14. कृष्ण ने उद्धव को योग प्रणाली समझाई
श्रीउद्धव उवाचबदन्ति कृष्ण श्रेयांसि बहूनि ब्रह्मवादिन: ।तेषां विकल्पप्राधान्यमुताहो एकमुख्यता ॥
१॥
श्री-उद्धवः उबाच-- श्री उद्धव ने कहा; वदन्ति--कहते हैं; कृष्ण--हे कृष्ण; श्रेयाँसि--जीवन में प्रगति की विधियाँ; बहूनि--अनेक; ब्रह्म-वादिन:--विद्वान मुनि जिन्होंने वैदिक वाड्मय की व्याख्या की है; तेषामू--ऐसी सारीविधियों का; विकल्प--नानाप्रकार की अनुभूतियों की; प्राधान्यम्-- श्रेष्ठठा; उत--अथवा; अहो--निस्सन्देह; एक--एक की; मुख्यता--प्रधानता |
श्री उद्धव ने कहा : हे कृष्ण, वैदिक वाड्मय की व्याख्या करने वाले विद्वान मुनिगणमनुष्य-जीवन की सिद्धि के लिए अनेक विधियों की संस्तुति करते हैं। हे प्रभु, इन नाना प्रकारके दृष्टिकोणों पर विचार करते हुए आप मुझे बतलायें कि ये सारी विधियाँ समान रूप सेमहत्त्वपूर्ण हैं अथवा उनमें से कोई एक सर्वश्रेष्ठ है।
भवतोदाहतः स्वामिन्भक्तियोगोनपेक्षित: ।निरस्य सर्वतः सड़ुं येन त्व्याविशेन््मन: ॥
२॥
भवता--आपके द्वारा; उदाहतः--स्पष्ट कहा गया; स्वामिन्--हे स्वामी; भक्ति-योग: -- भक्ति; अनपेक्षित:-- भौतिक इच्छाओं सेरहित; निरस्थ--हटाकर; सर्वत:ः--सभी तरह से; सड़म्ू--संगति; येन--जिस ( भक्ति ) से; त्वयि--आपमें; आविशेत्-- प्रवेशकर सके; मन:ः--मन।
हे प्रभु, आपने शुद्ध भक्तियोग की स्पष्ट व्याख्या कर दी है, जिससे भक्त अपने जीवन सेसारी भौतिक संगति हटाकर, अपने मन को आप पर एकाग्र कर सकता है।
श्रीभगवानुवाचकालेन नष्टा प्रलये वाणीयं वेदसंज्ञिता ।मयादौ ब्रह्मणे प्रोक्ता धर्मो यस्यां मदात्मक: ॥
३॥
श्री-भगवान् उबाच-- भगवान् ने कहा; कालेन--काल के प्रभाव से; नष्टा--विनष्ट; प्रलये--प्रलय के समय; वाणी--सन्देश;इयम्--यह; वेद-संज्ञिता--वेदों से युक्त; मया--मेरे द्वारा; आदौ--सृष्टि के समय; ब्रह्मणे--ब्रह्मा से; प्रोक्ता--कहा गया;धर्म:--धार्मिक सिद्धान्त; यस्याम्--जिसमें; मत्-आत्मक: --मुझसे अभिन्न
भगवान् ने कहा : काल के प्रभाव से प्रलय के समय वैदिक ज्ञान की दिव्य ध्वनि नष्ट हो गईथी। अतएव जब फिर से सृष्टि बनी, तो मैंने यह वैदिक ज्ञान ब्रह्म को बतलाया क्योंकि मैं ही वेदों में वर्णित धर्म हूँ।
तेन प्रोक्ता स्वपुत्राय मनवे पूर्वजाय सा ।ततो भृग्वादयोगृहन्सप्त ब्रह्ममहर्षय: ॥
४॥
तेन--ब्रह्मा द्वारा; प्रोक्ता--कहा गया; स्व-पुत्राय--अपने पुत्र से; मनवे--मनु को; पूर्व-जाय--सबसे पुराने; सा--वह वैदिकज्ञान; ततः--मनु से; भूगु-आदयः -- भूगु मुनि इत्यादि ने; अगृह्ननू--ग्रहण किया; सप्त--सात; ब्रह्म--वैदिक ज्ञान में; महा-ऋषय:--परम दिद्वान मुनियों ने |
ब्रह्म ने यह वैदिक ज्ञान अपने ज्येष्ठ पुत्र मनु को दिया और तब भृगु मुनि इत्यादि सप्तऋषियों ने वही ज्ञान मनु से ग्रहण किया।
तेभ्य: पितृभ्यस्तत्पुत्रा देवदानवगुह्मका: ।मनुष्या: सिद्धगन्धर्वा: सविद्याधरचारणा: ॥
५॥
किन्देवा: किन्नरा नागा रक्ष:किम्पुरुषादय: ।बह्व्यस्तेषां प्रकृतयो रज:सत्त्वतमोभुव: ॥
६॥
याभिर्भूतानि भिद्यन्ते भूतानां पतयस्तथा ।यथाप्रकृति सर्वेषां चित्रा वाच: स्त्रवन्ति हि ॥
७॥
तेभ्य:--उनसे ( भृगु मुनि इत्यादि से ); पितृभ्य:--पूर्वजों से; तत्--उनके; पुत्रा:--पुत्र, उत्तराधिकारीगण; देव--देवता;दानव--असुर; गुह्का:--गुह्मकजन; मनुष्या:--मनुष्य; सिद्ध-गन्धर्वा:--सिद्धजन तथा गन्धर्वगण; स-विद्याधर-चारणा:--विद्याधरों तथा चारणों सहित; किन्देवा:--एक भिन्न मानव जाति; किन्नरा:--अर्द्ध मानव; नागा:--सर्प; रक्ष:--राक्षस;किम्पुरुष--वानरों की उन्नत नस्ल; आदय:--इत्यादि; बह्व्य:--अनेक प्रकार के; तेषाम्ू--ऐसे जीवों के ; प्रकृतयः--स्वभावोंया इच्छाओं; रज:-सत्त्व-तम:-भुव:--तीन गुणों से उत्पन्न होने से; याभि: --ऐसी इच्छाओं या प्रवृत्तियों से; भूतानि--ऐसे सारेजीव; भिद्यन्ते--अनेक रूपों में बँटे प्रतीत होते हैं; भूतानामू--तथा उनके; पतय:--नेता; तथा--उसी प्रकार से विभक्त; यथा-प्रकृति--लालसा या इच्छा के अनुसार; सर्वेषाम्--उन सबों का; चित्रा:--विचित्र; वाच:--वैदिक अनुष्ठान तथा मंत्र;स्त्रवन्ति--निकलते हैं; हि--निश्चय ही |
भूगु मुनि तथा ब्रह्मा के अन्य पुत्रों जैसे पूर्वजों से अनेक पुत्र तथा उत्तराधिकारी उत्पन्न हुए,जिन्होंने देवताओं, असुरों, मनुष्यों, गुह्कों, सिद्धों, गन्धर्वों, विद्याधरों, चारणों, किन्देवों,किन्नरों, नागों, किम्पुरुषों इत्यादि के विभिन्न रूप धारण किये। सभी विश्वव्यापी जातियाँ तथाउनके अपने अपने नेता, तीन गुणों से उत्पन्न विभिन्न स्वभाव तथा इच्छाएँ लेकर प्रकट हुए।इसलिए ब्रह्माण्ड में जीवों के विभिन्न लक्षणों के कारण न जाने कितने अनुष्ठान, मंत्र तथा फलहैं।
एवं प्रकृतिवैचित्र्याद्धिद्यन्ते मतयो नृणाम् ।पारम्पर्येण केषाज्चित्पाषण्डमतयोपरे ॥
८॥
एवम्--इस प्रकार; प्रकृति--स्वभाव या इच्छाओं के; वैचित्रयात्--विविधता के कारण; भिद्यन्ते--विभक्त हैं; मतयः--जीवन-दर्शन; नृणाम्--मनुष्यों में; पारम्पर्येण --परम्परा से; केषाद्चित्--कुछ लोगों में; पाषण्ड--नास्तिक; मतय: --दर्शन; अपरे--अन्य
इस तरह मनुष्य के बीच नाना प्रकार की इच्छाओं तथा स्वभावों के कारण जीवन केअनेकानेक आस्तिक दर्शन हैं, जो प्रथा, रीति-रिवाज तथा परम्परा द्वारा हस्तान्तरित होते रहते हैं।ऐसे भी शिक्षक हैं, जो नास्तिक दृष्टिकोण का समर्थन करते हैं।
मन्मायामोहितधिय: पुरुषा: पुरुषर्षभ ।श्रेयो बदन्त्यनेकान्तं यथाकर्म यथारुचि ॥
९॥
मतू-मया--मेरी माया से; मोहित--मोहग्रस्त; धिय:--बुद्धि वाले; पुरुषा: --मनुष्य; पुरुष-ऋषभ--हे पुरुष- श्रेष्ठ; श्रेय: --लोगों के लिए शुभ; वदन्ति--कहते हैं; अनेक-अन्तम्--अनेक प्रकार से; यथा-कर्म--अपने अपने कर्मों के अनुसार; यथा-रुचि--अपनी अपनी रुचि के अनुसार।
हे पुरुष- श्रेष्ठ, मनुष्यों की बुद्धि मेरी माया से मोहग्रस्त हो जाती है अतएवं वे, अपने कर्मोंतथा अपनी रुचियों के अनुसार, मनुष्यों के लिए जो वास्तव में शुभ है, उसके विषय में असंख्यप्रकार से बोलते हैं।
धर्ममेके यशश्चान्ये काम सत्यं दमं शमम् ।अन्ये बदन्ति स्वार्थ वा ऐश्वर्य त्यागभोजनम् ।केचिद्य॒ज्जं तपो दानं ब्रतानि नियमान्यमान् ॥
१०॥
धर्मम्ू-पुण्यकर्म; एके--कुछ लोग; यश: --ख्याति; च-- भी; अन्ये--अन्य लोग; कामम्--इन्द्रियतृप्ति; सत्यम्--सत्य;दमम्--आत्मसंयम; शमम्--शान्तिप्रियता; अन्ये-- अन्य लोग; वदन्ति--स्थापना करते हैं; स्व-अर्थम्--आत्म-हित या स्वार्थका अनुसरण करना; बै--निश्चय ही; ऐश्वर्यम्--ऐश्वर्य या राजनीतिक प्रभाव; त्याग--त्याग; भोजनम्-- भोग; केचित्ू--कुछलोग; यज्ञम्--यज्ञ; तप: --तपस्या; दानम्--दान; ब्रतानि--ब्रत रखना; नियमान्--नियमित धार्मिक कृत्य; यमान्ू--कठोरविधियों को
कुल लोग कहते हैं कि पुण्यकर्म करके सुखी बना जा सकता है। अन्य लोग कहते हैं किसुख को यश, इन्द्रियतृप्ति, सच्चाई, आत्मसंयम, शान्ति, स्वार्थ, राजनीति का प्रभाव, ऐश्वर्य,संन्यास, भोग, यज्ञ, तपस्या, दान, ब्रत, नियमित कृत्य या कठोर अनुशासन द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। हर विधि के अपने अपने समर्थक होते हैं।
आइह्यन्तवन्त एवैषां लोकाः कर्मविनिर्मिता: ।दुःखोदर्कास्तमोनिष्ठा: क्षुद्रा मन्दा: शुचार्पिता: ॥
११॥
आदि-अन्त-वन्त:--आदि तथा अन्त रखने वाला; एव--निस्सन्देह; एघाम्--उनका ( भौतिकतावादियों का ); लोका:ः --अर्जितउपाधियाँ; कर्म--किसी के भौतिक कर्म द्वारा; विनिर्मिता:--उत्पन्न; दुःख--दुख; उदर्का:-- भावी फल के रूप में; तम:--अज्ञान; निष्ठा:--स्थित; क्षुद्रा:--नगण्य; मन्दा:--दुखी; शुच्चा--शोक से युक्त; अर्पिता:--पूरित
अभी मैंने जिन सारे पुरुषों का उल्लेख किया है वे अपने अपने भौतिक कर्म के क्षणिक'फल प्राप्त करते हैं। निस्सन्देह, वे जिन नगण्य तथा दुखमय स्थितियों को प्राप्त होते हैं, उनसेभावी दुख मिलता है और वे अज्ञान पर आधारित हैं। अपने कर्मफलों का भोग करते हुए भी,ऐसे व्यक्ति शोक से पूरित हो जाते हैं।
मय्यर्पितात्मन: सभ्य निरपेक्षस्य सर्वतः ।मयात्मना सुखं यत्तत्कुतः स्याद्विषयात्मनाम् ॥
१२॥
मयि--मुझमें; अर्पित--स्थिर; आत्मन:--चेतना वाले का; सभ्य--हे विद्वान उद्धव; निरपेक्षस्थ--निष्काम व्यक्ति का;सर्वत:--सभी प्रकार से; मया--मेरे साथ; आत्मना-- भगवान् के साथ या अपने आध्यात्मिक शरीर के साथ; सुखम्--सुख;यत् तत्--ऐसा; कुतः--कैसे; स्थात्--हो सकता है; विषय--भौतिक इन्द्रियतृप्ति में; आत्मनाम्--अनुरक्तों का
हे विद्वान उद्धव, जो लोग समस्त भौतिक इच्छाएँ त्याग कर, अपनी चेतना मुझमें स्थिर करतेहैं, वे मेरे साथ उस सुख में हिस्सा बँटाते हैं, जिसे इन्द्रियतृप्ति में संलग्न मनुष्यों के द्वारा अनुभवनहीं किया जा सकता।
अकिदड्ञनस्य दान्तस्य शान्तस्थ समचेतस: ।मया सनन््तुष्टमनसः सर्वा: सुखमया दिश: ॥
१३॥
अकिड्जनस्थ--कुछ न चाहने वाले का; दान्तस्य--इन्द्रियों पर संयम रखने वाले का; शान्तस्यथ--शान्त रहने वाले का; सम-चेतस:--समान चेतना वाले का; मया--मुझसे; सन्तुष्ट--पूर्णतया सन्तुष्ट; मनस:--मन वाले; सर्वा:--सभी; सुख-मया: --सुख से पूर्ण; दिशः--दिशाएँ
जो इस जगत में कुछ भी कामना नहीं करता, जिसने अपनी इन्द्रियों को वश में करकेशान्ति प्राप्त कर ली है, जिसकी चेतना सभी परिस्थितियों में एक-सी रहती है तथा जिसका मनमुझमें पूर्णतया तुष्ट रहता है, वह जहाँ कहीं भी जाता है उसे सुख ही सुख मिलता है।
न पारमेष्ठयं न महेन्द्रधिष्ण्यंन सार्वभौम॑ न रसाधिपत्यम् ।न योगसिद्धीरपुनर्भवं वामय्यर्पितात्मेच्छति मद्विनान्यत् ॥
१४॥
न--नहीं; पारमेष्ठयम्--ब्रह्म का पद या धाम; न--कभी नहीं; महा-इन्द्र-धिष्ण्यम्--इन्द्र का पद; न--न तो; सार्वभौमम्--पृथ्वी पर साम्राज्य; न--न ही; रस-आधिपत्यम्--निम्न लोकों में सर्वश्रेष्ठठा; न--कभीनहीं; योग-सिद्धी:--आठ योग-सिद्धियाँ; अपुन:ः-भवम्--मोक्ष; वा--न तो; मयि-- मुझमें; अर्पित--स्थिर; आत्मा-- चेतना; इच्छति--वह चाहता है; मत्--मुझको; विना--बिना; अन्यत्--अन्य कोई वस्तु।
जिसने अपनी चेतना मुझमें स्थिर कर रखी है, वह न तो ब्रह्मा या इन्द्र के पद या उनके धामकी कामना करता है, न इस पृथ्वी के साम्राज्य, न निम्न लोकों की सर्वश्रेष्ठठा, न योग की आठसिद्धियों की, न जन्म-मृत्यु से मोक्ष की कामना करता है। ऐसा व्यक्ति एकमात्र मेरी कामनाकरता है।
न तथा मे प्रियतम आत्मयोनिर्न शट्डूरः ।न च सद्डूर्षणो न श्रीनैंवात्मा च यथा भवान् ॥
१५॥
न--नहीं; तथा--उसी प्रकार से; मे--मुझको; प्रिय-तम:--सर्वाधिक प्रिय; आत्म-योनि:--मेरे शरीर से उत्पन्न, ब्रह्मा; न--नतो; सट्भूर:--शिवजी; न--न तो; च--भी; सड्डूर्षण:--मेरा स्वांश संकर्षण; न--न तो; श्री:--लक्ष्मीजी; न--न तो; एब--निश्चय ही; आत्मा--अर्चाविग्रह के रूप में मेरी आत्मा; च--भी; यथा--जितना कि; भवान्--तुम |
हे उद्धव, न तो ब्रह्मा, शिव, संकर्षण, लक्ष्मीजी, न ही मेरी आत्मा ही मुझे इतने प्रिय हैंजितने कि तुम हो।
निरपेक्ष॑ मुनि शान्तं निरवर समदर्शनम् ।अनुक्रजाम्यहं नित्य॑ पूर्येयेत्यड्रप्रिरेणुभि: ॥
१६॥
निरपेक्षम--निजी इच्छा से रहित; मुनिमू--मेरी लीलाओं में मेरी सहायता करने के ही विचार में मग्न; शान्तम्--शान्त;निर्वरमू--किसी से बैर न रखते हुए; सम-दर्शनम्--सर्वत्र एकसमान चेतना; अनुब्रजामि--अनुसरण करता हूँ; अहम्-मैं;नित्यमू--सदैव; पूयेय--शुद्ध होऊँ; इति--इस प्रकार; अद्धघ्रि--चरणकमलों की; रेणुभि:--धूल से |
मैं अपने भक्तों के चरणकमलों की धूल से अपने भीतर स्थित भौतिक जगतों को शुद्धबनाना चाहता हूँ। इसलिए मैं सदैव अपने उन शुद्ध भक्तों के पदचिन्हों का अनुसरण करता हूँ जोनिजी इच्छाओं से रहित हैं, जो मेरी लीलाओं के विचार में मग्न रहते हैं, शान्त हैं, शत्रुभाव सेरहित हैं तथा सर्वत्र समभाव रखते हैं।
निष्किज्ञना मय्यनुरक्तचेतसःशान््ता महान्तोडईखिलजीववत्सला: ।कामैरनालब्धधियो जुषन्ति तेयज्नैरपेक्ष्यं न विदु: सुखं मम ॥
१७॥
निष्किज्ञना:--इन्द्रियतृप्ति की इच्छा से रहित; मयि--मुझ भगवान् में; अनुरक्त-चेतस:--निरन्तर अनुरक्त मन; शान्ता:--शान्त;महान्तः--मिथ्या अभिमान से रहित महान् आत्माएँ; अखिल--समस्त; जीव--जीवों के प्रति; वत्सला:--स्नेहिल शुभचिन्तक;कामै:--इन्द्रियतृप्ति के लिए अवसरों से; अनालब्ध--अछूता तथा अप्रभावित; धियः--जिसकी चेतना; जुषन्ति--अनुभव करतेहैं; ते--वे; यत्--जो; नैरपेक्ष्यम्--पूर्ण विरक्ति द्वारा ही प्राप्त हुआ; न विदु:--नहीं जानते; सुखम्--सुख; मम--मेरा |
जो निजी तृप्ति की किसी इच्छा से रहित हैं, जिनके मन सदैव मुझमें अनुरक्त रहते हैं, जोशान्त, मिथ्या अभिमान से रहित तथा समस्त जीवों पर दयालु हैं तथा जिनकी चेतना कभी भीइन्द्रियतृप्ति के अवसरों से प्रभावित नहीं होती, ऐसे व्यक्ति मुझमें ऐसा सुख पाते हैं जिसे वेव्यक्ति प्राप्त नहीं कर पाते या जान भी नहीं पाते जिनमें भौतिक जगत से विरक्ति का अभाव है।
बाध्यमानोपि मद्धक्तो विषयैरजितेन्द्रियः ।प्रायः प्रगल्भया भक्त्या विषयैर्नाभिभूयते ॥
१८॥
बाध्यमान:--सताया जाकर; अपि-- भी; मतू-भक्त:--मेरा भक्त; विषयै:--इन्द्रिय-विषयों द्वारा; अजित--बिना जीता गया;इन्द्रियः--इन्द्रियों द्वारा; प्रायः--सामान्यतया; प्रगलल््भया--प्रभावशाली तथा हृढ़; भक्त्या--भक्ति से; विषयै: --इन्द्रियतृप्तिद्वारा; न--नहीं; अभिभूयते--परास्त होता है।
हे उद्धव, यदि मेरा भक्त पूरी तरह से अपनी इन्द्रियों को जीत नहीं पाता, तो वह भौतिकइच्छाओं द्वारा सताया जा सकता है, किन्तु मेरे प्रति अविचल भक्ति के कारण, वह इन्द्रियतृप्तिद्वारा परास्त नहीं किया जायेगा।
यथाग्नि: सुसमृद्धार्चि: करोत्येधांसि भस्मसात् ।तथा मद्ठिषया भक्तिरुद्धवैनांसि कृत्सनशः ॥
१९॥
यथा--जिस तरह; अग्निः--आग; सु-समृद्ध-- धधकती हुई; अर्चिः:--लपटों वाली; करोति--बदल देती है; एधांसि--लकड़ीको; भस्म-सात्--राख में; तथा--उसी तरह; मत्-विषया--मुझे लक्ष्य बनाकर; भक्ति:--भक्ति; उद्धव--हे उद्धव; एनांसि--पाप करता है; कृत्स्नश:--पूरी तरह से ।
है उद्धव, जिस तरह धधकती अग्नि ईंधन को जलाकर राख कर देती है, उसी तरह मेरीभक्ति मेरे भक्तों द्वारा किये गये पापों को पूर्णतया भस्म कर देती है।
न साधयति मां योगो न साड्ख्य॑ धर्म उद्धव ।न स्वाध्यायस्तपस्त्यागो यथा भक्तिर्ममोर्जिता ॥
२०॥
न--नहीं; साधयति--वश में करती है; माम्--मुझको; योग:--योग-पद्धति; न--न तो; साइड्ख्यम्--सांख्य दर्शन; धर्म:--वर्णाश्रम प्रणाली के अन्तर्गत पवित्र कार्यकलाप; उद्धव--हे उद्धव; न--नहीं; स्वाध्याय:--वैदिक अध्ययन; तपः--तपस्या;त्याग:--त्याग; यथा--जिस तरह; भक्ति:-- भक्ति; मम--मेरे प्रति; ऊर्जिता--विकसित
हे उद्धव, भक्तों द्वारा की जाने वाली मेरी शुद्ध भक्ति मुझे उनके वश में करने वाली है।अतएव योग, सांख्य दर्शन, शुद्ध कार्य, वैदिक अध्ययन, तप अथवा वैराग्य में लगे व्यक्तियों केद्वारा मैं भी वशीभूत नहीं होता।
भक््त्याहमेकया ग्राह्म: श्रद्धयात्मा प्रियः सताम् ।भक्ति: पुनाति मन्निष्ठा श्रणाकानपि सम्भवात् ॥
२१॥
भक्त्या-- भक्ति से; अहम्--मैं; एकया--शुद्ध; ग्राह्मः--प्राप्त किया जाने वाला; श्रद्धया-- श्रद्धा से; आत्मा-- भगवान्;प्रियः--प्रेम की वस्तु; सताम्-भक्तों की; भक्ति:--शुद्ध भक्ति; पुनाति--पवित्र बनाती है; मत्-निष्ठा--मुझको एकमात्र लक्ष्यबनाकर; श्र-पाकान्--चांडाल; अपि-- भी; सम्भवात्--निम्न जन्म के कल्मष से |
मुझ पर पूर्ण श्रद्धा से युक्त शुद्ध भक्ति का अभ्यास करके ही मुझे अथात्् पूर्ण पुरुषोत्तमपरमेश्वर को प्राप्त किया जा सकता है। मैं स्वभावतः अपने उन भक्तों को प्रिय हूँ जो मुझे हीअपनी प्रेमाभक्ति का एकमात्र लक्ष्य मानते हैं। ऐसी शुद्ध भक्ति में लगने से चांडाल तक अपनेनिम्न जन्म के कल्मष से अपने को शुद्ध कर सकते हैं।
धर्म: सत्यदयोपेतो विद्या वा तपसान्विता ।मद्धक्त्यापेतमात्मानं न सम्यक्प्रपुनाति हि ॥
२२॥
धर्म:--धार्मिक सिद्धान्त; सत्य--सच्चाई; दया--तथा दया से; उपेत:--युक्त; विद्या--ज्ञान; वा--अथवा; तपसा--तपस्या से;अन्विता--युक्त; मत्-भक्त्या--मेरी भक्ति से; अपेतम्--रहित; आत्मानम्--चेतना; न--नहीं; सम्यक्--पूर्णतया; प्रपुनाति--शुद्ध बनाती है; हि--निश्चय ही
न सत्य तथा दया से युक्त धार्मिक कार्य, न ही कठिन तपस्या से प्राप्त किया गया ज्ञानउनकी चेतना को पूर्णतया शुद्ध बना सकता है, जो मेरी भक्ति से विहीन होते हैं।
'कथं विना रोमहर्ष द्रवता चेतसा विना ।विनानन्दाश्रुकलया शुध्येद्धक्त्या विनाशय: ॥
२३॥
कथम्--कैसे; विना--बिना; रोम-हर्षम्--रोंगटे खड़े होना, रोमांच; द्रवता--पिघला; चेतसा--हृदय से; विना--रहित;विना--रहित; आनन्द--आनन्द के; अश्रु-कलया-- आँसू बहना; शुध्येत्--शुद्ध किया जा सकता है; भक्त्या--भक्ति से;विना--रहित; आशय: --चेतना |
यदि किसी को रोमांच नहीं होता, तो उसका हृदय कैसे द्रवित हो सकता है ? और यदि हृदयद्रवित नहीं होता, तो आँखों से प्रेमाश्रु कैसे बह सकते हैं ? यदि कोई आध्यात्मिक सुख मेंचिल्ला नहीं उठता, तो वह भगवान् की प्रेमाभक्ति कैसे कर सकता है ? और ऐसी सेवा के बिनाचेतना कैसे शुद्ध बन सकती है ? वाग्गद््गदा द्रवते यस्य चित्तंरुदत्यभीक्ष्णं हसति क्वचिच्च ।विलज्ज उदगायति नृत्यते चमद्धक्तियुक्तो भुवनं पुनाति ॥
२४॥
वाक्--वाणी; गदगदा--रुद्ध; द्रवते--पिघलता है; यस्य--जिसका; चित्तम्--हृदय; रुदति--रोता है; अभीक्षणम्--पुनःपुनः; हसति--हँसता है; क्वचित्ू--कभी; च-- भी; विलज्ञ:--लज्जित; उद्गायति--जोरों से गा उठता है; नृत्यते--नाचता है;च--भी; मत्-भक्ति-युक्त:--मेरी भक्ति में स्थिर; भुवनम्--ब्रह्माण्ड को; पुनाति--पवित्र करता है।
वह भक्त जिसकी वाणी कभी रुद्ध हो जाती है, जिसका हृदय द्रवित हो उठता है, जोनिरन्तर चिल्लाता है और कभी हँसता है, जो लज्जित होता है और जोरों से चिल्लाता है, फिरनाचने लगता है--इस तरह से मेरी भक्ति में स्थिर भक्त सारे ब्रह्माण्ड को शुद्ध करता है।
यथाग्निना हेम मलं जहातिध्मातं पुनः स्व॑ं भजते च रूपम् ।आत्मा च कर्मानुशयं विधूयमद्धक्तियोगेन भजत्यथो माम् ॥
२५॥
यथा--जिस तरह; अग्निना--अग्नि से; हेम--स्वर्ण; मलम्ू--अशुद्ध; जहाति--त्याग देता है; ध्मातम्--पिघलाया; पुन: --फिर; स्वमू--अपने से; भजते--प्रवेश करता है; च-- भी; रूपम्ू--स्वरूप; आत्मा--आत्मा या चेतना; च-- भी; कर्म--सकाम कर्मों का; अनुशयम्--बचा दूषण; विधूय--हटाकर; मत्-भक्ति-योगेन--मेरी भक्ति से; भजति--पूजा करता है;अथो--इस प्रकार; माम्-मुझको |
जिस तरह आग में पिघलाने से सोना अपनी अशुद्धियाँ त्याग कर शुद्ध चमक प्राप्त कर लेताहै, उसी तरह भक्तियोग की अग्नि में लीन आत्मा पूर्व सकाम कर्मों से उत्पन्न सारे कल्मष से शुद्धबन जाता है और बैकुण्ठ में मेरी सेवा करने के अपने आदि पद को प्राप्त करता है।
यथा यथात्मा परिमृज्यतेठसौ मत्पुण्यगाथा भ्रवणाभिधानै: ।तथा तथा पश्यति वस्तु सूक्ष्मंचक्षुर्यथेवाञ्जनसम्प्रयुक्तम् ॥
२६॥
यथा यथा--जितना; आत्मा--आत्मा, चेतन जीव; परिमृज्यते-- भौतिक कल्मष से विमल होता है; असौ--वह; मत्-पुण्य-गाथा--मेरे यश का पवित्र वर्णन; श्रवण--सुनने से; अभिधानै:ः--तथा कीर्तन से; तथा तथा--उसी अनुपात में; पश्यति--देखता है; वस्तु--परब्रह्म को; सूक्ष्ममू--सूक्ष्म; चक्षुः--आँख; यथा--जिस तरह; एव--निश्चय ही; अज्ञन-- औषधि के अंजनसे; सम्प्रयुक्तम्--उपचारित |
जब रुग्ण आँख का उपचार औषधीय अंजन से किया जाता है, तो आँख में धीरे धीरे देखनेकी शक्ति आ जाती है। इसी तरह जब चेतनामय जीव मेरे यश की पुण्य गाथाओं के श्रवण तथाकीर्तन द्वारा अपने भौतिक कल्मष को धो डालता है, तो वह फिर से मुझ परब्रह्म को मेरे सूक्ष्मआध्यात्मिक रूप में देखने की शक्ति पा लेता है।
विषयान्ध्यायतश्चित्तं विषयेषु विषज्ञते ।मामनुस्मरतश्ित्तं मय्येव प्रविलीयते ॥
२७॥
विषयानू--इन्द्रियूप्ति की वस्तुएँ; ध्यायत:ः--ध्यान करने वाला; चित्तम्ू--चेतना को; विषयेषु--इन्द्रियतृप्ति की वस्तुओं में;विषज्ते--अनुरक्त होता है; माम्--मुझको; अनुस्मरत: --निरन्तर स्मरण करता हुआ; चित्तम्--चेतना को; मयि--मुझमें;एव--निश्चय ही; प्रविलीयते--लीन रहता है ।
इन्द्रियतृप्ति की वस्तुओं का ध्यान धरने वाले का मन निश्चय ही ऐसी वस्तुओं में फँसा रहताहै, किन्तु यदि कोई निरन्तर मेरा स्मरण करता है, तो उसका मन मुझमें निमग्न हो जाता है।
तस्मादसदभिध्यानं यथा स्वप्ममनोरथम् ।हित्वा मयि समाधत्स्व मनो मद्भावभावितम् ॥
२८॥
तस्मात्ू--इसलिए; असत्-- भौतिक; अभिध्यानम्--उत्थान विधि जो ध्यान को लीन करे; यथा--जिस तरह; स्वज--सपने में;मनः-रथम्--मानसिक चिन्तन; हित्वा--त्याग कर; मयि--मुझमें; समाधत्स्व--पूरी तरह लीन करो; मन:--मन; मत्-भाव--मेरी चेतना द्वारा; भावितम्-शुद्ध किया गया।
इसलिए मनुष्य को उत्थान की उन सारी विधियों का बहिष्कार करना चाहिए, जो स्वण केमनोरथों जैसी हैं। उसे अपना मन पूरी तरह से मुझमें लीन कर देना चाहिए। निरन्तर मेरा चिन्तनकरने से वह शुद्ध बन जाता है।
स्त्रीणां स्त्रीसड्विनां सड़ूं त्यक्त्वा दूरत आत्मवान् ।क्षेमे विविक्त आसीनश्िन्तयेन्मामतन्द्रित: ॥
२९॥
स्त्रीणामू-स्त्रियों की; स्त्री--स्त्री के प्रति; सड्धिनामू--अनुरक्त रहने वालों की; सड्रम्ू--संगति; त्यक्त्वा--त्याग कर; दूरतः--दूर; आत्म-वान्ू--आत्मा के प्रति सचेष्ट; क्षेमे--निर्भय; विविक्ते--पृथक् या एकान्त स्थान में; आसीन:--बैठे हुए; चिन्तयेत्--एकाग्र करे; माम्--मुझ पर; अतन्द्रितः:--सावधानी से
नित्य आत्मा के प्रति सचेष्ट रहते हुए मनुष्य को स्त्रियों की तथा स्त्रियों से घनिष्ठतापूर्वक सम्बद्ध व्यक्तियों की संगति त्याग देनी चाहिए। एकान्त स्थान में निर्भय होकर आसन लगाकर,उसे अपने मन को बड़े ही ध्यान से मुझ पर एकाग्र करना चाहिए।
न तथास्य भवेत्कलेशो बन्धश्चान्यप्रसड्रतः ।योषित्सझद्यथा पुंसो यथा तत्सड्रिसड्गतः ॥
३०॥
न--नहीं; तथा--उस तरह; अस्य--उसका; भवेत्--हो सकता है; क्लेश:--कष्ट; बन्ध:--बन्धन; च--तथा; अन्य-प्रसड़त:--अन्य लगाव से; योषित्--स्त्रियों के; सड्भरात्ू-- अनुरक्ति से; यथा--जैसे; पुंसः--मनुष्य का; यथा--उसी तरह;तत्--स्त्रियों को; सड़ि--अनुरक्त रहने वाले की; सड्भतः--संगति से |
विभिन्न अनुरक्तियों से उत्पन्न होने वाले सभी प्रकार के कष्ट तथा बन्धन में से ऐसा एक भीनहीं, जो स्त्रियों के प्रति अनुरक्ति तथा स्त्रियों के प्रति अनुरक्त रहने वालों के घनिष्ठ सम्पर्क सेबढ़ कर हो।
श्रीउद्धव उवाचयथा त्वामरविन्दाक्ष याहशं वा यदात्मकम् ।ध्यायेन्मुमुश्षुरेतन्मे ध्यानं त्वं वक्तुमहसि ॥
३१॥
श्री-उद्धवः उबाच-- श्री उद्धव ने कहा; यथा--किस तरह से; त्वामू--आपके; अरविन्द-अक्ष--हे कमलनेत्र वाले कृष्ण;याहशम्--जिस स्वभाव का; वा--अथवा; यत्-आत्मकम्-किस रूप में; ध्यायेत्-- ध्यान करे; मुमुक्षुः--मुक्ति का इच्छुक;एतत्--यह; मे-- मुझको; ध्यानमू--ध्यान; त्वम्-तुम्हें; वक्तुमू--कहने या बतलाने के लिए; अहसि--चाहिए।
श्री उद्धव ने कहा : हे कमलनयन कृष्ण, यदि कोई मुक्ति का इच्छुक व्यक्ति आपका ध्यानकरना चाहें तो वह किस विधि से करे, उसका यह ध्यान किस विशेष स्वभाव वाला हो और वहकिस रूप का ध्यान करे ? कृपया मुझे ध्यान के इस विषय के बारे में बतलायें।
श्रीभगवानुवाचसम आसन आसीनः समकायो यथासुखम् ।हस्तावुत्सद़ आधाय स्वनासाग्रकृतेक्षण: ॥
३२॥
प्राणस्य शोधयेन्मार्ग पूरकुम्भकरेचकै: ।विपर्ययेणापि शनैरभ्यसेन्निर्जितेन्द्रिय: ॥
३३॥
श्री-भगवान् उवाच-- भगवान् ने कहा; समे--समतल; आसने--आसन पर; आसीन:--बैठ कर; सम-काय:ः--शरीर को सीधाकरके; यथा-सुखम्--सुखपूर्वक बैठ कर; हस्तौ--दोनों हाथों को; उत्सड्रे--गोद में; आधाय--रख कर; स्व-नास-अग्र--अपनी नाक के अगले भाग पर; कृत--केन्द्रित करते हुए; ईक्षण:--चितवन; प्राणस्य-- श्रास का; शोधयेत्--शुद्ध करनाचाहिए; मार्गम्ू--मार्ग; पूर-कुम्भक-रेचकै: -- प्राणायाम द्वारा; विपर्ययेण--उलट करके, अर्थात् रेचक, कुम्भक तथा पूरकक्रम में; अपि-- भी; शनै:ः--ध धीरे धीरे; अभ्यसेत्-- प्राणायाम का अभ्यास करे; निर्जित--वश में करके; इन्द्रियः--इन्द्रियों को
भगवान् ने कहा : ऐसे आसन पर बैठ कर, जो न तो ज्यादा ऊँचा हो, न अधिक नीचा हो,शरीर को सीधा रखते हुए जिससे सुख मिल सके, दोनों हाथों को गोद में रख कर तथा आँखोंको अपनी नाक के अगले सिरे पर केन्द्रित करते हुए, मनुष्य को चाहिए कि पूरक, कुम्भक तथारेचक प्राणायाम का यांत्रिक अभ्यास करे और फिर इस विधि को उलट कर करे ( अर्थात्रेचक, कुम्भक तथा पूरक के क्रम से करे )। इन्द्रियों को भलीभाँति वश में कर लेने के बाद,उसे धीरे धीरे प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिए।
हृद्यविच्छिन्नमोंकारं घण्टानादं बिसोर्णवत् ।प्राणेनोदीर्य तत्राथ पुनः संवेशयेत्स्वरम् ॥
३४॥
हृदि--हृदय में; अविच्छिन्नम्-- अनवरत; ओंकारम्-- ३४»कार की पवित्र ध्वनि; घण्टा--घण्टे की तरह; नादम्-- ध्वनि; बिस-ऊर्ण-वबत्--कमल वृन्त तक जाने वाले रेशे की तरह; प्राणेन--प्राण-वायु द्वारा; उदीर्य-- धकेल कर; तत्र--वहाँ ( बारह अंगुलदूरी पर ); अथ--इस प्रकार; पुन:--फिर; संवेशयेत्--जोड़ दे; स्वरम्--अनुस्वार समेत पन्द्रह ध्वनियाँ ॥
मूलाधार चक्र से शुरू करके, मनुष्य को चाहिए कि प्राण-वायु को कमल नाल के तनुओंकी तरह ऊपर की ओर लगातार ले जाय जब तक कि वह हृदय तक न पहुँच जाय जहाँ पर ३४»क पवित्र अक्षर घंटे की ध्वनि की तरह विद्यमान है। इस तरह उसे इस अक्षर को लगातार ऊपरकी ओर बारह अंगुल की दूरी तक उठाते जाना चाहिए और वहाँ पर ३»कार को अनुस्वार समेतउत्पन्न पन्द्रह ध्वनियों से जोड़ देना चाहिए।
एवं प्रणवसंयुक्त प्राणमेव समभ्यसेत् ।दशकृत्वस्त्रिषवणं मासादर्वाग्जितानिल: ॥
३५॥
एवम्--इस प्रकार; प्रणव--» अक्षर से; संयुक्तम्--जुड़ा हुआ; प्राणम्--शारीरिक श्वास को वश में करने की प्राणायामविधि; एब--निस्सन्देह; समभ्यसेत्--सतर्कता से अभ्यास करे; दश-कृत्व:--दस बार; त्रि-षबणम्--सूर्योदय, दोपहर तथासूर्यास्त के समय; मासात्--एक मास के; अर्वाक्ृ-पश्चात्; जित--जीत लेगा; अनिल:--प्राण-वायु |
'कार में स्थिर होकर मनुष्य को चाहिए कि सूर्योदय, दोपहर तथा सूर्यास्त के समय दस-दस बार प्राणायाम का सतर्कतापूर्वक अभ्यास करे। इस तरह एक महीने के बाद वह प्राण-वायुपर विजय पा लेगा।
हत्पुण्डरीकमन्तःस्थमूर्ध्वनालमधोमुखम् ।ध्यात्वोर्ध्वमुखमुन्रिद्रमष्टपत्रं सकर्णिकम् ।कर्णिकायां न्यसेत्सूर्यसोमाग्नीनुत्तरोत्तरम् ॥
३६॥
वहििमध्ये स्मरेद्रूपं ममैतद्धयानमड्रलम् ।समं प्रशान्तं सुमुखं दीर्घचारुचतुर्भुजम् ॥
३७॥
सुचारुसुन्दरग्रीव॑ सुकपोलं शुचिस्मितम् ।समानकर्णविन्यस्तस्फुरन्मकरकुण्डलम् ॥
३८॥
हेमाम्बरं घनश्यामं श्रीवत्सअश्रीनिकेतनम् ।शद्भुचक्रगदापदावनमालाविभूषितम् ॥
३९॥
नूपुरैर्विलसत्पादं कौस्तुभप्रभया युतम् ।झुमत्किरीटकटककटिसूत्राड्दायुतम् ॥
४०॥
सर्वाड्रसुन्दरं हृदय प्रसादसुमुखेक्षनम् ।सुकुमारमभिध्यायेत्सर्वाड्रिषु मनो दधत् ॥
४१॥
इन्द्रियाणीन्द्रिया रथ भ्यो मनसाकृष्य तनमन: ।बुद्धया सारथिना धीर: प्रणयेन्मयि सर्वतः ॥
४२॥
हत्--हृदय में; पुण्डकीकम्--कमल का फूल; अन्तः-स्थम्--शरीर के भीतर स्थित; ऊर्ध्व-नालम्--कमल नाल को ऊपरउठाये; अध:-मुखम्--आँखें आधी बन्द किये हुए तथा नाक के सिरे पर ताकते हुए; ध्यात्वा--ध्यान में मन को स्थिर करके;ऊर्ध्व-मुखम्--जाग्रत; उन्निद्रमू--बिना ऊँघे, सचेष्ट; अष्ट-पत्रमू--आठ पंखुड़ियों वाला; स-कर्णिकम्--कोशयुक्त;कर्णिकायाम्--कोश के भीतर; न्यसेत्--एकाग्र होकर रखे; सूर्य--सूर्य; सोम--चन्द्रमा; अग्नीन्ू--तथा अग्नि; उत्तर-उत्तरमू--एक के बाद एक, इस क्रम से; वह्नि-मध्ये--अग्नि के भीतर; स्मरेत्--ध्यान करे; रूपम्--स्वरूप पर; मम--मेरे;एतत्--यह; ध्यान-मड्रलम्-ध्यान की पवित्र वस्तु; समम्-शरीर के सभी अंगएकसमान, संतुलित; प्रशान्तम्--शान्त; सु-मुखम्- प्रसन्न; दीर्घ-चारु-चतु:-भुजम्--चार सुन्दर लम्बी भुजाओं वाले; सु-चारु--मनोहारी; सुन्दर--सुन्दर; ग्रीवम्-गर्दन;सु-कपोलमू--सुन्दर मस्तक; शुचि-स्मितम्--शुद्ध मुस्कान से युक्त; समान--सहश; कर्ण--कान में; विन्यस्त--स्थित;स्फुरतू--चमचमाते; मकर--मगर के आकार के; कुण्डलम्--कुण्डल; हेम--सुनहरे रंग के; अम्बरम्--वस्त्र; घन-श्यामम्--बादलों जैसे श्यामरंग के; श्री-वत्स-- भगवान् के वक्षस्थल पर अद्वितीय घुंघराले बाल; श्री-निकेतनमू--लक्ष्मी के धाम;शब्गु--शंख; चक्र --सुदर्शन चक्र; गदा--गदा; पद्मय--कमल; वन-माला--तथा जंगली फूलों की माला से; विभूषितम्--अलंकृत; नूपुरः--घुंघरूओं तथा पायजेबों से; विलसत्--चमकते हुए; पादमू--चरणकमल; कौस्तुभ--कौस्तुभ मणि के;प्रभया--तेज से; युतम्--युक्त; द्युमत्--चमकता; किरीट--मुकुट; कटक--सुनहले बाजूबन्द; कटि-सूत्र--करधनी;अड्डद--बाजूबन्द; आयुतम्--से युक्त; सर्व-अड़--शरीर के सारे अंग; सुन्दरम्--सुन्दर; हृद्यमू--मनोहर; प्रसाद--कृपा से;सुमुख--हँसीला; ईक्षणम्--चितवन; सु-कुमारम्ू-- अत्यन्त नाजुक; अभिध्यायेत्-- ध्यान करे; सर्व-अड्डेषु--शरीर के सारेअंगों में; मनः--मन को; दधत्--रखते हुए; इन्द्रियाणि -- भौतिक इन्द्रियों को; इन्द्रिय-अर्थभ्य: --इन्द्रिय-विषयों से; मनसा--मन से; आकृष्य--पीछे खींच कर; तत्--वह; मन:--मन; बुद्धय्या--बुद्धि से; सारधिना--रथ के सारथी की-सी; धीर: --गम्भीर तथा संयमित होकर; प्रणयेत्--प्रबलतापूर्वक आगे बढ़े; मयि--मुझमें; सर्वतः--शरीर के सारे अंगों में
आँखों को अधखुली रखते हुए तथा उन्हें अपनी नाक के सिरे पर स्थिर करके, अत्यन्तजागरूक रह कर, मनुष्य को हृदय के भीतर स्थित कमल के फूल का ध्यान करना चाहिए। इसकमल के फूल में आठ पंखड़ियाँ हैं और यह सीधे डंठल पर स्थित है। उसे सूर्य, चन्द्रमा तथाअग्नि को उस कमल-पुष्प के कोश में एक-एक करके रखते हुए, उनका ध्यान करना चाहिए।अग्नि में मेरे दिव्य स्वरूप को स्थापित करते हुए, उसे समस्त ध्यान का शुभ लक्ष्य मान करउसका ध्यान करना चाहिए। यह स्वरूप अत्यन्त समरूप, भद्र तथा प्रसन्न होता है। इसकी चारसुन्दर लम्बी भुजाएँ, सुहावनी सुन्दर गर्दन, सुन्दर मस्तक, शुद्ध हँसी तथा दोनों कानों में लटकनेवाले मकराकृति के चमचमाते कुण्डल होते हैं। यह आध्यात्मिक स्वरूप वर्षा के मेघ की भाँतिश्यामल रंग वाला है और सुनहले-पीले रेशम से आवृत है। इस रूप के वक्षस्थल पर श्रीवत्सतथा लक्ष्मी का आवास है और यह स्वरूप शंख, चक्र, गदा, कमल-पुष्प तथा जंगली फूलों कीमाला से सुसज्जित है। इसके दो चमकीले चरणकमल घुंघरूओं तथा पायजेबों से विभूषित हैंऔर इस रूप से कौस्तुभ मणि के साथ ही तेजवान मुकुट भी प्रकट होता है। इसके कूल्हेसुनहली करधनी से सुन्दर लगते हैं और भुजाएँ मूल्यवान बाजूबन्दों से सज्जित हैं। इस सुन्दर रूपके सभी अंग हृदय को मोहने वाले हैं और इसका मुखड़ा दयामय चितवन से सुशोभित है।मनुष्य को चाहिए कि इन्द्रिय-विषयों से इन्द्रियों को पीछे हटाकर, गम्भीर तथा आत्मसंयमी बनेऔर मेरे दिव्य शरीर के सारे अंगों पर मन को हढ़ता से स्थिर करने के लिए बुद्धि का उपयोग करे। इस तरह उसे मेरे अत्यन्त मृदुल दिव्य स्वरूप का ध्यान करना चाहिए।
तत्सर्वव्यापकं चित्तमाकृष्यैकत्र धारयेत् ।नान्यानि चिन्तयेद्धूयः सुस्मितं भावयेन्मुखम् ॥
४३॥
तत्--इसलिए; सर्व--शरीर के सारे भागों में; व्यापकम्--फैली; चित्तमू--चेतना; आकृष्य--खींच कर; एकत्र--एक स्थानपर; धारयेत्--एकाग्र करे; न--नहीं; अन्यानि--शरीर के अन्य अंगों को; चिन्तयेत्-- ध्यानकरे; भूय: --फिर; सु-स्मितम्--अद्भुत मुस्कान या हँसी से युक्त; भावयेत्--एकाग्र करे; मुखम्--मुँह पर।
तब वह अपनी चेतना को दिव्य शरीर के समस्त अंगों से हटा ले। उस समय उसे भगवान् केअद्भुत हँसी से युक्त मुख का ही ध्यान करना चाहिए।
तत्र लब्धपदं चित्तमाकृष्य व्योम्नि धारयेत् ।तच्च त्यक्त्वा मदारोहो न किल्लिदपि चिन्तयेत् ॥
४४॥
तत्र-- भगवान् के मुख का ध्यान करते हुए; लब्ध-पदम्--स्थापित होकर; चित्तम्ू--चेतना; आकृष्य--खींच कर; व्योम्नि--आकाश में; धारयेत्--ध्यान करे; तत्--आकाश का ऐसा ध्यान; च--भी; त्यक्त्वा--त्याग कर; मत्--मुझ तक; आरोह:--चढ़ कर; न--नहीं; किल्लित्ू--कुछ; अपि-- भी; चिन्तयेत्--चिन्तन करे।
भगवान् के मुख का ध्यान करते हुए, उसे चाहिए कि वह अपनी चेतना को हटाकर उसेआकाश में स्थिर करे। तब ऐसे ध्यान को त्याग कर, वह मुझमें स्थिर हो जाय और ध्यान-विधिका सर्वथा परित्याग कर दे।
एवं समाहितमतिमामेवात्मानमात्मनि ।विच॒ष्टे मयि सर्वात्मन्ज्योति्ज्योतिषि संयुतम् ॥
४५॥
एवम्--इस प्रकार; समाहित--पूर्णतया स्थिर; मति:ः--चेतना; माम्--मुझको; एब--निस्सन्देह; आत्मानम्--आत्मा;आत्मनि--आत्मा के भीतर; विचष्टे--देखता है; मयि--मुझमें; सर्व-आत्मन्-- भगवान् में; ज्योति:--सूर्य की किरणें;ज्योतिषि--सूर्य के भीतर; संयुतम्--संयुक्त |
जिसने अपने मन को मुझमें पूरी तरह स्थिर कर लिया है उसे चाहिए कि अपनी आत्मा केभीतर मुझ भगवान् को देखे और व्यष्टि आत्मा को मेरे भीतर देखे। इस तरह वह आत्माओं कोपरमात्मा से संयुक्त देखता है, जिस तरह सूर्य की किरणों को सूर्य से पूर्णतया संयुक्त देखा जाताहै।
ध्यानेनेत्थं सुतीत्रेण युज्ञतो योगिनो मन: ।संयास्यत्याशु निर्वाणं द्रव्य ज्ञानक्रियाभ्रम: ॥
४६॥
ध्यानेन--ध्यान से; इत्थम्ू--जैसाकि बतलाया गया; सु-तीब्रेण-- अत्यन्त एकाग्र; युज्धत:ः--अभ्यास करने वाले; योगिन: --योगी का; मनः--मन; संयास्यति--एकसाथ जायेगा; आशु--तेजी से; निर्वाणम्--अन्त के लिए; द्रव्य-ज्ञान-क्रिया-- भौतिकवस्तुओं की अनुभूति, ज्ञान तथा कर्म पर आधारित; भ्रम:-- भ्रम, मायामय पहचान
जब योगी इस तरह अत्यधिक एकाग्र ध्यान से अपने मन को अपने वश में करता है, तोभौतिक वस्तुओं, ज्ञान तथा कर्म से उसकी भ्रामक पहचान तुरन्त समाप्त हो जाती है।
