हुक्म देता रहता है ? अथवा यह चिता की अग्नि की अथवा उनकुत्ते तथा सियारों की है, जो अन्ततोगत्वा इसका भक्षण करेंगे ? क्या यह उस अन्तस्थ आत्मा कीसम्पत्ति है, जो इसके सुख-दुख में साथ देता है अथवा यह शरीर उन घनिष्ठ मित्रों का है, जोइसको प्रोत्साहित करते तथा इसकी सहायता करते है? यद्यपि मनुष्य कभी भी शरीर के स्वामीको निश्चित नहीं कर पाता, किन्तु वह इससे अनुरक्त रहता है। यह भौतिक शरीर उस दूषित पदार्थके समान है, जो निम्न स्थान की ओर बढ़ रहा है; फिर भी जब मनुष्य किसी स्त्री के मुख कीओर टकटकी लगाता है, तो सोचता है, 'कितनी सुन्दर है यह स्त्री ? कैसी सुघड़ नाक है इसकीऔर जरा इसकी सुन्दर हँसी को तो देखो।

त्वड्मांसरुधिरस्नायुमेदोमज्जास्थिसंहतौ ।विप्मूत्रपूये रमतां कृमीणां कियदन्तरम्‌ ॥

२१॥

त्वक्‌्--चमड़ी से; मांस--मांस; रुधिर--खून; स्नायु--पेशी; मेद: --चर्बी; मज्जा --मज्जा; अस्थि--तथा हड्डी; संहतौ--बनाहुआ; विट्‌ू--मल; मूत्र--मूत्र; पूपे--तथा पीब का; रमताम्‌--रमण करता हुआ; कृमीणाम्‌--कीड़े-मकोड़ों के तुल्य;कियत्‌--कितना; अन्तरम्‌--अन्तर।

सामान्य कीड़ों-मकोड़ों तथा उन व्यक्तियों में अन्तर ही क्‍या है, जो चमड़ी, मांस, रक्त,पेशी, चर्बी, मज्जा, हड्डी, मल, मूत्र तथा पीब से बने इस भौतिक शरीर का भोग करना चाहतेहै? अथापि नोपसजेत स्त्रीषु स्त्रेणेषु चार्थवित्‌ ।विषयेन्द्रियसंयोगान्मन:ः क्षुभ्यति नान्‍्यथा ॥

२२॥

अथ अपि--इतने पर भी; न उपसज्जेत--सम्पर्क रखे; स्त्रीषु--स्त्रियों से; स्त्रणेषु--स्त्रियों पर अनुरक्त व्यक्तियों से; च--अथवा;अर्थ-वित्‌--अपना हित जानने वाला; विषय--भोग की वस्तु के; इन्द्रिय--इन्द्रियों के; संयोगात्‌--सम्बन्ध से; मनः--मन;क्षुभ्यति-- क्षुब्ध होता है; न--नहीं; अन्यथा-- अन्यथा |

सिद्धान्त रूप में शरीर की वास्तविक प्रकृति को जानने पर भी व्यक्ति को कभी भी स्त्रियोंया स्त्रियों में लिप्त रहने वाले पुरुषों की संगति नहीं करनी चाहिए। आखिर, इन्द्रियों का उनकेविषयों से सम्पर्क अनिवार्य रूप से मन को विचलित कर देता है।

अद्ष्टादश्रुताद्धावान्न भाव उपजायते ।असम्प्रयुज्धतः प्राणान्शाम्यति स्तिमितं मन: ॥

२३॥

अदृष्टातू--अनदेखा; अश्रुतात्‌--अनसुना; भावात्‌--वस्तु से; न--नहीं; भाव:--मानसिक क्षोभ; उपजायते--उत्पन्न होते है;असप्प्रयुज्तः--उसके लिए जो प्रयोग में नहीं ला रहा; प्राणान्‌--इन्द्रियों को; शाम्यति--शान्त हो जाता है; स्तिमितम्‌--नियंत्रित; मन:ः--मन |

चूँकि मन ऐसी वस्तु से क्षुब्ध नहीं होता जो न तो देखी गई हो, न सुनी गई हो, इसलिए ऐसेव्यक्ति का मन, जो अपनी इन्द्रियों को रोकता है, स्वतः अपने भौतिक कर्मों को करने से रोकदिया जायेगा और शान्त हो जायेगा।

तस्मात्सड़े न कर्तव्य: स्त्रीषु स्त्रेणेषु चेन्द्रिये: ।विदुषां चाप्यविस्त्रब्ध: षड्वर्ग: किमु माहशाम्‌ ॥

२४॥

तस्मात्‌--इसलिए; सड्भः--संगति; न कर्तव्य:--नहीं करे; स्त्रीषु-- स्त्रियों की; स्त्रैणेषु--स्त्रियों पर अनुरक्त रहने वाले पुरुषोंकी; च--तथा; इन्द्रियेः --इन्द्रियों से; विदुषाम्‌--बुद्ध्धिमान व्यक्तियों का; च अपि-- भी; अविस्त्रब्ध:--अविश्वसनीय; षटू-वर्ग:--मन के छः शत्रु ( काम, क्रोध, लोभ, मोह, नशा तथा ईर्ष्या); किम्‌ उ--क्या कहा जाय; माहशाम्‌--मुझ जैसे व्यक्तियोंका

इसलिए मनुष्य को चाहिए कि वह अपनी इन्द्रियों को स्त्रियों की या स्त्रियों के प्रति आसक्तपुरुषों की खुल कर संगति न करने दे। यहाँ तक कि जो अत्यधिक विद्वान है वे मन के छहशत्रुओं पर विश्वास नहीं कर सकते, तो फिर मुझ जैसे मूर्ख व्यक्तियों के बारे में क्‍या कहा जाय ? श्रीभगवानुवाचएवं प्रगायन्नूपदेवदेव:स उर्वशीलोकमथो विहाय ।आत्मानमात्मन्यवगम्य मां वेउपारमज्ज्ञाअनविधूतमोह: ॥

२५॥

श्री-भगवान्‌ उवाच-- भगवान्‌ ने कहा; एवम्‌--इस तरह; प्रगायन्‌--गाते हुए; नृप--मनुष्यों; देब--तथा देवताओं में; देव: --जो प्रसिद्ध था; सः--वह, राजा पुरूरवा; उर्वशी-लोकम्‌--उर्वशी का लोक, गन्धर्व लोक; अथ उ--तब; विहाय--छोड़ कर;आत्मानम्‌--परमात्मा; आत्मनि--अपने हृदय में; अवगम्य-- अनुभव करके; माम्‌--मुझको; बै--निस्सन्देह; उपारमत्‌--शान्तहो गया; ज्ञान--दिव्य ज्ञान से; विधूत--हटा दिया; मोह:--मोह

भगवान्‌ ने कहा : इस प्रकार यह गीत गाकर देवताओं तथा मनुष्यों में विख्यात महाराजपुरूरवा ने वह पद त्याग दिया जिसे उसने उर्वशी लोक में प्राप्त कर लिया था।दिव्य ज्ञान से उसका मोह हट गया; उसने अपने हृदय में मुझे परमात्मा रूप में समझ लिया जिससे अन्त में उसेशान्ति मिल गई।

ततो दु:सड्डमुत्सृज्य सत्सु सज्जेत बुद्धिमान्‌ ।सन्त एवास्य छिन्दन्ति मनोव्यासड्रमुक्तिभि: ॥

२६॥

ततः--इसलिए; दुःसड्रम्‌--बुरी संगति; उत्सुज्य--फेंक कर; सत्सु--सन्त भक्तों को; सज्जेत--लिप्त हो जाता है; बुद्धि-मन्‌--बुद्धिमान; सन्‍्तः--सन्त पुरुष; एब--एकमात्र; अस्य--उसका; छिन्दन्ति--काट देते है; मन:--मन का; व्यासड्रमू--अत्यधिकआसक्ति; उक्तिभि:ः--उनके शब्दों से |

इसलिए बुद्धिमान मनुष्य को सारी कुसंगति त्याग देनी चाहिए और सन्त भक्तों की संगतिग्रहण करनी चाहिए जिनके शब्दों से मन का अति-अनुराग समाप्त हो जाता है।

सन्‍्तोनपेक्षा मच्चित्ता: प्रशान्ताः समदर्शिनः ।निर्ममा निरहड्डारा निद्व॑न्द्वा निष्परिग्रहा: ॥

२७॥

सनन्‍्तः--सन्त भक्त; अनपेक्षा:--किसी भौतिक वस्तु पर आश्रित न रह कर; मत्ू-चित्ता:--जिन्होंने मुझ पर अपना मन स्थिर कररखा है; प्रशान्ता:--पूर्णतया शान्त; सम-दर्शिन:--समान दृष्टि से युक्त; निर्ममा:--ममत्व से रहित; निरहड्डारा: --मिथ्या अहंकारसे मुक्त; निद्वन्द्वा:--समस्त द्वैतों से मुक्त; निष्परिग्रहा:--लोभ से मुक्त |

मेरे भक्त अपने मनों को मुझ पर स्थिर करते हैं और किसी भी भौतिक वस्तु पर निर्भर नहींरहते। वे सदैव शान्त, समहृष्टि से युक्त तथा ममत्व, अहंकार, द्वन्द्द तथा लोभ से रहित होते हैं।

तेषु नित्यं महाभाग महाभागेषु मत्कथा: ।सम्भवन्ति हि ता नृणां जुषतां प्रपुनन्त्यघम्‌ ॥

२८॥

तेषु--उनमें से; नित्यम्‌--निरन्तर; महा-भाग--हे भाग्यवान उद्धव; महा-भागेषु-- भाग्यशाली भक्तों में से; मत्‌-कथा: --मेरीकथाएँ; सम्भवन्ति--उत्पन्न होती हैं; हि--निस्सन्देह; ताः--वे कथाएँ; नृणाम्‌--मनुष्योंकी; जुषताम्‌--उनमें भाग लेने वाले;प्रपुनन्ति--पूरी तरह शुद्ध करते हैं; अघम्‌--पापों को

हे महाभागा उद्धव, ऐसे सन्त भक्तों की संगति में सदा मेरी चर्चा चलती रहती है और जोलोग मेरी महिमा के इस कीर्तन तथा श्रवण में भाग लेते हैं, वे निश्चित रूप से सारे पापों से शुद्धहो जाते हैं।

ता ये श्रुण्वन्ति गायन्ति हानुमोदन्ति चाहता: ।मत्पराः श्रद्धानाश्व भक्ति विन्दन्ति ते मयि ॥

२९॥

ताः--वे कथाएँ; ये--जो व्यक्ति; श्रृण्वन्ति--सुनते हैं; गायन्ति--कीर्तन करते हैं; हि--निस्सन्देह; अनुमोदन्ति-- आत्मसातकरते हैं; च--तथा; आहता:--आदर पूर्वक; मत्‌-परा:--मेरे परायण; अ्रदधाना:-- श्रद्धालु; च--तथा; भक्तिमू-- भक्ति;विन्दन्ति--प्राप्त करते हैं; ते--वे; मयि--मेंरे लिए।जो कोई मेरी इन कथाओं को सुनता है, कीर्तन करता है और आदरपूर्वक आत्मसात्‌ करताहै, वह श्रद्धापूर्वक मेरे परायण हो जाता है और इस तरह मेरी भक्ति प्राप्त करता है।

भक्ति लब्धवतः साधो: किमन्यदवशिष्यते ।मय्यनन्तगुणे ब्रह्मण्यानन्दानुभवात्मनि ॥

३०॥

भक्तिमू-- भगवान्‌ की भक्ति; लब्धवतः --प्राप्त कर लेने वाले; साधो:--भक्त के लिए; किम्‌--क्या; अन्यत्‌-- अन्य कुछ;अवशिष्यते--शेष रह जाता है; मयि--मुझमें; अनन्त-गुणे-- अनन्त गुणों वाला; ब्रह्मणि--परब्रह्म में; आनन्द-- आनन्द का;अनुभव--अनुभव; आत्मनि--से युक्त |

पूर्ण भक्त के लिए मुझ परब्रह्म की भक्ति प्राप्त कर लेने के बाद, करने के लिए बचता हीक्या है? परब्रह्म के गुण असंख्य हैं और मैं साक्षात्‌ आनन्दमय अनुभव हूँ।

यथोपश्रयमाणस्य भगवन्तं विभावसुम्‌ ।शीतं भय तमोउप्येति साधून्संसेवतस्तथा ॥

३१॥

यथा--जिस तरह; उपश्रयमाणस्य--पास आने वाले का; भगवन्तम्‌--शक्तिमान; विभावसुम्‌-- अग्नि; शीतम्‌--शीत; भयम्‌--डर; तमः--अंधकार; अप्येति--हट जाते हैं; साधूनू--साधु भक्त; संसेवत:ः--सेवा में लगे रहने वाले के लिए; तथा--उसीप्रकार।

जो व्यक्ति यज्ञ-अग्नि के पास पहुँच चुका हो, उसके लिए जिस तरह शीत, भय तथाअंधकार दूर हो जाते हैं, उसी तरह जो व्यक्ति भगवान्‌ के भक्तों की सेवा में लगा रहता है उसकाआलस्य, भय तथा अज्ञान दूर हो जाता है।

निमज्योन्मज्जतां घोरे भवाब्धौ परमायणम्‌ ।सनन्‍्तो ब्रह्मविदः शान्ता नौर्ईढेवाप्सु मज्जताम्‌ ॥

३२॥

निमज्य--डूबने वालों का; उन्मजताम्‌--तथा फिर से ऊपर उठने वालों का; घोरे--घोर, कठिन; भव--सांसारिक जीवन के;अब्धौ--सागर में; परम--परम; अयनम्‌--शरण; सनन्‍्त:--सन्‍्त भक्तगण; ब्रह्म-विद:--परब्रह्म को समझने वाले; शान्ता: --शान्त; नौ;:--नाव; हृढा--मजबूत; इब--जिस तरह; अप्सु--जल में; मजजताम्‌--डूबने वालों को

भगवान्‌ के भक्त, जो कि परम ज्ञान को शान्त भाव से प्राप्त हैं, उन लोगों के लिए चरमशरण हैं, जो भौतिक जीवन के भयावने सागर में बारम्बार डूबते तथा उठते हैं। ऐसे भक्त उसमजबूत नाव के सहश होते हैं, तो डूब रहे व्यक्तियों की रक्षा करती है।

अन्नं हि प्राणिनां प्राण आर्तानां शरणं त्वहम्‌ ।धर्मो वित्तं नृणां प्रेत्य सन्तोर्वाग्बिभ्यतोरणम्‌ ॥

३३॥

अन्नमू-- भोजन; हि--निस्सन्देह; प्राणिनाम्‌ू--जीवों का; प्राण: --प्राण; आर्तानाम्‌ू--दुखियों का; शरणम्‌--आश्रय; तु--तथा; अहम्‌--मैं; धर्म:--धर्म; वित्तम्‌--सम्पत्ति; नृणाम्‌--मनुष्यों का; प्रेत्य--मरने के बाद; सन्‍्तः--भक्तगण; अर्वाक्‌--नीचेजाने वालों का; बिभ्यत:--डरने वालों के लिए; अरणम्‌--शरण

जिस तरह समस्त प्राणियों के लिए भोजन ही जीवन है, जिस तरह मैं दुखियारों का परमआश्रय हूँ तथा जिस तरह इस लोक से मर कर जाने वालों के लिए धर्म ही सम्पत्ति है, उसी तरहमेरे भक्त उन लोगों के एकमात्र आश्रय हैं, जो जीवन की दुखमय अवस्था में पड़ने से डरते रहतेहैं।

सन्‍्तो दिशन्ति चक्षूंसि बहिरकक: समुत्थितः ।देवता बान्धवा: सन्त: सन्त आत्माहमेव च ॥

३४॥

सनन्‍्तः--भक्तगण; दिशन्ति--प्रदान करते हैं; चक्षूंषि--आँखें; बहि:--बाहरी; अर्क:ः--सूर्य ; समुत्थित:ः --पूरी तरह उदय हुआ;देवता:--पूज्य देव; बान्धवा:--सम्बन्धीजन; सन्‍्तः--भक्तगण; सन्तः--भक्तगण; आत्मा--आत्मा; अहम्‌--मैं; एव च-- भी ।

मेरे भक्तगण दैवी आँखें प्रदान करते हैं जबकि सूर्य केवल बाह्य दृष्टि प्रदान करता है औरवह भी तब जब वह आकाश में उदय हुआ रहता है। मेरे भक्तगण ही मनुष्य के पूज्य देव तथाअसली परिवार हैं; वे स्वयं ही आत्मा हैं और वे मुझसे अभिन्न हैं।

बैतसेनस्ततोप्येवमुर्वश्या लोकनिष्पृह: ।मुक्तसड्री महीमेतामात्मारामश्चचार ह ॥

३५॥

वैतसेन:--राजा पुरूरवा; ततः अपि--इसी कारण से; एवम्‌--इस प्रकार; उर्वश्या:--उर्वशी का; लोक--उसी लोक में होने;निष्पृह:--इच्छा से रहित; मुक्त--मुक्त; सड्र:--सारी भौतिक संगति से; महीम्‌--पृथ्वी; एतामू--इस; आत्म-आराम:--आत्मतुष्ट; चचार--विचरण करने लगा; ह--निस्सन्देह

इस तरह उर्वशी के लोक में रहने की अपनी इच्छा त्याग कर महाराज पुरूरवा समस्तभौतिक संगति से मुक्त होकर तथा अपने भीतर पूरी तरह तुष्ट होकर पृथ्वी पर विचरण करनेलगे।

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