13. हंस-अवतार ब्रह्मा के पुत्रों के प्रश्नों का उत्तर देता है
श्रीभगवानुवाचसत्त्वं रजस्तम इति गुणा बुद्धेर्न चात्मन: ।सत्त्वेनान्यतमौ हन्यात्सत्त्वं सत्त्वेन चैव हि ॥
१॥
श्री-भगवान् उबाच-- भगवान् ने कहा; सत्त्वमू--सतो; रज:--रजो; तम:ः--तमो; इति--इस प्रकार ज्ञात; गुणा: --प्रकृति केगुण; बुद्धेः--भौतिक बुद्धि से सम्बद्ध; न--नहीं; च-- भी; आत्मन:--आत्मा को; सत्त्वेन--सतोगुण से; अन्यतमौ--अन्य दो( रजो तथा तमो ); हन्यात्--नष्ट किये जा सकते हैं; सत्त्वमू--सतोगुण को; सत्त्वेन--शुद्ध सतोगुण से; च-- भी ( नष्ट किया जासकता है ); एब--निश्चय ही; हि--निस्सन्देह।
भगवान् ने कहा : भौतिक प्रकृति के तीन गुण, जिनके नाम सतो, रजो तथा तमोगुण हैं,भौतिक बुद्धि से सम्बद्ध होते हैं, आत्मा से नहीं। सतोगुण के विकास से मनुष्य रजो तथातमोगुणों को जीत सकता है एवं दिव्य सत्त्व के अनुशीलन से, वह अपने को भौतिक सत्त्व सेभी मुक्त कर सकता है।
सच्त्वाद्धर्मो भवेद्वृद्धात्पुंसो मद्धक्तिलक्षण: ।सात्त्विकोपासया सत्त्वं ततो धर्म: प्रवर्तते ॥
२॥
सत्त्वात्ू-सतोगुण से; धर्म:--धार्मिक सिद्धान्त; भवेत्-उत्पन्न होते हैं; वृद्धात्--जो प्रबल बनते हैं; पुंसः--पुरुष का; मत्-भक्ति-मेरी भक्ति से; लक्षण:--लक्षणों से युक्त; सात्त्तिक--सतोगुणी वस्तुओं के; उपासया--अनुशीलन से; सत्त्वमू--सतोगुण; ततः--उस गुण से; धर्म:--धार्मिक सिद्धान्त; प्रवर्तते--उत्पन्न होता है।
जब जीव प्रबल रूप से सतोगुण में स्थित हो जाता है, तो मेरी भक्ति के लक्षणों से युक्तधार्मिक सिद्धान्त प्रधान बन जाते हैं। जो वस्तुएँ पहले से सतोगुण में स्थित हैं, उनके अनुशीलनसे सतोगुण को प्रबल बनाया जा सकता है और इस तरह धार्मिक सिद्धान्तों का उदय होता है।
धर्मो रजस्तमो हन्यात्सत्त्ववृद्धिरनुत्तम: ।आशु नश्यति तन्मूलो ह्ाधर्म उभये हते ॥
३॥
धर्म:--भक्ति पर आधारित धर्म; रज:--रजोगुण; तमः--तमोगुण; हन्यात्--नष्ट करते हैं; सत्त्वत--सतोगुण की; वृद्धधिः--वृद्धधिसे; अनुत्तम:--सबसे उत्तम; आशु--शीघ्र; नश्यति--नष्ट हो जाता है; तत्ू--रजो तथातमोगुण का; मूल:--मूल, जड़; हि--निश्चय ही; अधर्म: --अधर्म; उभये हते--दोनों के नष्ट हो जाने पर।
सतोगुण से प्रबलित धर्म, रजो तथा तमोगुण के प्रभाव को नष्ट कर देता है। जब रजो तथातमोगुण परास्त हो जाते हैं, तो उनका मूल कारण, जो कि अधर्म है, तुरन्त ही नष्ट हो जाता है।
आगमोपः प्रजा देश: काल: कर्म च जन्म च ।ध्यानं मन्त्रोथ संस्कारो दशैते गुणहेतव: ॥
४॥
आगमः--शास्त्र; अप:--जल; प्रजा:--जनता या अपने बच्चों की संगति; देश:--स्थान; काल:--समय; कर्म --कर्म; च--भी; जन्म--जन्म; च--भी; ध्यानम्- ध्यान; मन्त्र:--मंत्रोच्चारण; अथ--तथा; संस्कार:--शुद्धि के अनुष्ठान; दश--दस;एते--ये; गुण--गुण; हेतवः-- कारण |
शास्त्रों के गुण, जल, बच्चों या जनता से संगति, स्थान विशेष, काल, कर्म, जन्म, ध्यान,मंत्रोच्चार तथा संस्कार के अनुसार, प्रकृति के गुण भिन्न भिन्न प्रकार से प्रधानता प्राप्त करते हैं।
तत्तत्सात्त्विकमेवैषां यद्य॒द्वुद्धाः प्रचक्षते ।निन्दन्ति तामसं तत्तद्राजसं तदुपेक्षितम् ॥
५॥
तत् तत्--वे वे वस्तुएँ; सात्ततिकम्--सतोगुण में; एव--निस्सन्देह; एषाम्ू--इन दसों में से; यत् यत्--जो जो; वृद्धा:--प्राचीनऋषि यथा व्यासदेव जो वैदिक ज्ञान में पटु हैं; प्रचक्षते-- प्रशंसा करते हैं; निन्दन्ति--निन्दा करते हैं; तामसम्--तमोगुणी; तत्तत्--वे वे वस्तुएँ; राजसम्--रजोगुण में; तत्--मुनियों द्वारा; उपेक्षितम्--न तो प्रशंसित, न आलोचित, सर्वथा त्यक्त |
अभी मैंने जिन दस वस्तुओं का उल्लेख किया है, उनमें से जो सात्विक वस्तुएँ हैं उनकीप्रशंसा तथा संस्तुति, जो तामसिक हैं उनकी आलोचना तथा बहिष्कार एवं जो राजसिक हैं उनकेप्रति उपेक्षा का भाव, उन मुनियों द्वारा व्यक्त किया गया है, जो वैदिक ज्ञान में पटु हैं।
सात्त्विकान्येव सेवेत पुमान्सत्त्वविवृद्धये ।ततो धर्मस्ततो ज्ञानं यावत्स्मृतिरपोहनम् ॥
६॥
सात्त्विकानि--सतोगुणी वस्तुएँ; एब--निस्सन्देह; सेवेत--अनुशीलन करे; पुमान्--पुरुष; सत्त्त--सतोगुण; विवृद्धये --बढ़ानेके लिए; ततः--उस ( सतोगुण में वृद्धि ) से; धर्म:--धार्मिक सिद्धान्तों में स्थिर; तत:--उस ( धर्म ) से; ज्ञानमू--ज्ञान प्रकटहोता है; यावत्--जब तक; स्मृतिः--अपने नित्य स्वरूप का स्मरण करते हुए, आत्म-साक्षात्कार; अपोहनम्ू--दूर करना ( शरीरतथा मन से मोहमयी पहचान )।
जब तक मनुष्य आत्मा विषयक प्रत्यक्ष ज्ञान को पुनरुज्जीवित नहीं कर लेता और प्रकृति केतीन गुणों से उत्पन्न भौतिक शरीर तथा मन से मोहमयी पहचान को हटा नहीं देता, तब तक उसेसतोगुणी वस्तुओं का अनुशीलन करते रहना चाहिए। सतोगुण के बढ़ाने से, वह स्वतः धार्मिकसिद्धान्तों को समझ सकता है और उनका अभ्यास कर सकता है। ऐसे अभ्यास से दिव्य ज्ञानजागृत होता है।
वेणुसड्डर्षजो वह्िर्दग्ध्वा शाम्यति तद्दनम् ।एवं गुणव्यत्ययजो देह: शाम्यति तत्क्रिय: ॥
७॥
वेणु--बाँस की; सड्डर्ष-ज:--रगड़ से उत्पन्न; वहिः--आग; दग्ध्वा--जलाकर; शाम्यति--शान्त हो जाती है; तत्--बाँस के;वनम्--जंगल को; एवम्--इस प्रकार; गुण--गुणों के; व्यत्यय-ज:--अन्योन्य क्रिया से उत्पन्न; देह:-- भौतिक शरीर;शाम्यति--शान्त की जाती है; तत्ू--वह अग्नि; क्रियः:--वही कार्य करके |
बाँस के जंगल में कभी कभी वायु बाँस के तनों में रगड़ उत्पन्न करती है और ऐसी रगड़ सेप्रज़वलित अग्नि उत्पन्न हो जाती है, जो अपने जन्म के स्त्रोत, बाँस के जंगल, को ही भस्म करदेती है। इस प्रकार अग्नि अपने ही कर्म से स्वतः प्रशमित हो जाती है। इसी तरह प्रकृति केभौतिक गुणों में होड़ तथा पारस्परिक क्रिया होने से, स्थूल तथा सूक्ष्म शरीर उत्पन्न होते हैं। यदिमनुष्य अपने मन तथा शरीर का उपयोग ज्ञान का अनुशीलन करने में करता है, तो ऐसा ज्ञान देह को उत्पन्न करने वाले गुणों के प्रभाव को नष्ट कर देता है। इस तरह, अग्नि के ही समान, शरीरतथा मन अपने जन्म के स्त्रोत को विनष्ट करके अपने ही कर्मों से शान्त हो जाते हैं।कर दिया जायेगा।
श्रीउद्धव उबाचविदन्ति मर्त्या: प्रायेण विषयान्पदमापदाम् ।तथापि भुज्जते कृष्ण तत्कथं श्रखराजवत् ॥
८॥
श्री-उद्धवः उवाच--उद्धव ने कहा; विदन्ति--जानते हैं; मर्त्या:--मनुष्यगण; प्रायेण--सामान्यतया; विषयान्--इन्द्रियतृप्ति;'पदम्--स्थिति; आपदाम्--अनेक विपत्तियों की; तथा अपि--फिर भी; भुझ्जते-- भोगते हैं; कृष्ण--हे कृष्ण; तत्ू--ऐसीइन्द्रियतृप्ति; कथम्--कैसे सम्भव है; श्र--कुत्ते; खर--गधे; अज--तथा बकरे; वत्--सहृश ।
श्री उद्धव ने कहा : हे कृष्ण, सामान्यतया मनुष्य यह जानते हैं कि भौतिक जीवन भविष्य मेंमहान् दुख देता है, फिर भी वे भौतिक जीवन का भोग करना चाहते हैं। हे प्रभु, यह जानते हुएभी, वे किस तरह कुत्ते, गधे या बकरे जैसा आरचण करते हैं।तात्पर्य : भौतिक जगत में भोग की मानक विधियाँ हैं--यौन, धन तथा मिथ्या प्रतिष्ठा। ये सब श्रीभगवानुवाचअहमित्यन्यथाबुद्द्ि: प्रमत्तस्य यथा हृदि ।उत्सर्पति रजो घोरं ततो वैकारिकं मनः ॥
९॥
रजोयुक्तस्थ मनसः सड्डूल्प:ः सविकल्पक: ।ततः कामो गुणध्यानादुःसहः स्याद्ध्धि दुर्मतेः ॥
१०॥
श्री-भगवान् उबाच-- भगवान् ने कहा; अहम्ू--शरीर तथा मन के साथ झूठी पहचान; इति--इस प्रकार; अन्यथा-बुद्धि: --मोहमय ज्ञान; प्रमत्तस्य--वास्तविक बुद्धि से रहित है, जो उसका; यथा--तदनुसार; हृदि--मन के भीतर; उत्सर्पति--उठती है;रज:--कामवासना; घोरम्-- भयावह कष्ट देने वाला; ततः--तब; वैकारिकम्--( मूलतः ) सतोगुण में; मनः--मन; रज: --रजोगुण में; युक्तस्थ--लगा हुआ है, जो उसका; मनसः--मन का; सड्डूल्प:--संकल्प; स-विकल्पक:--बदलाव सहित;ततः--उससे; काम:ः--पूर्ण भौतिक इच्छा; गुण--गुणों में; ध्यानातू--ध्यान से; दुःसहः--असहा; स्यथात्--ऐसा ही हो; हि--निश्चय ही; दुर्मतेः--मूर्ख व्यक्ति का।
भगवान् ने कहा : हे उद्धव, बुद्धिरहित व्यक्ति सर्वप्रथम अपनी झूठी पहचान भौतिक शरीरतथा मन के साथ करता है और जब किसी की चेतना में ऐसा मिथ्या ज्ञान उत्पन्न हो जाता है, तोमहान् कष्ट का कारण, भौतिक काम ( विषय-वासना ), उस मन में व्याप्त हो जाता है, जोस्वभाव से सात्विक होता है। तब काम द्वारा दूषित मन भौतिक उन्नति के लिए तरह-तरह कीयोजनाएँ बनाने में एवं बदलने में लीन हो जाता है। इस प्रकार सदैव गुणों का चिन्तन करते हुए,मूर्ख व्यक्ति असहा भौतिक इच्छाओं से पीड़ित होता रहता है।
'करोति कामवशग: कर्माण्यविजितेन्द्रिय: ।दुःखोदर्काणि सम्पश्यन्रजोवेगविमोहित: ॥
११॥
करोति--करता है; काम-- भौतिक इच्छाओ के; वश--अधीन; ग:--जाकर; कर्माणि--सकाम कर्म; अविजित--- अवश्य;इन्द्रियः--जिसकी इन्द्रियाँ; दुःख--दुख; उरदर्काणि-- भावी फल के रूप में लाते हुए; सम्पश्यन्--स्पष्टदेखते हुए; रज:--रजोगुण का; वेग--वेग से; विमोहितः --मोह ग्रस्त
जो भौतिक इन्द्रियों को वश में नहीं करता, वह भौतिक इच्छाओं के वशीभूत हो जाता हैऔर इस तरह वह रजोगुण की प्रबल तरंगों से मोहग्रस्त हो जाता है। ऐसा व्यक्ति भौतिक कर्मकरता रहता है, यद्यपि उसे स्पष्ट दिखता है कि इसका फल भावी दुख होगा।
रजस्तमोभ्यां यदपि विद्वान्विक्षिप्तधी: पुनः ।अतन्द्रितो मनो युझ्जन्दोषदृष्टिन सजजते ॥
१२॥
रजः-तमोभ्याम्ू--रजो तथा तमोगुणों से; यत् अपि--यद्यपि; विद्वानू--विद्वान व्यक्ति; विक्षिप्त--मोहग्रस्त; धी:--बुद्ध्धि;पुनः--फिर; अतन्द्रितः:--सावधानी से; मन: --मन; युद्जनू--लगाते हुए; दोष-- भौतिकआसक्ति का कल्मष; दृष्टि:--स्पष्टदेखते हुए; न--नहीं; सजते--लिप्त नहीं होता ।
यद्यपि विद्वान पुरुष की बुद्धि रजो तथा तमोगुणों से मोहग्रस्त हो सकती है, किन्तु उसेचाहिए कि वह सावधानी से अपने मन को पुनः अपने वश्ञ में करे। गुणों के कल्मष को स्पष्टदेखने से वह आसक्त नहीं होता।
अप्रमत्तोनुयुज्जीत मनो मय्यर्पयज्छनै: ।अनिर्विण्णो यथाकालं जितश्वासो जितासनः ॥
१३॥
अप्रमत्त:--सतर्क तथा गम्भीर; अनुयुज्जीत--स्थिर करे; मन:ः--मन; मयि--मुझमें; अर्पयन्--लीन करते हुए; शनैः--धीरे धीरे;अनिर्विण्णग:--आलसी या खिन्न हुए बिना; यथा-कालम्--दिन में कम से कम तीन बार ( प्रातः, दोपहर तथा संध्या-समय );जित--जीत कर; श्वास: -- श्रास लेने की विधि; जित--जीत कर; आसन: --बैठने की शैली
मनुष्य को सावधान तथा गम्भीर होना चाहिए और उसे कभी भी आलसी या खिन्न नहीं होनाचाहिए। श्वास तथा आसन की योग-क्रियाओं में दक्ष बन कर, मनुष्य को अपना मन प्रातः,दोपहर तथा संध्या-समय मुझ पर एकाग्र करके इस तरह मन को धीरे धीरे मुझमें पूरी तरह सेलीन कर लेना चाहिए।
एतावान्योग आदिष्टो मच्छिष्यै: सनकादिभि: ।सर्वतो मन आकृष्य मय्यद्धावेश्यते यथा ॥
१४॥
एतावानू्--वास्तव में यह; योग:--योग-पद्धति; आदिष्ट:--आदेश दिया हुआ; मत्-शिष्यै: --मेंरे भक्तों द्वारा; सनक-आदिभिः:--सनक कुमार इत्यादि द्वारा; सर्वतः--सभी दिशाओं से; मन:--मन को; आकृष्य--खींच कर; मयि--मुझमें;अद्धा--सीधे; आवेश्यते--लीन किया जाता है; यथा--तदनुसार |
सनक कुमार इत्यादि मेरे भक्तों द्वारा पढ़ायी गयी वास्तविक योग-पद्धति इतनी ही हैं किअन्य सारी वस्तुओं से मन को हटाकर मनुष्य को चाहिए कि उसे सीधे तथा उपयुक्त ढंग से मुझ में लीन कर दे।श्रीउद्धव उबाचयदा त्वं सनकादिभ्यो येन रूपेण केशव ।योगमादिष्टवानेतद्रूपमिच्छामि वेदितुम्ू ॥
१५॥
श्री-उद्धवः उबाच-- श्री उद्धव ने कहा; यदा--जब; त्वम्--तुम; सनक-आदिश्य: --सनक आदि को; येन--जिससे;रूपेण--रूप से; केशव--हे केशव; योगम्--परब्रह्म में मन को स्थिर करने की विधि; आदिष्टवान्--आपने आदेश दिया है;एततू--वह; रूपमू--रूप; इच्छामि--चाहता हूँ; वेदितुमू--जानना
श्री उद्धव ने कहा : हे केशव, आपने सनक तथा उनके भाइयों को किस समय तथा किसरूप में योग-विद्या के विषय में उपदेश दिया ? अब मैं इन बातों के विषय में जानना चाहता हूँ।
श्रीभगवानुवाचपुत्रा हिरण्यगर्भस्य मानसा: सनकादयः पप्रच्छु: पितरं सूक्ष्मां योगस्यैकान्तिकीमातिम् ॥
१६॥
श्री-भगवान् उवाच-- भगवान् ने कहा; पुत्रा:--पुत्र; हिरण्य-गर्भस्य--ब्रह्मा के; मानसा:--मन से उत्पन्न; सनक-आदय: --सनक ऋषि इत्यादि ने; पप्रच्छु:--पूछा; पितरम्--अपने पिता ( ब्रह्मा ) से; सूक्ष्माम्-सूक्ष्म अतएबसमझने में कठिन; योगस्य--योग-विद्या का; एकान्तिकीमू--परम; गतिम्--लक्ष्य |
भगवान् ने कहा, एक बार सनक आदि ब्रह्मा के मानस पुत्रों ने अपने पिता से योग के परमलक्ष्य जैसे अत्यन्त गूढ़ विषय के बारे में पूछा।
सनकादय ऊचुःगुणेष्वाविशते चेतो गुणाश्रेतसि च प्रभो ।कथमन्योन्यसन्त्यागो मुमुक्षोरतितितीर्षों: ॥
१७॥
सनक-आदय: ऊचु:--सनक इत्यादि ऋषियों ने कहा; गुणेषु--इन्द्रिय-विषयों में; आविशते--सीधे प्रवेश करता है; चेत:--मन; गुणा: --इन्द्रिय-विषय; चेतसि--मन के भीतर; च-- भी; प्रभो--हे प्रभु; कथम्--वह विधि क्या है; अन्योन्य--इन्द्रिय-विषयों तथा मन का पारस्परिक सम्बन्ध; सन्त्याग:--वैराग्य; मुमुक्षो: --मोक्ष की कामना करने वाले का; अतितितीर्षो: --इन्द्रियतृप्ति को पार कर जाने के इच्छुक का।
सनकादि ऋषियों ने कहा : हे प्रभु, लोगों के मन स्वभावत: भौतिक इन्द्रिय-विषयों के प्रतिआकृष्ट रहते हैं और इसी तरह से इन्द्रिय-विषय इच्छा के रूप में मन में प्रवेश करते हैं। अतएव मोक्ष की इच्छा करने वाला तथा इन्द्रियतृप्ति के कार्यों को लाँघने की इच्छा करने वाला व्यक्तिइन्द्रिय-विषयों तथा मन के बीच पाये जाने वाले इस पारस्परिक सम्बन्ध को कैसे नष्ट करे?कृपया हमें यह समझायें ।
श्रीभगवानुवाचएवं पृष्टो महादेव: स्वयम्भूभ्भूतभावन: ।ध्यायमान: प्रश्नबीजं नाभ्यपद्यत कर्मधी: ॥
१८॥
श्री-भगवान् उबाच-- भगवान् ने कहा; एवम्--इस प्रकार; पृष्ट:--पूछे जाने पर; महा-देवः --महान् देवता ब्रह्मा; स्वयम्-भू:--बिना जन्म के ( गर्भोदकशायी विष्णु के शरीर से सीधे उत्पन्न ); भूत--सारे बद्धजीवों के; भावन:--स्त्रष्टा ( बद्ध जीवन के );ध्यायमान:--गम्भीरतापूर्वक विचार करते हुए; प्रश्न-- प्रश्न के; बीजम्--सत्य; न अभ्यपद्यत--नहीं पहुँचा; कर्म-धी:--अपनेही कर्मों द्वारा मोहित बुद्धि |
भगवान् ने कहा : हे उद्धव, भगवान् के शरीर से उत्पन्न तथा भौतिक जगत के समस्त जीवोंके स्त्रष्टा स्वयं ब्रह्माजी ने सर्वोच्च देवता होने के कारण सनक आदि अपने पुत्रों के प्रश्न परगम्भीरतापूर्वक विचार किया। किन्तु ब्रह्मा की बुद्धि अपनी सृष्टि के कार्यो से प्रभावित थी, अतःवे इस प्रश्न का सही उत्तर नहीं ढूँढ सके ।
स मामचिन्तयद्देव: प्रश्नपारतितीर्षया ।तस्याहं हंसरूपेण सकाशमगमं तदा ॥
१९॥
सः--उस ( ब्रह्मा ) ने; मामू--मुझको; अचिन्तयत्--स्मरण किया; देव: --आदि देवता; प्रश्न-- प्रश्न का; पार--अन्त, निष्कर्ष( उत्तर ); तितीर्षया--प्राप्त करने या समझने की इच्छा से; तस्य--उस तक; अहमू--मैं; हंस-रूपेण--हंस के रूप में;सकाशम्--हृश्य; अगममू--हो गया; तदा--उस समय ।
ब्रह्माजी उस प्रश्न का उत्तर पाना चाह रहे थे, जो उन्हें उद्विग्न कर रहा था, अतएव उन्होंनेअपना मन भगवान् में स्थिर कर दिया। उस समय, मैं अपने हंस रूप में ब्रह्मा को दृष्टिगोचरहुआ।
इृष्टा माम्त उपब्रज्य कृत्व पादाभिवन्दनम् ।ब्रह्माणमग्रतः कृत्वा पप्रच्छु? को भवानिति ॥
२०॥
इष्ठा--देख कर; माम्--मुझको; ते--वे ( मुनिगण ); उपब्रज्य--निकट आकर; कृत्वा--करके; पाद--चरणकमलों पर;अभिवन्दनम्--नमस्कार; ब्रह्मणम्--ब्रह्माजी को; अग्रत:--सामने; कृत्वा--करके ; पप्रच्छु: --पूछा; कः भवान्ू--आप कौनहैं; इति--इस प्रकार।
इस प्रकार मुझे देख कर सारे मुनि, ब्रह्म को आगे करके, आगे आये और मेरे चरणकमलोंकी पूजा की। तत्पश्चात् उन्होंने साफ साफ पूछा कि, ' आप कौन हैं ?' इत्यहं मुनिभि: पृष्टस्तत्त्वजिज्ञासुभिस्तदा ।यदवोचमहं तेभ्यस्तदुद्धव निबोध मे ॥
२१॥
इति--इस प्रकार; अहम्--मैं; मुनिभि:--मुनियों के द्वारा; पृष्टः--पूछा जाने पर; तत्त्व--योग के लक्ष्य के विषय में सत्य;जिज्ञासुभि:--जानने की इच्छा रखने वालों के द्वारा; तदा--उस समय; यत्--जो; अवोचम्--बोला; अहमू--मैं; तेभ्य: --उनसे; तत्--वह; उद्धव--हे उद्धव; निबोध--सीखो; मे--मुझसे |
हे उद्धव, मुनिगण योग-पद्धति के परम सत्य को जानने के इच्छुक थे, अतएव उन्होंने मुझसेइस प्रकार पूछा। मैंने मुनियों से जो कुछ कहा, उसे अब मुझसे सुनो।
वस्तुनो यद्यनानात्व आत्मन: प्रश्न ईहशः ।कथं घटेत वो विप्रा वक्तुर्वा मे क आश्रय: ॥
२२॥
वस्तुन:ः--व्गास्तविकता का; यदि--यदि; अनानात्वे--व्यष्टिहीनता में; आत्मन:--जीवात्मा के; प्रश्न: --प्रश्न; ईहश:ः --ऐसा;कथम्--कैसे; घटेत--सम्भव है, अथवा उपयुक्त है; वः--पूछ रहे तुम्हारा; विप्रा:--हे ब्राह्मण; वक्तु:--वक्ता का; वा--अथवा; मे--मेरा; क:ः--क्या है; आश्रय:--असली स्थिति अथवा आश्रय ।
हे ब्राह्मणो, यदि तुम लोग मुझसे पूछते हो कि मैं कौन हूँ, तो यदि तुम यह विश्वास करते होकि मैं भी जीव हूँ और हम लोगों में कोई अन्तर नहीं है--क्योंकि अन्ततः सारे जीव एक हैं--तोफिर तुम लोगों का प्रश्न किस तरह सम्भव या उपयुक्त ( युक्ति संगत ) है ? अन्ततः तुम्हारा औरमेरा दोनों का असली आश्रय क्या है ? पशञ्जात्मकेषु भूतेषु समानेषु च वस्तुतः ।को भवानिति वः प्रश्नो वाचारम्भो हानर्थकः ॥
२३॥
पञ्ञ--पाँच तत्त्वों के; आत्मकेषु--बने हुए; भूतेषु--विद्यमान; समानेषु--एक समान; च--भी; वस्तुत:--सार रूप में; कः--कौन; भवान्--आप हैं; इति--इस प्रकार; व:--तुम्हारा; प्रश्न:--प्रश्न; वाचा--वाणी से; आरम्भ:--ऐसा प्रयास; हि--निश्चयही; अनर्थकः--असली अर्थ या अभिप्राय से रहित।
यदि तुम लोग मुझसे यह प्रश्न पूछ कर कि, 'आप कौन हैं ?' भौतिक देह की बात करनाचाहते हो, तो मैं यह इंगित करना चाहूँगा कि सारे भौतिक देह पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु तथाआकाश--इन पाँच तत्त्वों से मिल कर बने हैं। इसलिए, तुम लोगों को इस प्रकार पूछना चाहिएथा, 'आप पाँच कौन हैं?' यदि तुम लोग यह मानते हो कि सारे भौतिक देह एकसमान तत्त्वोंसे बने होने से, अन्ततः एक हैं, तो भी तुम्हारा प्रश्न निरर्थक है क्योंकि एक शरीर से दूसरे शरीरमें भेद करने में कोई गम्भीर प्रयोजन नहीं है। इस तरह ऐसा लगता है कि मेरी पहचान पूछ कर,तुम लोग ऐसे शब्द बोल रहे हो जिनका कोई वास्तविक अर्थ या प्रयोजन नहीं है।
मनसा वचसा हृष्टया गृह्मतेउन्यैरपीन्द्रिये: ।अहमेव न मत्तोन्यदिति बुध्यध्वमझसा ॥
२४॥
मनसा--मन से; वचसा-- वाणी से; दृष्या--दृष्टि से; गृह्मते--ग्रहण किया जाता है, स्वीकार किया जाता है; अन्यै:-- अन्य;अपि--बद्यर्पा; इन्द्रियैः --इन्द्रियों के द्वारा; अहम्--मैं; एब--निस्सन्देह; न--नहीं; मत्त:--मेंरे अतिरिक्त; अन्यत्--अन्य कोईवस्तु; इति--इस प्रकार; बुध्यध्वम्-तुम्हें समझना चाहिए; अज्ञसा--तथ्यों के सीधेविश्लेषण से |
इस जगत में, मन, वाणी, आँखों या अन्य इन्द्रियों के द्वारा जो भी अनुभव किया जाता है,वह एकमात्र मैं हूँ, मेरे अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। तुम सभी लोग तथ्यों के सीधे विश्लेषण सेइसे समझो।
गुणेष्वाविशते चेतो गुणाश्रेतसि च प्रजा: ।जीवस्य देह उभयं गुणाश्वेतो मदात्मतः ॥
२५॥
गुणेषु--इन्द्रिय-विषयों में; आविशते--प्रविष्ट करता है; चेतः:--मन; गुणा:--इन्द्रिय-विषय; चेतसि--मन में ; च-- भी ( प्रवेशकरते हैं ); प्रजा:--मेरे पुत्रों; जीवस्य--जीव का; देह:--बाह्य शरीर, उपाधि के रूप में; उभयम्--इन दोनों; गुणा: --इन्द्रिय-विषय; चेत:--मन; मत्-आत्मन: --परमात्मा रूप में मुझे पाकर |
हे पुत्रो, मन की सहज प्रवृत्ति भौतिक इन्द्रिय-विषयों में प्रविष्ट करने की होती है और इसीतरह इन्द्रिय-विषय मन में प्रवेश करते हैं। किन्तु भौतिक मन तथा इन्द्रिय-विषय दोनों हीउपाधियाँ मात्र हैं, जो मेरे अंशरूप आत्मा को प्रच्छन्न करती हैं।
गुणेषु चाविशच्चित्तमभीक्ष्णं गुणसेवया ।गुणाश्च चित्तप्रभवा मद्गूप उभयं त्यजेत्ू ॥
२६॥
गुणेषु--इन्द्रिय-विषयों में; च--तथा; आविशत्-प्रविष्ट हुआ; चित्तम्ू--मन; अभीक्ष्णम्-पुनः पुनः; गुण-सेवया--इन्द्रियतृप्ति द्वारा; गुणा:--तथा भौतिक इन्द्रिय-विषय; च--भी; चित्त--मन के भीतर; प्रभवा:--मुख्य रूप से उपस्थित होकर;मत्-रूप:--जिसने अपने को मुझसे अभिन्न समझ लिया है और इस तरह जो मेरे रूप, लीला आदि में लीन रहता है; उभयम्--दोनों ( मन तथा इन्द्रिय-विषय ); त्यजेतू--त्याग देना चाहिए
जिस व्यक्ति ने यह जान कर कि वह मुझसे भिन्न नहीं है, मुझे प्राप्त कर लिया है, वहअनुभव करता है कि मन निरन्तर इन्द्रियतृप्ति के कारण इन्द्रिय-विषयों में रमा रहता है औरभौतिक वस्तुएँ मन के भीतर स्पष्टतया स्थित रहती हैं। मेरे दिव्य स्वभाव को समझ लेने के बाद,वह मन तथा इसके विषयों को त्याग देता है।
जाग्रत्स्वष्न: सुषुप्तं च गुणतो बुद्धिवृत्तय: ।तासां विलक्षणो जीव: साक्षित्वेन विनिश्चित:ः ॥
२७॥
जाग्रत्ू--जगा हुआ; स्वप्न:--स्वप्न देखता; सु-सुप्तम्--गहरी नींद; च--भी; गुणतः--गुणों से उत्पन्न; बुद्धि--बुद्धि के;वृत्तय:--कार्य; तासाम्--ऐसे कार्यो से; विलक्षण:--विभिन्न लक्षणों वाला; जीव:--जीव; साक्षित्वेन--साक्षी होने के लक्षणसे युक्त; विनिश्चित:--सुनिश्चित किया जाता है
जगना, सोना तथा गहरी नींद--ये बुद्धि के तीन कार्य है और प्रकृति के गुणों द्वारा उत्पन्नहोते है। शरीर के भीतर का जीव इन तीनों अवस्थाओं से भिन्न लक्षणों द्वारा सुनिश्चित होता है,अतएव वह उनका साक्षी बना रहता है।
यहिं संसृतिबन्धोयमात्मनो गुणवृत्तिद: ।मयि तुर्ये स्थितो जह्यात्त्यागस्तद्गुणचेतसाम् ॥
२८ ॥
यहि-- क्योंकि; संसति-- भौतिक बुद्धि या संसार का; बन्ध: --बन्धन; अयम्--यह है; आत्मन:--आत्मा का; गुण-- प्रकृति केगुणों में; वृत्ति-दः --वृत्तिपरक कार्य देने वाली; मयि--मुझमें; तुर्ये--चौथे तत्त्व में ( जाग्रत, सुप्त, सुषुप्त से आगे ); स्थित: --स्थित; जह्यातू--त्याग दे; त्याग:--वैराग्य; तत्ू--उस समय; गुण--इन्द्रिय-विषयों का; चेतसामू--तथा मन का ।
आत्मा भौतिक बुद्धि के बन्धन में बन्दी है, जो उसे प्रकृति के मोहमय गुणों से निरन्तरलगाये रहती है। लकिन मै चेतना की चौथी अवस्था--जाग्रत, स्वप्न तथा सुषुप्त से परे--हूँ।मुझमें स्थित होने पर, आत्मा को भौतिक चेतना का बन्धन त्याग देना चाहिए। उस समय, जीवस्वतः भौतिक इन्द्रिय-विषयों तथा भौतिक मन को त्याग देगा।
अहड्ढारकृतं बन्धमात्मनोर्थविपर्ययम् ।दिद्वान्निर्विद्य संसारचिन्तां तुर्ये स्थितस्त्यजेतू ॥
२९॥
अहड्ढडार--मिथ्या गर्व से; कृतम्--उत्पन्न; बन्धम्--बन्धन; आत्मन:--आत्मा का; अर्थ--जो वास्तव में उपयोगी है उसका;विपर्ययम्--उल्टा, विरुद्ध; विद्वान्ू--जानने वाला; निर्विद्य--विरक्त होकर; संसार--जगत में; चिन्ताम्--निरन्तर विचार;तुर्ये--चौथे तत्त्व, भगवान् में; स्थितः--स्थित होकर; त्यजेत्--त्याग दे
जीव का अहंकार उसे बन्धन में डालता है और जीव जो चाहता है उसका सर्वथा विपरीतउसे देता है। अतएव बुद्धिमान व्यक्ति को चाहिए कि भौतिक जीवन भोगने की स्थायी चिन्ताको त्याग दे और भगवान् में स्थित रहे, जो भौतिक चेतना के कार्यो से परे है।
यावन्नानार्थधीः पुंसो न निवर्तेत युक्तिभि: ।जागर्त्यपि स्वपन्नज्ञ: स्वप्ने जागरणं यथा ॥
३०॥
यावत्--जब तक; नाना--अनेक; अर्थ--महत्त्व का; धी:-- धारणा; पुंसः--पुरुष का; न--नहीं; निवर्तेत--शमन होता है;युक्तिभिः --उपयुक्त विधियों से ( जिन्हें मैने बताया है ); जागर्ति--जाग्रत रहने से; अपि--यद्यपि; स्वपन्--सोते या स्वप्न देखते;अज्ञ:--वस्तुओं को उसी रूप में न देखने वाला; स्वप्ने--सपने में; जागरणम्--जाग्रत रह कर; यथा--जिस तरह।
मनुष्य को चाहिए कि मेरे आदेशों के अनुसार वह अपना मन मुझ में स्थिर करे। किन्तु यदिवह हर वस्तु को मेरे भीतर न देख कर जीवन में अनेक प्रकार के अर्थ तथा लक्ष्य देखता रहताहै, तो वह, जगते हुए भी, अपूर्ण ज्ञान के कारण, वास्तव में स्वप्न देखता रहता है, जिस तरहवह यह स्वप्न देखे कि वह स्वप्न से जग गया है।
असत्त्वादात्मनो३न्येषां भावानां तत्कृता भिदा ।गतयो हेतवश्वास्य मृषा स्वजहशो यथा ॥
३१॥
असत्त्वात्ू--वास्तविक अस्तित्व के अभाव में; आत्मन:-- भगवान् से; अन्येषाम्--अन्य; भावानाम्--अस्तित्व की दशाओं के;तत्--उनके द्वारा; कृता--उत्पन्न; भिदा--अन्तर या बिछोह; गतयः--लक्ष्य यथा स्वर्ग जाना; हेतव:ः--सकाम कर्म जो भावी'फल के कारण है; च-- भी; अस्य--जीव का; मृषा--झूठा; स्वज--सपने का; दृशः--देखने वाले का; यथा--जिस तरह ।
उन जगत की अवस्थाओं का जिन्हें भगवान् से पृथक्् सोचा जाता है, वास्तविक अस्तित्व नहीं होता, यद्यपि वे परब्रह्म से पृथकत्व की भावना उत्पन्न करती है। जिस तरह स्वप्न देखनेवाला नाना प्रकार के कार्यों तथा फलों की कल्पना करता है उसी तरह भगवान् से पृथक्अस्तित्व की भावना से जीव झूठे ही सकाम कर्मों को भावी फल तथा गन्तव्य का कारणसोचता हुआ कर्म करता है।
यो जागरे बहिरनुक्षणधर्मिणो< र्थान्भुड़े समस्तकरणैईदि तत्सदक्षान् ।स्वप्ने सुषुप्त उपसंहरते स एक:स्मृत्यन्वयात्रत्रिगुणवृत्तिहगिन्द्रियेश: ॥
३२॥
यः--जो जीव; जागरे--जगते हुए; बहि:--बाह्य; अनुक्षण-- क्षणिक ; धर्मिण: --गुण; अर्थानू--शरीर, मन तथा उनकेअनुभव; भुड़े -- भोगता है; समस्त--समस्त; करणै:--इन्द्रियों से; हदि--मन के भीतर; तत्-सहक्षान्--जगते हुए में जैसेअनुभव; स्वप्ने--स्वप्नों में; सुषुप्ते--स्वप्नरहित गहरी नींद में; उपसंहरते--अज्ञान में लीन हो जाता है; सः--वह; एक:--एक;स्मृति--स्मरणशक्ति का; अन्वयात्--क्रम से; त्रि-गुण--जाग्रत, स्वप्न तथा सुषुप्त, इन तीन अवस्थाओं के; वृत्ति--कार्य;हक्--देखना; इन्द्रिय--इन्द्रियों का; ईशः--स्वामी बनता है|
जाग्रत रहने पर जीव अपनी सारी इन्द्रियों से भौतिक शरीर तथा मन के सारे क्षणिक गुणोंका भोग करता है; स्वप्न के समय वह मन के भीतर ऐसे ही अनुभवों का आनन्द लेता है औरप्रगाढ़ स्वप्नरहित निद्रा में ऐसे सारे अनुभव अज्ञान में मिल जाते है। जागृति, स्वप्न तथा सुषुप्तिकी सरणि को स्मरण करते तथा सोचते हुए, जीव यह समझ सकता है कि वह चेतना की तीनोंअवस्थाओं में एक ही है और दिव्य है। इस तरह वह अपनी इन्द्रियों का स्वामी बन जाता है।
एवं विमृश्य गुणतो मनसस्त्र्यवस्थामन्मायया मयि कृता इति निश्चितार्था: ।सछ्छिद्य हार्दमनुमानसदुक्तिती क्षणज्ञानासिना भजत माखिलसंशयाधिम् ॥
३३॥
एवम्--इस प्रकार; विमृश्य--विचार करके; गुणतः--गुणों से; मनसः--मन की; त्रि-अवस्था:--चेतना की तीन अवस्थाएँ;मत्-मायया--मेरी मायाशक्ति के प्रभाव से; मयि--मुझमें; कृता:--आरोपित; इति--इस प्रकार; निश्चित-अर्था:--जिन्होंनेआत्मा के वास्तविक अर्थ को निश्चित कर लिया है; सज्छिद्य--काट कर; हार्दमू--हृदय में स्थित; अनुमान--तर्क द्वारा; सतू-उक्ति--तथा मुनियों और वैदिक ग्रंथों के आदेशों से; तीक्ष्ण--तेज; ज्ञान--ज्ञान की; असिना--तलवार से; भजत--आप कीसारी पूजा; मा--मुझको; अखिल--समस्त; संशय--संदेह; आधिम्--कारण
( मिथ्या अभिमान )तुम्हें विचार करना चाहिए कि किस तरह, प्रकृति के गुणों द्वारा उत्पन्न, मन की ये तीनअवस्थाएँ, मेरी मायाशक्ति के प्रभाव से, मुझमें कृत्रिम रूप से विद्यमान मानी गई है। तुम्हें आत्माकी सत्यता को सुनिश्चित कर लेने के बाद, तर्क तथा मुनियों एवं वैदिक ग्रंथों के आदेशों सेप्राप्त, ज्ञानरूपी तेज तलवार से मिथ्या अभिमान को पूरी तरह काट डालना चाहिए क्योंकि यहीसमस्त संशयों को प्रश्नय देने वाला है। तब तुम सबों को, अपने हृदयों में स्थित, मेरी पूजा करनीचाहिए।
ईक्षेत विभ्रममिदं मनसो विलासंहृष्ट विनष्टमतिलोलमलातचक्रम् ।विज्ञानमेकमुरुधेव विभाति मायास्वप्नस्त्रिधा गुणविसर्गकृतो विकल्प: ॥
३४॥
ईक्षेत--देखना चाहिए; विभ्रमम्-- भ्रम या त्रुटि के रूप में; इदम्--इस ( भौतिक जगत ); मनस:--मन का; विलासम्--प्राकट्य या कूदफाँद; दृष्टम्ू--आज है; विनष्टम्ू--कल नहीं है; अति-लोलम्--अत्यन्त चलायमान; अलात-चक्रम्--जलतीलकड़ी को घुमाने से बना हुआ गोला, लुकाठ की बनेठी; विज्ञानमू--सहज सचेतन आत्मा; एकम्--एक है; उरुधा--अनेकविभागों में; इब--मानो; विभाति-- प्रकट होती है; माया--यह माया है; स्वप्न:--मात्र स्वप्न; त्रिधा--तीन विभागों में; गुण--गुणों का; विसर्ग--विकार का; कृत:--उत्पन्न; विकल्प:--अनुभूति या कल्पना का भेद |
मनुष्य को देखना चाहिए कि यह भौतिक जगत मन में प्रकट होने वाला स्पष्ट भ्रम है,क्योंकि भौतिक वस्तुओं का अस्तित्व अत्यन्त क्षणिक है और वे आज है, किन्तु कल नहीं रहेंगी।इनकी तुलना लुकाठ के घुमाने से बने लाल रंग के गोले से की जा सकती है। आत्मा स्वभाव सेएक ही विशुद्ध चेतना के रूप में विद्यमान रहता है। किन्तु इस जगत में वह अनेक रूपों औरअवस्थाओं में प्रकट होता है। प्रकृति के गुण आत्मा की चेतना को जाग्रत, सुप्त तथा सुषुप्त, इनतीन अवस्थाओं में बाँट देते है। किन्तु ये अनुभूति की ऐसी विविधताएँ, वस्तुतः माया है औरइनका अस्तित्व स्वप्न की ही तरह होता है।
इृष्टिम्ततः प्रतिनिवर्त्य निवृत्ततृष्ण-स्तृष्णीं भवेन्निजसुखानु भवो निरीहः ।सन्हश्यते क्व च यदीदमवस्तुबुद्धयात्यक्त भ्रमाय न भवेत्स्मृतिरानिषातात्ू ॥
३५॥
इृष्टिमू--दृष्टि; ततः--उस माया से; प्रतिनिवर्त्य--हटाकर; निवृत्त--समाप्त; तृष्ण:--लालसा; तूष्णीमू--मौन; भवेत्--हो जानाचाहिए; निज--अपना ( आत्मा का ); सुख--सुख; अनुभव: -- अनुभव करते हुए; निरीह:--निष्क्रिय; सन्दश्यते--देखा जाताश़ है; क्व च--कभी कभी; यदि--यदि; इृदम्--यह संसार; अवस्तु--असत्य; बुद्धवा--चेतना से; त्यक्तम्-त्यागा हुआ;भ्रमाय--और अधिक भ्रम; न--नहीं; भवेत्--हो सके; स्मृतिः--स्मरणशक्ति; आ-निपातात्--शरीर त्यागने तक |
भौतिक वस्तुओं के क्षणिक भ्रामक स्वभाव को समझ लेने के बाद और अपनी दृष्टि कोभ्रम से हटा लेने पर, मनुष्य को निष्काम रहना चाहिए। आत्मा के सुख का अनुभव करते हुए,मनुष्य को भौतिक बोलचाल तथा कार्यकलाप त्याग देने चाहिए। यदि कभी वह भौतिक जगतको देखे तो उसे स्मरण करना चाहिए कि यह परम सत्य नहीं है, इसीलिए इसका परित्याग कियागया है। ऐसे निरन्तर स्मरण से मनुष्य अपनी मृत्यु पर्यन्त, पुनः भ्रम में नहीं पड़ेगा।
देहं च नश्वरमवस्थितमुत्थितं वासिद्धो न पश्यति यतोध्यगमत्स्वरूपम् ।दैवादपेतमथ दैववशादुपेतंवासो यथा परिकृतं मदिरामदान्ध: ॥
३६॥
देहम्ू-- भौतिक शरीर; च--भी; नश्वरमू--नाशवान; अवस्थितम्--बैठा; उत्थितम्ू--उठा; वा--अथवा; सिद्ध:--सिद्ध; न'पश्यति--नहीं देखता; यतः--क्योंकि; अध्यगमत्--उसने प्राप्त कर लिया है; स्व-रूपम्--अपनी असली आध्यात्मिक पहचान;दैवात्-- भाग्यवश; अपेतम्--गया हुआ; अथ--अथवा इस तरह; दैव-- भाग्य के; वशात्--वश से; उपेतम्--पाया हुआ;वास:--कपड़े; यथा--जिस तरह; परिकृतम्--शरीर में पहना हुआ; मदिरा--शराब का; मद--नशे से; अन्ध:--अन्धा हुआ।
जिस प्रकार शराब पिया हुआ व्यक्ति यह नहीं देख पाता कि उसने कोट पहना है या कमीज,उसी तरह जो व्यक्ति आत्म-साक्षात्कार में पूर्ण है और जिसने अपना नित्य स्वरूप प्राप्त कर लियाहै, वह यह नहीं देखता कि नश्वर शरीर बैठा हुआ है या खड़ा है। हाँ, यदि ईश्वर की इच्छा सेउसका शरीर समाप्त हो जाता है या उसे नया शरीर प्राप्त होता है, तो स्वरूपसिद्ध व्यक्ति उसे उसीतरह नहीं देखता जिस तरह शराबी अपनी बाह्य वेशभूषा को नहीं देखता।
देहोपि दैववशग: खलु कर्म यावत्स्वारम्भकं प्रतिसमीक्षत एवं सासु: ।त॑ सप्रपज्ञमधिरूढसमाधियोग:स्वाष्न॑ पुनर्न भजते प्रतिबुद्धवस्तु: ॥
३७॥
देहः--शरीर; अपि-- भी; दैव--ब्रह्म के; वश-ग:--नियंत्रण में; खलु--निस्सन्देह; कर्म--सकाम कर्मों की श्रृंखला; यावत्--जब तक; स्व-आरम्भकम्--जो अपने को प्रारम्भ करता है या आगे बढ़ाता है; प्रतिसमीक्षते--जीवति रहता तथा प्रतीक्षा करतारहता है; एब--निश्चय ही; स-असु:--प्राण तथा इन्द्रियों सहित; तमू--उस ( शरीर ) को; स-प्रपञ्ञम्--अभिव्यक्तियों कीविविधता सहित; अधिरूढ--उच्च स्थान को प्राप्त; समाधि--सिद्धि अवस्था; योग:--योग-प्रणाली में; स्वाप्मम्--स्वप्न कीतरह; पुनः--फिर; न भजते--पूजा नहीं करता; प्रतिबुद्ध-प्रबुद्ध; वस्तु: --परम सत्य में |
भौतिक शरीर निश्चय ही विधाता के वश में रहता है, अतः यह शरीर तब तक इन्द्रियों तथाप्राण के साथ जीवित रहता है जब तक उसका कर्म प्रभावशाली रहता है। किन्तु स्वरूपसिद्ध आत्मा, जो परम सत्य के प्रति प्रबुद्ध हो चुका है और जो योग की पूर्ण अवस्था में उच्चारूढ है,कभी भी शरीर तथा उसकी अनेक अभिव्यक्तियों के समक्ष नतमस्तक नहीं होगा क्योंकि वह इसेस्वण में देखे गये श़रीर के समान जानता है।
मयैतदुक्त वो विप्रा गुह्म॑ं यत्साइ्ख्ययोगयो: ।जानीत मागतं यज्ञं युष्मद्धर्मविवक्षया ॥
३८ ॥
मया-ेरे द्वारा; एतत्--यह ( ज्ञान ); उक्तम्--कहा गया; वः--तुमसे; विप्रा:--हे ब्राह्मणो; गुह्मामू--गोपनीय; यत्--जो;साड्ख्य--आत्मा से पदार्थ को विभेदित करने की दार्शनिक विधि का; योगयो:--तथा अष्टांग योग-पद्धति का; जानीत--समझो; मा--मुझको; आगतम्--आया हुआ; यज्ञम्-यज्ञ के स्वामी विष्णु के रूप में; युष्मत्--तुम्हारा; धर्म--धार्मिककर्तव्य; विवक्षया--बतलाने की इच्छा से |
हे ब्राह्मणो, अब मै तुम लोगों से सांख्य का वह गोपनीय ज्ञान बतला चुका हूँ, जिसके द्वारामनुष्य पदार्थ तथा आत्मा में अन्तर कर सकता है। मैने तुम लोगों को अष्टांग योग का भी ज्ञान देदिया है, जिससे मनुष्य ब्रह्म से जुड़ता है। तुम लोग मुझे भगवान् विष्णु समझो जो तुम लोगों केसमक्ष वास्तविक धार्मिक कर्तव्य बताने की इच्छा से प्रकट हुआ है।
अहं योगस्य साड्ख्यस्य सत्यस्यर्तस्थ तेजस: ।परायणं द्विजश्रेष्ठा: श्रियः कीर्तेर्दमस्थ च ॥
३९॥
अहमू-मै; योगस्य--योग-पद्धति के; साड्ख्यस्य--सांख्य दर्शन के; सत्यस्य--सत्य के; ऋतस्य--सत्यमय धार्मिक सिद्धान्तोंके; तेजसः--शक्ति के; पर-अयनमू--परम आश्रय; द्विज-पश्रेष्ठा:--हे श्रेष्ठ ब्राह्णो; भ्रिय:--सौन्दर्य का; कीर्ते:--कीर्ति का;दमस्य--आत्मसंयम का; च-- भी ।
हे श्रेष्ठ ब्राह्यणो, तुम लोग यह जानो कि मै योग-पद्धति, सांख्य दर्शन, सत्य, ऋत, तेज,सौन्दर्य, यश तथा आत्मसंयम का परम आश्रय हूँ।
मां भजन्ति गुणा: सर्वे निर्गुणं निरपेक्षकम् ।सुहृदं प्रियमात्मानं साम्यासडझझदयोगुणा: ॥
४०॥
माम्ू--मुझको; भजन्ति--सेवा करते तथा शरण ग्रहण करते है; गुणा:--गुण; सर्वे--सभी; निर्गुणम्--गुणों से मुक्त;निरपेक्षकम्-विरक्त; सु-हदम्--शुभचिन्तक; प्रियम्--अत्यन्त प्रिय; आत्मानम्ू--परमात्मा को; साम्य--समान रूप से सर्वत्रस्थित; असड़र--विरक्ति; आदय: --इत्यादि; अगुणा:--गुणों के विकार से मुक्त |
ऐसे सारे के सारे उत्तम दिव्य गुण--जैसे कि गुणों से परे होना, विरक्त, शुभचिन्तक,अत्यन्त प्रिय, परमात्मा, सर्वत्र समरूप से स्थित तथा भौतिक बन्धन से मुक्त होना--जो कि गुणोंके विकारों से मुक्त है, मुझमें शरण तथा पूजनीय वस्तु पाते है।
इति मे छिन्नसन्देहा मुनयः सनकादय: ।सभाजयित्वा परया भक्त्यागृणत संस्तवै: ॥
४१॥
इति--इस प्रकार; मे--मेरे द्वारा; छिन्न--विनष्ट; सन्देहा:--सारे सन्देह; मुनयः--मुनिगण; सनक-आदय:--सनक कुमारइत्यादि; सभाजयित्वा--पूर्णतया मेरी पूजा करके; परया--दिव्य प्रेम के लक्षणों से युक्त; भक्त्या--भक्तिपूर्वक; अगृणत--मेरीमहिमा का उच्चारण किया; संस्तवै: --सुन्दर स्तुतियों द्वारा |
भगवान् कृष्ण ने आगे कहा : हे उद्धव, इस प्रकार मेरे वचनों से सनक इत्यादि मुनियों केसारे संदेह नष्ट हो गये। दिव्य प्रेम तथा भक्ति के साथ मेरी पूजा करते हुए, उन्होंने उत्तम स्तुतियोंद्वारा मेरी महिमा का गान किया।
तैरहं पूजित: संयक्संस्तुतः परमर्पषिभि: ।प्रत्येयाय स्वक॑ धाम पश्यतः परमेष्ठलिन: ॥
४२॥
तैः--उनके द्वारा; अहम्ू--मै; पूजित:--पूजा गया; संयक्-- भलीभाँति; संस्तुत:-- भलीभाँति स्तुति किया गया; परम-ऋषिभि:--महा मुनियों द्वारा; प्रत्येथयाय--मै लौट आया; स्वकम्ू--अपने; धाम-- धाम; पश्यत: परमेष्ठिन:--ब्रह्मा के देखते-देखते
इस तरह सनक ऋषि इत्यादि महामुनियों ने मेरी भलीभाँति पूजा की और मेरे यश का गानकिया। मै ब्रह्म के देखते-देखते अपने धाम लौट गया।
