27. देवता पूजा की प्रक्रिया पर कृष्ण के निर्देश
शाश्रीउद्धव उवाचक्रियायोगं समाचक्ष्व भवदाराधन प्रभो ।यस्मात्त्वां ये यथार्चन्ति सात्वता: सात्वतर्षभ ॥
१॥
श्री-उद्धवः उबाच--श्री उद्धव ने कहा; क्रिया-योगम्--संस्तुत क्रिया-विधि; समाचक्ष्व--बतलाइये; भवत्--आपकी;आराधनम्--अर्चाविग्रह पूजा; प्रभो--हे प्रभु; यस्मात्ू--किस रूप पर आधारित; त्वाम्--तुमको; ये--जो; यथा--जिस भाँतिसे; अर्चन्ति--पूजते हैं; सात्वता:-- भक्तगण; सात्वत-ऋषभ--हे भक्तों के स्वामी |
श्री उद्धव ने कहा : हे प्रभु, हे भक्तों के स्वामी, आप कृपा करके मुझे अपने अर्चाविग्रहरूप में अपनी पूजा की नियत विधि बतलायें। अर्चाविग्रह की पूजा करने वाले भक्तों की क्याक्षमताएँ होती हैं? ऐसी पूजा किस आधार पर स्थापित है? तथा पूजा की विशिष्ट विधि कया है ? शाएतद्ठदन्ति मुनयो मुहुर्नि: श्रेयसं नृणाम् ।नारदो भगवान्व्यास आचार्योउड्डिस्स: सुतः ॥
२॥
एतत्--यह; वदन्ति--कहते हैं; मुन॒यः--मुनिजन; मुहुः--बारम्बार; नि: श्रेयसम्--जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य; नृणाम्--मनुष्योंके लिए; नारद:--नारद मुनि; भगवान् व्यास:-- श्रील व्यासदेव; आचार्य: --मेरे गुरु; अद्धिरसः--अंगिरा का; सुतः--पुत्र |
सारे मुनि बारम्बार घोषित करते हैं कि ऐसी पूजा से मनुष्य जीवन में बड़े-से-बड़ा सम्भवलाभ मिलता है। नारद मुनि, महान् व्यासदेव तथा मेरे अपने गुरु बृहस्पति का यही मत है।
निःसूतं ते मुखाम्भोजाद्ददाह भगवानज: ।पुत्रे भ्यो भृगुमुख्येभ्यो देव्ये च भगवान्भव: ॥
३॥
एतद्ठे सर्ववर्णानामा श्रमाणां च सम्मतम् ।श्रेयसामुत्तमं मन्ये स्त्रीशूद्राणां च मानद ॥
४॥
निःसृतम्--निकला; ते--आपके; मुख-अम्भोजात्--कमल-मुख से; यत्--जो; आह--कहा; भगवान्--महान् स्वामी;अजः--स्वतःजन्मे ब्रह्म; पुत्रेभ्य: --अपने पुत्रों द्वारा; भृगु-मुख्येभ्य:-- भूगु आदि; देव्यै--देवी पार्वती से; च--तथा; भगवान्भव:--शिवजी ने; एतत्--यह ( पूजा-विधि ); बै--निस्सन्देह; सर्व-वर्णानामू--सारे वर्णों; आश्रमाणाम्--तथा आश्रमों द्वारा;च--भी; सम्मतम्--स्वीकृत; श्रेयसाम्--जीवन में विभिन्न लाभों का; उत्तमम्--सर्व श्रेष्ठ; मन्ये--मैं मानता हूँ; स्त्री--स्त्रियों केलिए; शूद्राणामू--तथा निम्न श्रेणी के श्रमिकों के लिए; च--भी; मान-द--हे वदान्य प्रभु
हे वदान्य प्रभु, अर्चाविग्रह की इस पूजा-विधि के आदेश सर्वप्रथम आपने अपने कमलमुखसे दिये। तब ब्रह्माजी ने इन्हें भूगु इत्यादि अपने पुत्रों को दिया और शिवजी ने अपनी पत्नीपार्वती को दिया। यह विधि सभी वर्णों तथा आश्रमों द्वारा स्वीकार की जाती है और उनकेउपयुक्त है। इसलिए मैं अर्चाविग्रह के रूप में आपकी पूजा को, स्त्रियों तथा शूद्रों तक के लिएसमस्त आध्यात्मिक अभ्यासों में अत्यन्त लाभप्रद मानता हूँ।
एतत्कमलपत्राक्ष कर्मबन्धविमोचनम् ।भक्ताय चानुरक्ताय ब्रूहि विश्वेश्वेेश्वर ॥
५॥
शाएतत्--यह; कमल-पत्र-अक्ष--हे कमलनयन प्रभु; कर्म-बन्ध-- भौतिक कार्य के बन्धन से; विमोचनम्--मोक्ष का साधन;भक्ताय--आपके भक्तों से; अनुरक्ताय--अत्यन्त अनुरक्त; ब्रूहि--कृपया कहें; विश्व-ई श्वर--ब्रह्माण्ड के सारे प्रभुओं के;ईश्वर--हे परमेश्वर
है कमलनयन, हे ब्रह्माण्ड के सारे ईश्वरों के ईश्वर, कृपया अपने इस भक्त-दास को कर्म-बन्धन से मोक्ष का साधन बतलायें।
श्रीभगवानुवाचन हान्तोनन्तपारस्य कर्मकाण्डस्य चोद्धव ।सद्क्षिप्तं वर्णयिष्यामि यथावदनुपूर्वश: ॥
६॥
श्री-भगवान् उवाच-- भगवान् ने कहा; न--नहीं है; हि--निस्सन्देह; अन्तः--छोर; अनन्त-पारस्य-- असीम का; कर्म-काण्डस्य--पूजा करने की वैदिक संस्तुतियाँ; च--तथा; उद्द्वव--हे उद्धव; सड्क्षिप्तम्--संक्षेप में; वर्णयिष्यामि--बतलाऊँगा;यथा-वत्--उपयुक्त ढंग से; अनुपूर्वश:--उपयुक्त क्रम से
भगवान् ने कहा : हे उद्धव, अर्चाविग्रह पूजा करने के लिए इतने वैदिक उपाय हैं कि उनकाकोई अन्त नहीं है; इसलिए मैं यह विषय तुम्हें संक्षेप में एक-एक करके बतलाऊँगा।
वैदिकस्तान्त्रिको मिश्र इति मे त्रिविधो मख: ।त्रयाणामीप्सितेनेव विधिना मां समर्चरेत् ॥
७॥
वैदिकः--चारों वेदों के अनुसार; तान्त्रिक:--व्यावहारिक व्याख्यात्मक ग्रंथों के अनुसार; मिश्र:--मिश्रित; इति--इस प्रकार;मे--मेरा; त्रि-विध:--तीन प्रकार के; मख:--यज्ञ; त्रयाणामू--तीनों के; ईप्सितेन--जो सर्वाधिक उपयुक्त जान पड़े, उससे;एव--निश्चय ही; विधिना--विधि से; माम्--मुझको; समर्चरित्ू--ठीक से पूजे
मनुष्य को चाहिए कि वैदिक, तांत्रिक अथवा मिश्रित, इन तीन विधियों में से, जिनसे मैं यज्ञप्राप्त करता हूँ, किसी एक को चुन कर सावधानीपूर्वक मेरी पूजा करे।
शायदा स्वनिगमेनोक्तं द्विजत्व॑ प्राप्य पूरूष: ।यथा यजेत मां भक्त्या श्रद्धया तन्निबोध मे ॥
८॥
यदा--जब; स्व--अपनी योग्यता के अनुसार; निगमेन--वेदों के द्वारा; उक्तम्--आदेश दिया गया; द्विजत्वम्-द्विज बनने कापद; प्राप्प--प्राप्त करके ; पूरुष: --व्यक्ति; यथा--जिस तरह; यजेत--पूजा करे; माम्--मुझको; भक्त्या--भक्ति से;श्रद्धया-- श्रद्धा से; तत्ू--वह; निबोध--कृपया सुनें; मे--मुझसे |
अब तुम श्रद्धापूर्वक सुनो क्योंकि मैं बतला रहा हूँ कि किस तरह द्विज पद को प्राप्त व्यक्तिसंबद्ध वैदिक संस्तुतियों द्वारा भक्तिपूर्वक मेरी पूजा करे।
अर्चायां स्थण्डिलेः्ग्नौ वा सूर्य वाप्सु हृदि द्विज: ।द्रव्येण भक्तियुक्तोर्चेत्स्वगुरु माममायया ॥
९॥
अर्चायाम्ू--अर्चाविग्रह के रूप में भीतर; स्थण्डिले--पृथ्वी पर; अग्नौ--अग्नि में; वा--अथवा; सूर्य --सूर्य में; वा--अथवा;अप्सु--जल में; हृदि--हृदय में; द्विज:--ब्राह्मण; द्रव्येण--विविध साज-सामग्री से; भक्ति-युक्त:--भक्ति से युक्त; अर्चेत्--पूजा करे; स्व-गुरुमू--अपने आराध्य स्वामी की; माम्--मुझको; अमायया--किसी संशय से रहित होकर।
द्विज को चाहिए कि वह अपने आराध्य देव मुझको बिना द्वैत के मेरे अर्चाविग्रह पर प्रेममयीभक्ति के साथ उपयुक्त साज-सामग्री प्रदान करके पूजे अथवा पृथ्वी पर, अग्नि में, सूर्य में, जल शामें या पूजक के ही हृदय में प्रकट होने वाले मेरे रूप को पूजे।
पूर्व स्नान॑ प्रकुर्वीत धौतदन्तोड्रशुद्धये ।उभयैरपि च स्नान मन्त्रैरम॑द्ग्रहणादिना ॥
१०॥
पूर्वमू--पहले; स्नानम्ू--स्नान; प्रकुर्वीत--सम्पन्न करे; धौत--धोकर; दन्तः--दाँत; अड़--शरीर की; शुद्धये --शुद्धि केलिए; उभयै: --दोनों प्रकार की; अपि च--भी; स्नानमू--स्नान; मन्त्रै:--मंत्रों से; मृत्-ग्रहण-आदिना--मिट्टी इत्यादि पोतकरा
मनुष्य को चाहिए कि पहले वह अपने दाँत साफ करके तथा स्नान करके अपना शरीर शुद्धबनाये। तत्पश्चात् वह शरीर को मिट्टी से मल कर तथा वैदिक एवं तांत्रिक मंत्रों के उच्चारण द्वारादुबारा शुद्ध करे।
सन्ध्योपास्त्यादिकर्माणि वेदेनाचोदितानि मे ।पूजां तैः कल्पयेत्सम्यक्सड्डल्प: कर्मपावनीम् ॥
११॥
सन्ध्या--दिन की तीन सन्धियों ( प्रातः, दोपहर तथा सूर्यास्त ) पर; उपास्ति--पूजा करे ( गायत्री मंत्र का उच्चारण करके );आदि--इत्यादि; कर्माणि--नियत कार्य; वेदेन--वेदों द्वारा; आचोदितानि--संस्तुत; मे--मेरी; पूजाम्--पूजा; तैः--इन कार्योंसे; कल्पयेत्--सम्पन्न करे; सम्यक्-सड्डूल्प:--हढ़ संकल्प वाला; कर्म--कर्मफल; पावनीम्--समूल नष्ट कर देने वाला।
मनुष्य को चाहिए कि वह मन को मुझ पर स्थिर करके, अपने विविध नियत कार्यो द्वारा,यथा दिन में तीन संधियों पर गायत्री मंत्र का उच्चारण करके, मेरी पूजा करे। वेदों द्वारा ऐसेकार्यों का आदेश है और इनसे पूजा करने वाला अपने कर्मफलों से शुद्ध हो जाता है।
शैली दारुमयी लौही लेप्या लेख्या च सैकती ।मनोमयी मणिमयी प्रतिमाष्टविधा स्मृता ॥
१२॥
शैली--पत्थर की बनी; दारु-मयी--काष्ठ की बनी; लौही--धातु की बनी; लेप्या--मिट्टी, चन्दन आदि से बना; लेख्या--चित्रित; च--तथा; सैकती-- बालू की बनी; मन:ः-मयी--मन में विचारी गई; मणि-मयी--मणियों से बनी; प्रतिमा--अर्चाविग्रह; अष्ट-विधा--आठ प्रकार की; स्मृता--ऐसा स्मरण किया जाता है।
भगवान् के अर्चाविग्रह रूप का आठ प्रकारों में--पत्थर, काष्ठ, धातु, मिट्टी, चित्र, बालू,मन या रत्न में-- प्रकट होना बतलाया जाता है।
शाचलाचलेति द्विविधा प्रतिष्ठा जीवमन्दिरम् ।उद्वासावाहने न स्तः स्थिरायामुद्धवार्चने ॥
१३॥
चला--चल; अचला--अचल; इति--इस प्रकार; द्वि-विधा--दो प्रकार की; प्रतिष्टा--स्थापना; जीव-मन्दिरम्--समस्त जीवोंके आश्रय अर्चाविग्रह का; उद्बास--विसर्जन; आवाहने--तथा आवाहन; न स्तः--नहीं हैं; स्थिरायाम्--स्थायी रूप से स्थापितअर्चाविग्रह के लिए; उद्धव--हे उद्धव; अर्चने--पूजा में |
समस्त जीवों के शरण रूप भगवान् का अर्चाविग्रह दो प्रकारों से स्थापित किया जा सकताहै--अस्थायी रूप से अथवा स्थायी रूप से। किन्तु हे उद्धव, स्थायी अर्चाविग्रह का आवाहन होचुकने पर उसका विसर्जन नहीं किया जा सकता।
अस्थिरायां विकल्प: स्यात्स्थण्डिले तु भवेद्द्वयम् ।स्नपनं त्वविलेप्यायामन्यत्र परिमार्जनमम् ॥
१४॥
अस्थिरायाम्--अस्थायी अर्चाविग्रह के प्रसंग में; विकल्प: --विकल्प ( कि अर्चाविग्रह का आवाहन करना तथा विसर्जन करनाहै ); स्थातू-है; स्थण्डिले-- भूमि पर बने अर्चाविग्रह के प्रसंग में; तु--लेकिन; भवेत्--होते हैं; द्ृयम्--ये दो अनुष्ठान;स्नपनम्--स्नान; तु--लेकिन; अविलेप्यायाम्--जब अर्चाविग्रह मिट्टी ( चित्र या काष्ठ ) से नहीं बनाया जाता; अन्यत्र--अन्यदशाओं में; परिमार्जनम्--पूर्ण सफाई किन्तु जल के बिना।
जो अर्चाविग्रह अस्थायी रूप से स्थापित किया जाता है उसका आवाहन और विसर्जन शाविकल्प रूप में किया जा सकता है किन्तु ये दोनों अनुष्ठान तब अवश्य करने चाहिए जबअर्चाविग्रह को भूमि पर अंकित किया गया हो। अर्चाविग्रह को जल से स्नान कराना चाहिएयदि वह मिट्टी, रंजक या काष्ट से न बनाया गया हो। ऐसा होने पर जल के बिना ही ठीक सेसफाई करनी चाहिए।
द्रव्यै: प्रसिद्धैर्मनझाग: प्रतिमादिष्वमायिनः ।शाभक्तस्य च यथालब्धईदि भावेन चैव हि ॥
१५॥
द्ब्यै:--साज-सामग्री से; प्रसिद्धैः--सर्वोत्तम; मत्-याग:--मेरी पूजा; प्रतिमा-आदिषु--विभिन्न अर्चाविग्रह रूपों में;अमायिन:--इच्छारहित; भक्तस्य-- भक्त का; च--तथा; यथा-लब्धे: --जो भी साज-सामग्री सरलता से प्राप्त की जा सकती है;हृदि--हृदय में; भावेन--मानसिक संकल्पना द्वारा; च--तथा; एव हि--निश्चय ही मनुष्य को चाहिए कि उत्तम से उत्तम साज-सामग्री भेंट करके मेरे अर्चाविग्रह रूप में मेरीपूजा करे।
किन्तु भौतिक इच्छा से पूर्णतया मुक्त भक्त मेरी पूजा, जो भी वस्तु मिल सके उसी सेकरे, यहाँ तक कि वह अपने हृदय के भीतर मानसिक साज-सामग्री से भी मेरी पूजा कर सकताहै।
स्नानालड्डूरणं प्रेष्ठमर्चायामेव तूद्धव ।स्थण्डिले तत्त्वविन्यासो वह्लावाज्यप्लुतं हवि: ॥
१६॥
सूर्य चाभ्यईएं प्रेष्ठं सलिले सलिलादिभि: ।श्रद्धयोपाहत प्रेष्ठ भक्तेन मम वार्यपि ॥
१७॥
स्नान--स्नान; अलड्डरणम्--तथा वस्त्रों एवं गहनों से सजाना; प्रेष्ठम्--पसन्द किया जाता है; अर्चायाम्--अर्चाविग्रह रूप केलिए; एब--निश्चय ही; तु--तथा; उद्धव--हे उद्धव; स्थण्डिले--भूमि पर अंकित अर्चाविग्रह केलिए; तत्त्व-विन्यास: --मंत्रोच्चार द्वारा अर्चाविग्रह के विविध अंगों के भीतर भगवान् के अंशों तथा शक्तियों की स्थापना; बह्नौ--यज्ञ की अग्नि केलिए; आज्य--घी में; प्लुतम्--डूबा; हवि:--तिल, जौ, गुड़ आदि की आहुति; सूर्य--सूर्य के लिए; च--तथा; अभ्यहणम्--बारह आसनों का योग-ध्यान तथा अर्ध्य दान; प्रेष्ठमू-- अत्यन्त प्रिय; सलिले--जल के लिए; सलिल-आदिभि: --जल इत्यादिकी भेंटों से; श्रद्धया--श्रद्धा के साथ; उपाहृतम्--भेंट किया; प्रेष्ठम्-- अत्यन्त प्रिय; भक्तेन--भक्त द्वारा; मम--मेरा; वारि--जल; अपि--भी |शा
हे उद्धव, मन्दिर के अर्चाविग्रह की पूजा में स्नान कराना तथा सजाना सर्वाधिक मनोहारीभेटें हैं। पवित्र भूमि पर अंकित अर्चाविग्रह के लिए तत्त्वविन्यास ही सर्वाधिक रुचिकर विधि है।तिल तथा जौ को घी में सिक्त करके जो आहुतियाँ दी जाती हैं, उन्हें यज्ञ की अग्नि भेंट सेअधिक अच्छा माना जाता है, जबकि उपस्थान तथा अर्घ्य से युक्त पूजा सूर्य के लिए अच्छी मानीजाती है। मनुष्य को चाहिए कि जल को ही अर्पित करके जल के रूप में मेरी पूजा करे। वस्तुतःमेरे भक्त द्वारा श्रद्धापूर्वक मुझे जो कुछ अर्पित किया जाता है--भले ही वह थोड़ा-सा जल हीक्यों न हो--मुझे अत्यन्त प्रिय है।
भूर्यप्यभक्तोपाहतं न मे तोषाय कल्पते ।गन्धो धूप: सुमनसो दीपोउच्नाद्यं च कि पुनः ॥
१८॥
भूरि--ऐश्वर्यववान; अपि-- भी; अभक्त--अभ क्त द्वारा; उपाहतम्-- भेंट किया; न--नहीं; मे--मेरा; तोषाय--सन्तोष; कल्पते--उत्पन्न करते हैं; गन्ध: --सुगन्धि; धूप:--धूप; सुमनस:--फूल; दीप:--दीपक; अन्न-आद्यमू-- भोजन सामग्री; च--तथा; किम्पुनः--क्या कहा जाय।
बड़ी से बड़ी ऐश्वर्यपूर्ण भेंट भी मुझे तुष्ट नहीं कर पाती यदि वे अभक्तों द्वारा प्रदान कीजायाँ। किन्तु मैं अपने प्रेमी भक्तों द्वारा प्रदत्त तुच्छ से तुच्छ भेंट से भी प्रसन्न हो जाता हूँ और जबसुगंधित तेल, अगुरु, फूल तथा स्वादिष्ट भोजन की उत्तम भेंट प्रेमपूर्वक चढ़ाई जाती हैं, तो मैंनिश्चय ही सर्वाधिक प्रसन्न होता हूँ।
शाशुचिः सम्भृतसम्भारः प्राग्दर्भ: कल्पितासन: ।आसीन: प्रागुदग्वार्चेदर्चायां त्वथ सम्मुख: ॥
१९॥
शुचिः--पवित्र; सम्भूत--एकत्र करके; सम्भार:--साज-सामग्री; प्राकु--उनके सिरे पूर्व की ओर निर्देशित; दर्भ:--कुश द्वारा;'कल्पित--व्यवस्थित करके; आसन:--अपने आसन पर; आसीन:--बैठा हुआ; प्राक्--पूर्वांभिमुख; उदक्--उत्तराभिमुख;वा--अथवा; अर्चेत्--पूजा करे; अर्चायाम्--अर्चाविग्रह का; तु--लेकिन; अथ--अथवा; सम्मुख:--सामने |
अपने को स्वच्छ करके तथा सारी सामग्री एकत्र करके पूजक को चाहिए कि अपना आसनपूर्वाभिमुख कुश से बनाये। तब वह पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठे अन्यथा यदिअर्चाविग्रह किसी स्थान पर स्थिर है, तो अर्चाविग्रह के समक्ष बैठे।
कृतन्यासः कृतन्यासां मरदर्चा पाणिनामृजेतू ।कललशं प्रोक्षणीयं च यथावदुपसाधयेत् ॥
२०॥
कृत-न्यास:--अपने शरीर को पवित्र कर चुकने पर ( विभिन्न अंगों का स्पर्श करके तथा उपयुक्त मंत्रों का उच्चारण करकेभगवान् के संगत स्वरूप का ध्यान करते हुए ); कृत-न्यासाम्--जिस अर्चाविग्रह पर यही विधि अपनाई गई हो; मत्-अर्चाम्--मेरा अर्चाविग्रह रूप; पाणिना--हाथ से; आमृजेत्--साफ करे ( पुरानी भेंट के जूठन को हटाकर ); कलशम्--शुभ वस्तुओं सेभरे पात्र को; प्रोक्षणीयम्--छिड़कने के लिए जल से भरा पात्र; च--तथा; यथा-वत्--उपयुक्त रीति से; उपसाधयेत्--तैयारकरे
भक्त को चाहिए कि अपने शरीर के विभिन्न अंगों का स्पर्श करके तथा मंत्रोच्चारण करतेहुए उन्हें पवित्र बनाये। उसे मेरे अर्चाविग्रह रूप के साथ भी ऐसा ही करना चाहिए और तब उसे शाअपने हाथों से अर्चाविग्रह पर चढ़े पुराने फूलों तथा अन्य भेटों को हटाना चाहिए। उसे पवित्रकलश ( पात्र ) तथा छिड़कने के लिए जल से भरा पात्र भी उचित ढंग से तैयार करना चाहिए।
तदद्धिर्देवयजन द्रव्याण्यात्मानमेव च ।प्रोक्ष्य पात्राणि त्रीण्यद्धिस्तैस्तैद्रव्यै श्र साधयेत् ॥
२१॥
तत्--छिड़कने के उस पात्र के; अद्धिः--जल से; देव-यजनम्--स्थान जहाँ देवता की पूजा की जाती है; द्रव्याणि--साज-सामग्री; आत्मानम्--अपना शरीर; एव--निस्सन्देह; च--भी; प्रोक्ष्य--छिड़क कर; पात्राणि--पात्र, बर्तन; त्रीणि--तीन;अद्धिः--जल से; तैः तैः--जो उपलब्ध हों उन उनसे; द्र॒व्यैः--शुभ वस्तुओं से; च--तथा; साधयेत्--व्यवस्था करे।
तब उस प्रोक्षणीय पात्र से वह उस स्थान पर पानी छिड़के जहाँ अर्चाविग्रह की पूजा की जारही हो, जहाँ भेंटे चढ़ाई जानी हों तथा साथ ही अपने शरीर पर भी पानी छिड़के। तत्पश्चात् वहजल से भरे तीन पात्रों को विविध शुभ वस्तुओं से सजाये।
पाद्यार्ष्याचमनीयार्थ त्रीणि पात्राणि देशिक: ।हृदा शीर्ष्णाथ शिखया गायत्र्या चाभिमन्त्रयेत् ॥
२२॥
पाद्य--भगवान् के चरणों को पखारने के लिए जल; अर्ध्य--आदर-भाव से सत्कार हेतु भगवान् को अर्पित होने वाला जल;आचमनीय--तथा भगवान् का मुख धोने के लिए अर्पित किया गया जल; अर्थम्--के लिए रखा गया; त्रीणि--तीन;पात्राणि--पात्र; देशिक: --पूजा करने वाला; हृदा--हृदय मंत्र से; शीर्ष्णा--' सिर ' मंत्र से; अथ--तथा; शिखया--शिखामंत्र से; गायत्र्या--तथा गायत्री मंत्र से; च-- भी; अभिमन्त्रयेत्ू--उच्चारण करते हुए शुद्ध करे।
तब पूजा करने वाला इन तीनों पात्रों को शुद्ध करे। उसे चाहिए कि भगवान् के चरणपखारने के लिए जल वाले पात्र को हृदयाय नमः मंत्र से पवित्र करे; अर्घ्य के लिए जल-पात्र कोप्विससे स्वाह्म मंत्र से तथा भगवान् का मुख धोने वाले जल के पात्र को शिखाये वषद् मंत्र का शाउच्चारण करके पवित्र बनाये। साथ ही, इन तीनों पात्रों के लिए गायत्री मंत्र का भी उच्चारणकरे।
पिण्डे वाय्वग्निसंशुद्धे हृत्पदास्थां परां मम ।अण्वीं जीवकलां ध्यायेन्नादान्ते सिद्धभाविताम् ॥
२३॥
पिण्डे--शरीर के भीतर; वायु--वायु; अग्नि--तथा अग्नि द्वारा; संशुद्धे-पूर्णतया शुद्ध हुआ; हृत्ू--हदय के; पद्य--कमलपर; स्थाम्--स्थित; परामू--दिव्य रूप; मम--मेरा; अण्वीम्--अत्यन्त सूक्ष्म; जीव-कलाम्-- भगवान् जिनसे सारे जीव विस्तारपाते हैं; ध्यायेत्-- ध्यान करे; नाद-अन्ते-- ४ की ध्वनि के अन्त में; सिद्ध--सिद्ध मुनि; भावितामू-- अनुभवी |
पूजा करने वाले को चाहिए कि वह मेरे सूक्ष्म रूप को, जो अब वायु तथा अग्नि से पवित्रहुए पूजा करने वाले के शरीर के भीतर स्थित होता है, समस्त जीवों के स्त्रोत रूप में ध्यान करे।भगवान् का यह रूप पवित्र अक्षर की ध्वनि के अन्त में स्वरूपसिद्ध मुनियों द्वारा अनुभवकिया जाता है।
तयात्मभूतया पिण्डे व्याप्ते सम्पूज्य तन््मय: ।आवाह्यार्चादिषु स्थाप्य न्यस्ताडुं मां प्रपूजयेत् ॥
२४॥
तया--ध्यान किये गये स्वरूप द्वारा; आत्म-भूतया-- अपनी अनुभूति के अनुसार सोचा गया; पिण्डे-- भौतिक शरीर में;व्याप्ते--व्याप्त; सम्पूज्य--उस रूप की भलीभाँति पूजा करके; तत्-मयः--उसकी उपस्थिति से युक्त; आवाह्य--आवाहनकरके; अर्चा-आदिषु--पूजा किये जाने वाले विभिन्न अर्चाविग्रहों के भीतर; स्थाप्य--स्थापित करके; न्यस्त-अड्भम्--उपयुक्तमंत्रों का उच्चारण करते हुए अर्चाविग्रह के विविध अंगों को छूकर; माम्--मुझको; प्रपूजयेत्--पूजा करे
भक्त परमात्मा का ध्यान करता है, जिसकी उपस्थिति भक्त के शरीर को उसकी अनुभूति केअनुसार अधिक भर देती है। इस तरह भक्त अपनी सामर्थ्य-भर भगवान् की पूजा करता है औरउन्हीं में लीन हो जाता है। अर्चाविग्रह के विभिन्न अंगों का स्पर्श करके तथा उपयुक्त मंत्रोच्चारकरके भक्त को चाहिए कि वह परमात्मा को अर्चाविग्रह रूप में आने के लिए आमंत्रित करे औरतब वह मेरी पूजा करे।
शापाद्योपस्पर्शाईणादीनुपचारान्प्रकल्पयेत् ।धर्मादिभिश्व नवभि: कल्पयित्वासनं मम ॥
२५॥
पद्ममष्टदलं तत्र कर्णिकाकेसरोज्वलम् ।उभाभ्यां वेदतन्त्राभ्यां महं तूभयसिद्धये ॥
२६॥
पाद्य--भगवान् के चरण पखारने के लिए जल; उपस्पर्श--भगवान् का मुख धोने के लिए जल; अर्हण--अर्ध्य के रूप में भेंटकिया गया जल; आदीनू्--तथा अन्य वस्तुएँ; उपचारानू--भेंटें; प्रकल्पयेत्--चढ़ाये; धर्म-आदिभि:--धर्म, ज्ञान, वैराग्य तथाऐश्वर्य के साकार रूपों के सहित; च--तथा; नवभि:--नौ ( भगवान् की शक्तियों ); कल्पयित्वा--कल्पना करके; आसनमू--आसन; मम--ेरा; पदामम्--कमल; अष्ट-दलम्--आठ पंखड़ियों वाला; तत्र--उसमें; कर्णिका--कोश में; केसर--केसर से;उज्वलम्--तेजवान; उभाभ्याम्--दोनों साधनों से; वेद-तन्त्राभ्याम्-वेदों तथा तंत्रों से; महाम्--मुझको; तु--तथा; उभय--दोनों ( भोग तथा मोक्ष ) की; सिद्धये--प्राप्ति हेतु
पूजा करने वाले को चाहिए कि सर्वप्रथम मेरे आसन को धर्म, ज्ञान, त्याग तथा ऐश्वर्य केसाक्षात् देवों से तथा मेरी नौ आध्यात्मिक शक्तियों से अलंकृत होने की कल्पना करे। वहभगवान् के आसन को आठ पंखड़ियों वाले कमल के रूप में मान ले जो अपने कोश के भीतरकेसर तन्तुओं से तेजवान है। तब वेदों तथा तंत्रों के नियमानुसार वह पाँव धोने का जल, मुखसाफ करने का जल, अर्घ्य तथा पूजा की अन्य वस्तुएँ मुझे अर्पित करे। इस विधि से उसे भौतिकभोग तथा मोक्ष दोनों की प्राप्ति होती है।
सुदर्शन पाञ्जजन्यं गदासीषुधनुईलान् ।मुषलं कौस्तुभं मालां श्रीवत्सं चानुपूजयेत् ॥
२७॥
शासुदर्शनम्-- भगवान् का चक्र; पाञ्जजन्यम्-- भगवान् का शंख; गदा--उनकी गदा; असि--तलवार; इषु--तीर; धनुः--धनुष;हलानू--तथा हल; मुषलम्--मुषल हथियार; कौस्तुभम्--कौस्तुभ मणि; मालाम्--उनकी माला; श्रीवत्सम्--उनके वक्षस्थलपर सुशोभित श्रीवत्स; च--तथा; अनुपूजयेत्--एक के बाद एक पूजे।
मनुष्य को चाहिए कि भगवान् के सुदर्शन चक्र, उनके पाझ्जजन्य शंख, उनकी गदा,तलवार, धनुष, बाण तथा हल, उनके मूसल, उनकी कौस्तुभ मणि, उनकी फूलमाला तथा उनकेवक्षस्थल के केश-गुच्छ श्रीवत्स की पूजा इसी क्रम से करे।
नन्दं सुनन्दं गरुडं प्रचण्डं चण्डं एव च ।महाबलं बलं चैव कुमुदं कमुदेक्षणम् ॥
२८॥
नन्दम् सुनन्दम् गरूडम्--नन्द, सुनन्द तथा गरुड़ नामक; प्रचण्डम् चण्डम्--प्रचण्ड तथा चण्ड; एब--निस्सन्देह; च-- भी;महा-बलम् बलम्--महाबल तथा बल; च--तथा; एव--निस्सन्देह; कुमुदम् कुमुद-ईक्षणम्--कुमुद तथा कुमुदेक्षण |
मनुष्य को चाहिए कि नन्द, सुनन्द, गरुड़, प्रचण्ड तथा चण्ड, महाबल तथा बल एवं कुमुदतथा कुमुदेक्षण नामक भगवान् के संगियों की पूजा करे।
दुर्गा विनायकं व्यासं विष्वक्षेनं गुरून्सुरान् ।स्वे स्वे स्थाने त्वभिमुखान्पूजयेत्प्रोक्षणादिभि: ॥
२९॥
दुर्गामू-- भगवान् की आध्यात्मिक शक्ति; विनायकम्--आदि गणेश; व्यासमू--वेद के संग्राहक; विष्वक्सेनम्--विष्वक्सेन;गुरून्ू--अपने गुरुओं; सुरान्ू--देवताओं; स्वे स्वे--अपने अपने; स्थाने--स्थान पर; तु--तथा; अभिमुखान्--अर्चा विग्रह कीओर मुख करके; पूजयेत्--पूजा करे; प्रोक्षण-आदिभि:--शुद्द्धि के लिए जल छिड़कने आदि की विविध क्रियाओं द्वारा |
मनुष्य को चाहिए कि वह प्रोक्षण इत्यादि भेंटों से दुर्गा, विनायक, व्यास, विष्वक्सेन,गुरुओं तथा विविध देवताओं की पूजा करे। इन सारे व्यक्तियों को भगवान् के अर्चाविग्रह कीओर मुख किए हुए अपने अपने स्थानों में होना चाहिए।
शाकान कमा ; मागुरुवासितैः: ।सलिलै: स्नापयेन्मजर्मित्यदा विभवे सति ॥
३०॥
स्वर्णघर्मानुवाकेन महापुरुषविद्यया ।पौरुषेणापि सूक्तेन सामभी राजनादिभि: ॥
३१॥
चन्दन--चन्दन का लेप; उशीर--उशीर या खस; कर्पूर--कपूर; कुट्ढू म--सिंदुर; अगुरु--अगुरु से; वासितै: --सुगन्धितबनाया गया; सलिलै:--विभिन्न प्रकार के जल से; स्नापयेत्--अर्चाविग्रह को नहलाये; मन्त्रै: --मंत्रों से; नित्यदा--प्रतिदिन;विभवे--पूँजी; सति--हैं; स्वर्ण-घर्म-अनुवाकेन--स्वर्ण-धर्म नामक वेदों के अध्याय से; महा-पुरुष-विद्यया--महापुरुषनामक मंत्र द्वारा; पौरुषेण --पुरुष सूक्त द्वारा; अपि-- भी; सूक्तेन--वैदिक स्तुति; सामभि:ः--सामवेद से गीतों द्वारा; राजन-आदिभि:--राजन नामक तथा अन्य |
पूजा करने वाले को चाहिए कि अपनी आर्थिक सामर्थ्य के अनुसार प्रतिदिन अर्चाविग्रह कोस्नान कराने के लिए चन्दन-लेप, उशीर, कपूर, कुंकुम तथा अगुरु से सुगंधित किए गए जलका प्रयोग करे। उसे विविध वैदिक स्तुतियों का भी, यथा अनुवाक जो कि स्वर्ण-घर्म कहलातीहै, महापुरुष विद्या, पुरुष सूक्त तथा सामवेद के विविध गीतों यथा राजन तथा रोहिण्य का भीउच्चारण करना चाहिए ॥
वस्त्रोपवीताभरणपत्रस्त्रग्गन्धलेपनै: ।अलहड्डू वीत सप्रेम मद्भक्तो मां चथोचितम् ॥
३२॥
वस्त्र--कपड़े; उपवीत--ब्राह्मण का जनेऊ; आभरण--गहने; पत्र--तिलक से शरीर के विविध अंगों को सजाना; सत्रक्--माला; गन्ध-लेपनैः--तथा सुगन्धित तेलों का लेपन; अलह्ढु बीत--अलंकृत करे; स-प्रेम--प्रेमपूर्वक; मत्-भक्त:--मेरा भक्त;माम्--मुझको; यथा उचितम्--जैसा आदेश हो।
तब मेरे भक्त को चाहिए कि वह मुझे वस्त्रों, जनेऊ, विविध आभूषनों, तिलक के चिन्हतथा मालाओं से अच्छी तरह अलंकृत करे और मेरे शरीर पर सुगन्धित तेल का नियत विधि से शालेप करे।
पाद्यमाचमनीयं च गन्धं सुमनसो क्षतान् ।धूपदीपोपहार्याणि दद्यान्मे श्रद्धयार्चक: ॥
३३॥
पाद्यम्ू--पाँव धोने का जल; आचमनीयम्--मुँह धोने का जल; च--तथा; गन्धम्--सुगन्धि; सुमनस:--फूल; अक्षतान्--अखण्डित बीज ( चावल ); धूप--अगुरु; दीप--दीपक; उपहार्याणि--साज-सामग्री की वस्तुएँ; दद्यातू-- प्रदान करे; मे--मुझको; श्रद्धया--श्रद्धापूर्वक; अर्चकः:--पूजा करने वाला।
पूजक को चाहिए कि वह मेरे पाँव तथा मुँह धोने के लिए जल, सुगन्धित तेल, फूल, अक्षततथा इसी के साथ अगुरु, दीपक तथा अन्य भेंटें भी दे।
गुडपायससर्पीषि शष्कुल्यापूषमोदकान् ।संयावदधिसूपां श्व नैवेद्यं सति कल्पयेत् ॥
३४॥
गुड--गुड़; पायस--खीर; सर्पीषि--तथा घी; शष्कुली--चावल के आटे, चीनी तथा तिल से बनी और घी में तली गई पूड़ी;आपूप--मीठा व्यंजन; मोदकानू--लह्ू » संयाव--आटा, घी तथा दूध से बनी आयताकार रोटी जिस पर चीनी तथा मसालाचुपड़ा हो; दधि--दही; सूपान्ू--तरकारी का शोरवा; च--तथा; नैवेद्यमू-- भोजन की भेंट; सति--यदि उसके पास पर्याप्तसाधन हों; कल्पयेत्-- भक्त व्यवस्था करे।
अपने साधनों के ही अन्तर्गत भक्त को चाहिए कि मुझे भेंट करने के लिए गुड़, खीर, घी,शष्कुली ( पूड़ी ) आपूप, मोदक, संयाव--दही, शोरबा तथा अन्य स्वादिष्ट भोजन भेंट करनेके लिए व्यवस्था करे।
शाअभ्यड़ोन्मर्दनादर्शदन््तधावाभिषेचनम् ।अन्नाद्यगीतनृत्यानि पर्वणि स्युरुतान्वहम् ॥
३५॥
अभ्यड़र--उबटन से; उन्मर्दन--मालिश; आदर्श--दर्पण दिखाना; दन््त-धाव--दाँत साफ करना; अभिषेचनम्--स्नान; अन्न--बिना चबाये खाया जाने वाला भोजन; आद्य--चबाकर खाया जाने वाला भोजन; गीता--गाना; नृत्यानि--तथा नाच;पर्वणि--विशेष उत्सवों पर; स्यु;--करे; उत--या फिर ( यदि सम्भव हो तो ); अनु-अहम्--प्रतिदिन |
विशेष अवसरों पर और यदि सम्भव हो तो नित्यप्रति अर्चाविग्रह को उबटन लगाया जाय,दर्पण दिखाया जाय, दाँत साफ करने के लिए नीम की दातून दी जाय, पाँच प्रकार के अमृत( पंचामृत ) से नहलाया जाय, विविध उच्च कोटि के व्यंजन भेंट किये जायँ तथा उनका गायनऔर नृत्य से मनोरंजन किया जाय।
विधिना विहिते कुण्डे मेखलागर्तवेदिभि: ।अग्निमाधाय परितः समूहेत्पाणिनोदितम् ॥
३६॥
शाविधिना--शास्त्रोक्त विधि से; विहिते--निर्मित; कुण्डे--यज्ञशाला में; मेखला--कमर की पेटी; गर्त--यज्ञ का गटड्ढा;वेदिभि:--तथा बेदी; अग्निमू--अग्नि; आधाय--स्थापित करके; परित:--चारों ओर; समूहेत्ू--बनाये; पाणिना--हाथों से;उदितम्--प्रज्वलित |
भक्त को चाहिए कि शास्त्रोक्ति विधि से तैयार की गईं यज्ञशाला में अग्नि-यज्ञ करे जिसमेंबह पवित्र पेटी ( मेखला ), यज्ञ-कुण्ड तथा वेदी का प्रयोग करे। यज्ञ-अग्नि जलाते समय भक्तको चाहिए कि अपने हाथों से चिनी गई लकड़ियों को प्रज्वलित करे।
परिस्तीर्याथ पर्युक्षेदन्बाधाय यथाविधि ।प्रोक्षण्यासाद्य द्र॒व्याणि प्रोक्ष्याग्नी भावयेत माम् ॥
३७॥
परिस्तीर्य--( कुश ) फैलाकर; अथ--तब ; पर्युक्षेत्--जल का छिड़काव करे; अन्वाधाय--अन्वाधान ( ओउम् भूर्भुवः स्व: काउच्चारण करते हुए अग्नि में लकड़ी रखे ) करते हुए; यथा-विधि--मानक संस्तुति के अनुसार; प्रोक्षणया--आचमन पात्र में सेजल द्वारा; आसाद्य--सजाकर के; द्र॒व्याणि--आहुति में डाले जाने वाले पदार्थ; प्रोक्ष्यम--उन पर छिड़क कर; अग्नौ--अग्नि में;भावयेत--ध्यान करे; माम्--मेरा |
जमीन पर कुश फैलाकर तथा उस पर जल छिड़कने के बाद, नियत विधियों के अनुसारअन्वाधान किया जाय। तत्पश्चात् आहुति में डाले जाने वाली वस्तुओं को व्यवस्थित करे औरउन्हें पात्र में से जल छिड़क कर पवित्र बनाये। इसके बाद पूजा करने वाला अग्नि के भीतर मेराध्यान करे।
तप्तजाम्बूनदप्रख्यं शद्गुच्क्रगदाम्बुजै: ।लसच्चतुर्भुजं शान्तं पद्दाकिश्लल्कवाससम् ॥
३८॥
स्फुरत्किरीटकटक कटिसूत्रवराड्रदम् ।श्रीवत्सवक्षसं भ्राजत्कौस्तुभं वनमालिनम् ॥
३९॥
ध्यायन्नभ्यर्च्य दारूणि हविषाभिघृतानि च ।प्रास्याज्यभागावाघारौ दच्त्वा चाज्यप्लुतं हवि: ॥
४०॥
जुहुयान्मूलमन्त्रेण घोडशर्चावदानतः ।धर्मादिभ्यो यथान्यायं मन्त्रै: स्विष्टिकृतं बुध: ॥
४१॥
तप्त--पिघला; जाम्बू-नद--स्वर्ण का; प्रख्यम्ू--रंग; शट्बडु--शंख; चक्र --चक्र; गदा--गदा; अम्बुजै:--तथा कमल के फूलसे युक्त; लसत्ू--तेजवान; चतु:-भुजम्--चार भुजाओं वाले; शान्तम्--शान्त; पद्य--कमल के; किल्लल्क--तन्तुओं के रंग शावाला; वाससम्--वस्त्र; स्फुरत्--चमकता हुआ; किरीट--मुकुट; कटक--कंगन; कति-सूत्र--पेटी, करधनी; वर-अड्भरदम्--बाँह का सुन्दर आभूषण, बाजूबन्द; श्री-वत्स--लक्ष्मीजी का प्रतीक; वक्षसम्--अपनी छाती पर; भ्राजत्ू--तेजवान;कौस्तुभम्--कौस्तुभ मणि; वन-मालिनम्--फूल की माला पहने; ध्यायन्--उनका ध्यान करते हुए; अभ्यर्च्य--उनकी पूजाकरे; दारूणि--सूखी लकड़ी के खण्ड; हविषा--शुद्ध घृत से; अभिघृतानि--सिक्त; च--तथा; प्रास्थ--अग्नि में डाल कर;आज्य--घी का; भागौ--दो भाग; आघारौ--आधार अनुष्ठान करते समय; दत्त्वा--प्रदान करके; च--तथा; आज्य--घी से;प्लुतम्--सिक्त; हवि:--आहुति, सामग्री; जुहुयातू--अग्नि में डाले; मूल-मन्त्रेण--हर एक अर्चाविग्रह का नाम लेकर मूल मंत्रसे; षोडश-ऋचा--पुरुष सूत्र के सोलह पंक्ति वाले श्लोक की स्तुति से; अवदानत:--हर पंक्ति के बाद आहुति डालते हुए;धर्म-आदिभ्य:--यमराज इत्यादि देवताओं को; यथा-न्यायम्--उचित क्रम से; मन्त्रै:--प्रत्येक देवता का नाम लेकर विशिष्ट मंत्रसे; स्विष्टि-कृतम्-स्विष्टि नामक अनुष्ठान; बुध:--बुद्धिमान भक्त |
बुद्धिमान भक्त को चाहिए कि वह भगवान् के उस रूप का ध्यान करे जिसका रंग पिघलेसोने जैसा, जिसकी चारों भुजाएँ शंख-चक्र-गदा तथा कमल-फूल से शोभायमान हैं तथा जोसदैव शान्त रहता है और कमल के फूल के भीतर के तन्तुओं जैसा रंगीन वस्त्र पहने रहता है।उनका मुकुट, कंगन, करधनी तथा बाजूबन्द खूब चमकते रहते हैं। उनके वक्षस्थल पर श्रीवत्सका चिन्ह, चमकीली कौस्तुभ मणि तथा जंगली फूलों की माला रहती है। तत्पश्चात् भक्त को घीमें डूबी लकड़ियों को लेकर उन्हें अग्नि में डालते हुए भगवान् की पूजा करनी चाहिए। उसेआधार अनुष्ठान करना चाहिए जिसमें घी में सिक्त सारी आहुति-सामग्री अग्नि को अर्पित कीजाती है। तत्पश्चात् उसे यमराज इत्यादि सोलह देवताओं को स्विष्टि कृत नामक आहुति देनीचाहिए जिसमें प्रत्येक देवता के मूल मंत्रों का तथा पुरुष सूक्त की सोलह पंक्तियों का उच्चारणकिया जाता है। पुरुष सूक्त की प्रत्येक पंक्ति के बाद एक आहुति डाल कर, उसे प्रत्येक देवताका नाम लेकर विशेष मंत्र का उच्चारण करना चाहिए।
अभ्यर्च्याथ नमस्कृत्य पार्षदेभ्यो बलि हरेत् ।मूलमन्त्रं जपेद्गह्म स्मरन्नारायणात्मकम् ॥
४२॥
अभ्यर्च्य--पूजा करके; अथ--तब; नमस्कृत्य--नमस्कार करके ; पार्षदेभ्य:-- भगवान् के निजी संगियों को; बलिमू-- भेंट;हरेत्ू-- भेंट करे; मूल-मन्त्रमू--मूल मंत्र; जपेत्ू--चुपके से उच्चारण करे; ब्रह्म--परब्रह्म का; स्मरन्ू--स्मरण करते हुए;नारायण-आत्मकम्-- भगवान् नारायण के रूप में
इस तरह यज्ञ-अग्नि में भगवान् की पूजा करके भक्त को चाहिए कि भगवान् के निजीसंगियों को झुक कर नमस्कार करे और तब उन्हें उपहार भेंट करे। तब वह भगवान् केअर्चाविग्रह का मूल मंत्र मम ही मन जपे और भगवान् नारायण के रूप में परब्रह्म का स्मरणकरे।
शादत्त्वाचमनमुच्छेषं विष्वक्षेनाय कल्पयेत् ।मुखवासं सुरषिमत्ताम्बूलाद्यमथाहईयेत् ॥
४३॥
दत्त्वा--प्रदान करके; आचमनम्-- भगवान् का मुँह धोने का जल; उच्छेषम्-- भोजन का जूठन; विष्वक्सेनाय-- भगवान् विष्णुके निजी संगी विष्वक्सेन को; कल्पयेत्--दे; मुख-वासम्--मुख शुद्धि; सुरभि-मत्--सुगन्धित; ताम्बूल-आद्यमू--पानइत्यादि; अथ--तब; अ्हयेत्-- भेंट करे।
वह एक बार फिर अर्चाविग्रह को मुख धोने के लिए जल दे और जो भोजन बचा हो उसेविष्वक्सेन को दे दे। तत्पश्चात् वह अर्चाविग्रह को सुगंधित मुख शुद्धि एवं लगा हुआ पान काबीड़ा दे।
उपगायन्गृणन्रृत्यन्कर्माण्यभिनयन्मम ।मत्कथा: श्रावयन्श्रण्वन्मुहूर्त क्षिणकों भवेत् ॥
४४॥
उपगायन्-गाते हुए; गृणन्--तेजी से उच्चारण करते हुए; नृत्यनू--नाचते हुए; कर्माणि--दिव्य कार्य; अभिनयन्--नाटक द्वाराअनुकरण करते हुए; मम--मेरा; मत्-कथा:--मेरे सम्बन्ध में कथाएँ; श्रावयन्--सुनाते हुए; श्रृण्वन्--स्वयं सुनते हुए;मुहूर्तम्--कुछ समय के लिए; क्षणिक:--उत्सव में लीन; भवेत्--हो जाय
अन्यों के साथ गाते, जोर से कीर्तन करते तथा नाचते, मेरी दिव्य लीलाओं का अभिनयकरते तथा मेरे विषय में कथाएँ सुनते तथा सुनाते हुए भक्त को चाहिए कि कुछ समय के लिएऐसे उत्सव में लीन हो जाय।
स्तवैरुच्चावचै: स्तोत्रै: पौराणै: प्राकृतेरपि ।स्तुत्वा प्रसीद भगवत्निति बन्देत दण्डवत् ॥
४५॥
शास्तवैः--शास्त्रों से स्तुतियों द्वारा; उच्च-अवचै:--बड़ी तथा छोटी किस्मों के; स्तोत्रै:--मनुष्यों द्वारा रचित प्रार्थनाओं से;पौराणैः -- पुराणों से; प्राकृतेः--सामान्य स्त्रोतों से; अपि-- भी; स्तुत्वा-- भगवान् की स्तुति करके; प्रसीद--कृपया अपनी दयादिखायें; भगवन्--हे प्रभु; इति--ऐसा कहते हुए; बन्देत--वन्दना करे; दण्ड-वत्-- भूमि पर डंडे की तरह गिर कर।
भक्त को चाहिए कि पुराणों तथा अन्य प्राचीन शास्त्रों तथा सामान्य परम्परा के अनुसारसभी प्रकार की स्तुतियों तथा प्रार्थनाओं से भगवान् का सत्कार करे। उसे चाहिए कि, ' हे प्रभु,मुझ पर दयालु हों ' ऐसी प्रार्थना करते हुए पृथ्वी पर दण्ड की तरह गिर कर नमस्कार करे।
शिरो मत्पादयो: कृत्वा बाहुभ्यां च परस्परम् ।प्रपन्नं पाहि मामीश भीत मृत्युग्रहार्णवात् ॥
४६॥
शिरः--अपना सिर; मत्ू-पादयो: --मेरे दोनों चरणों पर; कृत्वा--रख कर; बाहुभ्याम्-हाथों से; च--तथा; परस्परम्--एकसाथ ( अर्चाविग्रह के दोनों पाँव पकड़ कर ); प्रपन्नमू--शरणागत; पाहि--रक्षा करें; मामू--मुझको; ईश-हे प्रभु;भीतम्--डरा हुआ; मृत्यु--मृत्यु का; ग्रह--मुख; अर्णवात्-- भौतिक सागर के |
अर्चाविग्रह के चरणों पर अपना सिर रख कर और तब भगवान् के समक्ष हाथ जोड़े खड़ेहोकर, उसे प्रार्थना करनी चाहिए 'हे प्रभु, मैं आपकी शरण में हूँ। कृपा करके मेरी रक्षा करें। मैंइस भवसागर से अत्यन्त भयभीत हूँ क्योंकि मैं मृत्यु के मुख पर खड़ा हूँ।
'इति शेषां मया दत्तां शिरस्याधाय सादरम् ।उद्दासयेच्चेदुद्वास्यं ज्योतिर्ज्योतिषि तत्पुन: ॥
४७॥
इति--इस प्रकार प्रार्थना करते हुए; शेषाम्--जूठन; मया--मेरे द्वारा; दत्तामू--दिया हुआ; शिरसि--सिर पर; आधाय--रखकर; स-आदरम्--आदरपूर्वक; उद्दासयेत्-- अर्चाविग्रह को विदा करे; चेत्--यदि; उद्बास्यम्ू--ऐसा करना ही हो; ज्योति: --प्रकाश; ज्योतिषि--प्रकाश के भीतर; तत्--वह; पुनः--एक बार फिर
इस प्रकार प्रार्थना करता हुआ भक्त अपने सिर पर मेरे द्वारा प्रदत्त उच्छिष्ठ को आदर-सहितरखे। और यदि उस अर्चाविग्रह का पूजा के अन्त में विसर्जन करना हो, तो भक्त को अपने हृदयके भीतर के कमल के प्रकाश के अन्दर अर्चाविग्रह की उपस्थिति के प्रकाश को एक बार पुनःधारण करना चाहिए ॥
अर्चादिषु यदा यत्र श्रद्धा मां तत्र चार्चयेत् ।सर्वभूतेष्वात्मनि च सर्वात्माहमवस्थित: ॥
४८ ॥
शाअर्चा-आदिषु--अर्चाविग्रह में तथा भगवान् के अन्य स्वरूपों में; यदा--जब भी; यत्र--जिस भी रूप में; श्रद्धा-- श्रद्धा उत्पन्नहोती है; माम्--मुझको; तत्र--वहाँ; च--तथा; अर्चयेत्--पूजा करे; सर्व-भूतेषु--सारे उत्पन्न हुए जीवों के भीतर; आत्मनि--पृथक् रूप से, मेरे आदि रूप में; च-- भी; सर्व-आत्मा--सबों की मूल आत्मा; अहम्--मैं; अवस्थित:--इस प्रकार स्थित ।
जब भी कोई व्यक्ति मुझमें, चाहे मेरे अर्चाविग्रह रूप में या अन्य प्रामाणिक अभिव्यक्तियोंके रूप में, श्रद्धा उत्पन्न कर लेता है, तो उसे उसी रूप में मेरी पूजा करनी चाहिए मैं निश्चय ही,समस्त उत्पन्न जीवों के भीतर तथा पृथक् रूप से अपने आदि रूप में भी विद्यमान रहता हूँ,क्योंकि मैं सबों का परमात्मा हूँ।
एवं क्रियायोगपथे: पुमान्बैदिकतान्त्रिकः ।अर्चब्रुभयतः सिद्धि मत्तो विन्दत्यभीप्सिताम् ॥
४९॥
एवम्--इस प्रकार से; क्रिया-योग--नियमित अर्चापूजन की; पथै: --विधियों द्वारा; पुमान्ू--पुरुष; बैदिक-तान्त्रिकै: --वेदोंतथा तंत्रों में प्रस्तुत किया गया; अर्चनू--पूजना; उभयतः--इस जीवन तथा अगले जीवन में; सिद्धिम्--सिद्धि; मत्त:--मुझसे;विन्दति--प्राप्त करता है; अभीष्सितामू--इच्छित |
वेदों तथा तंत्रों में संस्तुत विविध विधियों से मेरी पूजा करते हुए मनुष्य इस जीवन में तथाअगले जीवन में मुझसे इच्छित सिद्धि प्राप्त करेगा।
शाम्दर्चा सम्प्रतिष्ठाप्य मन्दिरं कारयेहूढम् ।पुष्पोद्यानानि रम्याणि पूजायात्रोत्सवाश्रितानू ॥
५०॥
मतू-अर्चामू-मेरा अर्चाविग्रह रूप; सम्प्रतिष्ठाप्प--ठीक से स्थापित करके ; मन्दिरम्--मन्दिर; कारयेत्-- बनवाये; हृढम्--प्रबल; पुष्प-उद्यानानि--फूल के बगीचे; रम्याणि--सुन्दर; पूजा--नियमित नैत्यिक पूजा के लिए; यात्रा--विशेष उत्सव;उत्सव--तथा वार्षिक उत्सव; आश्ितान्ू--एक ओर करके |
भक्त को चाहिए कि मजबूत मन्दिर बनवाकर उसी के साथ सुन्दर बगीचों से मेरे अर्चाविग्रहको अधिक पुष्ठता से स्थापित करे। इन बगीचों को नित्यप्रति पूजा के लिए फूल प्रदान करने,विशेष अर्चाविग्रह जुलूसों और शुभ पर्वों के मनाने के लिए सुरक्षित रखना चाहिए।
पूजादीनां प्रवाहार्थ महापर्वस्वथान्वहम् ।क्षेत्रापणपुरग्रामान्दत्त्वा मत्साप्टितामियात् ॥
५१॥
पूजा-आदीनाम्--नियमित पूजा तथा विशेष त्यौहारों का; प्रवाह-अर्थम्--निरंतरता जारी रखने के लिए; महा-पर्वसु--शुभअवसरों पर; अथ--तथा; अनु-अहमू्-- प्रतिदिन; क्षेत्र-- भूमि; आपण--दूकानें; पुर--शहर; ग्रामान्ू--तथा गाँवों को;दत्त्वा--अर्चाविग्रह को भेंट रूप में देकर; मत्-साप्टिताम्--मेंरे तुल्य ऐश्वर्य; इयात्--प्राप्त करता है |
जो व्यक्ति अर्चाविग्रह पर भूमि, बाजार, शहर तथा गाँव की भेंट चढ़ाता है, जिससे किअर्चाविग्रह की दैनिक पूजा तथा विशिष्ट उत्सव निरंतर चलते रहें, वह मेरे ही तुल्य ऐश्वर्य प्राप्तकरेगा।
प्रतिष्ठया सार्वभौमं सद्यना भुवनत्रयम् ।पूजादिना ब्रह्मलोकं त्रिभिर्मत्साम्यतामियात् ॥
५२॥
शाप्रतिष्ठया--अर्चा की स्थापना कर लेने पर; सार्व-भौमम्--पूरी धरती पर सर्वोपरिता, एकछत्र राज्य; सदाना--भगवान् के लिएमन्दिर बनवाकर; भुवन-त्रयम्--तीनों लोकों के ऊपर स्वामित्व; पूजा-आदिना--पूजा तथा अन्य सेवाओं द्वारा; ब्रह्मटलोकम्--ब्रह्मजी का लोक; त्रिभि:--तीन; मत्-साम्यताम्--मेरी बराबरी; इयात्--प्राप्त करता है।
भगवान् के अर्चाविग्रह की स्थापना करने से मनुष्य सारी पृथ्वी का राजा बन जाता है;भगवान् के लिए मन्दिर बनवाने से तीनों जगतों का शासक बन जाता है; अर्चाविग्रह की पूजातथा सेवा करने से वह ब्रह्मलोक को जाता है और इन तीनों कार्यो को करने से वह मुझ जैसा हीदिव्य स्वरूप प्राप्त करता है।
मामेव नैरपेक्ष्येण भक्तियोगेन विन्दति ।भक्तियोगं स लभत एवं यः पूजयेत माम् ॥
५३॥
मामू--मुझको; एव--निस्सन्देह; नैरपेक्ष्येण--निरपेक्ष भाव से; भक्ति-योगेन-- भक्ति करने से; विन्दति--प्राप्त करता है;भक्ति-योगमू-- भक्ति; सः--वह; लभते--प्राप्त करता है; एवम्--इस प्रकार; यः--जिसको; पूजयेत--पूजा करता है; माम्--मुझको
किन्तु जो व्यक्ति कर्मफल पर विचार किये बिना, भक्ति में लगा रहता है, वह मुझे प्राप्तकरता है। इस तरह जो कोई भी मेरे द्वारा वर्णित विधि के अनुसार मेरी पूजा करता है, वहअन्ततः मेरी शुद्ध भक्ति प्राप्त करेगा।
यः स्वदत्तां परेर्दत्तां हरेत सुरविप्रयो: ।वृत्ति स जायते विड्भुग्वर्षाणामयुतायुतम् ॥
५४॥
यः--जो; स्व-दत्तामू--अपने द्वारा दिया गया; परैः--अन्यों द्वारा; दत्तामू--दिया हुआ; हरेत--ले लेता है; सुर-विप्रयो:--देवताओं या ब्राह्मणों से सम्बन्धित; वृत्तिमू--सम्पत्ति; सः--वह; जायते--उत्पन्न होता है; विटू-भुक्ू--मल खाने वाला कीट;वर्षाणाम्ू--वर्षों तक; अयुत--दस हजार; अयुतम्--गुणित दस हजार
जो व्यक्ति देवताओं या ब्राह्मणों की सम्पत्ति चुराता है, चाहे वह उन्हें पहले उस व्यक्ति द्वारादी गई हो या अन्य किसी के द्वारा, उसे एक करोड़ वर्षों तक मल के कीट के रूप में रहनापड़ता है।
शाकर्तुश्च सारथेहेतोरनुमोदितुरेव च ।कर्मणां भागिन: प्रेत्य भूयो भूयसि तत्फलम् ॥
५५॥
कर्तुः--कर्ता का; च--तथा; सारथे: --सहायक का; हेतो:--प्रेरक का; अनुमोदितु:--अनुमोदन करने वाले का; एव च-- भी;कर्मणाम्--कर्मों का; भागिन: --हिस्सेदार का; प्रेत्य--अगले जन्म में; भूय:--अधिक शोक के साथ; भूयसि--इस हद तककि कर्म शोकमय हो; तत्--उसका ( भोग करे ); फलमू्--परिणाम |
न केवल चोरी करने वाला व्यक्ति अपितु उसकी सहायता करने वाला या जो अपराध केलिए प्रेरित करता है या मात्र अनुमोदन करता है, वह भी अगले जीवन में पापफल में भागीबनेगा। भागीदारी की कोटि के अनुसार ही, उन्हें उसी अनुपात में फल भोगना होगा।भगवान् के या उनके अधिकारी प्रतिनिधियों की पूजा की वस्तु को किसी भी दशा में नहींचुराना चाहिए।
