← उद्धव गीता की सूची

29. भक्ति-योग

श्रीउद्धव उबाचसुदुस्तरामिमां मन्ये योगचर्यामनात्मन: ।यथाञ्जसा पुमान्सिद्धबेत्तन्मे ब्रूह्नज्लसाच्युत ॥

१॥

श्री-उद्धवः उवाच-- श्री उद्धव ने कहा; सु-दुस्तरामू--पूरा कर पाना अत्यन्त कठिन; इमाम्‌ू--यह; मन्ये--मैं सोचता हूँ; योग-चर्यामू--योग-विधि; अनात्मन:--जिसने अपने मन को वश में नहीं किया, उसके लिए; यथा--कैसे; अज्सा--आसानी से;पुमान्‌--पुरुष; सिद्धब्रेत्‌-पूरा करे; तत्‌--वह; मे--मुझसे; ब्रूहि--कृपया कहें; अज्खसा--सरल ढंग से; अच्युत--हे अच्युतभगवान्‌

श्री उद्धव ने कहा : हे भगवान्‌ अच्युत, मुझे भय है कि आपके द्वारा वर्णित योग-विधि उसव्यक्ति के लिए अत्यन्त कठिन है, जो अपने मन को वश में नहीं रख सकता। इसलिए आप सरलशब्दों में यह बतलायें कि कोई व्यक्ति किस तरह इसे अधिक आसानी से सम्पन्न कर सकता है।

प्रायशः पुण्दरीकाक्ष युज्यन्तो योगिनो मन: ।विषीदन्त्यसमाधानान्मनोनिग्रहकर्शिता: ॥

२॥

प्रायश: --अधिकांशतः ; पुण्डरीक-अक्ष--हे कमलनेत्र भगवान्‌; युझ्जन्त: --प्रवृत्त होने वाले; योगिन: --योगीजन; मन: --मन;विषीदन्ति--हताश हो जाते हैं; असमाधानात्‌--समाधि प्राप्त करने में अक्षमता के कारण; मनः-निग्रह--मन को दमन करने केप्रयास द्वारा; कशिता:--थके हुए

हे कमलनयन भगवान्‌, सामान्यतया जो योगीजन मन को स्थिर करने का प्रयास करते हैं,उन्हें समाधि की दशा पूर्ण कर पाने की अपनी अक्षमता के कारण, निराशा का अनुभव करनापड़ता है। इस तरह वे मन को अपने वश में लाने के प्रयास में उकता जाते हैं।

अथात आनन्ददुघं पदाम्बुजंहंसाः श्रयेरन्नरविन्दलोचन ।सुखं नु विश्वेश्वर योगकर्मभि-स्त्वन्माययामी विहता न मानिन: ॥

३॥

अथ--अब; अतः--इसलिए; आनन्द-दुघम्‌--सारे आनन्द का स्त्रोत; पद-अम्बुजम्‌ू--आपके चरणकमल; हंसा:--हंस जैसेव्यक्ति; श्रयेरनू--शरण लेते हैं; अरविन्द-लोचन--हे कमलनेत्र; सुखम्‌--सुखपूर्वक; नु--निस्सन्देह; विश्व-ई श्रर--ब्रह्माण्ड केस्वामी; योग-कर्मभि:--योग तथा सकाम कर्म करने से; त्वत्‌ू-मायया--आपकी भौतिक शक्ति से; अमी--ये; विहता: --पराजित; न--नहीं ( शरण लेते ); मानिन:--झूठे ही गर्व करने वाले |

इसलिए हे कमलनयन ब्रह्माण्ड के स्वामी, हंस सहृश व्यक्ति खुशी-खुशी आपके उनचरणकमलों की शरण ग्रहण करते हैं, जो समस्त दिव्य आनन्द के स्त्रोत हैं। किन्तु जिन्हें अपनेयोग तथा कर्म की उपलब्धियों पर गर्व है, वे आपकी शरण में नहीं आ पाते और आपकीमायाशक्ति द्वारा परास्त होते हैं।

कि चित्रमच्युत तवैतदशेषबन्धोदासेष्वनन्यशरणेसु यदात्मसात्त्वम्‌ ।योरोचयत्सह मृगै: स्वयमी श्वराणांश्रीमत्किरीटतटपीडितपादपीठ: ॥

४॥

किम्‌--क्या; चित्रमू--आश्चर्य; अच्युत--हे अच्युत प्रभु; तब--तुम्हारा; एतत्‌--यह; अशेष-बन्धो --हे सबों के मित्र; दासेषु --सेवकों के लिए; अनन्य-शरणेषु --जिन्होंने अन्य शरण नहीं ग्रहण की; यत्‌--जो; आत्म-सात्त्वम्‌ू--आपसे घनिष्ठता; यः--जिसने; अरोचयत्‌--स्नेहपूर्वक कार्य किया; सह--साथ; मृगै:--पशुओं ( बन्दरों ) के; स्वयम्‌ू--स्वयं; ईश्वराणाम्‌--महान्‌देवताओं के; श्रीमत्‌--ऐश्वर्यशाली; किरीट--मुकुटों के; तट--किनारों से; पीडित--हिलाया; पाद-पीठ:--पीढ़ा ।

हे अच्युत प्रभु, यह आश्चर्य की बात नहीं है कि आप अपने उन सेवकों के पासघनिष्ठतापूर्वक जाते हैं जिन्होंने एकमात्र आपकी शरण ले रखी है। जब आप भगवान्‌ रामचन्द्र केरूप में प्रकट हुए थे, उस अवधि में ब्रह्म जैसे महान्‌ देवता आपके पादपीठ पर अपने मुकुट केऐश्वर्यशाली सिरे रखने के लिए लालायित रहते थे; तब आपने हनुमान जैसे बन्दरों पर विशेषस्नेह प्रदर्शित किया क्योंकि उन्होंने एकमात्र आपकी शरण ले रखी थी।

तं त्वाखिलात्मदयिते श्वरमाथितानांसर्वार्थदं स्वकृतविद्विसृजेत को नु ।को वा भजेत्‌ किमपि विस्मृतयेउनु भूत्यैकि वा भवेन्न तव पादरजोजुषां नः ॥

५॥

तम्‌--उसको; त्वा--तुम; अखिल--समस्त; आत्म--परमात्मा का; दयित--अत्यन्त प्रिय; ईश्वरम्‌--तथा परम नियन्ता;आश्रितानाम्‌ू--आपकी शरण ग्रहण करने वालों के; सर्व-अर्थ--सारी सिद्ध्ियों के; दम्‌--दाता; स्व-कृत--आपके द्वारा प्रदत्तलाभ; वित्‌--कौन जानता है; विसृजेत--तिरष्कृत कर सकता है; कः--कौन; नु--निस्सन्देह; क:ः--कौन; वा--अथवा;भजेत्‌-- स्वीकार कर सकता है; किम्‌ अपि--कुछ भी; विस्मृतये--विस्मृति के लए; अनु--फलस्वरूप; भूत्यै--इन्द्रियतृप्तिके लिए; किम्‌ू--क्या; वा--अथवा; भवेत्‌--है; न--नहीं; तव--तुम्हारे; पाद--चरणकमलों की; रज:-- धूल; जुषाम्‌--सेवकों के लिए; नः--हम सभी |

तो भला किसमें साहस है, जो आत्मारूप, पूजा के सर्वप्रिय लक्ष्य तथा सबों के परम ईश्वरआपका--जो अपनी शरण लेने वाले भक्तों को सभी सम्भव सिद्धियाँ प्रदान करने वाले हैं,तिरस्कार कर सके ? आपके द्वारा प्रदत्त लाभों को जानते हुए भला इतना कृतघ्न कौन हो सकताहै? ऐसा कौन है, जो आपका तिरस्कार करके ऐसी वस्तु को भौतिक सुख के लिए स्वीकारकरेगा जिससे आपकी विस्मृति हो? और आपके चरणकमलों की धूलि की सेवा में निरत हमलोगों को किस चीज का अभाव है ? नैवोपयन्त्यपचितिं कवयस्तवेशब्रह्मायुषापि कृतमृद्धमुदः स्मरन्तः ।योअन्तर्बहिस्तनुभूतामशुभं विधुन्च-न्राचार्यचैत्त्यवपुषा स्वगतिं व्यनक्ति ॥

६॥

न एव--बिल्कुल नहीं; उपयन्ति--व्यक्त करने में सक्षम हैं; अपचितिम्‌--अपनी कृतज्ञता; कवयः--विद्वान भक्तजन; तव--तुम्हारा; ईश--हे ईश्वर; ब्रह्य-आयुषा--ब्रह्म जितनी आयु से; अपि--के होते हुए; कृतम्‌--वदान्य कार्य; ऋद्ध--बढ़ा हुआ;मुदः- प्रसन्नता; स्मरन्त:--स्मरण करते हुए; यः--जो; अन्तः-- भीतर; बहिः--बाहर; तनु- भूताम्‌-देहधारियों का;अशुभम्‌--दुर्भाग्य; विधुन्वनू--दूर करते हुए; आचार्य--गुरु का; चैत्त्य--परमात्मा का; वपुषा--रूपों से; स्व--अपना;गतिम्‌--पथ; व्यनक्ति--दिखलाता है |

हे प्रभु, योगी कवि तथा आध्यात्मिक विज्ञान में पटु लोग आपके प्रति अपनी कृतज्ञता पूरीतरह अभिव्यक्त नहीं कर सके यद्यपि उन्हें ब्रह्माजी जितनी दीर्घायु प्राप्त थी क्योंकि आप दो रूपोंमें--बाह्मतः आचार्य रूप में और आन्तरिक रूप में परमात्मा की तरह देहधारी जीव को अपनेपास आने का निर्देश करते हुए उद्धार करने के लिए प्रकट होते हैं।

श्रीशुक उबाचइत्युद्धवेनात्यनुरक्तचेतसापृष्टो जगत्क़ीडनकः स्वशक्तिभि: ।गृहीतमूर्तित्रय ई श्वरेश्वरोजगाद सप्रेममनोहरस्मित: ॥

७॥

श्री-शुक: उवाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति--इस प्रकार; उद्धवेन--उद्धव द्वारा; अति-अनुरक्त--अत्यधिक आसक्त;चेतसा--हृदय से; पृष्ट:--पूछे गये; जगत्‌--ब्रह्माण्ड; क्रीडनक:--जिसका खिलौना; स्व-शक्तिभि: --अपनी ही शक्तियों द्वारा;गृहीत-- धारण किये हुए; मूर्ति--साकार रूप; त्रयः--तीन; ई श्वर-- समस्त नियन्ताओं में से; ईश्वर: --परम नियन्ता; जगाद--बोला; स-प्रेम--प्रेमी; मन:-हर--आकर्षक; स्मित: --मुसकान |

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : इस तरह अत्यन्त स्नेहिल उद्धव द्वारा पूछे जाने पर समस्त ई श्वरोंके परम नियन्ता भगवान्‌ कृष्ण जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को अपने खिलौने के रूप में मानते हैं और ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव के तीन रूप ग्रहण करते हैं, प्रेमपूर्वक्क अपनी सर्व-आकर्षक मुसकानदिखलाते हुए उत्तर देने लगे।

श्रीभगवानुवाचहन्त ते कथयिष्यामि मम धर्मान्सुमड्रलान्‌ ।यान्श्रद्धयाचरन्मरत्यों मृत्युं जयति दुर्जयम्‌ ॥

८ ॥

श्री-भगवान्‌ उवाच-- भगवान्‌ ने कहा; हन्त--हाँ; ते--तुमसे; कथयिष्यामि--कहूँगा; मम--अपने से सम्बन्धित; धर्मानू--धार्मिक सिद्धान्त; सु-मड्रलानू--अत्यन्त शुभ; यानू--जो; श्रद्धया-- श्रद्धा के साथ; आचरन्‌--सम्पन्न करते हुए; मर्त्य:--मर्त्यमानव; मृत्युमू--मृत्यु को; जबति--जीत लेता है; दुर्जयम्‌--न जीते जाने योग्य |

भगवान्‌ ने कहा : हाँ, मैं तुमसे अपनी भक्ति के सिद्धान्तों का वर्णन करूँगा जिनको सम्पन्नकरने से मर्त्य प्राणी दुर्जय मृत्यु पर विजय पा लेगा।

कुर्यात्सर्वाणि कर्माणि मदर्थ शनकैः: स्मरन्‌ ।मय्यर्पितमनश्ित्तो मद्धर्मात्ममनोरति: ॥

९॥

कुर्यात्‌ू--करे; सर्वाणि--सभी; कर्माणि--नियत कार्यकलाप; मत्‌ू-अर्थम्‌--मेरे लिए; शनकै:--जल्दबाजी किये बिना;स्मरन्‌--स्मरण करते हुए; मयि--मुझको; अर्पित--चढ़ाया गया; मन:-चित्त:--मन तथा बुद्धि; मत्‌-धर्म--मेरी भक्ति; आत्म-मन:--अपने मन का; रति:--आकर्षण ।

मनुष्य को चाहिए कि सैदव मेरा स्मरण करते हुए बिना जल्दबाजी के मेरे प्रति अपने सारेकर्तव्य पूरा करे। उसे चाहिए कि वह मुझे मन तथा बुद्धि अर्पित करके मेरी भक्ति के आकर्षणमें अपना मन स्थिर करे।

देशान्पुण्यानाश्रयेत मद्धक्तै: साधुभि: थ्रितान्‌ ।देवासुरमनुष्येषु मद्धक्ताचरितानि च ॥

१०॥

देशान्‌--स्थानों में; पुण्यान्‌ू--पवित्र; आश्रयेत--शरण ले; मत्‌-भक्तै:--मेरे भक्तों द्वारा; साधुभि:--सन्त स्वभाव के;थ्रितानू--आश्रित; देव--देवताओं; असुर--असुरों; मनुष्येषु--तथा मनुष्यों में; मत्‌ -भक्त--मेरे भक्तों के; आचरितानि--कार्यकलाप; च--तथा |

मनुष्य को उन पवित्र स्थानों में जाकर शरण लेनी चाहिए जहाँ मेरे सन्त स्वभाव वालेभक्तगण निवास करते हैं। उसे मेरे भक्तों के आदर्श कार्यकलापों से मार्गदर्शन प्राप्त करनाचाहिए। ये भक्त देवताओं, असुरों तथा मनुष्यों के बीच प्रकट होते हैं।

पृथक्सत्रेण वा मह्ं पर्वयात्रामहोत्सवान्‌ ।कारयेदगीतनृत्याद्यर्महाराजविभूतिभि: ॥

११॥

पृथक्‌--अकेला; सत्रेण--सभा में; वा--अथवा; महाम्‌--मेरे लिए; पर्व--मासिक त्यौहार यथा एकादशी; यात्रा--विशेषसम्मेलन; महा-उत्सवान्‌--तथा त्यौहार; कारयेत्‌--कराये; गीत--गायन; नृत्य-आद्यै:--नृत्य आदि से; महा-राज--राजसी;विभूतिभि:--ऐ श्वर्य की निशानी के साथ, ठाट-बाट से |

मेरी पूजा के लिए विशेष रूप से नियत पर्वों, त्यौहारों तथा उत्सवों को मनाने के लिए या तोअकेले या सामूहिक जलसों में गायन, नृत्य तथा अन्य ठाट-बाट के साथ मनाने की व्यवस्थाकरे।

मामेव सर्वभूतेषु बहिरन्तरपावृतम्‌ ।ईक्षेतात्मनि चात्मानं यथा खममलाशय: ॥

१२॥

माम्‌ू--मुझको; एव--निस्सन्देह; सर्व-भूतेषु--सारे जीवों में से; बहिः--बाहर से; अन्तः-- भीतर से; अपावृतम्‌--अनाच्छादित;ईक्षेत--देखे; आत्मनि-- अपने भीतर; च-- भी; आत्मानम्‌--परमात्मा को; यथा--जिस तरह; खम्‌--आकाश; अमल-आशय: -शुद्ध हृदय वाला

मनुष्य को चाहिए कि शुद्ध हृदय से सारे जीवों के भीतर और अपने भी भीतर मुझकोपरमात्मा रूप में देखे कि मैं किसी भौतिक वस्तु द्वारा अकलंकित हूँ तथा सर्वत्र भीतर तथा बाहर उपस्थित भी हूँ जिस तरह सर्वव्यापी आकाश होता है।

इति सर्वाणि भूतानि मद्धावेन महाद्युते ।सभाजयन्मन्यमानो ज्ञानं केवलमाथरितः ॥

१३॥

ब्राह्मणे पुक्कसे स्तेने ब्रह्मण्येर्के स्फुलिड्रके ।अक्रूरे क्रूरके चैव समहक्पण्डितो मत: ॥

१४॥

इति--इस प्रकार; सर्वाणि--सभी; भूतानि--जीवों को; मत्‌-भावेन--मेरी उपस्थिति के भाव से; महा-द्युते--हे परम तेजवानउद्धव; सभाजयन्‌--आदर देते हुए; मन्यमान: --ऐसा मानते हुए; ज्ञानमू--ज्ञान; केवलम्‌--दिव्य; आभ्रित:--की शरण लेतेहुए; ब्राह्मणे--ब्राह्मण में; पुक्से--पुक्तल जनजाति से निकाले हुओं में; स्तेने--चोर में; ब्रह्मण्ये-- ब्राह्मण संस्कृति का सम्मानकरने वाले मनुष्य में; अर्के --सूर्य में; स्फुलिड्रके --अग्नि की चिनगारी में; अक्रूरे--कृपालु भद्र में; क्ूरके --क्रूर में; च-- भी;एव--निस्सन्देह; सम-हक्‌--समान दृष्टि वाला; पण्डित:--विद्वान; मतः--माना जाता है|

हे तेजस्वी उद्धव, जो व्यक्ति सारे जीवों को इस भाव से देखता है कि मैं उनमें से हर एक मेंउपस्थित हूँ और जो इस दैवी ज्ञान की शरण लेकर हर एक का सम्मान करता है, वह वास्तव मेंबुद्धिमान माना जाता है। ऐसा व्यक्ति ब्राह्मण तथा नीच, चोर तथा ब्राह्मण संस्कृति के दानीसंवर्धक, सूर्य तथा अग्नि की क्षुद्र चिनगारी, सदय तथा क्रूर को समान रूप से देखता है।

नरेष्वभीक्ष्णं मद्भावं पुंसो भावयतोचिरात्‌ ।स्पर्धासूयातिरस्कारा: साहड्जारा वियन्ति हि ॥

१५॥

नरेषु--सारे पुरुषों में; अभीक्षणम्‌--निरन्तर; मत्‌-भावम्‌ू--मेरी साकार उपस्थिति; पुंसः--पुरुष की; भावयतः --ध्यान कर रहा;अचिरातू--तुरन्‍्त; स्पर्धा--होड़ करने की प्रवृत्ति ( समानों के विरुद्ध ); असूया--द्वेष ( गुरुजनों से ); तिरस्कारा:--तथादुरुपयोग ( छोटों का ); स--सहित; अहड्डारा:--मिथ्या अहंकार; वियन्ति--लुप्त हो जाते हैं; हि--निस्सन्देह |

जो व्यक्ति सारे पुरुषों में मेरी उपस्थिति का निरन्तर ध्यान करता है उसके लिए स्पर्धा कीकुप्रवृत्तियाँ, ईर्ष्या तथा तिरस्कार एवं उसी के साथ मिथ्या अहंकार तुरन्त नष्ट हो जाते हैं।

विसृज्य स्मयमानान्स्वान्हशं ब्रीडां च दैहिकीम्‌ ।प्रणमेद्ण्डवद्धूमावाश्रचाण्डालगोखरम्‌ ॥

१६॥

विसृज्य--त्याग कर; स्मयमानान्‌--हँसते हुओं को; स्वान्‌--अपने मित्रों; हशम्‌--दृष्टि को; ब्रीडाम्‌--परेशानी; च--तथा;दैहिकीम्‌्--देहात्म बोध का; प्रणमेत्‌--नमस्कार करे; दण्ड-वत्‌--डंडे की तरह गिर कर; भूमौ--भूमि पर; आ--यहाँ तककि; श्व-कुत्तों; चाण्डाल--चांडालों; गो--गौवों; खरम्‌--तथा गधों को |

मनुष्य को चाहिए कि वह अपने संगियों के उपहास की परवाह न करते हुए, देहात्म बुद्धिएवं उसके साथ लगी चिन्ता को त्याग दे। उसे कुत्तों, चाण्डालों, गौवों तथा गधों तक के समक्षभूमि पर दंड के समान गिर कर नमस्कार करना चाहिए।

यावत्सर्वेषु भूतेषु मद्भावो नोपजायते ।तावदेवमुपासीत वाड्मन:कायवृत्तिभि: ॥

१७॥

यावत्‌--जब तक; सर्वेषु--सभी; भूतेषु--जीवों में; मत्‌-भाव:--मेरी उपस्थिति का भाव; न उपजायते--उत्पन्न नहीं होता;तावत्‌--तब तक; एवम्‌--इस तरह से; उपासीत--पूजा करे; वाक्‌--वाणी; मन: --मन; काय--तथा शरीर के; वृत्तिभि:--कार्यो के द्वारा |जब तक मनुष्य सारे जीवों के भीतर मुझे देख पाने की क्षमता उत्पन्न नहीं कर लेता, तबतक उसे चाहिए कि वह अपनी वाणी, मन तथा शरीर के कार्यो द्वारा इस विधि से मेरी पूजाकरता रहे।सर्व ब्रह्मात्मकं तस्य विद्ययात्ममनीषया ।परिपश्यच्नुपरमेत्सर्वतो मुइतसंशय: ॥

१८॥

सर्वम्‌--हर वस्तु; ब्रह्य-आत्मकम्‌--परब्रह्म पर आश्रित; तस्थ--उसके लिए; विद्यया--दिव्य ज्ञान द्वारा; आत्म-मनीषया--परमात्मा की अनुभूति द्वारा; परिपश्यन्‌--सर्वत्र देखते हुए; उपरमेत्‌--भौतिक कर्मों से दूर रहे; सर्वतः--सभी प्रकार से; मुक्त-संशय:--सारे सन्देहों से मुक्त

सर्वव्यापक भगवान्‌ के ऐसे दिव्य ज्ञान से मनुष्य परब्रह्म को सर्वत्र देख सकता है। सारेसंशयों से मुक्त होकर वह सकाम कर्मों का परित्याग कर देता है।

अयं हि सर्वकल्पानां सक्षीचीनो मतो मम ।मद्भावः सर्वभूतेषु मनोवाक्कायवृत्तिभि: ॥

१९॥

अयम्‌--यह; हि--निस्सन्देह; सर्व--सभी; कल्पानाम्‌--विधियों का; सश्नीचीन:--अत्यन्त उपयुक्त; मतः--माना जाता है;मम--मेरे द्वारा; मत्‌-भाव:--मुझको देखना; सर्व-भूतेषु--सारे जीवों के भीतर; मन:ः-वाक्‌-काय-वृत्तिभि:--मन, वाणी तथा

शरीर के कार्यो द्वारा)निस्सन्देह मैं मन, वाणी तथा शरीर के कार्यो को प्रयोग करके सारे जीवों के भीतर मेरीअनुभूति करने की विधि को आध्यात्मिक प्रकाश की सर्वश्रेष्ठ सम्भव विधि मानता हूँ।

न हाड्जेपक्रमे ध्वंसो मद्धर्मस्योद्धवाण्वपि ।मया व्यवसितः सम्यड्निर्गुणत्वादनाशिष: ॥

२०॥

न--नहीं है; हि--निस्सन्देह; अड्ग--हे उद्धव; उपक्रमे--प्रयास में; ध्वंसः--विनाश; मत्‌-धर्मस्य--मेरी भक्ति का; उद्धव--हेउद्धव; अणु--रंचमात्र; अपि-- भी; मया--मेरे द्वारा; व्यवसित:--स्थापित; सम्यक्‌ --पूर्णरूपेण; निर्गुण-त्वात्‌--इसके दिव्यहोने से; अनाशिष: --कोई परोक्ष प्रयोजन न होना |

हे उद्धव, चूँकि मैंने स्वयं इसकी स्थापना की है, इसलिए मेरी भक्ति की यह विधि दिव्य हैऔर किसी भौतिक प्रेरणा से मुक्त है। निश्चय ही भक्त इस विधि को ग्रहण करने से रंचमात्र भीहानि नहीं उठाता।

यो यो मयि परे धर्म: कल्प्यते निष्फलाय चेत्‌ ।तदायासो निरर्थ: स्याद्धयादेरिव सत्तम ॥

२१॥

यः, यः--जो जो; मयि-- मुझमें; परे--परम; धर्म:--धर्म है; कल्प्यते--अग्रसर होता है; निष्फलाय-- भौतिक कर्म के फल सेमुक्त बनने की दिशा में; चेतू--यदि; तत्‌--उसका; आयास: --प्रयास; निरर्थ:--व्यर्थ; स्थात्‌ू--हो सके; भय-आदे:-- भयइत्यादि; इब--सहृश; सत्‌-तम-हे साधु-पुरुषों में श्रेष्ठ |

है सन्त शिरोमणि उद्धव, भयावह स्थिति में सामान्य व्यक्ति रोता है, डर जाता है और शोककरता है यद्यपि ऐसी व्यर्थ की भावनाओं से स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं आता किन्तु निजीप्रेरणा के बिना जो कार्य मुझे अर्पित किये जाते हैं, वे, बाहर से व्यर्थ होते हुए भी, वास्तविकधर्म-विधि के तुल्य हैं।

एषा बुद्धिमतां बुद्धिर्मनीषा च मनीषिणाम्‌ ।यत्सत्यमनृतेनेह मर्त्येनाप्नोति मामृतम्‌ ॥

२२॥

एषा--यह; बुद्धि-मताम्‌ू--बुद्धिमान की; बुद्धि:--बुद्धि; मनीषा--चतुराई; च--तथा; मनीषिणाम्‌--चतुर की; यत्‌-- जो;सत्यमू--असली; अनृतेन--झूठ से; इह--इस जीवन में; मर्त्येन--मर्त्य द्वारा; आप्नोति--प्राप्त करता है; मा--मुझको;अमृतम्‌ू--अमर।

यह विधि बुद्धिमान की परम बुद्धि और परम चतुर की चतुराई है क्योंकि इसका पालनकरने से मनुष्य इसी जीवन में मुझ नित्य सत्य को पाने में नश्वर तथा असत्य का उपयोग करसकता है।

एष तेभिहितः कृत्स्नो ब्रह्मवादस्य सड़्ग्रहः ।समासव्यासविधिना देवानामपि दुर्गम: ॥

२३॥

एषः--यह; ते--तुमसे; अभिहितः --बतलाया गया; कृत्स्न:--पूरी तरह; ब्रह्म-वादस्य--परब्रह्म के विज्ञान का; सड्ग्रह: --सर्वेक्षण; समास--संक्षेप में; व्यास--विस्तार से; विधिना--दोनों विधियों से; देवानामू--देवताओं के लिए; अपि--भी;दुर्गमः--पहुँच के बाहर।

इस तरह मैंने तुम्हें, संक्षेप और विस्तार दोनों ही रूपों में, परब्रह्म विषयक विज्ञान का पूर्णव्यौरा बतला दिया। यह विज्ञान देवताओं के लिए भी समझ पाना अत्यन्त कठिन है।

अभीक्ष्णशस्ते गदितं ज्ञानं विस्पष्टयुक्तिमत्‌ ।एतद्विज्ञाय मुच्येत पुरुषो नष्टसंशयः ॥

२४॥

अभीक्ष्णश:--बारम्बार; ते--तुमसे; गदितम्‌ू--कहा गया; ज्ञानमू--ज्ञान; विस्पष्ट-स्पष्ट; युक्ति-- तर्क; मत्‌--से युक्त;एतत्‌--यह; विज्ञाय--ठीक से समझ लेने पर; मुच्येत--मुक्त हो जायेगा; पुरुष:--व्यक्ति; नष्ट--विनष्ट; संशय: --उसकेसन्देह |मैं बारम्बार तुमसे स्पष्ट तर्क सहित यह ज्ञान बता चुका हूँ। जो कोई इसे ठीक से समझ लेताहै, वह सारे संशयों से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त करेगा।

सुविविक्तं तब प्रश्नं मयैतदपि धारयेत्‌ ।सनातन ब्रह्मगुह्मं परं ब्रह्माधिगच्छति ॥

२५॥

स-विविक्तम्‌--अच्छी तरह व्याख्यायित; तब--तुम्हारा; प्रश्नम्‌-- प्रश्न; मया--मेरे द्वारा; एतत्‌ू--यह; अपि--भी; धारयेत्‌--ध्यान एकाग्र करता है; सनातनम्‌--शा श्वत; ब्रह्म-गुह्मम्‌--वेदों का रहस्य; परम्‌--परम; ब्रह्म--ब्रह्म; अधिगच्छति--प्राप्तकरता है।

जो कोई तुम्हारे प्रश्नों के इन स्पष्ट उत्तरों पर अपना ध्यान एकाग्र करता है, वह वेदों केशाश्वत गुह्य लक्ष्य--परब्रह्म --को प्राप्त करेगा।

य एतन्मम भक्तेषु सम्प्रद्यात्सुपुष्कलम्‌ ।तस्याहं ब्रह्मदायस्य द॒दाम्यात्मानमात्मना ॥

२६॥

यः--जो; एतत्‌--यह; मम--मेरा; भक्तेषु--भक्तों में से; सम्प्रदद्यात्‌ू--उपदेश देता है; सु-पुष्कलम्‌--उदारतापूर्वक; तस्थ--उसको; अहम्‌--मैं; ब्रह्म-दायस्य--ब्रह्म विषयक ज्ञान प्रदान करने वाले व्यक्ति को; ददामि--देता हूँ; आत्मानम्‌--स्वयं को;आत्मना--स्वयं द्वारा

जो व्यक्ति उदारतापूर्वक इस ज्ञान को मेरे भक्तों के बीच फैलाता है, वह परब्रह्म का देनेवाला है और मैं उसे अपने आपको दे देता हूँ।

य एतत्समधीयीत पवित्र परमं शुचि ।स पूर्येताहरहर्मा ज्ञानदीपेन दर्शयन्‌ ॥

२७॥

यः--जो; एतत्‌--यह; समधीयीत--जोर-जोर से बाँचता ( पाठ करता ) है; पवित्रम्‌--पवित्र बनाने वाला; परमम्‌--परम;शुचि--स्पष्ट तथा पारदर्शी; सः--वह; पूयेत--शुद्ध हो जाता है; अह: अहः--दिन प्रतिदिन; माम्‌--मुझको; ज्ञान-दीपेन--ज्ञानके दीपक से; दर्शयन्‌--प्रकट करते हुए।

जो व्यक्ति इस स्पष्ट तथा शुद्ध बनाने वाले परम ज्ञान को जोर-जोर से बाँचता है, वह दिनप्रतिदिन शुद्ध बनता जाता है क्योंकि वह दिव्य ज्ञानरूपी दीपक से अन्यों को मुझे उद्धाटितकरता है।

य एतच्छुद्धया नित्यमव्यग्र: श्रृणुयात्रनर: ।मयि भक्ति परां कुर्वन्कर्मभिर्न स बध्यते ॥

२८॥

यः--जो; एतत्‌--यह; श्रद्धया-- श्रद्धापूर्वक; नित्यम्‌--नियमित; अव्यग्र: --विचलित हुए बिना; श्रुणुयात्‌--सुनता है; नर: --पुरुष; मयि--मुझमें; भक्तिम्‌ू-- भक्ति; पराम्‌--दिव्य; कुर्वनू--करते हुए; कर्मभि:--सकाम कर्मो द्वारा; न--नहीं; सः--वह;बध्यते--बँध जाता है।

जो कोई इस ज्ञान को श्रद्धा तथा ध्यान के साथ नियमित रूप से सुनता है और साथ ही मेरीशुद्ध भक्ति में लगा रहता है, वह भौतिक कर्म के फलों के बन्धन से कभी नहीं बँधता।

अप्युद्धव त्वया ब्रह्म सखे समवधारितम्‌ ।अपि ते विगतो मोह: शोक श्चासौ मनोभव:ः ॥

२९॥

अपि--क्या; उद्धव--हे उद्धव; त्वया--तुम्हारे द्वारा; ब्रह्य--आध्यात्मिक ज्ञान; सखे--हे मित्र; समवधारितम्‌--पर्याप्त समझागया; अपि-- क्या; ते--तुम्हारा; विगत:--दूर हो गया है; मोह:--मोह; शोक:--शोक; च--तथा; असौ--यह; मनः-भव: --तुम्हारे मन से उत्पन्न

हे मित्र उद्धव, क्या अब तुम इस दिव्य ज्ञान को भलीभाँति समझ गये ? क्या तुम्हारे मन मेंउठने वाले मोह तथा शोक दूर हो गये ? नैतत्त्वया दाम्भिकाय नास्तिकाय शठाय च ।अशुश्रूषोरभक्ताय दुर्विनीताय दीयताम्‌ ॥

३०॥

न--नहीं; एतत्‌--यह; त्वया--तुम्हारे द्वारा; दाम्भिकाय--दम्भी, पाखण्डी व्यक्ति को; नास्तिकाय--नास्तिक को; शठाय--धूर्त को; च--तथा; अशुश्रूषो: -- श्रद्धा के साथ न सुनने वाले को; अभक्ताय--अभक्त को; दुर्विनीताय--दुर्विनीत को;दीयताम्‌--दिया जाना चाहिए

तुम इस उपदेश को ऐसे व्यक्ति को मत देना जो पाखण्डी, नास्तिक या बेईमान हो या जोश्रद्धापूर्वक न सुनता हो, जो भक्त न हो या जो विनीत न हो।

एतैदेषिरविहीनाय ब्रह्मण्याय प्रियाय च ।साधवे शुचये ब्रूयाद्धक्ति: स्याच्छूद्रयोषिताम्‌ ॥

३१॥

एतैः--इन; दोषैः--दोषों से; विहीनाय--विहीन व्यक्ति को; ब्रह्मण्याय--ब्राह्मणों के कल्याण के प्रति समर्पित व्यक्ति को;प्रियाय--प्रेमी को; च--तथा; साधवे--साधु प्रकृति के; शुच्यये--शुद्ध; ब्रूयात्‌--कहे; भक्ति:-- भक्ति; स्थात्‌ू--यदि उपस्थितहो; शूद्र--सामान्य श्रमिक; योषिताम्‌--तथा स्त्रियों के |

यह ज्ञान उसे दिया जाय जो इन दुर्गुणों से मुक्त हो, जो ब्राह्मणों के कल्याण-कार्य के प्रतिसमर्पित हो तथा जो प्रेमी हो, सन्‍्त स्वभाव का हो और शुद्ध हो। और यदि सामान्य श्रमिकों तथास्त्रियों में भगवान्‌ के प्रति भक्ति पाई जाय, तो उन्हें भी योग्य श्रोताओं के रूप में स्वीकार करनाचाहिए।

नैतद्विज्ञाय जिज्ञासोर्ज्ञतव्यमवशिष्यते ।पीत्वा पीयूषममृतं पातव्यं नावशिष्यते ॥

३२॥

न--नहीं; एतत्‌--यह; विज्ञाय--पूरी तरह समझ कर; जिज्ञासो:--जिज्ञासुओं के; ज्ञातव्यमू--ज्ञेय विषय; अवशिष्यते--रहजाता है; पीत्वा--पीकर; पीयूषम्‌--स्वादिष्ट; अमृतम्‌--अमृत; पातव्यम्‌--पीने योग्य; न--कुछ भी नहीं; अवशिष्यते--बचारहता है।

जब जिज्ञासु व्यक्ति इस ज्ञान को समझ लेता है, तो उसे और जानने के लिए कुछ भी नहींरहता। आखिर, जो सर्वाधिक स्वादिष्ट अमृत का पान कर चुकता है, वह कहीं प्यासा रह सकताहै? ज्ञाने कर्मणि योगे च वार्तायां दण्डधारणे ।यावानर्थो नृणां तात तावांस्तेहं चतुर्विध: ॥

३३॥

ज्ञाने--ज्ञान की विधि में; कर्मणि--सकाम कर्म में; योगे--योग में; च--तथा; वार्तायाम्‌--सामान्य व्यापार में; दण्ड-धारणे--राजनैतिक शासन में; यावान्‌ू--जो भी; अर्थ:--उपलब्धि; नृणाम्‌--मनुष्यों की; तात--हे उद्धव; तावान्‌ू--उतना; ते-- तुमसे;अहमू--ैं; चतुः-विध:--चार प्रकार का चार पुरुषार्थ,वैश्लेषिक ज्ञान, कर्मकाण्ड, योग, सांसारिक वाणिज्य तथा राजनैतिक प्रशासन द्वारा लोगधर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष में प्रगति करना चाहते हैं। किन्तु क्योंकि तुम मेरे भक्त हो इसलिए जोकुछ इन नाना विधियों से प्राप्त किया जा सकता है, उसे तुम आसानी से मेरे भीतर पा सकोगे।

मर्त्यो यदा त्यक्तसमस्तकर्मानिवेदितात्मा विचिकीर्षितो मे ।तदामृतत्वं प्रतिपद्यमानोमयात्मभूयाय च कल्पते वै ॥

३४॥

मर्त्य; --मर्त्य; यदा--जब; त्यक्त--त्यागा हुआ; समस्त--सारे; कर्मा--सकाम कर्म; निवेदित-आत्मा--अपनी आत्मा कोअर्पित कर चुका; विचिकीर्षित:--कुछ विशेष करने के लिए उत्सुक; मे--मेरे लिए; तदा--उस समय; अमृतत्वम्‌-- अमरता;प्रतिपद्यमान: --प्राप्त करने की विधि में; मया--मेरे साथ; आत्म-भूयाय--समान ऐश्वर्य के लिए; च-- भी; कल्पते--पात्र बनजाता है; वै--निस्सन्देह।

जो व्यक्ति सारे सकाम कर्म त्याग देता है और मेरी सेवा करने की तीब्र उत्कंठा से पूरी तरहमुझमें समर्पित हो जाता है, वह जन्म-मृत्यु से मोक्ष पा लेता है और मेरे ऐश्वर्य के भागी के पद परउन्नत हो जाता है।

श्रीशुक उबाचस एवमादर्शितयोगमार्ग-स्तदोत्तम:ःशलोकवचो निशम्य ।बद्धाञलि: प्रीत्युपरुद्धकण्ठोन किद्धिदूचे श्रुपरिप्लुताक्ष: ॥

३५॥

श्री-शुक: उवाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; सः--वह ( उद्धव ); एवम्‌--इस प्रकार; आदर्शित--दिखाया गया; योग-मार्ग:--योग का मार्ग; तदा--तब; उत्तम:-शलोक-- भगवान्‌ श्रीकृष्ण के; बच: --शब्द; निशम्य--सुन कर; बद्ध-अद्जलि: --स्तुति में हाथ जोड़े हुए; प्रीति-- प्रेम के कारण; उपरुद्ध--रँ धा हुआ; कण्ठ:--गला; न किख्जित्‌--कुछ नहीं; ऊचे--कहा;अश्रु--आँसुओं से; परिप्लुत-- भरे हुए; अक्ष:--नेत्र

श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा : भगवान्‌ कृष्ण द्वारा कहे गये इन शब्दों को सुन कर तथाइस प्रकार सम्पूर्ण योग-मार्ग दिखलाये जा चुकने पर, उद्धव ने नमस्कार करने के लिए अपनेहाथ जोड़ लिये। किन्तु उनका गला प्रेम से रँँध गया और आँखें अश्रुओं से पूरित हो गईं जिससेवे कुछ भी नहीं कह पाये।

विष्टभ्य चित्तं प्रणयावधघूर्णधेर्येण राजन्बहुमन्यमान: ।कृताझजलि:ः प्राह यदुप्रवीरंशीर्ष्णा स्पृशंस्तच्चरणारविन्दम्‌ ॥

३६॥

विष्टभ्य--रोक कर; चित्तमू--अपना मन; प्रणय--प्रेमपूर्वक; अवधूर्णम्‌--पूर्णतया विचलित; थैर्येण -- धैर्यपूर्वक; राजन्‌--हेराजा; बहु-मन्यमान:--कृतज्ञता अनुभव करते हुए; कृत-अज्जलि: --हाथ जोड़े; प्राह--कहा; यदु-प्रवीरम्‌--यदुओं के महानतमवीर से; शीर्ष्णा--सिर से; स्पृशन्‌--छूते हुए; तत्‌ू--उनके; चरण-अरविन्दम्‌--चरणकमलों को |

प्रेम से अभिभूत हुए अपने मन को स्थिर करते हुए उद्धव ने यदुवंश के महानतम वीरभगवान्‌ कृष्ण के प्रति अतीव कृतज्ञता का अनुभव किया। हे राजा परीक्षित, वे अपने सिर सेभगवान्‌ के चरणकमलों का स्पर्श करने के लिए झुके और तब हाथ जोड़ कर बोले।

श्रीउद्धव उवाचविद्रावितो मोहमहान्धकारोय आश्रितो मे तव सन्निधानात्‌ ।विभावसो: कि नु समीपगस्यशीतं तमो भी: प्रभवन्त्यजाद्य ॥

३७॥

श्री-उद्धवः उवाच-- श्री उद्धव ने कहा; विद्रावित:--नष्ट हो चुका है; मोह--मोह का; महा-अन्धकार:--महान्‌ अँधेरा; यः --जो; आश्रित: --शरण लिया गया; मे--मेंरे द्वारा; तब--तुम्हारी; सन्निधानात्‌--उपस्थिति से; विभावसो:--सूर्य का; किमू--क्या; नु--निस्सन्देह; समीप-गस्य--निकट आये हुए का; शीतम्‌-- जाड़ा; तम:-- अंधकार; भी: -- भय; प्रभवन्ति--शक्तिरखते हैं; अज--हे अजन्मा; आद्य-ओ प्रिमेवल्‌ लोर्द

श्री उद्धव ने कहा : हे अजन्मा आदि भगवान्‌, यद्यपि मैं मोह के गहन अंधकार में गिर चुकाथा, किन्तु आपकी दयामयी संगति से अब मेरा अज्ञान दूर हो चुका है। निस्सन्देह, शीत,अंधकार तथा भय उस पर किस तरह अपनी शक्ति दिखा सकते हैं, जो तेजवान्‌ सूर्य के निकटपहुँच गया हो ? प्रत्यर्पितो मे भवतानुकम्पिनाभृत्याय विज्ञानमय: प्रदीप: ।हित्वा कृतज्ञस्तव पादमूलंकोन्यं समीयाच्छरणं त्वदीयम्‌ ॥

३८ ॥

प्रत्यर्पित:--बदले में अर्पित; मे--मुझको; भवता--आपके द्वारा; अनुकम्पिना--कृपालु; भृत्याय--अपने सेवक को; विज्ञान-मयः--दिव्य ज्ञान का; प्रदीप:--दीप्त प्रकाश; हित्वा--त्याग कर; कृत-ज्ञ:--कृतज्ञ; तब--तुम्हारे; पाद-मूलम्‌-- चरणकमलोंके तलवे; क:ः--कौन; अन्यमू--दूसरे को; समीयात्‌--जा सकता है; शरणम्‌--शरण के लिए; त्वदीयम्‌--तुम्हारी |

मेरे तुच्छ आत्म-निवेदन के बदले, आपने मुझ अपने सेवक पर दयापूर्वक दिव्य ज्ञान केप्रदीप का दान दिया है। इसलिए आपका कौन भक्त जिसमें तनिक भी कृतज्ञता होगी, आपकेचरणकमलों को त्याग कर अन्य स्वामी की शरण ग्रहण करेगा ? वृक्‍णश्च मे सुहृढः स्नेहपाशोदाशार्हवृष्ण्यन्धकसात्वतेषु ।प्रसारित: सृष्टिविवृद्धये त्वयास्वमायया ह्यात्मसुबोधहेतिना ॥

३९॥

वृकण:--कट गया; च--तथा; मे--मेरा; सु-हढः --अत्यन्त हृढ़; स्नेह-पाश:--स्नेह का बन्धन; दाशाई-वृष्णि-अन्धक-सात्वतेषु--दाशाहों, वृष्णियों, अन्धकों तथा सात्वतों के लिए; प्रसारित:--फैलाया हुआ; सृष्टि-- आपकी सृष्टि की; विवृद्धये --वृद्धि के लिए; त्वया--आपके द्वारा; स्‍्व-मायया--आपकी माया से; हि--निस्सन्देह; आत्म--आत्मा का; सु-बोध--उचितज्ञान का; हेतिना--तलवार द्वारा)दाशाहें,

वृष्णियों, अन्धकों तथा सात्वतों के परिवारों के प्रति मेरे स्नेह की हढ़ता से बँधीहुई रस्सी--वह रस्सी जिसे आपने अपनी सृष्टि को उत्पन्न करने हेतु अपनी माया से आरम्भ में मेरेऊपर डाल रखी थी--अब दिव्य आत्म-ज्ञान के हथियार से कट गई है।

नमोउस्तु ते महायोगिन्प्रपन्नमनुशाधि माम्‌ ।यथा त्वच्चरणाम्भोजे रति: स्थादनपायिनी ॥

४०॥

नमः अस्तु--नमस्कार है; ते--तुमको; महा-योगिन्‌--हे योगियों में सबसे महान्‌; प्रपन्नम्‌--शरणागत; अनुशाधि--कृपयाआदेश दें; माम्‌--मुझको; यथा--किस तरह; त्वत्‌--तुम्हारे; चरण-अम्भोजे--चरणकमलों पर; रति:--दिव्य आसक्ति;स्थात्‌--होए; अनपायिनी --अचल।

हे महायोगी, आपको नमस्कार है। मुझ शरणागत को आप उपदेश दें कि मैं किस तरहआपके चरणकमलों के प्रति अनन्य अनुरक्ति पा सकता हूँ।

श्रीभगवानुवाचगच्छोद्धव मयादिष्टो बदर्याख्यं ममाश्रमम्‌ ।तत्र मत्पादतीर्थोदे स्नानोपस्पर्शन: शुचि: ॥

४१॥

ईक्षयालकनन्दाया विधूताशेषकल्मष: ।वसानो वल्कलान्यडु वन्यभुक्सुखनि:स्पृह: ॥

४२॥

तितिक्षु्न्द्रमात्राणां सुशील: संयतेन्द्रिय: ।शान्तः समाहितधिया ज्ञानविज्ञानसंयुत: ॥

४३॥

मत्तो<नुशिक्षितं यत्ते विविक्तमनुभावयन्‌ ।मय्यावेशितवाक्ित्तो मद्धर्मनिरतो भव ।अतित्रज्य गतीस्तिस्त्रो मामेष्यसि तत: परम्‌ ॥

४४॥

श्री-भगवान्‌ उवाच-- भगवान्‌ ने कहा; गच्छ--जाओ; उद्धव--हे उद्धव; मया--मेरे द्वारा; आदिष्ट: --आदेश दिया गया; बदरी-आख्यम्‌--बद्धिका नामक; मम--मेरी; आश्रमम्‌--कुटिया; तत्र--वहाँ; मत्‌-पाद--मेरे पैरों से निकले; तीर्थ--पतवित्र स्थानोंके; उदे--जल में; स्नान--स्नान करके; उपस्पर्शनै:--तथा शुद्ध्धि के लिए स्पर्श करने से; शुचिः:--विमल; ईक्षया--चितवन से;अलकनन्दाया:--गंगा नदी पर; विधूत--विमल; अशेष--समस्त; कल्मष: --पाप; वसान:--पहन करके ; वल्कलानि--छाल;अड्-हे उद्धव; वन्‍्य--जंगल के फल-फूल, मूल आदि; भुक्‌ू--खाकर; सुख--सुखी; निःस्पृह:--तथा इच्छा से रहित;तितिक्षु:--सहिष्णु; ्न्द्द-मात्राणाम्‌--सारे द्वैतों के; सु-शील:--सन्‍्त जैसा आचरण करते हुए; संयत-इन्द्रियः --वशी भूतइन्द्रियों से; शान्त:--शान्त; समाहित--पूर्णतया एकाग्र; धिया--बुद्धि से; ज्ञान--ज्ञान; विज्ञान--तथा अनुभूति से; संयुत:--सेयुक्त; मत्त:--मुझसे; अनुशिक्षितम्‌--सीखा हुआ; यत्‌--जो; ते--तुम्हारे द्वारा; विविक्तम्‌ू--विवेक से सुनिश्चित;अनुभावयन्‌--पूरी तरह ध्यान करते हुए; मयि--मुझमें; आवेशित--लीन; वाक्‌--तुम्हारे शब्द; चित्त:--तथा मन; मत्‌-धर्म--मेरे दिव्य गुण; निरतः--अनुभव करने के लिए निरन्तर प्रयलशील; भव--इस तरह स्थित होओ; अतित्रज्य--इसको पार करके;गतीः--भौतिक प्रकृति के गन्तव्य; तिस्त्रः--तीन; मामू--मेरे पास; एष्यसि--तुम आओगे; ततः परम्‌--तत्पश्चात्‌ |

भगवान्‌ ने कहा : हे उद्धव, मेरा आदेश लो और बदरिका नामक मेरे आश्रम जाओ। तुमवहाँ के पवित्र जल को, जो मेरे चरणकमलों से निकला है, स्पर्श करना तथा उसमें स्नान करकेअपने को शुद्ध करना। तुम पवित्र अलकनन्दा नदी के दर्शन से समस्त पापों से अपने को मुक्तकरना। तुम वृक्षों की छाल पहनना और जंगल में जो कुछ मिल सके उसे खाना। इस तरह तुमसंतुष्ट और इच्छा से मुक्त, समस्त द्वैतों के प्रति सहिष्णु, अच्छे स्वभाव के, आत्मसंयमी, शान्ततथा आध्यात्मिक ज्ञान एवं विज्ञान से समन्वित हो सकोगे। अपना ध्यान एकाग्र करके मेरे द्वारादिये गये उपदेशों पर निरन्तर मनन करना और इनके सार को आत्मसात्‌ करना। अपने बचनोंतथा विचारों को मुझ पर स्थिर करना और मेरे दिव्य गुणों की अनुभूति को अपने में बढ़ाने केलिए सदैव प्रयास करना। इस तरह तुम प्रकृति के तीन गुणों के गन्तव्य को पार करके अन्त मेंमेरे पास आ जाओगे।

श्रीशुक उबाचस एवमुक्तो हरिमेधसोद्धवःप्रदक्षिणं त॑ परिसृत्य पादयो: ।शिरो निधायाश्रुकलाभिराद््रंधी -न्यषिश्नद्द्वन्द्परो उप्यपक्रमे ॥

४५॥

श्री-शुक: उवाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; सः--वह; एवम्‌--इस तरह; उक्त:--कहा गया; हरि-मेधसा-- भगवान्‌ द्वाराजिनकी बुद्धि भौतिक जीवन के कष्ट को हर लेती है; उद्धव:--उद्द्धव ने; प्रदक्षिणम्‌--अपनी दाएँ ओर मुँह करके; तम्‌ू--उसको; परिसृत्य--परिक्रमा करके; पादयो:--दोनों पाँवों पर; शिर:ः--अपना सिर; निधाय--रख कर; अश्रु-कलाभि:--आँसूकी बूँदों से; आर्द्र--द्रवित; धीः--जिसका हृदय; न्यषिज्ञत्‌ू-भिगो दिया; अद्वन्द्र-पर:--भौतिक द्वन्द्दों में न फँस कर; अपि--यद्यपि; अपक्रमे--विदा लेते समय ।

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : इस तरह भौतिक जीवन के समस्त कष्ट को नष्ट करने वालीबुद्धि के स्वामी भगवान्‌ कृष्ण द्वारा सम्बोधित किये जाने पर श्री उद्धव ने भगवान्‌ की परिक्रमाकी और तब भगवान्‌ के चरणों पर अपना सिर रख कर भूमि पर लेट गये। यद्यपि उद्धव सारे भौतिक द्वन्द्दों के प्रभाव से मुक्त थे, किन्तु उनका हृदय विदीर्ण हो रहा था और विदा के समयउन्होंने अपने आँसुओं से भगवान्‌ के चरणकमलों को भिगो दिया।

सुदुस्त्यजस्नेहवियोगकातरोन शब्नुवंस्तं परिहातुमातुरः ।कृच्छूं ययौ मूर्थनि भर्तृपादुकेबिभ्रन्नमस्कृत्य ययौ पुनः पुनः ॥

४६॥

सु-दुस्त्यज--त्याग पाना असम्भव; स्नेह--जिस पर उसने स्नेह टिका रखा था; वियोग--विछोह के कारण; कातर:--अत्यन्तदुखी, आपे से बाहर; न शक्नुवन्‌--असमर्थ होने से; तम्‌ू--उसको; परिहातुम्‌-छोड़ने के लिए; आतुर:ः--अभिभूत; कृच्छुम्‌ययौ--अत्यधिक पीड़ा अनुभव की; मूर्थनि--सिर पर; भर्तृ--अपने स्वामी के; पादुके--खड़ाओं को; बिभ्रनू--लेते हुए;नमस्कृत्य--नमस्कार करके; ययौ--चला गया; पुनः पुनः--बारम्बार |

जिनसे उद्धव का अटूट स्नेह था उनसे बिछुड़ने से अत्यधिक डरते हुए, वे किंकर्तव्यविमूढ़हो गये और वे भगवान्‌ का साथ छोड़ नहीं पाये। अन्त में, अत्यधिक पीड़ा का अनुभव करतेहुए, उन्होंने बारम्बार भगवान्‌ को नमस्कार किया और अपने स्वामी के खड़ाऊँ को सिर पर रखकर वहाँ से प्रस्थान किया।

ततस्तमन्तईदि सन्निवेश्यगतो महाभागवतो विशालाम्‌ ।यथोपदिष्टां जगदेकबन्धुनातपः समास्थाय हरेरगाद्गतिम्‌ ॥

४७॥

ततः--तब; तम्‌ू--उसको; अन्तः-- भीतर; हृदि--अपने मन में; सन्निवेश्य--रख कर; गत: --जाते हुए; महा- भागवत: --महान्‌भक्त; विशालाम्‌ू--बदरिका श्रम को; यथा--जिस तरह; उपदिष्टाम्‌--वर्णित; जगत्‌--ब्रह्मण्ड के; एक--एकमात्र; बन्धुना--मित्र द्वारा; तप:--तपस्या; समास्थाय--ठीक से सम्पन्न करके; हरेः-- भगवान्‌ के ; अगात्‌-- प्राप्त किया; गतिम्‌ू--गन्तव्य को |

तत्पश्चात्‌ भगवान्‌ को, हृदय में रखते हुए महान्‌ भक्त उद्धव बदरिकाश्रम गये। वहाँ पर तपस्या में रत होकर उन्होंने भगवान्‌ के निजी धाम को प्राप्त किया जिसका वर्णन ब्रह्माण्ड केएकमात्र मित्र स्वयं कृष्ण ने उनसे किया था।

य एतदानन्दसमुद्रसम्भूतंज्ञानामृतं भागवताय भाषितम्‌ ।कृष्णेन योगेश्वरसेविताड्प्रिणासच्छुद्धयासेव्य जगद्ठिमुच्यते ॥

४८ ॥

यः--जो कोई; एतत्‌--यह; आनन्द--आनन्द के; समुद्र--सागर; सम्भृतम्‌--संग्रहीत; ज्ञान--ज्ञान के; अमृतम्‌-- अमृत;भागवताय--उनके भक्त से; भाषितम्‌--कहा गया; कृष्णेन--कृष्ण द्वारा; योग-ईश्वर--योगके स्वामियों द्वारा; सेवित--सेवाकिया गया; अद्भप्रिणा--चरणकमलों द्वारा; सत्‌--सही; श्रद्धबा-- श्रद्धा के साथ; आसेव्य--सेवा करके; जगत्‌--सारासंसार; विमुच्यते--मुक्त हो जाता है

इस तरह उन भगवान्‌ कृष्ण ने जिनके चरणकमलों की सेवा समस्त बड़े बड़े योगेश्वरों द्वाराकी जाती है, अपने भक्त से यह अमृततुल्य ज्ञान कहा जो आध्यात्मिक आनन्द के सम्पूर्ण सागरजैसा है। इस ब्रह्माण्ड में जो कोई भी इस कथा को अत्यन्त श्रद्धापूर्वक ग्रहण करता है, उसकीमुक्ति निश्चित है।

भवभयमपहतन्तुं ज्ञानविज्ञानसारंनिगमकृदुपजहे भृड़वद्वेदसारम्‌ ।अमृतमुदधितश्चापाययद्धृत्यवर्गान्‌पुरुषमृषभमाद्यं कृष्णसंज्ञं नतोउस्मि ॥

४९॥

भव--भौतिक जीवन के; भयम्‌--भय को; अपहन्तुम्‌ू--हर लेने के लिए; ज्ञान-विज्ञान--ज्ञान तथा विज्ञान का; सारम्‌--सार;निगम--वेदों के; कृत्‌ू--रचयिता ने; उपजहढ्ले-- प्रदान किया; भूड़-वत्‌--मधुमक्खी की तरह; वेद-सारम्‌--वेदों का सार;अमृतम्‌--अमृत; उदधित:--समुद्र से; च--तथा; अपाययत्‌--पिलाया; भृत्य-वर्गान्‌ू--अपने अनेक भक्तों को; पुरुषम्‌--भगवान्‌ को; ऋषभम्‌--महानतम; आद्यम्‌--आदि जीव; कृष्ण-संज्ञम्‌--कृष्ण नामक; नत:--सिर झुकाता; अस्मि--हूँ

मैं उन भगवान्‌ कृष्ण को नमस्कार करता हूँ जो आदि तथा समस्त जीवों में महानतम हैं। वेवेदों के रचयिता हैं और उन्होंने अपने भक्तों के भौतिक जगत के भय को नष्ट करने के लिए,मधुमक्खी की तरह समस्त ज्ञान तथा विज्ञान के इस अमृतमय सार का संग्रह किया। इस तरहउन्होंने अपने अनेक भक्तों को आनन्दसागर से यह अमृत प्रदान किया है और उनकी कृपा सेउन्होंने इसका पान किया है।

TO

← पिछला अध्याय

← उद्धव गीता की सूची