28. ज्ञान-योग
श्रीभगवानुवाचपरस्वभावकर्माणि न प्रशंसेन्न गयेत् ।विश्वमेकामकं पश्यन्प्रकृत्या पुरुषेण च ॥
१॥
श्री-भगवान् उबाच-- भगवान् ने कहा; पर--पराये का; स्वभाव--स्वभाव; कर्माणि--तथा कर्म; न प्रशंसेत्-- प्रशंसा न करे;न गहयेत्ू--आलोचना न करे; विश्वम्--संसार; एक-आत्मकम्--सत्य पर आश्नित; पश्यन्ू--देखते हुए; प्रकृत्या--प्रकृति केसाथ साथ; पुरुषेण-- भोक्ता के साथ; च--भी |
भगवान् ने कहा : मनुष्य को चाहिए कि किसी अन्य व्यक्ति के बद्ध स्वभाव तथा कर्मो कीन तो प्रशंसा करे, न ही आलोचना। प्रत्युत उसे इस जगत को प्रकृति तथा भोक्ता आत्माओं कासंमेल ही मानना चाहिए क्योंकि वे सभी एक परम सत्य पर अश्ित हैं।
'परस्वभावकर्माणि य:ः प्रशंसति निन्दति ।स आशु भ्रए्यते स्वार्थादसत्यभिनिवेशत: ॥
२॥
'पर--दूसरे का; स्वभाव--स्वभाव, व्यक्तित्व; कर्माणि--तथा कार्य; यः--जो; प्रशंसति--प्रशंसा करता है; निन्दति--आलोचना करता है; सः--वह; आशु--तुरनन््त; भ्रश्यते--गिरता है; स्व-अर्थात्--अपने हित से; असति--असत्य में;अभिनिवेशतः--पूरी तरह बँध जाने के कारण।
जो भी व्यक्ति दूसरों के गुणों तथा आचरण की प्रशंसा करता है या आलोचना करता है,वह मायामय द्वैतों में फँसने के कारण अपने उत्तमोत्तम हित से शीघ्र विपथ हो जाएगा।
तैजसे निद्रयापन्ने पिण्डस्थो नष्टचेतन: ।मायां प्राप्नोति मृत्युं वा तद्बन्नानार्थटक्पुमान् ॥
३ ॥
तैजसे--जब इन्द्रियाँ, जो कि रजोगुण में मिथ्या अहंकार से उत्पन्न हैं; निद्रया--नींद से; आपतन्ने--परास्त हो जाती हैं; पिण्ड--भौतिक शरीर का कवच; स्थ:--स्थित ( आत्मा ); नष्ट-चेतन:--अपनी चेतना खोकर; मायाम्--स्वण देखने का भ्रम;प्राणोति--अनुभव करता है; मृत्युम्--मृत्यु जैसी गहरी निद्रावस्था; वा--अथवा; तद्बत्--उसी प्रकार से; नाना-अर्थ-- भौतिकविविधताओं के रूप में; हक्ू--देखने वाला; पुमान्ू--मनुष्य |
जिस तरह देहधारी आत्मा की इन्द्रियाँ स्वप्न देखने के भ्रम या मृत्यु जैसी गहरी निद्रावस्थाके द्वारा परास्त हो जाती हैं, उसी तरह भौतिक द्वन्द्द का अनुभव करने वाले व्यक्ति को मोह तथामृत्यु का सामना करना पड़ता है।
कि भद्गं किमभद्रं वा द्वैतस्यावस्तुन: कियत् ।वाचोदितं तदनृतं मनसा ध्यातमेव च ॥
४॥
किम्--क्या; भद्रम्-- अच्छा; किमू--क्या; अभद्रम्ू--बुरा; वा--अथवा; द्वैतस्थ--द्वैत की; अवस्तुनः--वस्तु नहीं है;कियत्--कितना; वाचा--वाणी से; उदितम्--उत्पन्न; तत्ू--वह; अनृतम्--असत्य; मनसा--मन से; ध्यातम्-- ध्यान कियागया; एव--निस्सन्देह; च--तथा।
जो कुछ भौतिक शब्दों से व्यक्त किया जाता है या मन के द्वारा ध्यान किया जाता है, वहपरम सत्य नहीं है। अतएव द्वैत के इस असार जगत में, वस्तुतः क्या अच्छा या क्या बुरा है औरऐसे अच्छे तथा बुरे की मात्रा को कैसे मापा जा सकता है ? छायाप्रत्याह्ययाभासा हासन्तोप्यर्थकारिण: ।एवं देहादयो भावा यच्छन्त्यामृत्युतो भयम् ॥
५॥
छाया--छायाएँ; प्रत्याहय--प्रतिध्वनि; आभासा:--तथा मिथ्या प्राकट्य; हि--निस्सन्देह; असन्त:-- अविद्यमान; अपि--यद्यपि; अर्थ--विचार; कारिण:--उत्पन्न करने वाले; एवम्--उसी तरह से; देह-आदय: --देह इत्यादि; भावा:-- भौतिकसंकल्पनाएँ; यच्छन्ति--देते हैं; आ-मृत्युतः--मृत्युपर्यन्त; भयमू-- भय |
यद्यपि छायाएँ, प्रतिध्वनियाँ तथा मृगमरीचिकाएँ असली वस्तुओं के भ्रामक प्रतिबिम्ब हीहोती हैं, किन्तु ये प्रतिबिम्ब अर्थपूर्ण या ज्ञेय भाव का साहश्य उत्पन्न करते हैं। इसी तरह यद्यपिशरीर, मन तथा अहंकार के साथ बद्धजीव की पहचान भ्रामक है, किन्तु यह पहचान मृत्यु पर्यन्तउसके भीतर भय उत्पन्न करती रहती है।
आत्मैव तदिदं विश्व॑ं सृज्यते सृजति प्रभु: ।त्रायते त्राति विश्वात्मा हियते हरती श्वरः ।तस्मान्न ह्ात्मनोन्यस्मादन्यो भावो निरूपितः ॥
६॥
निरूपितेयं त्रिविधा निर्मूल भातिरात्मनि ।इदं गुणमयं विद्धि त्रिविधं मायया कृतम् ॥
७॥
आत्मा--परमात्मा; एव-- एकमात्र; तत् इदम्--यह; विश्वम्--ब्रह्माण्ड; सृज्यते--उत्पन्न किया जाता है; सृजति--तथा उत्पन्नकरता है; प्रभुः--परमेश्वर; त्रायते--रक्षा किया जाता है; त्राति--रक्षा करता है; विश्व-आत्मा--सारे जगत का आत्मा; हियते--खींच लिया जाता है; हरति--खींच लेता है; ईश्वर:--परम नियन्ता; तस्मात्--उसकी अपेक्षा; न--नहीं; हि--निस्सन्देह;आत्मन:--आत्मा की तुलना में; अन्यस्मात्--जो स्पष्ट है; अन्य:--अन्य; भाव:--जीव; निरूपित:--निश्चित किया जाता है;निरूपिते--इस प्रकार स्थापित हुआ; अयम्--यह; त्रि-विधा--तीन प्रकार का; निर्मुला--आधाररहित; भाति: --स्वरूप;आत्मनि--परमात्मा के भीतर; इृदमू--यह; गुण-मयम्-प्रकृति के गुणों से युक्त; विद्धि--जानो; त्रि-विधम्--तीन प्रकार का;मायया--माया द्वारा; कृतमू--उत्पन्न ।
एकमात्र परमात्मा ही इस जगत के परम नियन्ता तथा स्त्रष्टा हैं, अतः अकेले वे भी उत्पन्न किये हुए हैं। इसी प्रकार जो समस्त जगत का आत्मास्वरूप है, वह पालन भी करता है औरपालित भी होता है; हरता है और हरा भी जाता है। यद्यपि परमात्मा हर वस्तु से तथा अन्य हरकिसी से पृथक् हैं, किन्तु कोई अन्य जीव उनसे पृथक् रूप में निश्चित नहीं किया जा सकता।तीन प्रकार की प्रकृति के जो उनके भीतर देखी जाती है, प्राकट्य का कोई वास्तविक आधारनहीं है। प्रत्युत तुम यह समझ लो कि तीन गुणों वाली यह प्रकृति उनकी मायाशक्ति का हीप्रतिफल है।
एतद्विद्वान्मदुदितं ज्ञानविज्ञाननैपुणम् ।न निन्दति न च स्तौति लोके चरति सूर्यवत् ॥
८॥
एतत्--यह; विद्वान्ू--जानने वाला; मत्ू--मेरे द्वारा; उदितम्--वर्णित; ज्ञान--ज्ञान; विज्ञान--तथा अनुभूति में; नैपुणम्--स्थिरहुआ; न निन्दति--आलोचना नहीं करता; न च--न तो; स्तौति--प्रशंसा करता है; लोके--जगत में; चरति--विचरण करताहै; सूर्य-वत्--सूर्य की तरह ।
जिसने मेरे द्वारा यहाँ पर वर्णित सैद्धान्तिक तथा अनुभूत ज्ञान में स्थिर होने की विधि कोभलीभाँति समझ लिया है, वह भौतिक निन््दा या स्तुति में रत नहीं होता। वह इस जगत में सूर्यकी तरह सर्वत्र स्वतंत्र होकर विचरण करता है।
प्रत्यक्षेणानुमानेन निगमेनात्मसंविदा ।आद्यन्तवदसज्ज्ात्वा निःसड्डो विचरेदिह ॥
९॥
प्रत्यक्षेण-- प्रत्यक्ष अनुभूति द्वारा; अनुमानेन--तार्किक आगम द्वारा; निगमेन--शास्त्र के कथनों द्वारा; आत्म-संविदा--अपनीस्वयं की अनुभूति से; आदि-अन्त-वत्--आदि तथा अन्त से युक्त; असत्-- असत्य; ज्ञात्वा--जान कर; निःसड्भर:--आसक्ति सेरहित; विचरेत्ू--इधर-उधर आये-जाये; इह--इस संसार में ॥
प्रत्यक्ष अनुभूति, तर्कसंगत निगमन, शास्त्रोक्त प्रमाण तथा आत्म अनुभूति द्वारा मनुष्य कोयह जान लेना चाहिए कि इस जगत का आदि तथा अन्त है, अतएवं यह परम सत्य नहीं है। इस तरह मनुष्य को निर्लिप्त होकर इस जगत में रहना चाहिए।
श्रीउद्धव उवाचनैवात्मनो न देहस्य संसूृतिर्द्रष्टटश्ययो: ।अनात्मस्वदशोरीश कस्य स्यादुपलभ्यते ॥
१०॥
श्री-उद्धवः उवाच-- श्री उद्धव ने कहा; न--नहीं; एव--निस्सन्देह; आत्मन: --आत्मा का; न--न तो; देहस्य--शरीर का;संसृति:--संसार; द्रष्ट-ह॒श्ययो:--देखने वाले अथवा देखे गये का; अनात्म--जो आत्मा नहीं है; स्व-हशो:--या उसका जिसकोअन्तर्ज्ञन है; ईश--हे भगवान्; कस्य--किसका; स्यातू--हो सकता है; उपलभ्यते-- अनुभव किया जाता है।
श्री उद्धव ने कहा : हे भगवन्ू, इस भौतिक जगत के लिए यह सम्भव नहीं कि वह द्रष्टारूपीआत्मा का अनुभव हो या दृश्यरूपी शरीर का अनुभव हो। एक ओर जहाँ आत्मा स्वाभाविक तौरपर, पूर्ण ज्ञान से समन्वित होता है, वहीं दूसरी ओर भौतिक शरीर चेतन जीव नहीं है। तो फिरजगत का यह अनुभव किससे सम्बद्ध है ? आत्माव्ययोगुण: शुद्धः स्वयंज्योतिरनावृतः ।अग्निवद्दारवदचिद्देह: कस्येह संसृति: ॥
११॥
आत्मा--आत्मा; अव्यय:--न चुकने वाला; अगुण:--गुणों से परे; शुद्ध: --शुद्ध; स्वयम्-ज्योति:--आत्म-प्रकाशित;अनावृत:--खुला; अग्नि-वत्--अग्नि की तरह; दारु-वत्--काष्ठ की तरह; अचित्--अचेतन; देह:--शरीर; कस्य--किसका; इह--इस जगत में; संसृतिः--भौतिक जीवन का अनुभव,
आत्मा अव्यय, दिव्य, शुद्ध, आत्म-प्रकाशित तथा किसी भौतिक वस्तु से कभी न ढकाजाने वाला है। यह अग्नि के समान है। किन्तु अचेतन शरीर, काष्ठ की तरह मन्द है और अनभिज्ञहै। अतएव इस जगत में वह कौन है, जो वास्तव में भौतिक जीवन का अनुभव करता है ? श्रीभगवानुवाचयावहेहेन्द्रियप्राणैरात्मन: सन्निकर्षणम् ।संसार: फलवांस्तावदपार्थोप्यविवेकिन: ॥
१२॥
श्री-भगवान् उवाच-- भगवान् ने कहा; यावत्--जब तक; देह--शरीर; इन्द्रिय--इन्द्रियाँ; प्राणै:--तथा प्राण के द्वारा;आत्मन:--आत्मा का; सन्निकर्षणम्--आकर्षण; संसार:-- भौतिक जगत; फल-वान्--फल से युक्त; तावत्--उस अवधि तक;अपार्थ:--अर्थहीन; अपि--यद्यपि; अविवेकिन:--विवेकहीन व्यक्ति के लिए।
भगवान् ने कहा : जब तक मूर्ख आत्मा भौतिक शरीर, इन्द्रियों तथा प्राण के प्रति आकृष्टरहता है, तब तक उसका भौतिक अस्तित्व विकसित होता रहता है यद्यपि अन्ततोगत्वा यहअर्थहीन होता है।
अर्थ हाविद्यमानेपि संसृतिर्न निवर्तते ।ध्यायतो विषयानस्य स्वप्नेडनर्थागमो यथा ॥
१३॥
अर्थ--असली कारण; हि--निश्चय ही; अविद्यमाने--अनुपस्थित; अपि--यद्यपि; संसृतिः:--भौतिक जगत; न--नहीं;निवर्तते--मिट जाता है; ध्यायत:--ध्यान करते हुए; विषयान्--इन्द्रिय-विषयों का; अस्य--जीव का; स्वपण्ने--स्वण में;अनर्थ--हानियों का; आगम:--आना; यथा--जिस तरह |
वस्तुतः जीव भौतिक जगत से परे है। किन्तु भौतिक प्रकृति पर प्रभुत्व दिखाने की मनोवृत्तिके कारण, उसका भौतिक अस्तित्व मिटता नहीं और वह सभी प्रकार की हानियों से प्रभावितहोता है, जिस तरह स्वप्न में घटित होता है।
यथा ह्वप्रतिबुद्धस्य प्रस्वापो बहनर्थभूत् ।स एव प्रतिबुद्धस्य न वै मोहाय कल्पते ॥
१४॥
यथा--जिस तरह; हि--निस्सन्देह; अप्रतिबुद्धस्य--जो नहीं जगा हुआ है उसके लिए; प्रस्वाप:--नींद; बहु--अनेक; अनर्थ--अवांछित अनुभव; भृत्--प्रस्तुत करते हुए; सः--वही स्वप्न; एव--निस्सन्देह; प्रतिबुद्धस्य--जगे हुए के लिए; न--नहीं; बै--निश्चय ही; मोहाय--संशय; कल्पते--उत्पन्न करता है|
यद्यपि स्वप्न देखते समय मनुष्य को अनेक अवांछित वस्तुओं का अनुभव होता है, किन्तुजग जाने पर वह स्वप्न के अनुभवों से तनिक भी उद्विग्न नहीं होता।
शोकहर्षभयक्रोधलो भमोहस्पृहादय: ।अहड्डारस्य दृश्यन्ते जन्ममृत्युश्च नात्मन: ॥
१५॥
शोक--शोक; हर्ष--हर्ष; भय--डर; क्रोध--क्रोध; लोभ--लालच; मोह-- संशय; स्पृहा-- लालसा; आदय:--इत्यादि;अहड्डारस्थ--मिथ्या अहंकार के; दृश्यन्ते--वे प्रतीत होते हैं; जन्म--जन्म; मृत्यु:--मृत्यु; च--तथा; न--नहीं; आत्मन: --आत्मा का
शोक, हर्ष, भय, क्रोध, लोभ, मोह, लालसा, जन्म तथा मृत्यु मिथ्या अहंकार के अनुभवहैं, शुद्ध आत्मा के नहीं।
देहेन्द्रियप्राणमनो भिमानोजीवोन्तरात्मा गुणकर्ममूर्ति: ।सूत्रं महानित्युरुधेव गीतःसंसार आधावति कालतन्त्र: ॥
१६॥
देह--शरीर; इन्द्रिय--इन्द्रियाँ; प्राण--जीवन-वायु; मनः--तथा मन से; अभिमान: --जो झूठे ही अपनी पहचान बनाता है;जीव:--जीव; अन्तः--भीतर स्थित; आत्मा--आत्मा; गुण--अपने भौतिक गुण; कर्म--तथा कर्म के अनुसार; मूर्ति:--उसकेस्वरूप की कल्पना करते हुए; सूत्रम्ू--सूत्र तत्त्व; महानू-- प्रकृति का आदि रूप; इति--इस प्रकार; उरुधा--भिन्न भिन्न तरीकोंसे; इब--निस्सन्देह; गीत:--वर्णित; संसारे-- भौतिक जीवन में; आधावति--इधर-उधर दौड़ता है; काल--समय के; तन्त्र: --कठोर नियंत्रण में
जो जीव अपनी पहचान गलती से अपने शरीर, इन्द्रियों, प्राण तथा मन से करता है और जोइन आवरणों के भीतर रहता है, वह अपने ही बद्ध भौतिक गुणों तथा कर्म का रूप धारण करताहै। वह समग्र भौतिक भक्ति के सापेक्ष विविध उपाधियाँ ग्रहण करता है और इस तरह, परमकाल के कठोर नियंत्रण में, संसार के भीतर इधर-उधर दौने के लिए बाध्य होता है।
अमूलमेतद्वहुरूपरूपितंमनोवच:ःप्राणशरीरकर्म ।ज्ञानासिनोपासनया शितेन-चिछत्त्वा मुनिर्गां विचरत्यतृष्ण: ॥
१७॥
अमूलम्--नींवरहित; एतत्--यह ( मिथ्या अहंकार ); बहु-रूप--नाना रूपों में; रूपितम्--सुनिश्चित; मन:--मन; बच: --वाणी; प्राण--जीवन-वायु; शरीर--तथा स्थूल शरीर का; कर्म--कार्य ; ज्ञान--दिव्य ज्ञान की; असिना--तलवार से;उपासनया--( गुरु की ) उपासना से; शितेन--तीक्ष्ण की हुई; छित्तता--काट कर; मुनि:ः--गम्भीर साधु; गाम्ू--इस पृथ्वी पर;विचरति--विचरण करता है; अतृष्ण: -- भौतिक इच्छाओं से मुक्त |
यद्यपि मिथ्या अहंकार का कोई यथार्थ आधार नहीं है, किन्तु यह अनेक रूपों में देखा जाताहै--यथा मन, वाणी, प्राण तथा शरीर के कार्यो के रूप में। किन्तु प्रामाणिक गुरु की उपासनाके द्वारा तेज की हुईं दिव्य ज्ञानरूपी तलवार से, गम्भीर साधु इस मिथ्या पहचान को काट देता हैऔर इस जगत में समस्त भौतिक आसक्ति से मुक्त होकर निवास करता है।
ज्ञानं विवेको निगमस्तपश्चप्रत्यक्षमतिहामथानुमानम् ।आद्चन्तयोरस्य यदेव केवलं कालश्च हेतुश्व तदेव मध्ये ॥
१८॥
ज्ञामम्ू--दिव्य ज्ञान; विवेक: --विवेक; निगम: --शास्त्र; तप: -- तपस्या; च--तथा; प्रत्यक्षम्--प्रत्यक्ष अनुभूति; ऐतिहाम् --पुराणों का ऐतिहासिक विवरण; अथ--तथा; अनुमानम्--तर्क; आदि--प्रारम्भ में; अन्तयो: --तथा अन्त में; अस्य--इस सृष्टिके; यत्ू--जो; एब--निस्सन्देह; केवलम्--अकेला; काल:--काल का नियामक कारक; च--तथा; हेतु:--चरम कारण;च--तथा; तत्--वह; एब--अकेला; मध्ये--बीचमें |
असली आध्यात्मिक ज्ञान तो आत्मा और पदार्थ के विवेक पर आधारित है और इसकाअनुशीलन शास्त्रों के प्रमाण, तपस्या, प्रत्यक्ष अनुभूति, पुराणों के ऐतिहासिक वृत्तान्तों केसंग्रहण तथा तार्किक निष्कर्षो द्वारा किया जाता है। परब्रह्म जो अकेला इस ब्रह्माण्ड की सृष्टि केपूर्व विद्यमान था और जो इसके संहार के बाद भी बचा रहेगा, वही काल तथा परम कारण भीहै। इस सृष्टि के मध्य में भी एकमात्र परब्रह्म वास्तविक सत्य है।
यथा हिरण्यं स्वकृतं पुरस्तात्पश्चाच्च सर्वस्य हिरण्मयस्य ।तदेव मध्ये व्यवहार्यमाणंनानापदेशैरहमस्य तद्बत् ॥
१९॥
यथा--जिस तरह; हिरण्यम्--स्वर्ण; सु-अकृतम्--बनी वस्तु के रूप में अप्रकट; पुरस्तात्ू--इसके पूर्व; पश्चात्--बाद में;च--तथा; सर्वस्य--हर वस्तु का; हिरण्-मयस्य--सोने से बनी; तत्--वह सोना; एव--एकमात्र; मध्ये--बीच में;व्यवहार्यमाणम्--उपयोग में लाने पर; नाना--विविध; अपदेशै:--उपाधियों के रूप में; अहम्--मैं; अस्य--इस उत्पन्न ब्रह्माण्डका; तद्बत्ू--उसी तरह से
जिस तरह सोने की वस्तुएँ तैयार होने के पूर्व, एकमात्र सोना रहता है और जब ये वस्तुएँ नष्टहो जाती हैं, तो भी एकमात्र सोना बचा रहता है और जब विविध नामों से व्यवहार में लाये जानेपर भी एकमात्र सोना ही अनिवार्य सत्य होता है, उसी तरह इस ब्रह्माण्ड की सृष्टि के पूर्व, इसकेसंहार के बाद और इसके अस्तित्व के समय केवल मैं विद्यमान रहता हूँ।
विज्ञानमेतत्तरियवस्थमड़गुणत्रयं कारणकर्यकर्तू ।समन्वयेन व्यतिरेकतश्चयेनैव तुर्येण तदेव सत्यम् ॥
२०॥
विज्ञानमू--( मन जिसका लक्षण है ) पूर्ण ज्ञान; एतत्--यह; त्रि-अवस्थम्--तीन अवस्थाओं ( जाग्रत, सुप्ति, सुषुप्ति ) मेंविद्यमान; अड्ग--हे प्रिय उद्धव; गुण-त्रयम्ू--तीन गुणों के माध्यम से प्रकट; कारण--सूक्ष्म कारण के रूप में ( अध्यात्म );कार्य--स्थूल उत्पाद ( अधिभूत ); कर्तु--तथा करने वाला ( आधिदैव ); समन्वयेन--एक के बाद एक-एक में; व्यतिरिकतः--पृथक् रूप में; च--तथा; येन--जिससे; एव--निस्सन्देह; तुर्येण--चौथा कारण; तत्--वह; एव--ही; सत्यम्--परब्रह्म है
भौतिक मन चेतना की तीन अवस्थाओं--जाग्रत, सुप्ति तथा सुषुप्ति--में प्रकट होता है,जो प्रकृति के तीन गुणों से उत्पन्न हैं। फिर मन तीन भिन्न भिन्न भूमिकाओं में--द्रष्टा, हश्य तथाअनुभूति के नियामक रूप में--प्रकट होता है। इस तरह मन तीनों उपाधियों में लगातार विविधप्रकारों से प्रकट होता है। किन्तु इन सबों से भिन्न एक चौथा तत्त्व भी विद्यमान रहता है और वहीपरब्रह्म होता है।
न यत्पुरस्तादुत यन्न पश्चा-न्मध्ये च तन्न व्यपदेशमात्रम् ।भूतं प्रसिद्धं च परेण यद्यत् तदेव तत्स्यादिति मे मनीषा ॥
२१॥
न--नहीं है; यत्--जो; पुरस्तात्--इससे पहिले; उत--न तो; यत्--जो; न--नहीं; पश्चात्--बाद में; मध्ये--बीच में; च--तथा; तत्--वह; न--नहीं विद्यमान रहता; व्यपदेश-मात्रम्--उपाधि मात्र; भूतम्--उत्पन्न; प्रसिद्धमू--विख्यात बनाया गया;च--तथा; परेण--दूसरे के द्वारा; यत् यत्--जो जो; तत्ू--वह; एव--केवल; तत्--वह अन्य; स्यात्ू--वास्तव में है; इति--इस प्रकार; मे--मेरा; मनीषा--विचार, मत।
जो भूतकाल में विद्यमान नहीं था और भविष्य में भी विद्यमान नहीं रहेगा, उसका उसकीपूरी अवधि में कोई अस्तित्व नहीं होता; वह केवल ऊपरी उपाधि होता है। मेरे मत में जो कुछ उत्पन्नकिया जाता है तथा किसी अन्य वस्तु से उद्धाटित किया जाता है, वही अन्ततः एकमात्र अन्य वस्तुहोता है।
अविद्यमानोप्यवभासते योवैकारिको राजससर्ग एस: ।ब्रह्म स्वयं ज्योतिरतो विभातिब्रह्मोन्द्रियार्थात्मविकारचित्रम् ॥
२२॥
अविद्यमान:--वास्तव में विद्यमान न होते हुए; अपि--यद्यपि; अवभासते--प्रतीत होता है; यः--जो; वैकारिक:--विकारों कीअभिव्यक्ति; राजस--रजोगुण का; सर्ग:--सृजन; एष:--यह; ब्रह्म--परब्रह्म; स्वयम्-- अपने में स्थित; ज्योति:--प्रकाशवान्;अतः--इसलिए; विभाति-- प्रकट होता है; ब्रह्म--परब्रह्म; इन्द्रिय--इन्द्रियों का; अर्थ--विषय; आत्म--मन; विकार--तथापाँच तत्त्वों के रूपान्तरों का; चित्रमू--विविधता के रूप में
वास्तव में विद्यमान न होते हुए भी, रजोगुण से उत्पन्न रूपान्तरों की यह अभिव्यक्ति सत्यप्रतीत होती है क्योंकि स्वयं-व्यक्त, स्वयं-प्रकाशित परब्रह्म अपने को नाना प्रकार की इन्द्रियों,इन्द्रिय-विषयों, मन तथा शरीर के तत्त्वों के रूप में प्रकट करता है।
एवं स्फुत॑ ब्रह्मविवेकहेतुभिः'परापवादेन विशारदेन ।छित्त्वात्मसन्देहमुपारमेतस्वानन्दतुष्टो $खिलकामुके भ्य: ॥
२३॥
एवम्--इस प्रकार; स्फुटम्-स्पष्टत: ; ब्रह्म--परब्रह्म का; विवेक-हेतुभि: --विवेक तथा तर्कों द्वारा; पर-- अन्य धारणाओं सेगलत पहचान का; अपवादेन--निषेध द्वारा; विशारदेन--पटु; छित्त्वा--काट कर; आत्म--आत्मा की पहचान के बारे में;सन्देहम्--सन्देह को; उपारमेत--बचे; स्व-आनन्द-- अपने दिव्य आनन्द में; तुष्ट:--सनन््तुष्ट; अखिल--समस्त; कामुके भ्य:--'काम-वासना वाली वस्तुओं से |
इस तरह विवेकशील तर्क द्वारा परब्रह् की अनन्य स्थिति को अच्छी तरह समझ करकेमनुष्य को चाहिए कि पदार्थ से अपनी गलत पहचान का कुशलतापूर्वक निषेध करे और आत्माकी पहचान विषयक सारे संशयों को छिन्न-भिन्न कर डाले। आत्मा के स्वाभाविक आनन्द से तुष्टहोते हुए मनुष्य को भौतिक इन्द्रियों के काम-वासनामय कार्यो से दूर रहना चाहिए।
नात्मा वपु: पार्थिवमिन्द्रियाणिदेवा हासुर्वायुर्जलम्हुताश: ।मनोन्नमात्रं धिषणा च सत्त्व-महलड्डू तिः खं क्षितिरर्थसाम्यम् ॥
२४॥
न--नहीं; आत्मा--आत्मा; वपु:--शरीर; पार्थिवम्--पृथ्वी से बना; इन्द्रियाणि--इन्द्रियाँ; देवा:--अधिष्ठाता देवता; हि--निस्सन्देह; असु:--प्राण-वायु; वायु:--बाह्य वायु; जलम्ू--पानी; हुत-आश: -- अग्नि; मन: --मन; अन्न-मात्रमू-- केवलपदार्थ होने से; धिषणा--बुद्धि; च--तथा; सत्त्वमू-- भौतिक चेतना; अहड्डू ति:--मिथ्या अहंकार; खम्--आकाश; क्षिति: --पृथ्वी; अर्थ--इन्द्रिय अनुभूति के विषय; साम्यम्-प्रकृति की आदि अभिन्नित अवस्था
पृथ्वी से बना भौतिक शरीर असली आत्मा नहीं है, न ही इन्द्रियाँ, उनके अधिष्ठातृ देवता याप्राण-वायु; न बाह्य वायु, जल, अथवा अग्नि या मन ही हैं। ये सब पदार्थ हैं।इसी तरह न तो मनुष्य की बुद्धि, न भौतिक चेतना, न अहंकार, न ही आकाश या पृथ्वी के तत्त्व, न ही इन्द्रियअनुभूति के विषय, न भौतिक साम्य की आदि अवस्था ही को आत्मा की वास्तविक पहचानमाना जा सकता है।
समाहितैः कः करणैर्गुणात्मभि-गुणो भवेन्मत्सुविविक्तधाम्न: ।विक्षिप्पमाणैरुत कि नु दूषणंघनैरुपेतैर्विगते रवेः किम् ॥
२५॥
समाहितैः--ध्यान में पूरी तरह एकाग्र; कः--क्या; करणै:--इन्द्रियों द्वारा; गुण-आत्मभि:--जो गुणों की अभिव्यक्तियाँ हैं;गुण:--गुण; भवेत्--होगा; मत्--मेरा; सु-विविक्त--जिसने अच्छी तरह निश्चित कर लिया है; धाम्न:--पहचान;विक्षिप्यमाणै:--जिन्हें विश्लुब्ध किया जा रहा है; उत--दूसरी ओर; किम्--क्या; नु--निस्सन्देह; दूषणम्--कलंक; घनै:--बादलों द्वारा; उपेतै:--आये हुए; विगतैः--अथवा जो जा चुके हैं; रवे:--सूर्य का; किमू--क्या
जिसने मेरी पहचान भगवान् के रूप में कर ली है, उसके लिए इसमें कया श्रेय रखा है यदिउसकी इन्द्रियाँ, जो गुणों से उत्पन्न हैं, ध्यान में पूरी तरह एकाग्र हों? दूसरी ओर, इसमें कौन-साकलंक लगता है यदि उसकी इन्द्रियाँ चलायमान होती हैं ? निस्सन्देह, इससे सूर्य का क्या बनता-बिगड़ता है यदि बादल आते और जाते हैं ? यथा नभो वाय्वनलाम्बुभूगुणै-गतागतैर्व॑र्तुगुणैर्न सज्जते ।तथाक्षरं सत्त्वरजस्तमोमलै-रहंमतेः संसृतिहेतुभि: परम् ॥
२६॥
यथा--जिस तरह; नभः--आकाश; वायु--वायु; अनल--अग्नि; अम्बु--जल; भू--तथा पृथ्वी के; गुणैः--गुणों से; गत-आगतैः--आने-जाने वाले; वा--अथवा; ऋतु-गुणैः--ऋतुओं ( यथा शीत, ग्रीष्म इत्यादि ) के गुणों द्वारा; न सज्ते--नहीं बँधता; तथा-- उसी तरह; अक्षरम्--परब्रह्म; सत्त्व-गज:-तम:--सतो, रजो तथा तमोगुणों के; मलैः--दूषण द्वारा; अहम्-मतेः--मिथ्या अहंकार की भावना का; संसृति-हेतुभि:--जगत के कारणों द्वारा; परमू--परम |
आकाश अपने में से होकर गुजरने वाली वायु, अग्नि, जल तथा पृथ्वी के विविध गुणों कोऔर उसी के साथ उष्मा तथा शीत के गुणों को भी प्रदर्शित कर सकता है, जो ऋतुओं केअनुसार निरन्तर आते-जाते रहते हैं। फिर भी, आकाश कभी भी इन गुणों से बँधता नहीं। इसीप्रकार परब्रह्म सतो, रजो तथा तमोगुणों के दूषणों से कभी बँधता नहीं क्योंकि ये मिथ्याअहंकार का भौतिक विकार उत्पन्न करने वाले हैं।
तथापि सड्ढः परिवर्जनीयोगुणेषु मायारचितेषु तावत् ।मद्धक्तियोगेन हढेन यावद्रजो निरस्येत मनःकषाय: ॥
२७॥
तथा अपि--तिस पर भी; सड्ृः--संगति; परिवर्जनीय:--बहिष्कार कर देनी चाहिए; गुणेषु--गुणों से; माया-रचितेषु --मायाशक्ति द्वारा उत्पन्न; तावतू--तब तक; मत्ू-भक्ति-योगेन--मेरी भक्ति द्वारा; हढेन--हढ़; यावत्--जब तक; रज:--वासनामय आकर्षण; निरस्येत--दूर हो जाय; मन:--मन की; कषाय: -गर्द, धूल
तिस पर भी मनुष्य जब तक हढ़तापूर्वक मेरी भक्ति का अभ्यास करके अपने मन से भौतिककाम-वासना के कल्मष को पूरी तरह निकाल नहीं फेंकता है, तब तक उसे इन भौतिक गुणोंकी संगति करने में सावधानी बरतनी चाहिए जो मेरी मायाशक्ति द्वारा उत्पन्न होते हैं।
यथामयो साधु चिकित्सितो नृणांपुनः पुनः सन्तुदति प्ररोहन् ।एवं मनोपक्वकषायकर्मकुयोगिनं विध्यति सर्वसड्रम् ॥
२८॥
यथा--जिस तरह; आमय:--रोग; असाधु--अपूर्ण रूप से; चिकित्सित:--उपचार किया गया; नृणाम्--मनुष्यों के; पुनःपुनः--बारम्बार; सन्तुदति--दुख देता है; प्ररोहन्-- ऊपर उठते हुए; एवम्--उसी तरह; मनः--मन; अपक्व--अशुद्ध;कषाय--दूषण का; कर्म--कर्मों से; कु-योगिनम्-- अपूर्ण योगी; विध्यति--तंग करता है; सर्व-सड्रमू--जो सभी तरह की
भौतिक आसक्तियों से पूर्ण है जिस तरह ठीक से उपचार न होने पर रोग फिर से लौट आता है और रोगी को बारम्बार कष्टदेता है, उसी तरह यदि मन को विकृत प्रवृत्तियों से पूरी तरह शुद्ध नहीं कर लिया जाता, तो वहभौतिक वस्तुओं में लिप्त रहने लगता है और अपूर्ण योगी को बारम्बार तंग करता रहता है।
कुयोगिनो ये विहितान्तरायै-म॑नुष्यभूतैस्त्रिदशोपसूष्टै: ।ते प्राक्तनाभ्यासबलेन भूयोयुझ्जन्ति योगं न तु कर्मतन्त्रमू ॥
२९॥
कु-योगिन:--योगाभ्यासी जिसका ज्ञान अपूर्ण है; ये--जो; विहित--आरोपित; अन्तरायै:--बाधाओं द्वारा; मनुष्य-भूतैः--मनुष्यों ( उनके सम्बन्धियों, शिष्यों इत्यादि ) के रूप में; त्रिदश--देवताओं द्वारा; उपसूष्टै:-- भेजे गये; ते--वे; प्राक्तन--पूर्वजन्मका; अभ्यास--संचित अभ्यास के; बलेन--बल पर; भूयः--एक बार फिर; युझ्जन्ति--प्रवृत्त होते हैं; योगम्--योग में; न--कभी नहीं; तु--किन्तु; कर्म-तन्त्रमू--सकाम कर्म का पाश।
कभी कभी अपूर्ण योगी की उन्नति पारिवारिक सदस्यों, शिष्यों अथवा अन्यों के प्रतिआसक्ति के कारण रुक जाती है क्योंकि ऐसे लोग इसी प्रयोजन से ईर्ष्यालु देवताओं द्वारा भेजेजाते हैं। किन्तु अपनी संचित उन्नति के बल पर ऐसे अपूर्ण योगी अगले जन्म में अपनायोगाभ्यास फिर चालू कर देते हैं। वे फिर कभी सकाम कर्म के जाल में नहीं फँसते।
करोति कर्म क्रियते च जन्तु:केनाप्यसौ चोदित आनिपतात् ।न तत्र विद्वान्प्रकृती स्थितोपिनिवृत्ततृष्ण: स्वसुखानुभूत्या ॥
३०॥
करोति--करता है; कर्म--भौतिक कार्य; क्रियते--कराया जाता है; च-- भी; जन्तु:--जीव; केन अपि--किसी न किसीशक्ति के द्वारा; असौ--वह; चोदितः--प्रेरित; आ-निपातात्--मृत्युपर्यन्त; न--नहीं; तत्र--वहाँ; विद्वानू--चतुर व्यक्ति;प्रकृतौ--प्रकृति में; स्थित:--स्थित; अपि-- भी; निवृत्त--त्यागने के बाद; तृष्ण: --भौतिक इच्छा से; स्व--अपनी; सुख--सुख का; अनुभूत्या-- अनुभव
सामान्य जीव भौतिक कर्म करता है और ऐसे कर्म के फल से रूपान्तरित हो जाता है। इसतरह वह विविध इच्छाओं से प्रेरित होकर अपनी मृत्यु तक सकाम कर्म करता रहता है। किन्तुबुद्धिमान व्यक्ति अपने स्वाभाविक आनन्द का अनुभव किये रहने से, सारी भौतिक इच्छाओं कोत्याग देता है और सकाम कर्म में प्रवृत्त नहीं होता।
तिष्ठन्तमासीनमुत ब्रजन्तंशयानमुक्षन्तमदन्तमन्नम् ।स्वभावमन्यत्किमपीहमान-मात्मानमात्मस्थमतिर्न वेद ॥
३१॥
तिष्ठन्तम्ू--खड़े खड़े; आसीनम्--बैठे हुए; उत--अथवा; ब्रजन्तम्--विचरण करते हुए; शयानम्--लेटे हुए; उश्षन्तम्--मूत्रत्याग करते हुए; अदन्तमू-खाते हुए; अन्नम्ू-- भोजन; स्व-भावम्--उसके बद्ध स्वभाव से प्रकट; अन्यत्--दूसरा; किम्अपि--जो भी; ईहमानम्--सम्पन्न करते हुए; आत्मानम्--अपने शरीर को; आत्म-स्थ--सच्चे आत्मा में स्थित; मतिः--चेतना;न वेद--नहीं पहचानता |
बुद्धिमान व्यक्ति, जिसकी चेतना आत्मा में स्थित है, अपनी शारीरिक क्रियाओं पर भी ध्याननहीं दे पाता। खड़े, बैठे, चलते, लेटे, मूत्र त्याग करते, भोजन करते या अन्य शारीरिक कार्यकरते हुए भी, वह समझता है कि शरीर अपने स्वभाव के अनुसार कार्य करता है।
यदि सम पश्यत्यसदिन्द्रियार्थनानानुमानेन विरुद्धमन्यत् ।न मन्यते वस्तुतया मनीषीस्वाप्नं यथोत्थाय तिरोदधानम् ॥
३२॥
यदि--यदि; स्म--कभी; पश्यति--देखता है; असत्-- अशुद्ध; इन्द्रिय-अर्थम्--इन्द्रिय-विषयों को; नाना--द्वैत पर आधारितहोने से; अनुमानेन--तर्क द्वारा; विरुद्धमू--विरोध किया हुआ; अन्यत्--वास्तविकता से भिन्न; न मन्यते--नहीं मानता;वस्तुतया-- असली के रूप में; मनीषी--बुद्द्धिमान मनुष्य; स्वाप्मम्ू-- स्वप्न का; यथा--जिस तरह, मानो; उत्थाय--जग कर;तिरोदधानम्--जो तिरोधान होने की विधि है।
यद्यपि स्वरूपसिद्ध आत्मा कभी कभी अशुद्ध वस्तु या कर्म को देख सकता है, किन्तु वहइसे सत्य नहीं मानता। अशुद्ध इन्द्रिय-विषयों को तर्क द्वारा मायावी भौतिक द्वैत पर आधारितसमझ कर, बुद्धिमान व्यक्ति उन्हें सत्य से सर्वथा विपरीत और पृथक् मानता है, जिस तरह निद्रासे जगा हुआ मनुष्य अपने अस्पष्ट स्वप्न को देखता है।
पूर्व गृहीतं गुणकर्मचित्र-मज्ञानमात्मन्यविविक्तमड़ः ।निवर्तते तत्पुनरीक्षयैवन गृह्ते नापि विसृय्य आत्मा ॥
३३॥
पूर्वमू--इसके पहले; गृहीतम्--स्वीकृत; गुण--गुणों के; कर्म--कर्मो के द्वारा; चित्रमू--विविधतापूर्ण; अज्ञानम्ू--अज्ञान;आत्मनि--आत्मा पर; अविविक्तम्--अभिन्न रूप में आरोपित; अड्ग--हे उद्धव; निवर्तते--बन्द कर देता है; तत्--वह; पुनः--फिर; ईक्षया--ज्ञान द्वारा; एब--ही; न गृह्मते-- स्वीकार नहीं किया जाता; न--नहीं; अपि--निस्सन्देह; विसृज्य--तिरस्कारकरके; आत्मा--आत्मा |
भौतिक अविद्या को, जो प्राकृतिक गुणों के कार्यों द्वारा नाना रूपों में विस्तार पाती है,बद्धजीव गलती से आत्मा मान बैठता है। किन्तु हे उद्धव, आध्यात्मिक ज्ञान के अनुशीलन सेयही अविद्या मोक्ष के समय समाप्त हो जाती है। दूसरी ओर, नित्य आत्मा न तो कभी ग्रहणकिया जा सकता है और न ही त्यागा जा सकता है।
यथा हि भानोरुदयो नृचक्षुषांतमो निहन्यान्न तु सद्विधत्ते ।एवं समीक्षा निपुणा सती मेहन्यात्तमिस्त्रं पुरुषस्य बुद्धे: ॥
३४॥
यथा--जिस तरह; हि--निस्सन्देह; भानो:--सूर्य का; उदयः--उदय होना; नृ--मनुष्य की; चक्षुषाम्--आँखों के ; तम:--अंधकार; निहन्यात्--नष्ट कर देता है; न--नहीं; तु--लेकिन; सत्--विद्यमान वस्तुएँ; विधत्ते--उत्पन्न करता है; एवम्--उसीतरह; समीक्षा--पूर्ण अनुभूति; निपुणा--निपुण; सती--असली; मे--मेरा; हन्यात्--नष्ट करता है; तमिस्त्रमू-- अंधकार को;पुरुषस्य--मनुष्य के; बुद्धेः--बुद्धि में
जब सूर्य उदय होता है, तो वह मनुष्यों की आँखों को ढकने वाले अंधकार को नष्ट कर देताहै, किन्तु वह उन वस्तुओं को उत्पन्न नहीं करता जिन्हें मनुष्य अपने समक्ष देखते हैं क्योंकि वे तोपहले से वहीं पर थीं। इसी तरह मेरी शक्तिशाली तथा यथार्थ अनुभूति मनुष्य की असली चेतनाको ढकने वाले अंधकार को नष्ट कर देगी।
एप स्वयंज्योतिरजो प्रमेयोमहानुभूति: सकलानुभूतिः ।एकोडद्वितीयो वचसां विरामेयेनेषिता वागसवश्चरन्ति ॥
३५॥
एष:--यह ( परमात्मा ); स्वयम्-ज्योति:--आत्म-प्रकाशित; अज:--अजन्मा; अप्रमेयः--माप पाना असम्भव; महा-अनुभूतिः--दिव्य चेतना से पूरित; सकल-अनुभूति:--हर वस्तु से ज्ञात; एक:--एक; अद्वितीय:--अद्वितीय; बचसाम्विरामे--जब वाणी विराम ले लेती ( तभी अनुभूति होती है ); येन--जिसके द्वारा; ईषिता:--प्रेरित; वाक्--वाणी; असव: --तथा प्राण; चरन्ति--गति करते हैं।
परमेश्वर स्वतः प्रकाशित, अजन्मा तथा अप्रमेय हैं। वे शुद्ध दिव्य चेतना हैं और हर वस्तु काअनुभव करते हैं। वे अद्वितीय हैं और जब सामान्य शब्द काम करना बन्द कर देते हैं, तभीउनकी अनुभूति होती है। उनके द्वारा वाक्शक्ति तथा प्राणों को गति प्राप्त होती है।
एतावानात्मसम्मोहो यद्विकल्पस्तु केवले ।आत्मनृते स्वमात्मानमवलम्बो न यस्य हि ॥
३६॥
एतावान्--जो भी; आत्म--आत्मा का; सम्मोह:--संशय; यत्--जो; विकल्प:--द्वैतभाव; तु--लेकिन; केवले--अद्वितीय;आत्मन्--आत्मा में; तें--रहित; स्वम्--वही; आत्मानम्-- आत्मा; अवलम्ब:--सहारा; न--नहीं है; यस्य--जिस ( द्वैत ) का;हि--निस्सन्देह
आत्मा में जो भी ऊपरी द्वैत अनुभव किया जाता है, वह केवल मन का संशय होता है।निस्सन्देह, अपने ही आत्मा से पृथक् ऐसे कल्पित द्वैत के ठहर पाने का कोई आधार नहीं है।
यन्नामाकृतिभिग्राह्म॑ पञ्ञवर्णमबाधितम् ।व्यर्थनाप्यर्थवादोयं द्वयं पणिडितमानिनाम् ॥
३७॥
यत्--जो; नाम--नामों; आकृतिभि: --तथा स्वरूपों द्वारा; ग्राह्ममू--अनुभूत; पञ्ञ-वर्णम्--पाँच भौतिक तत्त्वों वाला;अबाधितम्--जिससे इंकार नहीं किया जा सके; व्यर्थन--व्यर्थ। अपि--निस्सन्देह; अर्थ-वाद:--काल्पनिक व्याख्या; अयम्--यह; द्वयम्--द्वैत; पण्डित-मानिनामू--तथाकथित पण्डितों का |
पाँच भौतिक तत्त्वों का द्वैत केवल नामों और रूपों में ही देखा जाता है। जो लोग कहते हैंकि यह द्वैत असली है, वे छद् पण्डित हैं और वस्तुतः बिना आधार के व्यर्थ ही तरह-तरह केसिद्धान्त प्रस्तावित करते रहते हैं।
योगिनोपक्वयोगस्य युद्धतः काय उत्थितै: ।उपसर्गर्विहन्येत तत्रायं विहितो विधि: ॥
३८ ॥
योगिन:--योगी का; अपक्व-योगस्य--योगाभ्यास में कच्चा; युद्धतः--जुड़ने के लिए प्रयततशील; काय:--शरीर; उत्थितैः--उठे हुए; उपसगें:--उत्पातों से; विहन्येत--विचलित हो सकता है; तत्र--उस सम्बन्ध में; अयम्--यह; विहित:ः--संस्तुत;विधि:ः--विधि
अपने अभ्यास में अभी तक परिपक्व न होने वाले प्रयत्नशील योगी का शरीर कभी कभीविविध उत्पातों की चपेट में आ सकता है। अतएव निम्नलिखित विधि संस्तुत की जाती है।
योगधारणया कांश्विदासनैर्धारणान्वितैः ।तपोमन्त्रौषधे: कांश्विदुपसर्गान्विनिर्ददेत्ू ॥
३९॥
योग-धारणया--योग के ध्यान से; कांश्वित्ू--कुछ उत्पात; आसनैः--नियत आसनों से; धारणा-अन्वितैः--नियंत्रित प्राणायामपर ध्यान के समेत; तपः--विशेष तपस्या; मन्त्र--जादुई उच्चार; औषधे:--तथा जड़ी-बूटियों द्वारा; कांश्वित्ू-कुछ;उपसर्गानू--व्यवधान; विनिर्दहेत्ू--समूल नष्ट किये जा सकते हैं।
इनमें से कुछ व्यवधानों को योगिक ध्यान द्वारा या शारीरिक आसनों के द्वारा, जिनकाअभ्यास प्राणायाम में एकाग्रता के साथ साथ किया जाता है, दूर किया जा सकता है और अन्यव्यवधानों को विशेष तपस्या, मंत्रों या जड़ी-बूटियों से बनी ओषधियों द्वारा दूर किया जा सकताहै।
कांश्रिन्ममानुध्यानेन नामसड्डीर्तनादिभि: ।योगेश्वरानुवृत्त्या वा हन्यादशुभदान्शनै: ॥
४०॥
कांश्वित्ू-कुछ; मम-ेरा; अनुध्यानेन--निरन्तर ध्यान से; नाम--पवित्र नामों का; सल्ढीऋतन--जोर से उच्चारण करके;आदिभिः --इत्यादि से; योग-ईश्वर--योग के महान् स्वामियों का; अनुवृत्त्या--अनुसरण करके; वा--अथवा; हन्यात्ू--नष्ट करदिया जा सकता है; अशुभ-दान्--अशुभ परिस्थिति उत्पन्न करने वाले ( व्यवधान ); शनै:--धीरे धीरे
इन अशुभ उत्पातों को मेरा स्मरण करके, मेरे नामों का सामूहिक श्रवण और कीर्तन करकेया योग के महान् स्वामियों के पदचिन्हों पर चल कर धीरे धीरे दूर किया जा सकता है।
केचिद्देहमिमं धीरा: सुकल्पं वयसि स्थिरम् ।विधाय विविधोपायैरथ युद्जन्ति सिद्धये ॥
४१॥
केचित्--कुछ; देहम्--शरीर को; इमम्--इस; धीरा:--आत्मसंयमी; सु-कल्पम्--उपयुक्त; वयसि--युवावस्था में; स्थिरम्--स्थिर; विधाय--बनाकर; विविध--विविध; उपायै:--उपायों से; अथ--इस प्रकार; युद्जन्ति-- लगाते हैं; सिद्धये-- भौतिकसिद्धि पाने के लिए
कुछ योगीजन विविध उपायों से शरीर को रोग तथा वृद्धावस्था से मुक्त कर लेते हैं और उसेशाश्रत तरुण बनाये रखते हैं। इस तरह वे भौतिक योग-सिद्ध्ियाँ पाने के उद्देश्य से योग में प्रवृत्तहोते हैं।पद पर हां उपलब्ध है। न हि तत्कुशलाहत्यं तदायासो हापार्थक:ः ।अन्तवत्त्वाच्छरीरस्थ फलस्येव वनस्पते: ॥
४२॥
न--नहीं; हि--निस्सन्देह; तत्ू--वह; कुशल--दिव्य ज्ञान में जो कुशल हैं उनके द्वारा; आहत्यम्--आदरित होने को; तत्--उसका; आयास:--प्रयास; हि--निश्चय ही; अपार्थक: --व्यर्थ; अन्त-वत्त्वात्ू-विनष्ट होने के कारण; शरीरस्य--जहाँ तकभौतिक शरीर की बात है; फलस्य--फल का; इब--सहृश; वनस्पते: --वृक्ष के
जो लोग दिव्य ज्ञान में पटु हैं, वे इस योग की शारीरिक सिद्धि को अत्यधिक महत्त्व नहींदेते। निस्सन्देह, वे ऐसी सिद्धि के लिए किये गये प्रयास को व्यर्थ मानते हैं क्योंकि आत्मा तोवृक्ष के सहश स्थायी है किन्तु शरीर वृक्ष के फल की तरह विनाशशील है।
योगं निषेवतो नित्यं कायश्रेत्कल्पतामियात् ।तच्छुद्ध्यान्न मतिमान्योगमुत्सूज्य मत्पर: ॥
४३॥
योगम्--योगाभ्यास; निषेवत:--सम्पन्न करने वाले का; नित्यमू--नियमित रूप से; काय:--भौतिक शरीर; चेत्--कदाचित;कल्पताम्--स्वस्थता; इयात्--प्राप्त करता है; तत्--उसमें; अ्रद्दध्यात्-- श्रद्धा करता है; न--नहीं; मति-मान्--बुद्द्धिमान;योगम्--योग-प्रणाली; उत्सूज्य--त्याग कर; मत्-पर:ः--मुझको समर्पित भक्त ।
यद्यपि योग की विभिन्न विधियों से शरीर सुधर सकता है, किन्तु बुद्धिमान व्यक्ति, जिसनेअपना जीवन मुझे समर्पित कर दिया है योग के द्वारा शरीर को पूर्ण बनाने पर अपनी श्रद्धा नहींदिखलाता और वास्तव में वह ऐसी विधियों को त्याग देता है।
योगचर्यामिमां योगी विचरन्मदपाश्रयः ।नान््तरायैर्विहन्येत निःस्पृह: स्वसुखानुभू: ॥
४४॥
योग-चर्याम्--योग की संस्तुत विधि; इमामू--यह; योगी--अभ्यास करने वाला; विचरन्--सम्पन्न करते हुए; मतू-अपाश्रय:--मेरी शरण ग्रहण करके; न--नहीं; अन्तरायैः --व्यवधानों से; विहन्येत-- रोका जाता है; निःस्पृहः--लालसा सेमुक्त; स्व--आत्मा का; सुख--सुख; अनुभू: -- भीतर ही भीतर अनुभव करते हुए।
जिस योगी ने मेरी शरण ग्रहण कर ली है, वह लालसा से मुक्त रहता है क्योंकि वह भीतरही भीतर आत्मा के सुख का अनुभव करता है। इस तरह इस योग-विधि को सम्पन्न करते हुएवह कभी विघ्न-बाधाओं से पराजित नहीं होता।
